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  • मोहम्मद रफी के गीत ने बदली इंदिरा गांधी की भावनाएं टैक्स फ्री हुई फिल्म नौनिहाल

    मोहम्मद रफी के गीत ने बदली इंदिरा गांधी की भावनाएं टैक्स फ्री हुई फिल्म नौनिहाल


    नई दिल्ली । भारत के सिनेमा इतिहास में कुछ घटनाएं ऐसी रही हैं जो आज भी लोगों के दिलों में जीवित हैं। ऐसी ही एक कहानी जुड़ी है महान गायक मोहम्मद रफी की मखमली और भावनाओं से भरी आवाज से। यह किस्सा फिल्म नौनिहाल से जुड़ा है जिसे सुनकर उस समय की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भावुक हो उठी थीं और उनकी आंखों में आंसू आ गए थे। इसी भावनात्मक अनुभव के बाद फिल्म को पूरे देश में टैक्स फ्री कर दिया गया था।

    साठ के दशक का समय हिंदी सिनेमा में संगीत का स्वर्ण युग माना जाता है। इस दौर में मोहम्मद रफी की आवाज ने लाखों दिलों पर राज किया। उनकी गायकी में ऐसा दर्द और ऐसा जादू था जो सीधे दिल को छू लेता था। जब भी किसी फिल्म में गहरे भावनात्मक गीत की जरूरत होती थी तो निर्माता और संगीतकार सबसे पहले रफी साहब को याद करते थे। उनकी आवाज में वह शक्ति थी जो कहानी को जीवंत बना देती थी।

    फिल्म नौनिहाल के निर्माता सावन कुमार टाक थे। वे देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से बहुत प्रभावित थे। जब 27 मई 1964 को जवाहरलाल नेहरू के निधन की खबर आई तो वे गहरे दुख में डूब गए। उन्होंने तय किया कि वे नेहरू को श्रद्धांजलि देने के लिए एक फिल्म बनाएंगे। इस सोच से फिल्म नौनिहाल की शुरुआत हुई। इस फिल्म की कहानी एक अनाथ बच्चे के इर्द गिर्द घूमती है जो अपने जीवन में एक बड़ी यात्रा पर निकलता है और भावनात्मक मोड़ से गुजरता है।

    फिल्म के लिए एक ऐसा गीत चाहिए था जो दर्शकों के दिल को झकझोर दे। गीतकार कैफी आजमी ने इस भावनात्मक गीत को लिखा। जब इस गीत को आवाज देने की बात आई तो मोहम्मद रफी का नाम चुना गया। रफी साहब ने जब इस गीत को अपनी आवाज दी तो उसमें एक गहरी संवेदना और दर्द समा गया।

    फिल्म रिलीज से पहले सावन कुमार टाक ने इसे टैक्स फ्री कराने के लिए प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मुलाकात की। इंदिरा गांधी ने फिल्म देखने से पहले कहा कि वे कोई गीत सुनना चाहेंगी। इसके बाद सावन कुमार ने टेप रिकॉर्डर पर रफी की आवाज में वह गीत सुनाया। जैसे ही गीत बजना शुरू हुआ पूरा माहौल भावनाओं से भर गया।

    गीत की पंक्तियां सुनते सुनते इंदिरा गांधी अपने पिता जवाहरलाल नेहरू की यादों में खो गईं। उनकी आंखें नम हो गईं और वे कुछ देर के लिए बहुत भावुक हो गईं। कुछ समय बाद वे अपने केबिन में चली गईं। इस भावनात्मक अनुभव के बाद फिल्म को पूरे देश में टैक्स फ्री करने का निर्णय लिया गया। यह घटना इस बात का प्रमाण है कि संगीत केवल मनोरंजन नहीं बल्कि भावनाओं की गहराई तक पहुंचने वाली शक्ति है और मोहम्मद रफी की आवाज उस शक्ति का सबसे बड़ा उदाहरण रही है।

  • जब चंबल के डाकू ने मीना कुमारी से चाकू से मांगा ऑटोग्राफ खौफ से कांप उठीं ट्रैजेडी क्वीन

    जब चंबल के डाकू ने मीना कुमारी से चाकू से मांगा ऑटोग्राफ खौफ से कांप उठीं ट्रैजेडी क्वीन

    नई दिल्ली । हिंदी सिनेमा की ट्रैजेडी क्वीन कही जाने वाली मीना कुमारी की जिंदगी सिर्फ परदे पर ही नहीं बल्कि असल जिंदगी में भी कई उतार चढ़ाव और हैरान कर देने वाली घटनाओं से भरी रही। उनकी खूबसूरती और अदाकारी के लाखों दीवाने थे लेकिन एक बार उनकी मुलाकात ऐसे शख्स से हुई जिसने उन्हें खौफ से भर दिया। यह घटना उस समय की है जब वह अपने पति कमाल अमरोही के साथ फिल्म पाकीजा की शूटिंग के सिलसिले में मध्यप्रदेश के शिवपुरी जा रही थीं।

    बताया जाता है कि चंबल के जंगलों से गुजरते समय उनकी गाड़ी अचानक रुक गई क्योंकि उसमें ईंधन खत्म हो गया था। इसी दौरान वहां कुछ गाड़ियां आकर रुकीं और हथियारों से लैस डाकुओं ने उन्हें घेर लिया। अचानक हुए इस घटनाक्रम से मीना कुमारी और कमाल अमरोही दोनों घबरा गए। माहौल इतना तनावपूर्ण था कि किसी भी वक्त कुछ भी हो सकता था।

    कमाल अमरोही ने हिम्मत दिखाते हुए डाकुओं से बातचीत की कोशिश की और अपने बारे में बताया। शुरुआत में गलतफहमी के चलते डाकुओं को लगा कि वे पुलिस वाले हैं जो किसी कार्रवाई के लिए आए हैं। इससे स्थिति और ज्यादा बिगड़ने लगी। लेकिन जब अमरोही ने समझाया कि वे फिल्म की शूटिंग के लिए आए हैं तब जाकर माहौल थोड़ा शांत हुआ।

    इसी बीच डाकुओं के सरदार ने अपना नाम अमृत लाल बताया जो उस समय चंबल का एक खौफनाक और चर्चित डाकू माना जाता था। जैसे ही उसे पता चला कि पास की गाड़ी में मीना कुमारी मौजूद हैं तो उसका रवैया अचानक बदल गया। वह उनका बड़ा प्रशंसक निकला और उनसे मिलने की इच्छा जाहिर की। उसने साफ कहा कि वह मीना कुमारी से मुलाकात करना चाहता है तभी वह उन्हें सुरक्षित जाने देगा।

    डर और अनिश्चितता के बीच मीना कुमारी को उसके सामने लाया गया। बताया जाता है कि माहौल को हल्का करने के लिए डाकुओं ने गाने बजाने और नाचने तक की बात की। इसके बाद उन्होंने उनकी गाड़ी में ईंधन भी भरवाया जिससे यह साफ था कि अब खतरा थोड़ा कम हो गया है।

    लेकिन इस पूरी घटना का सबसे चौंकाने वाला मोड़ तब आया जब अमृत लाल ने मीना कुमारी से ऑटोग्राफ मांगा। उसके पास न तो कागज था और न ही पेन। ऐसे में उसने चाकू निकालकर उनके सामने रख दिया और कहा कि वह अपने हाथ पर चाकू से उनका नाम लिखें। यह सुनकर मीना कुमारी बुरी तरह डर गईं लेकिन हालात ऐसे थे कि उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था।

    कहते हैं कि उन्होंने कांपते हुए हाथों से चाकू लिया और डाकू के हाथ पर अपना नाम उकेर दिया। इसके बाद ही वह सभी को जाने देने के लिए तैयार हुआ और यह खौफनाक मंजर खत्म हुआ। यह घटना आज भी मीना कुमारी की जिंदगी से जुड़ी सबसे चर्चित और डरावनी यादों में से एक मानी जाती है।

    मीना कुमारी ने अपने करियर की शुरुआत बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट की थी और आगे चलकर साहिब बीवी और गुलाम बैजू बावरा दिल एक मंदिर और परिणीता जैसी फिल्मों से अमिट छाप छोड़ी। उनकी निजी जिंदगी भी काफी उतार चढ़ाव भरी रही और कम उम्र में ही उनका निधन हो गया।

    इस घटना से यह साफ होता है कि फिल्मी सितारों की जिंदगी जितनी चमकदार नजर आती है उतनी ही जोखिमों और अनपेक्षित परिस्थितियों से भी भरी होती है। मीना कुमारी की यह कहानी आज भी लोगों को हैरान कर देती है।

  • टैक्सी बेचकर फिल्म बनाने वाले सरदार सिंह सूरी की कहानी, सफलता के बाद भी मिला सिर्फ धोखा

    टैक्सी बेचकर फिल्म बनाने वाले सरदार सिंह सूरी की कहानी, सफलता के बाद भी मिला सिर्फ धोखा


    नई दिल्ली। भारतीय सिनेमा जगत में कई प्रेरणादायक कहानियां सामने आती रही हैं, लेकिन कुछ जीवन यात्राएं ऐसी होती हैं जिनमें संघर्ष और सफलता के साथ गहरा दर्द भी जुड़ा होता है। ऐसी ही एक कहानी है सरदार सिंह सूरी की, जिन्होंने साधारण जीवन से उठकर अपने सपनों को साकार किया और सिनेमा की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई। उनका सफर मेहनत, जज्बे और त्याग से भरा हुआ था, लेकिन अंत में उन्हें एक ऐसे विश्वासघात का सामना करना पड़ा जिसने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी।

    सरदार सिंह सूरी मूल रूप से रावलपिंडी के निवासी थे। देश के विभाजन के बाद उन्होंने नए सिरे से जीवन की शुरुआत की और मुंबई पहुंचकर टैक्सी चलाने का काम शुरू किया। कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और धीरे धीरे अपने परिश्रम से एक टैक्सी को तीन टैक्सियों में बदल दिया। हालांकि उनके मन में सिनेमा के प्रति गहरी रुचि थी और वे कुछ बड़ा करने का सपना देखते थे।

    अपने इसी सपने को साकार करने के लिए उन्होंने एक बड़ा और जोखिम भरा फैसला लिया। उन्होंने अपनी तीनों टैक्सियां बेच दीं और उस धन से पंजाबी फिल्म ए धरती पंजाब दी का निर्माण किया। यह फिल्म उनके जीवन का टर्निंग प्वाइंट साबित हुई। इस फिल्म में प्रेम चोपड़ा को बतौर हीरो पहला बड़ा अवसर मिला, जिसने उनके अभिनय करियर की मजबूत नींव रखी।

    फिल्म रिलीज होने के बाद जबरदस्त सफल रही और इसे कुल नौ पुरस्कार भी प्राप्त हुए। यह सफलता किसी भी निर्माता के लिए गर्व का क्षण होती, लेकिन सरदार सिंह सूरी के लिए यह खुशी अधूरी रह गई। फिल्म की कमाई में उनके एक सहयोगी द्वारा धोखाधड़ी किए जाने के कारण उन्हें उनका उचित हिस्सा नहीं मिल पाया। आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो गई कि वे अपनी ही फिल्म के सम्मान समारोह में शामिल होने के लिए टिकट तक नहीं खरीद सके।

    यह घटना उनके जीवन का सबसे बड़ा झटका साबित हुई। एक ओर जहां उन्होंने अपने सपनों के लिए सब कुछ दांव पर लगाया, वहीं दूसरी ओर विश्वासघात ने उन्हें भीतर से तोड़ दिया। इस दर्दनाक अनुभव के बाद उन्होंने फिल्म निर्माण से दूरी बना ली और सिनेमा की दुनिया से लगभग अलग हो गए।

    वर्षों बाद प्रेम चोपड़ा ने एक श्रद्धांजलि कार्यक्रम में उन्हें याद करते हुए कहा कि सरदार सूरी केवल एक निर्माता नहीं बल्कि एक नेक और सच्चे इंसान थे। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि उनके करियर की शुरुआत में मिला अवसर सरदार सूरी की ही देन था। उस दौर को याद करते हुए उन्होंने कहा कि सीमित संसाधनों के बावजूद फिल्मों में काम करने का जुनून अलग ही था।

    सरदार सिंह सूरी का जीवन केवल सिनेमा तक सीमित नहीं था। उन्होंने सामाजिक और धार्मिक गतिविधियों में भी सक्रिय भूमिका निभाई और मुंबई के चार बंगला गुरुद्वारा साहिब के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि सपनों को पूरा करने के लिए साहस जरूरी है, लेकिन विश्वास और पारदर्शिता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।