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  • FSSAI के शराब लेबलिंग नियमों पर कंपनियों की हाईकोर्ट में चुनौती, अचानक बिक्री रोकने से नुकसान की चिंता

    FSSAI के शराब लेबलिंग नियमों पर कंपनियों की हाईकोर्ट में चुनौती, अचानक बिक्री रोकने से नुकसान की चिंता

    नई दिल्ली । भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण यानी FSSAI के शराब से जुड़े लेबलिंग और उत्पाद मानकों को लेकर विवाद अब बॉम्बे हाईकोर्ट पहुंच गया है। कुछ बड़ी शराब कंपनियों ने नियामक के उन आदेशों को चुनौती दी है, जिनके तहत कुछ प्रकार के भारतीय निर्मित विदेशी मदिरा उत्पादों की बिक्री पर आपत्ति जताई गई है। मामले में अदालत में अगली सुनवाई सोमवार को होने वाली है, जिस पर कंपनियों और नियामक दोनों की नजर बनी हुई है।

    विवाद का केंद्र शराब की लेबलिंग, फ्लेवर और उत्पाद की उम्र से जुड़े दावे हैं। FSSAI का कहना है कि कुछ कंपनियां ऐसे उत्पादों को रम या व्हिस्की के रूप में बाजार में पेश कर रही हैं, जिनमें अतिरिक्त या कृत्रिम फ्लेवर का इस्तेमाल किया गया है। नियामक के अनुसार, यदि किसी स्पिरिट में अलग से फ्लेवर मिलाया गया है, तो उपभोक्ताओं को इसकी स्पष्ट जानकारी लेबल पर दी जानी चाहिए।

    नियामकीय आपत्ति के अनुसार ऐसे उत्पादों की पैकेजिंग पर रम या व्हिस्की के बजाय संबंधित उत्पाद की वास्तविक प्रकृति को स्पष्ट करने वाले शब्दों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। इसका उद्देश्य उपभोक्ताओं को उत्पाद के बारे में सही और पारदर्शी जानकारी उपलब्ध कराना बताया गया है। इसी बिंदु को लेकर शराब कंपनियों और नियामक के बीच कानूनी विवाद गहराया है।

    विवाद का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू शराब की उम्र से संबंधित दावों का है। कुछ उत्पादों पर उन्हें कैस्क में पुरानी या परिपक्व स्पिरिट के तौर पर प्रस्तुत किए जाने पर भी सवाल उठाए गए हैं। नियामक का तर्क है कि किसी ब्लेंड में इस्तेमाल की गई सबसे कम उम्र वाली स्पिरिट को ध्यान में रखकर ही उम्र संबंधी दावा किया जाना चाहिए। इससे उन उत्पादों की लेबलिंग प्रभावित हो सकती है, जिनमें अलग-अलग उम्र की स्पिरिट का मिश्रण किया गया है।

    इस मामले में United Spirits और Mohan Meakin समेत कई कंपनियों ने अदालत का रुख किया है। कंपनियों की ओर से दलील दी गई है कि अचानक बिक्री रोकने या लेबल बदलने के निर्देश से कारोबार पर गंभीर आर्थिक असर पड़ सकता है। उनका कहना है कि इन उत्पादों का निर्माण लंबे समय से निर्धारित प्रक्रियाओं के तहत किया जा रहा है और अचानक बदलाव लागू करना व्यावहारिक रूप से कठिन होगा।

    कंपनियों का एक प्रमुख तर्क यह भी है कि शराब की बोतलों के लेबल में बदलाव केवल प्रिंटिंग तक सीमित प्रक्रिया नहीं है। इसके लिए कई मामलों में राज्य आबकारी विभागों से आवश्यक मंजूरी लेनी पड़ती है। इसलिए कंपनियों के मुताबिक यदि उन्हें तुरंत नए नियमों के अनुसार लेबल बदलने और मौजूदा स्टॉक की बिक्री रोकने के लिए कहा जाता है, तो इससे तैयार माल और वितरण व्यवस्था पर बड़ा असर पड़ सकता है।

    सुनवाई के दौरान बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी अचानक पूरे उद्योग की गतिविधियों पर असर पड़ने की संभावना को लेकर चिंता जताई। अदालत ने संकेत दिया कि किसी पूरे उद्योग को रातोंरात बंद करने से व्यावहारिक और आर्थिक समस्याएं पैदा हो सकती हैं। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि शराब के निर्माण, जांच और मार्केटिंग के तकनीकी मानक तय करना न्यायपालिका का काम नहीं है।

    अदालत ने केंद्र सरकार के वकील और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल से FSSAI से इस मामले से जुड़ी पूरी जानकारी हासिल कर अगली सुनवाई में स्थिति स्पष्ट करने को कहा है। अब सोमवार को होने वाली सुनवाई में यह महत्वपूर्ण होगा कि अदालत कंपनियों की बिक्री संबंधी मांग और नियामक के खाद्य सुरक्षा तथा लेबलिंग मानकों के बीच किस तरह संतुलन स्थापित करती है।

    इस विवाद का असर केवल संबंधित कंपनियों तक सीमित नहीं है, बल्कि शराब उद्योग में उत्पादों की लेबलिंग और नियामकीय अनुपालन को लेकर आगे की दिशा भी इससे तय हो सकती है। फिलहाल अंतिम स्थिति अदालत की आगामी सुनवाई और संबंधित पक्षों की दलीलों के बाद ही स्पष्ट होगी।

  • गडकरी ने कहा- E20 और एथेनॉल ब्लेंडिंग से मेरा कोई संबंध नहीं, फर्जी AI वीडियो पर मेटा, एक्स और गूगल के खिलाफ करेंगे मुकदमा

    गडकरी ने कहा- E20 और एथेनॉल ब्लेंडिंग से मेरा कोई संबंध नहीं, फर्जी AI वीडियो पर मेटा, एक्स और गूगल के खिलाफ करेंगे मुकदमा

    नई दिल्ली । केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण को लेकर सोशल मीडिया पर प्रसारित हो रहे कथित एआई-जनित डीपफेक वीडियो से स्वयं को पूरी तरह अलग बताते हुए स्पष्ट किया है कि एथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल (ईबीपी) कार्यक्रम और ई20 पहल से उनका कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है। उन्होंने कहा कि यह पूरी तरह केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र का विषय है और इस नीति के क्रियान्वयन में उनकी कोई भूमिका नहीं है।

    इस मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने गडकरी को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू करने की अनुमति दे दी है। अदालत की मंजूरी के बाद अब वह मेटा, एक्स और गूगल के विरुद्ध सिविल मुकदमा दायर कर सकते हैं। गडकरी का आरोप है कि विभिन्न डिजिटल माध्यमों पर प्रसारित कई वीडियो में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की मदद से उनकी छवि और आवाज का उपयोग कर भ्रामक सामग्री तैयार की गई, जिससे जनता के बीच गलत संदेश फैलाने का प्रयास किया गया।

    याचिका में कहा गया है कि वायरल किए गए वीडियो में यह झूठा दावा किया गया कि गडकरी और उनका परिवार एथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल कार्यक्रम तथा ई20 पहल से किसी प्रकार का आर्थिक लाभ प्राप्त कर रहे हैं। मंत्री ने इन दावों को पूरी तरह निराधार, मनगढ़ंत और दुर्भावनापूर्ण बताते हुए कहा कि इस प्रकार की सामग्री उनकी व्यक्तिगत और सार्वजनिक छवि को नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से तैयार की गई है।

    मामले में केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय तथा दूरसंचार मंत्रालय को भी प्रतिवादी बनाया गया है। याचिका के माध्यम से डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर उपलब्ध कथित फर्जी सामग्री के खिलाफ आवश्यक कानूनी कार्रवाई और उसे हटाने की मांग की गई है। गडकरी ने यह भी स्पष्ट किया कि उनकी याचिका का उद्देश्य किसी सरकारी नीति पर होने वाली सार्वजनिक बहस, आलोचना या लोकतांत्रिक चर्चा को सीमित करना नहीं है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक नागरिक को सरकारी नीतियों पर अपनी राय रखने का अधिकार है, लेकिन किसी व्यक्ति के नाम और पहचान का दुरुपयोग कर झूठी जानकारी फैलाना स्वीकार्य नहीं हो सकता।

    हाल के समय में देश में ई20 पेट्रोल को लेकर कई तरह की चर्चाएं और दावे सामने आए हैं। विशेष रूप से वर्ष 2023 से पहले निर्मित कुछ पेट्रोल वाहनों के मालिकों ने माइलेज में कमी, रखरखाव लागत बढ़ने और इंजन के कुछ हिस्सों पर संभावित प्रभाव जैसी चिंताएं व्यक्त की हैं। इसी बीच सोशल मीडिया पर कई भ्रामक वीडियो और दावे भी तेजी से प्रसारित हुए, जिनमें एथेनॉल मिश्रण नीति को लेकर विभिन्न प्रकार की गलत जानकारियां साझा की गईं।

    गडकरी ने अपने पक्ष में दायर याचिका में दोहराया कि एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल से संबंधित नीति का संचालन और निर्णय केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के अधीन है। उन्होंने कहा कि उनके नाम का उपयोग कर तैयार किए गए एआई-जनित वीडियो तथ्यों से परे हैं और इनका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है। उनका कहना है कि डिजिटल माध्यमों पर फर्जी सामग्री के प्रसार से न केवल आम लोगों में भ्रम फैलता है, बल्कि सार्वजनिक जीवन से जुड़े व्यक्तियों की विश्वसनीयता भी प्रभावित होती है।

    इस घटनाक्रम ने एक बार फिर कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित डीपफेक सामग्री, डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही और ऑनलाइन भ्रामक सूचनाओं की निगरानी जैसे मुद्दों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया के बाद संबंधित पक्षों का जवाब और अदालत की आगामी सुनवाई महत्वपूर्ण रहेगी।