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  • स्क्रिप्ट की डिमांड नहीं थी काला चश्मा! सलमान खान की एक परेशानी ने बदल दिया ‘रेडी’ का पूरा सीन, जानें अनसुना किस्सा

    स्क्रिप्ट की डिमांड नहीं थी काला चश्मा! सलमान खान की एक परेशानी ने बदल दिया ‘रेडी’ का पूरा सीन, जानें अनसुना किस्सा


    नई दिल्ली । साल 2011 में रिलीज हुई सलमान खान और असिन की सुपरहिट फिल्म रेडी ने दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया था। फिल्म की कहानी से लेकर इसके कॉमेडी सीन्स और दमदार स्टारकास्ट तक ने दर्शकों के बीच खास पहचान बनाई। सलमान खान के साथ परेश रावल, महेश मांजरेकर, मनोज जोशी, शरत सक्सेना और कई कलाकारों ने फिल्म में शानदार काम किया था। रेडी के कई सीन आज भी लोगों को हंसाते हैं, लेकिन फिल्म का एक ऐसा सीन है जिसमें सलमान खान समेत पूरी कास्ट काला चश्मा लगाए नजर आती है। देखने में यह किसी खास कहानी या स्क्रिप्ट की जरूरत जैसा लगता है, लेकिन इसके पीछे की असली वजह बेहद दिलचस्प है।

    दरअसल रेडी की शूटिंग साल 2010 में श्रीलंका में चल रही थी। वहां फिल्म के लिए बड़ा सेट तैयार किया गया था और एक अहम सीन की शूटिंग होने वाली थी। सेट पर सलमान खान समेत फिल्म की बड़ी स्टारकास्ट मौजूद थी और लगभग सारी तैयारियां पूरी हो चुकी थीं। तभी शूटिंग शुरू होने से पहले सलमान खान ने निर्देशक अनीस बज्मी को बताया कि उनकी आंख में इन्फेक्शन हो गया है। इस वजह से उनकी आंख की स्थिति ऐसी नहीं थी कि वह सामान्य तरीके से कैमरे के सामने सीन शूट कर सकें।

    यह सुनकर अनीस बज्मी के सामने बड़ी परेशानी खड़ी हो गई। सीन में सिर्फ सलमान खान नहीं बल्कि कई बड़े कलाकार शामिल थे। सेट तैयार था और शूटिंग को रोकने या कैंसिल करने का मतलब पूरी योजना में बदलाव करना था। इतने बड़े सेट और पूरी स्टारकास्ट के साथ शूटिंग टालना आसान नहीं था। ऐसे में निर्देशक ने इस समस्या का ऐसा समाधान निकाला जिसने मजबूरी को फिल्म के एक यादगार और मजेदार सीन में बदल दिया।

    अनीस बज्मी ने फैसला किया कि सलमान खान को काला चश्मा पहना दिया जाए ताकि उनकी आंख का इन्फेक्शन कैमरे में नजर न आए। लेकिन यहां एक नई समस्या सामने आ गई। फिल्म में सलमान के किरदार प्रेम का लुक पहले से अलग तरह का था और अचानक सिर्फ उन्हें काला चश्मा पहनाना कहानी में अजीब लग सकता था। तब निर्देशक ने इस मजबूरी को पूरी तरह कहानी का हिस्सा बनाने का फैसला किया।

    इसके बाद सिर्फ सलमान ही नहीं बल्कि सीन में मौजूद पूरी कास्ट को काला चश्मा पहना दिया गया। लेकिन दर्शकों के मन में यह सवाल न उठे कि आखिर सभी लोग अचानक काला चश्मा क्यों लगाए हुए हैं, इसके लिए एक खास डायलॉग भी तैयार किया गया। फिल्म के सीन में सलमान का किरदार प्रेम सभी को काला चश्मा पहनाता है। जब उनसे इसका कारण पूछा जाता है तो प्रेम अपनी मजेदार कहानी और KK मोदी की शर्तों का हवाला देते हुए कहता है कि ऐसी बातें सामने आई हैं जिनके बाद कोई किसी से नजरें नहीं मिला पाएगा। इसी वजह से सभी को काला चश्मा पहनाया गया है।

    यही वह शानदार रचनात्मकता थी जिसने शूटिंग की एक बड़ी परेशानी को पर्दे पर पूरी तरह स्वाभाविक बना दिया। शायद यही कारण है कि फिल्म देखने वाले ज्यादातर दर्शकों को कभी एहसास ही नहीं हुआ कि काला चश्मा पहनने वाला यह पूरा सीन किसी पहले से तय स्क्रिप्ट का हिस्सा नहीं था। सलमान खान की आंख के इन्फेक्शन से पैदा हुई मजबूरी को अनीस बज्मी ने अपने अनुभव और तुरंत सोचने की क्षमता से ऐसा रूप दिया कि वह फिल्म का यादगार हिस्सा बन गया।

    रेडी का यह किस्सा यह भी साबित करता है कि फिल्मों की दुनिया में कई बार सबसे यादगार दृश्य पूरी योजना से नहीं बल्कि अचानक सामने आई मुश्किलों से पैदा होते हैं। सलमान की आंख का इन्फेक्शन उस दिन शूटिंग के लिए बड़ी समस्या बन सकता था, लेकिन निर्देशक के एक शानदार आइडिया ने इसे फिल्म की कहानी में इस तरह पिरो दिया कि दर्शकों को आज तक इसके पीछे छिपी असली वजह का अंदाजा नहीं हुआ।

  • लाल साड़ी और वो खौफनाक चीख आज भी नहीं भूल पाए दर्शक ऐसे बना था लज्जा शंकर पांडे का आइकॉनिक सीन

    लाल साड़ी और वो खौफनाक चीख आज भी नहीं भूल पाए दर्शक ऐसे बना था लज्जा शंकर पांडे का आइकॉनिक सीन


    नई दिल्ली। हिंदी सिनेमा में कुछ किरदार ऐसे होते हैं जो फिल्म खत्म होने के बाद भी दर्शकों के जेहन से नहीं निकलते। साल 1999 में रिलीज हुई फिल्म संघर्ष का लज्जा शंकर पांडे भी ऐसा ही किरदार था। आशुतोष राणा ने इस भूमिका में ऐसा खौफ पैदा किया था कि उस दौर में सिनेमाघरों में बैठे दर्शक तक उनकी आवाज और हावभाव देखकर सहम जाते थे। आज फिल्म को रिलीज हुए कई साल बीत चुके हैं लेकिन लज्जा शंकर पांडे का नाम आते ही लोगों के सामने वही डरावना चेहरा और जीभ हिलाकर निकाली गई उनकी खौफनाक चीख याद आ जाती है।

    इस किरदार की सबसे खास बात यह थी कि इसे डरावना बनाने के लिए किसी बड़े स्पेशल इफेक्ट या आधुनिक तकनीक का सहारा नहीं लिया गया था। आशुतोष राणा ने अपने अभिनय और आवाज के दम पर ऐसा माहौल तैयार किया जो आज भी याद किया जाता है। खास बात यह है कि जिस सीन को देखकर दर्शकों की चीख निकल जाती थी उसके लिए खुद आशुतोष राणा ने कोई रिहर्सल नहीं की थी।

    फिल्म की कहानी महेश भट्ट ने लिखी थी और तनुजा चंद्रा ने इसका निर्देशन किया था। कहानी एक ऐसे खतरनाक तांत्रिक की थी जो अमर होने की सनक में बच्चों की बलि देता है। ऐसे किरदार के लिए सिर्फ संवाद बोलना काफी नहीं था। उसे पर्दे पर असामान्य और भयावह दिखाना जरूरी था। महेश भट्ट चाहते थे कि लज्जा शंकर पांडे की कोई ऐसी पहचान हो जिसे दर्शक लंबे समय तक भूल न पाएं।

    यहीं से आशुतोष राणा की कल्पना ने इस किरदार को एक अलग पहचान दी। उन्होंने सोचा कि लज्जा शंकर आम इंसानों की तरह प्रतिक्रिया देने वाला व्यक्ति नहीं होना चाहिए। उसकी हर हरकत उसके भीतर की विकृत मानसिकता को दिखाए। इसी सोच के साथ उन्होंने जीभ हिलाते हुए एक अजीब और डरावनी चीख निकालने का अंदाज तैयार किया।

    इस आवाज के पीछे उनके बचपन की यादों का भी बड़ा योगदान था। मध्य प्रदेश के गाडरवारा में बीता उनका बचपन उन्हें गांव की लोक परंपराओं और अनुष्ठानों के करीब लेकर गया था। उन्होंने वहां तांत्रिक और भगतों को अलग तरह की आवाजें निकालते हुए देखा था। रामलीला में रावण का किरदार निभाने का अनुभव और बाद में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से मिली अभिनय की ट्रेनिंग ने भी उनके भीतर के कलाकार को मजबूत किया। इन्हीं अनुभवों को उन्होंने लज्जा शंकर पांडे की मानसिकता के साथ जोड़ दिया।

    जब इस सीन की शूटिंग का समय आया तो आशुतोष राणा ने अपने इस प्रयोग को सीधे कैमरे के सामने करने का फैसला किया। कैमरा शुरू हुआ और उन्होंने अचानक जीभ हिलाते हुए वह खौफनाक चीख निकाल दी। सेट पर मौजूद लोगों के लिए यह पूरी तरह अप्रत्याशित था। कुछ पल के लिए वहां ऐसा सन्नाटा छा गया जैसे हर कोई उस आवाज के असर में आ गया हो। कट होने के बाद भी टीम को कुछ क्षण समझ नहीं आया कि प्रतिक्रिया कैसे दी जाए। फिर सेट पर तालियों की गूंज सुनाई दी।

    लज्जा शंकर पांडे के किरदार की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। उस समय आशुतोष राणा को खबर मिली थी कि यह भूमिका किसी बड़े स्टार को दी जा सकती है। वह दूसरी फिल्म की शूटिंग के लिए हैदराबाद में थे। खबर मिलते ही वह मुंबई पहुंचे और महेश भट्ट से मुलाकात की। बाद में उन्हें पता चला कि यह जानकारी गलत थी। महेश भट्ट ने साफ कर दिया कि लज्जा शंकर पांडे का किरदार आशुतोष राणा को ध्यान में रखकर ही लिखा गया था।

    फिल्म रिलीज के समय भले ही बॉक्स ऑफिस पर उम्मीद के मुताबिक बड़ी सफलता हासिल नहीं कर पाई लेकिन समय के साथ संघर्ष को एक अलग पहचान मिली। टेलीविजन और बाद में डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए नई पीढ़ी ने भी फिल्म को देखा। आज लज्जा शंकर पांडे हिंदी सिनेमा के यादगार खलनायकों में गिना जाता है। आशुतोष राणा ने यह साबित कर दिया कि डर पैदा करने के लिए हमेशा तकनीक की जरूरत नहीं होती। कई बार एक कलाकार की आंखें उसकी आवाज और उसकी कल्पना ही दर्शकों की रीढ़ में सिहरन पैदा करने के लिए काफी होती है।

  • हेमा मालिनी संग सीन देने में हुई झिझक! नसीरुद्दीन शाह के इनकार के बाद मेकर्स ने निकाला अनोखा रास्ता

    हेमा मालिनी संग सीन देने में हुई झिझक! नसीरुद्दीन शाह के इनकार के बाद मेकर्स ने निकाला अनोखा रास्ता


    नई दिल्ली। हिंदी सिनेमा में कई बार ऐसे किस्से सामने आते हैं जो फिल्मों से ज्यादा उनकी शूटिंग के दौरान घटी घटनाओं की वजह से चर्चा में रहते हैं। कलाकार अक्सर अपने किरदार की जरूरत के अनुसार चुनौतीपूर्ण दृश्य निभाते हैं लेकिन कुछ मौके ऐसे भी आए जब कलाकारों ने व्यक्तिगत असहजता के कारण कुछ दृश्यों को करने से परहेज किया। ऐसा ही एक दिलचस्प किस्सा साल 1988 में रिलीज हुई फिल्म रिहाई से जुड़ा है जिसमें हेमा मालिनी और नसीरुद्दीन शाह अहम भूमिकाओं में नजर आए थे।

    बताया जाता है कि फिल्म की कहानी के अनुसार नसीरुद्दीन शाह और हेमा मालिनी के बीच एक रोमांटिक दृश्य फिल्माया जाना था। जब अभिनेता को इस दृश्य के बारे में जानकारी मिली तो उन्होंने इसे करने में असहजता जताई। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार नसीरुद्दीन शाह का मानना था कि हेमा मालिनी जैसी वरिष्ठ और प्रतिष्ठित अभिनेत्री के साथ इस तरह का दृश्य करना उनके लिए सहज नहीं था। उन्होंने निर्देशक से अपनी झिझक भी साझा की।

    कहा जाता है कि फिल्म की निर्देशक अरुणा राजे और स्वयं हेमा मालिनी ने उन्हें समझाने का प्रयास किया ताकि दृश्य कहानी की जरूरत के अनुसार पूरा किया जा सके। हालांकि अभिनेता अपने फैसले पर कायम रहे। इसके बाद फिल्म की टीम ने वैकल्पिक तरीका अपनाते हुए संबंधित दृश्य को बॉडी डबल की मदद से फिल्माने का निर्णय लिया। इस तरह फिल्म की शूटिंग पूरी की गई और कहानी के प्रवाह को भी बनाए रखा गया।

    फिल्म रिहाई अपने समय की अलग विषयवस्तु वाली फिल्मों में गिनी जाती है। इसमें ग्रामीण समाज महिलाओं के अकेलेपन सामाजिक बदलाव और रिश्तों की जटिलताओं को संवेदनशील तरीके से प्रस्तुत किया गया था। फिल्म में हेमा मालिनी के अलावा विनोद खन्ना नसीरुद्दीन शाह और नीना गुप्ता जैसे कलाकारों ने महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं। समीक्षकों ने इसकी कहानी और अभिनय की सराहना की थी।

    रिपोर्टों के मुताबिक इस फिल्म के लिए शुरुआत में अभिनेत्री स्मिता पाटिल पर भी विचार किया गया था। बाद में यह भूमिका हेमा मालिनी को मिली और उन्होंने मजबूत कहानी तथा महिला निर्देशक के साथ काम करने की इच्छा के चलते फिल्म स्वीकार की। एक इंटरव्यू में हेमा मालिनी ने भी बताया था कि अरुणा राजे के निर्देशन में काम करना उनके लिए एक विशेष अनुभव था और यही वजह थी कि उन्होंने यह फिल्म करने का फैसला लिया।

    आज भी रिहाई केवल अपनी कहानी के लिए ही नहीं बल्कि शूटिंग से जुड़े इन दिलचस्प किस्सों के कारण भी याद की जाती है। यह घटना इस बात का उदाहरण मानी जाती है कि कलाकारों की व्यक्तिगत सहजता और पेशेवर जरूरतों के बीच संतुलन बनाने के लिए फिल्म निर्माण के दौरान कई बार अलग-अलग समाधान तलाशने पड़ते हैं।

  • जब अपनी ही फिल्म के फ्लॉप होने की दुआ मांगने लगे थे किशोर कुमार किस्मत ने बना दिया सुपरहिट

    जब अपनी ही फिल्म के फ्लॉप होने की दुआ मांगने लगे थे किशोर कुमार किस्मत ने बना दिया सुपरहिट


    नई दिल्ली। हिंदी सिनेमा के महान गायक अभिनेता और निर्माता किशोर कुमार अपनी शानदार गायकी के साथ साथ अपने अनोखे स्वभाव और मजेदार किस्सों के लिए भी जाने जाते थे। उनके जीवन से जुड़ी कई घटनाएं आज भी लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी रहती हैं। ऐसा ही एक दिलचस्प किस्सा उनकी सुपरहिट फिल्म चलती का नाम गाड़ी से जुड़ा है। कहा जाता है कि इस फिल्म के निर्माण के दौरान किशोर कुमार चाहते थे कि उनकी अपनी ही फिल्म बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप हो जाए। हालांकि किस्मत को कुछ और ही मंजूर था और यही फिल्म बाद में उनकी सबसे बड़ी सफलताओं में शामिल हो गई।

    बताया जाता है कि वर्ष 1958 के दौरान किशोर कुमार आयकर से जुड़े मामलों में उलझे हुए थे। उन पर टैक्स का बड़ा बकाया था और इसी परेशानी से निकलने के लिए उन्होंने एक अलग ही योजना बनाई। उनका विचार था कि यदि वह एक ऐसी फिल्म बनाएंगे जो बॉक्स ऑफिस पर असफल हो जाएगी तो उन्हें भारी आर्थिक नुकसान होगा। इस नुकसान को आय में समायोजित करके टैक्स का बोझ कम किया जा सकेगा।

    इसी सोच के साथ उन्होंने निर्देशक सत्येन बोस के साथ मिलकर चलती का नाम गाड़ी का निर्माण शुरू किया। फिल्म में मधुबाला को मुख्य भूमिका दी गई जबकि किशोर कुमार अपने भाइयों के साथ पर्दे पर नजर आए। इस फिल्म का निर्माण हिंदी के साथ साथ बंगाली भाषा में भी किया गया जहां इसे लुकचुरी नाम से रिलीज किया गया।

    कहा जाता है कि किशोर कुमार मन ही मन यही चाहते थे कि फिल्म दर्शकों को पसंद न आए और उनकी योजना सफल हो जाए। लेकिन रिलीज के बाद कहानी पूरी तरह बदल गई। फिल्म को दर्शकों का जबरदस्त प्यार मिला और यह उस दौर की सबसे बड़ी सफल फिल्मों में शामिल हो गई। अपनी शानदार कॉमेडी दमदार अभिनय और यादगार गीतों की वजह से फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर शानदार कमाई की और लंबे समय तक सिनेमाघरों में चलती रही।

    करीब 35 लाख रुपये के बजट में बनी इस फिल्म ने भारतीय बॉक्स ऑफिस पर लगभग एक करोड़ पच्चीस लाख रुपये का कारोबार किया जबकि दुनिया भर में इसकी कमाई करीब ढाई करोड़ रुपये तक पहुंच गई। उस समय के हिसाब से यह बेहद बड़ी सफलता मानी गई। फिल्म की अप्रत्याशित कामयाबी ने किशोर कुमार की टैक्स बचाने की पूरी योजना पर पानी फेर दिया क्योंकि नुकसान दिखाने की जगह उन्हें बड़ा मुनाफा हो गया।

    बताया जाता है कि आयकर से जुड़ा उनका मामला लंबे समय तक अदालतों में चलता रहा। हालांकि इस पूरे घटनाक्रम का सकारात्मक पहलू यह रहा कि भारतीय सिनेमा को एक ऐसी क्लासिक कॉमेडी फिल्म मिली जिसे आज भी दर्शक पूरे परिवार के साथ देखना पसंद करते हैं। चलती का नाम गाड़ी समय के साथ एक यादगार फिल्म बन गई और इसके गीत तथा किरदार आज भी लोगों की यादों में ताजा हैं। यही वजह है कि किशोर कुमार का यह अनोखा किस्सा आज भी फिल्म प्रेमियों के बीच मुस्कान बिखेर देता है।

  • मुन्ना भाई एमबीबीएस में नहीं दिखा वह सीन जिसने बाद में 3 इडियट्स के क्लाइमैक्स को यादगार बना दिया

    मुन्ना भाई एमबीबीएस में नहीं दिखा वह सीन जिसने बाद में 3 इडियट्स के क्लाइमैक्स को यादगार बना दिया


    नई दिल्ली । हिंदी सिनेमा की सबसे लोकप्रिय फिल्मों में शामिल मुन्ना भाई एमबीबीएस और 3 इडियट्स के बीच एक दिलचस्प कड़ी सामने आई है। मशहूर निर्देशक राजकुमार हिरानी ने खुलासा किया है कि 3 इडियट्स का एक बेहद चर्चित और भावुक दृश्य दरअसल पहले मुन्ना भाई एमबीबीएस की स्क्रिप्ट का हिस्सा था। हालांकि उस समय इसे फिल्म से हटा दिया गया लेकिन वर्षों बाद यही विचार नए रूप में 3 इडियट्स में नजर आया और दर्शकों की खूब वाहवाही बटोरने में सफल रहा।

    साल 2003 में रिलीज हुई मुन्ना भाई एमबीबीएस ने भारतीय सिनेमा में एक नया अध्याय लिखा था। संजय दत्त और अरशद वारसी की जोड़ी ने दर्शकों को हंसाया भी और भावुक भी किया। फिल्म की कहानी और उसके किरदार आज भी लोगों के दिलों में बसे हुए हैं। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस फिल्म की स्क्रिप्ट में कई ऐसे दृश्य भी लिखे गए थे जो बाद में अंतिम संस्करण का हिस्सा नहीं बन पाए।

    राजकुमार हिरानी ने एक इंटरव्यू में बताया था कि उन्होंने मुन्ना भाई एमबीबीएस के लिए एक खास दृश्य लिखा था जो मुख्य किरदार मुन्ना के जीवन में बड़ा बदलाव लाने वाला था। कहानी के अनुसार एक रात मुन्ना और सर्किट शराब पीकर सड़क पर घूम रहे होते हैं। शहर में कर्फ्यू लगा होता है और सन्नाटा पसरा होता है। तभी एक छोटा बच्चा घबराया हुआ उनके पास आता है और बताता है कि उसकी मां को प्रसव पीड़ा हो रही है लेकिन कोई एम्बुलेंस या डॉक्टर मदद के लिए उपलब्ध नहीं है।

    जब बच्चे को पता चलता है कि मुन्ना डॉक्टर बनने की पढ़ाई कर रहा है तो वह उसे अपने साथ चलने के लिए मजबूर कर देता है। मुन्ना के पास कोई वास्तविक चिकित्सकीय अनुभव नहीं होता लेकिन वह फिल्मों में देखी गई बातों के आधार पर मदद करने की कोशिश करता है। वह लोगों से गर्म पानी और जरूरी सामान लाने को कहता है और हालात को संभालने का प्रयास करता है।

    कहानी के अनुसार अंततः बच्चे का जन्म हो जाता है और जब मुन्ना पहली बार नवजात को अपनी गोद में उठाता है तब उसके भीतर एक बड़ा भावनात्मक परिवर्तन आता है। उसी पल उसे जीवन की कीमत और अपने पेशे की जिम्मेदारी का एहसास होता है। यही दृश्य उसके किरदार के विकास में महत्वपूर्ण मोड़ बनने वाला था।

    हालांकि बाद में यह पूरा दृश्य फिल्म से हटा दिया गया। लेकिन राजकुमार हिरानी को इस विचार की ताकत पर पूरा भरोसा था। इसलिए वर्षों बाद जब उन्होंने 3 इडियट्स बनाई तो इसी भावनात्मक आधार को नए अंदाज में इस्तेमाल किया। फिल्म में रैंचो आपात स्थिति में पिया की बहन की डिलीवरी करवाता है। यह दृश्य न सिर्फ फिल्म के सबसे यादगार पलों में शामिल हुआ बल्कि इसके जरिए वायरस के किरदार का हृदय परिवर्तन भी दिखाया गया।

    3 इडियट्स में यह दृश्य दर्शकों के लिए रोमांच भावनाओं और प्रेरणा का अनूठा मिश्रण साबित हुआ। शायद यही वजह है कि आज भी यह सीन फिल्म के सबसे चर्चित हिस्सों में गिना जाता है।

    राजकुमार हिरानी का यह खुलासा बताता है कि कई बार फिल्म निर्माण के दौरान हटाए गए विचार भी वर्षों बाद नई कहानी में जगह पाकर इतिहास रच देते हैं। मुन्ना भाई एमबीबीएस से निकलकर 3 इडियट्स तक पहुंचा यह दृश्य इसका बेहतरीन उदाहरण है।

  • जब रिकॉर्डिंग स्टूडियो में लेट गए थे किशोर कुमार, और बन गया सदाबहार सुपरहिट गाना

    जब रिकॉर्डिंग स्टूडियो में लेट गए थे किशोर कुमार, और बन गया सदाबहार सुपरहिट गाना


    नई दिल्ली । हिंदी फिल्म संगीत के इतिहास में कई ऐसे किस्से दर्ज हैं, जो कलाकारों की प्रतिभा और उनके जुनून को नई पहचान देते हैं। ऐसा ही एक दिलचस्प किस्सा महान गायक किशोर कुमार और फिल्म ‘शराबी’ के मशहूर गीत ‘इंतहा हो गई इंतजार की’ से जुड़ा हुआ है। यह गीत आज भी संगीत प्रेमियों की पसंदीदा सूची में शामिल है, लेकिन इसके पीछे की कहानी बहुत कम लोग जानते हैं।

    साल 1984 में निर्देशक प्रकाश मेहरा अपनी महत्वाकांक्षी फिल्म ‘शराबी’ का निर्माण कर रहे थे। फिल्म में अमिताभ बच्चन मुख्य भूमिका में थे और उनके किरदार की भावनाओं को दर्शाने के लिए गीतकार अंजान ने एक बेहतरीन गीत लिखा था। संगीतकार बप्पी लहरी ने इस गीत को मधुर धुन से सजाया। अब जरूरत थी ऐसी आवाज की, जो इस गीत की आत्मा को जीवंत कर सके, और इसके लिए चुना गया नाम था किशोर कुमार।

    जब किशोर कुमार के सामने यह गीत रिकॉर्डिंग के लिए रखा गया, तो उन्होंने शुरुआत में इसे गाने से इनकार कर दिया। रिकॉर्डिंग स्टूडियो में मौजूद लोग हैरान रह गए। कुछ देर बाद उन्होंने गीत की स्थिति और उसके भाव को गहराई से समझा। उन्हें बताया गया कि पर्दे पर अमिताभ बच्चन एक ऐसे व्यक्ति की भूमिका निभा रहे हैं, जो शराब के नशे में है और अपनी भावनाओं को व्यक्त कर रहा है।

    यहीं से किशोर कुमार की रचनात्मकता सामने आई। उन्होंने कहा कि यदि इस गीत में एक शराबी का वास्तविक एहसास पैदा करना है, तो वह इसे सामान्य तरीके से खड़े होकर नहीं गाएंगे। उनकी शर्त थी कि रिकॉर्डिंग के दौरान उन्हें लेटने दिया जाए ताकि वे उस मानसिक और शारीरिक स्थिति को महसूस कर सकें, जिसमें फिल्म का पात्र दिखाई देगा।

    स्टूडियो में मौजूद सभी लोग उनकी यह बात सुनकर चौंक गए। हालांकि, किशोर कुमार अपनी बात पर अड़े रहे। आखिरकार उनकी इच्छा पूरी करने के लिए रिकॉर्डिंग रूम में एक बड़ी टेबल मंगवाई गई। किशोर कुमार उस पर लेट गए, माइक को उसी हिसाब से सेट किया गया और फिर रिकॉर्डिंग शुरू हुई।

    इसके बाद जो हुआ, वह इतिहास बन गया। आशा भोसले के साथ किशोर कुमार ने ‘इंतहा हो गई इंतजार की’ को अपनी आवाज दी और गीत में ऐसा जादू भर दिया कि वह रिलीज होते ही लोगों की जुबान पर चढ़ गया। कहा जाता है कि रिकॉर्डिंग के दौरान आशा भोसले भी किशोर कुमार के इस अनोखे अंदाज को देखकर हैरान रह गई थीं।

    यह गीत न केवल फिल्म ‘शराबी’ की पहचान बना, बल्कि हिंदी सिनेमा के सबसे लोकप्रिय युगल गीतों में भी शामिल हो गया। दशकों बाद भी जब यह गाना बजता है, तो श्रोता उसी उत्साह और भावनाओं के साथ इसे सुनते हैं। किशोर कुमार की यही विशेषता थी कि वह केवल गीत नहीं गाते थे, बल्कि उसे जीते थे। शायद यही कारण है कि उनकी आवाज और उनके गाए गीत आज भी करोड़ों दिलों में जीवित हैं।