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  • लाल साड़ी और वो खौफनाक चीख आज भी नहीं भूल पाए दर्शक ऐसे बना था लज्जा शंकर पांडे का आइकॉनिक सीन

    लाल साड़ी और वो खौफनाक चीख आज भी नहीं भूल पाए दर्शक ऐसे बना था लज्जा शंकर पांडे का आइकॉनिक सीन


    नई दिल्ली। हिंदी सिनेमा में कुछ किरदार ऐसे होते हैं जो फिल्म खत्म होने के बाद भी दर्शकों के जेहन से नहीं निकलते। साल 1999 में रिलीज हुई फिल्म संघर्ष का लज्जा शंकर पांडे भी ऐसा ही किरदार था। आशुतोष राणा ने इस भूमिका में ऐसा खौफ पैदा किया था कि उस दौर में सिनेमाघरों में बैठे दर्शक तक उनकी आवाज और हावभाव देखकर सहम जाते थे। आज फिल्म को रिलीज हुए कई साल बीत चुके हैं लेकिन लज्जा शंकर पांडे का नाम आते ही लोगों के सामने वही डरावना चेहरा और जीभ हिलाकर निकाली गई उनकी खौफनाक चीख याद आ जाती है।

    इस किरदार की सबसे खास बात यह थी कि इसे डरावना बनाने के लिए किसी बड़े स्पेशल इफेक्ट या आधुनिक तकनीक का सहारा नहीं लिया गया था। आशुतोष राणा ने अपने अभिनय और आवाज के दम पर ऐसा माहौल तैयार किया जो आज भी याद किया जाता है। खास बात यह है कि जिस सीन को देखकर दर्शकों की चीख निकल जाती थी उसके लिए खुद आशुतोष राणा ने कोई रिहर्सल नहीं की थी।

    फिल्म की कहानी महेश भट्ट ने लिखी थी और तनुजा चंद्रा ने इसका निर्देशन किया था। कहानी एक ऐसे खतरनाक तांत्रिक की थी जो अमर होने की सनक में बच्चों की बलि देता है। ऐसे किरदार के लिए सिर्फ संवाद बोलना काफी नहीं था। उसे पर्दे पर असामान्य और भयावह दिखाना जरूरी था। महेश भट्ट चाहते थे कि लज्जा शंकर पांडे की कोई ऐसी पहचान हो जिसे दर्शक लंबे समय तक भूल न पाएं।

    यहीं से आशुतोष राणा की कल्पना ने इस किरदार को एक अलग पहचान दी। उन्होंने सोचा कि लज्जा शंकर आम इंसानों की तरह प्रतिक्रिया देने वाला व्यक्ति नहीं होना चाहिए। उसकी हर हरकत उसके भीतर की विकृत मानसिकता को दिखाए। इसी सोच के साथ उन्होंने जीभ हिलाते हुए एक अजीब और डरावनी चीख निकालने का अंदाज तैयार किया।

    इस आवाज के पीछे उनके बचपन की यादों का भी बड़ा योगदान था। मध्य प्रदेश के गाडरवारा में बीता उनका बचपन उन्हें गांव की लोक परंपराओं और अनुष्ठानों के करीब लेकर गया था। उन्होंने वहां तांत्रिक और भगतों को अलग तरह की आवाजें निकालते हुए देखा था। रामलीला में रावण का किरदार निभाने का अनुभव और बाद में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से मिली अभिनय की ट्रेनिंग ने भी उनके भीतर के कलाकार को मजबूत किया। इन्हीं अनुभवों को उन्होंने लज्जा शंकर पांडे की मानसिकता के साथ जोड़ दिया।

    जब इस सीन की शूटिंग का समय आया तो आशुतोष राणा ने अपने इस प्रयोग को सीधे कैमरे के सामने करने का फैसला किया। कैमरा शुरू हुआ और उन्होंने अचानक जीभ हिलाते हुए वह खौफनाक चीख निकाल दी। सेट पर मौजूद लोगों के लिए यह पूरी तरह अप्रत्याशित था। कुछ पल के लिए वहां ऐसा सन्नाटा छा गया जैसे हर कोई उस आवाज के असर में आ गया हो। कट होने के बाद भी टीम को कुछ क्षण समझ नहीं आया कि प्रतिक्रिया कैसे दी जाए। फिर सेट पर तालियों की गूंज सुनाई दी।

    लज्जा शंकर पांडे के किरदार की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। उस समय आशुतोष राणा को खबर मिली थी कि यह भूमिका किसी बड़े स्टार को दी जा सकती है। वह दूसरी फिल्म की शूटिंग के लिए हैदराबाद में थे। खबर मिलते ही वह मुंबई पहुंचे और महेश भट्ट से मुलाकात की। बाद में उन्हें पता चला कि यह जानकारी गलत थी। महेश भट्ट ने साफ कर दिया कि लज्जा शंकर पांडे का किरदार आशुतोष राणा को ध्यान में रखकर ही लिखा गया था।

    फिल्म रिलीज के समय भले ही बॉक्स ऑफिस पर उम्मीद के मुताबिक बड़ी सफलता हासिल नहीं कर पाई लेकिन समय के साथ संघर्ष को एक अलग पहचान मिली। टेलीविजन और बाद में डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए नई पीढ़ी ने भी फिल्म को देखा। आज लज्जा शंकर पांडे हिंदी सिनेमा के यादगार खलनायकों में गिना जाता है। आशुतोष राणा ने यह साबित कर दिया कि डर पैदा करने के लिए हमेशा तकनीक की जरूरत नहीं होती। कई बार एक कलाकार की आंखें उसकी आवाज और उसकी कल्पना ही दर्शकों की रीढ़ में सिहरन पैदा करने के लिए काफी होती है।

  • 700 फिल्मों वाला बॉलीवुड स्टार: सलमान-शाहरुख भी रह गए पीछे

    700 फिल्मों वाला बॉलीवुड स्टार: सलमान-शाहरुख भी रह गए पीछे


    नई दिल्ली । हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में कई ऐसे कलाकार हुए हैं जिन्होंने अपने दमदार अभिनय और लगातार मेहनत के बल पर लंबा और सफल करियर बनाया। कुछ सितारे अपने स्टारडम के लिए जाने गए, तो कुछ कलाकारों ने फिल्मों की संख्या के मामले में रिकॉर्ड कायम कर दिए। दिलचस्प बात यह है कि सबसे ज्यादा फिल्में करने की सूची में सिर्फ सुपरस्टार ही नहीं, बल्कि एक ऐसे अभिनेता का नाम सबसे ऊपर है जिसने विलेन, कॉमेडियन और कैरेक्टर रोल्स से दर्शकों के दिलों में खास जगह बनाई।

    सबसे ज्यादा फिल्में करने वाले कलाकारों की बात करें तो शक्ति कपूर इस सूची में सबसे आगे नजर आते हैं। शक्ति कपूर ने अपने करियर में 700 से ज्यादा फिल्मों में काम किया है। 80 और 90 के दशक में उन्होंने खलनायक और कॉमिक किरदारों से जबरदस्त लोकप्रियता हासिल की। उनकी खास डायलॉग डिलीवरी और अलग अंदाज ने उन्हें बॉलीवुड का यादगार कलाकार बना दिया।

    इस सूची में दूसरा बड़ा नाम अनुपम खेर का है। अनुपम खेर ने 500 से ज्यादा फिल्मों में अभिनय किया है। उन्होंने गंभीर, कॉमिक और भावनात्मक हर तरह के किरदार निभाकर अपनी अलग पहचान बनाई। खास बात यह है कि लंबे समय से इंडस्ट्री में सक्रिय रहने के बावजूद आज भी वे लगातार फिल्मों और वेब सीरीज में नजर आते हैं।

    वहीं धर्मेंद्र भी बॉलीवुड के सबसे व्यस्त कलाकारों में शामिल रहे हैं। उन्होंने अपने करियर में 300 से ज्यादा फिल्मों में काम किया। एक्शन, रोमांस और पारिवारिक फिल्मों में उनकी लोकप्रियता दशकों तक बनी रही। उनका नाम हिंदी सिनेमा के सबसे सफल अभिनेताओं में गिना जाता है।

    कॉमेडी की दुनिया के मशहूर कलाकार जॉनी लीवर ने भी 280 से ज्यादा फिल्मों में काम कर दर्शकों को खूब हंसाया। उनकी कॉमिक टाइमिंग और अलग अंदाज ने उन्हें बॉलीवुड का सबसे लोकप्रिय कॉमेडियन बना दिया।

    इसके अलावा परेश रावल ने 250 से ज्यादा फिल्मों में अभिनय किया है। कॉमेडी से लेकर निगेटिव और गंभीर किरदारों तक, उन्होंने हर भूमिका में अपनी छाप छोड़ी। उनकी कई फिल्में आज भी दर्शकों की पसंदीदा मानी जाती हैं।

    बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन भी इस सूची में शामिल हैं। उन्होंने 200 से ज्यादा फिल्मों में काम किया है और उम्र के इस पड़ाव पर भी लगातार सक्रिय हैं। वहीं अक्षय कुमार ने 150 से ज्यादा फिल्मों में अभिनय कर खुद को इंडस्ट्री के सबसे व्यस्त सितारों में शामिल किया है। इन कलाकारों ने साबित किया कि मेहनत, निरंतरता और दर्शकों का प्यार किसी भी अभिनेता को इतिहास में खास जगह दिला सकता है।

  • अपनी विशिष्ट संवाद शैली और आंखों के खौफ से दर्शकों को डराने वाले महान कलाकार..

    अपनी विशिष्ट संवाद शैली और आंखों के खौफ से दर्शकों को डराने वाले महान कलाकार..


    नई दिल्ली/मुंबई। भारतीय सिनेमा के इतिहास में खलनायकों के किरदारों ने हमेशा से कहानी को एक नई ऊंचाई दी है लेकिन नब्बे के दशक में एक ऐसा चेहरा उभरा जिसने बिना चीखे और बिना चिल्लाए केवल अपनी आंखों की गहराई से दर्शकों के दिल में दहशत पैदा कर दी। हम बात कर रहे हैं दिग्गज अभिनेता रामी रेड्डी की जिन्होंने अपनी विशिष्ट संवाद शैली और प्रभावशाली व्यक्तित्व के दम पर खलनायकी की एक नई परिभाषा लिखी थी। करीब ढाई सौ फिल्मों में अपनी अदाकारी का लोहा मनवाने वाले इस कलाकार का स्क्रीन प्रेजेंस इतना जबरदस्त था कि उनके पर्दे पर आते ही नायक और दर्शक दोनों के पसीने छूट जाते थे। रामी रेड्डी ने यह साबित किया कि खौफ पैदा करने के लिए डरावने मेकअप की नहीं बल्कि सधी हुई नजरों और ठंडे लहजे की जरूरत होती है।

    बहुत कम लोग इस तथ्य से परिचित हैं कि फिल्मी चकाचौंध में आने से पहले रामी रेड्डी पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय थे। आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में जन्मे रेड्डी ने हैदराबाद के विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की डिग्री हासिल की और एक दैनिक समाचार पत्र में अपनी सेवाएं दीं। हालांकि उनके भीतर के कलाकार ने उन्हें अंततः अभिनय की ओर खींच लिया। क्षेत्रीय सिनेमा से शुरू हुआ उनका सफर हिंदी सिनेमा तक पहुंचा जहां कर्नल शिकारा और स्पॉट नाना जैसे किरदारों ने उन्हें रातों रात घर-घर में मशहूर कर दिया। उनके संवाद बोलने का सपाट अंदाज और दक्षिण भारतीय पुट वाली आवाज दर्शकों के जेहन में आज भी ताजा है।

    सफलता के शिखर पर पहुंचने के बाद इस महान कलाकार का जीवन संघर्षों के एक कठिन दौर में प्रवेश कर गया। साल दो हजार दस के आसपास उनकी सेहत में भारी गिरावट दर्ज की गई और गंभीर बीमारी की पुष्टि हुई। इस शारीरिक समस्या ने उनके स्वास्थ्य पर इतना बुरा प्रभाव डाला कि पर्दे पर बेहद मजबूत दिखने वाला यह कलाकार शारीरिक रूप से बहुत कमजोर हो गया। अपने अंतिम दिनों में उनकी स्थिति इतनी बदल गई थी कि उन्हें पहचानना तक मुश्किल था लेकिन उनकी इच्छाशक्ति अंत तक बनी रही।

    बीमारी से लंबी और साहसी लड़ाई लड़ने के बाद चौदह अप्रैल दो हजार ग्यारह को महज बावन वर्ष की आयु में इस महान अभिनेता ने हैदराबाद में अंतिम सांस ली। उनका असमय जाना फिल्म जगत के लिए एक ऐसी अपूरणीय क्षति थी जिसकी भरपाई आज भी नहीं हो सकी है। रामी रेड्डी अपने पीछे एक समृद्ध फिल्मी विरासत छोड़ गए हैं जो आने वाली पीढ़ी के कलाकारों के लिए एक प्रेरणा की तरह है। आज भले ही वह हमारे बीच मौजूद नहीं हैं लेकिन उनकी फिल्मों के दृश्य और उनकी वह डरावनी खामोशी सिनेमा प्रेमियों के दिलों में हमेशा जीवित रहेगी।

  • एक तस्वीर ने बदली जिंदगी परवीन बाबी से मिलने आया शख्स बना 80s का खतरनाक विलेन

    एक तस्वीर ने बदली जिंदगी परवीन बाबी से मिलने आया शख्स बना 80s का खतरनाक विलेन

    नई दिल्ली: हिंदी सिनेमा के 80 और 90 के दशक को याद किया जाए तो जहां एक तरफ दमदार हीरो का दौर था, वहीं दूसरी तरफ खतरनाक विलेन भी फिल्मों की जान हुआ करते थे. इसी दौर में एक ऐसा विदेशी चेहरा बार-बार बड़े पर्दे पर दिखाई देता था, जिसने अपनी मजबूत कद-काठी और डरावने अंदाज से दर्शकों के दिलों में खास जगह बना ली. यह अभिनेता थे बॉब क्रिस्टो, जिनकी कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं है.

    20 मार्च 1938 को सिडनी में जन्मे बॉब क्रिस्टो का असली नाम रॉबर्ट जॉन क्रिस्टो था. वह पेशे से सिविल इंजीनियर थे और पढ़ाई के साथ-साथ थिएटर में भी रुचि रखते थे. उनकी जिंदगी सामान्य ढंग से चल रही थी, लेकिन एक दुखद घटना ने सबकुछ बदल दिया. उनकी पत्नी का एक सड़क हादसे में निधन हो गया, जिससे वह पूरी तरह टूट गए और उनकी जिंदगी एक नए मोड़ की ओर मुड़ गई.

    उनकी जिंदगी का सबसे दिलचस्प अध्याय तब शुरू हुआ जब उन्होंने एक मैगजीन के कवर पर मशहूर अभिनेत्री परवीन बाबी की तस्वीर देखी. इस एक तस्वीर ने उन पर ऐसा असर डाला कि वह उनसे मिलने भारत चले आए. मुंबई पहुंचकर उन्होंने परवीन बाबी को ढूंढ निकाला और उनसे मुलाकात की. यही मुलाकात उनकी किस्मत बदलने वाली साबित हुई.

    परवीन बाबी की मदद से उन्हें फिल्म इंडस्ट्री में एंट्री मिली और फिल्म अब्दुल्ला के जरिए उन्हें पहला बड़ा मौका मिला. इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. 80 और 90 के दशक में वह बॉलीवुड के सबसे चर्चित विदेशी विलेन बन गए. उनकी दमदार पर्सनैलिटी और एक्शन सीन ने उन्हें बाकी कलाकारों से अलग पहचान दिलाई.

    उन्होंने कई बड़ी फिल्मों में काम किया, जिनमें कालिया, नमक हलाल, मर्द और मिस्टर इंडिया शामिल हैं. खास बात यह रही कि उनकी भिड़ंत अक्सर महानायक अमिताभ बच्चन और सुपरस्टार धर्मेंद्र जैसे सितारों के साथ होती थी. जब भी वह स्क्रीन पर इन बड़े सितारों के सामने आते, तो थिएटर में सीटियां और तालियां गूंज उठती थीं.

    बॉब क्रिस्टो की लंबी-चौड़ी काया और रौबदार व्यक्तित्व उन्हें परफेक्ट विलेन बनाता था. उन्होंने अपने करियर में करीब 200 फिल्मों में काम किया और हिंदी के साथ-साथ साउथ सिनेमा में भी अपनी पहचान बनाई. उनकी मौजूदगी ही किसी भी फिल्म में खतरे का एहसास पैदा कर देती थी.

    हालांकि समय के साथ उन्होंने फिल्मों से दूरी बना ली और बेंगलुरु में बस गए. वहां उन्होंने योगा इंस्ट्रक्टर के रूप में एक नई जिंदगी शुरू की. ग्लैमर की दुनिया से दूर वह एक साधारण जीवन जीने लगे.

    20 मार्च 2011 को 72 साल की उम्र में उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी यादें आज भी फिल्मों के जरिए जिंदा हैं. बॉब क्रिस्टो की कहानी यह साबित करती है कि कभी-कभी एक छोटा सा पल या एक तस्वीर भी किसी इंसान की पूरी जिंदगी बदल सकती है.