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  • अस्पताल के बिस्तर पर एसडी बर्मन ने सुनी थी किशोर कुमार की आखिरी आवाज, 'बड़ी सूनी सूनी है जिंदगी' गाने के निर्माण की भावुक दास्तां

    अस्पताल के बिस्तर पर एसडी बर्मन ने सुनी थी किशोर कुमार की आखिरी आवाज, 'बड़ी सूनी सूनी है जिंदगी' गाने के निर्माण की भावुक दास्तां

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    नई दिल्ली ।भारतीय सिनेमा जगत में वर्ष 1975 में प्रदर्शित हुई अभिनेता अमिताभ बच्चन और अभिनेत्री जया बच्चन की प्रसिद्ध फिल्म ‘मिली’ को न केवल उसकी उत्कृष्ट कहानी बल्कि उसके सदाबहार संगीत के लिए भी याद किया जाता है। इस फिल्म की पटकथा एक ऐसी युवती के इर्द-गिर्द घूमती है जो एक लाइलाज बीमारी से पीड़ित होने के बावजूद जीवन को जिंदादिली से जीती है। इस फिल्म में कई मनोरंजक और चुलबुले गीत शामिल थे, परंतु इसका एक गीत ऐसा भी है जिसने न केवल दर्शकों को भावुक किया बल्कि उसके निर्माण की पृष्ठभूमि भी गहरे दुखों और आंसुओं से भरी हुई है। यह गीत था ‘बड़ी सूनी सूनी है जिंदगी’, जिसकी रिकॉर्डिंग के दौरान भारतीय संगीत जगत के एक महान अध्याय का अंत होने की शुरुआत हो चुकी थी।

    इस कालजयी गीत के संगीत निर्देशन की जिम्मेदारी महान संगीतकार सचिन देव बर्मन संभाल रहे थे, जिन्हें फिल्मी दुनिया में लोग आदर से सचिन दा या एसडी बर्मन कहकर पुकारते थे। जब इस विशिष्ट गीत की रिहर्सल उनके निवास स्थान पर चल रही थी, तब फिल्म के मुख्य गायक किशोर कुमार वहां गीत की बारीकियों को समझने में व्यस्त थे। इसी अभ्यास सत्र के दौरान अचानक सचिन देव बर्मन को पैरालिसिस अर्थात लकवे का एक गंभीर अटैक आया। वहां उपस्थित परिजनों और सहयोगियों ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए उन्हें तुरंत चिकित्सालय ले जाने का आग्रह किया, परंतु अपने काम के प्रति अत्यधिक समर्पित सचिन दा ने जाने से साफ मना कर दिया। उनका तर्क था कि वे एक बेहद महत्वपूर्ण गीत पर काम कर रहे हैं जिसकी रिकॉर्डिंग अगले ही दिन निर्धारित है।

    ऐसी नाजुक परिस्थिति में जब सचिन दा किसी भी कीमत पर चिकित्सालय जाने के लिए तैयार नहीं हो रहे थे, तब गायक किशोर कुमार ने स्थिति को संभालने के लिए एक संवेदनशील झूठ का सहारा लिया। उन्होंने सचिन दा के समक्ष जाकर अत्यंत सहजता से कहा कि वर्तमान में उनका गला खराब है और वे आज गायन करने की स्थिति में नहीं हैं। उन्होंने संगीतकार से आग्रह किया कि जब तक वे चिकित्सालय से प्राथमिक उपचार कराकर लौटेंगे, तब तक उनका गला भी पूरी तरह से ठीक हो चुका होगा। किशोर कुमार की इस आत्मीय बात को मानकर सचिन दा अंततः चिकित्सालय जाने के लिए राजी हो गए और उन्हें तुरंत भर्ती कराया गया।

    अगले दिन जब स्टूडियो में इस गीत की रिकॉर्डिंग शुरू हुई, तब किशोर कुमार अपने मार्गदर्शक और पिता समान संगीतकार के बिना पूरी तरह से अकेले थे। अपने गुरु के अस्वस्थ होने के कारण वे अत्यधिक मानसिक तनाव और व्यक्तिगत दुख से गुजर रहे थे। जब उन्होंने माइक के सामने खड़े होकर ‘बड़ी सूनी सूनी है जिंदगी’ गाना शुरू किया, तो उनके भीतर का सारा व्यक्तिगत दर्द और व्याकुलता अनायास ही उनकी आवाज के माध्यम से बाहर आ गई। स्टूडियो के भीतर उपस्थित सभी सह-कलाकार और तकनीशियन किशोर कुमार के इस अत्यंत भावुक और जीवंत गायन को सुनकर स्तब्ध रह गए थे, क्योंकि उस आवाज में अभिनय नहीं बल्कि वास्तविक पीड़ा साफ महसूस हो रही थी।

    गीत की रिकॉर्डिंग सफलतापूर्वक संपन्न होने के अगले दिन सचिन देव बर्मन के सुपुत्र और प्रसिद्ध संगीतकार राहुल देव बर्मन उस रिकॉर्डेड गीत का टेप लेकर सीधे चिकित्सालय पहुंचे। चिकित्सालय के बिस्तर पर गंभीर अवस्था में लेटे हुए सचिन दा को वह गीत सुनाया गया। किशोर कुमार की मर्मस्पर्शी आवाज को सुनकर सचिन दा के चेहरे पर एक आत्मसंतोष की मुस्कान तैर गई। उन्होंने बेहद धीमे शब्दों में अपनी प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि किशोर कुमार ने इस रचना को बिल्कुल उसी रूप और भावना के साथ गाया है जैसा वे स्वयं चाहते थे। यह गीत आगे चलकर भारतीय संगीत इतिहास के सबसे सफल और लोकप्रिय गीतों में शुमार हुआ।

    चिकित्सालय के बिस्तर पर सुना गया यह गीत दुर्भाग्य से सचिन देव बर्मन के जीवन का अंतिम गीत साबित हुआ। इसके तुरंत बाद उनकी स्थिति और अधिक बिगड़ती चली गई और वे गहरे कोमा में चले गए। चिकित्सा विशेषज्ञों के तमाम प्रयासों के बावजूद वे कभी भी उस बिस्तर से उठ नहीं सके और कुछ समय पश्चात उनका निधन हो गया। किशोर कुमार द्वारा गाया गया यह दर्दभरा गीत आज भी जब गूंजता है, तो श्रोताओं को संगीत के प्रति दो महान विभूतियों के समर्पण और एक अमर गुरु-शिष्य परंपरा की याद दिला जाता है।

  • 'गाड़ी रोको, मैं यह फिल्म नहीं कर रहा!' जब ऋषि कपूर ने पहला सीन सुनते ही निर्देशक को बीच सड़क पर उतारा

    'गाड़ी रोको, मैं यह फिल्म नहीं कर रहा!' जब ऋषि कपूर ने पहला सीन सुनते ही निर्देशक को बीच सड़क पर उतारा


    नई दिल्ली। बॉलीवुड के ‘चिंटू जी’ यानी ऋषि कपूर अपनी बेबाकी और बेहतरीन अदाकारी के लिए तो मशहूर थे ही, लेकिन फिल्म इंडस्ट्री में उनके अनुशासन और समय की पाबंदी के किस्से भी कम नहीं हैं। फिल्ममेकर डेविड धवन ने हाल ही में एक इंटरव्यू के दौरान ऋषि कपूर की वर्किंग स्टाइल से जुड़ा एक ऐसा वाकया साझा किया, जो आज के दौर के एक्टर्स के लिए हैरान करने वाला हो सकता है। ऋषि कपूर का एक अटूट नियम था-वे शाम 7 बजे के बाद काम नहीं करते थे और ‘नाइट शिफ्ट’ के नाम से ही चिढ़ जाते थे।

    डेविड धवन ने कपिल शर्मा के शो पर बताया कि एक बार एक निर्देशक ऋषि कपूर को अपनी फिल्म की स्क्रिप्ट सुनाने आए थे। ऋषि कपूर उस वक्त घर के लिए निकल रहे थे, तो उन्होंने निर्देशक से कहा कि वे रास्ते में गाड़ी में ही कहानी सुना दें। जैसे ही निर्देशक ने नरेशन शुरू किया और पहले ही सीन का जिक्र करते हुए कहा कि यह एक नाइट सीन (रात का दृश्य) है, ऋषि कपूर ने तुरंत अपना आपा खो दिया। उन्होंने बीच रास्ते में ही ड्राइवर को चिल्लाकर कहा, गाड़ी रोको!

    ऋषि कपूर ने उस निर्देशक से दो टूक शब्दों में कह दिया, मैं उन फिल्मों में काम नहीं करता जिनमें रात की शूटिंग होती है। चाहे कुछ भी हो जाए, मेरा पैकअप 7 बजे हो जाता है। उस बेचारे निर्देशक का नरेशन पहले ही सीन पर खत्म हो गया और फिल्म वहीं रिजेक्ट हो गई। डेविड धवन के अनुसार, ऋषि कपूर को नाइट शूटिंग से सख्त नफरत थी और वे अपनी शर्तों पर ही काम करना पसंद करते थे।
    सिर्फ समय ही नहीं, ऋषि कपूर हर सीन के पीछे तर्क (Logic) भी तलाशते थे। डेविड धवन बताते हैं कि वे एक बेहद बुद्धिमान अभिनेता थे। अगर उन्हें कोई सीन समझ नहीं आता, तो वे डायरेक्टर से सवाल करते थे- मैं इसे इसी तरह क्यों करूँ? जब तक डायरेक्टर उन्हें संतुष्ट नहीं कर देता था, वे काम आगे नहीं बढ़ाते थे। ‘अमर अकबर एंथनी’ और ‘चांदनी’ जैसी कालजयी फिल्में देने वाले ऋषि कपूर का यही अनुशासन और स्पष्टवादिता उन्हें फिल्म जगत का एक ऐसा सितारा बनाती है, जिसकी कमी आज भी सिनेमा को खलती है।