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  • दिल्ली कूच पर अड़े किसानों ने ठुकराया सीएम का न्योता, 29 अगस्त तक खनौरी बॉर्डर पर मोर्चा जारी

    दिल्ली कूच पर अड़े किसानों ने ठुकराया सीएम का न्योता, 29 अगस्त तक खनौरी बॉर्डर पर मोर्चा जारी


    नई दिल्ली ।
    विभिन्न मांगों को लेकर दिल्ली की ओर बढ़ने पर अड़े किसान संगठनों ने एक बार फिर अपना रुख कड़ा कर लिया है। सीमावर्ती क्षेत्रों में प्रशासनिक तथा पुलिस अधिकारियों के साथ कई दौर की बैठकें आयोजित की गईं, परंतु बॉर्डर खोलने और प्रदर्शनकारियों को आगे बढ़ने की अनुमति देने को लेकर दोनों पक्षों के बीच कोई सहमति नहीं बन सकी। सहमति न बन पाने की स्थिति में किसानों ने राजमार्ग के एक हिस्से में तंबू गाड़ दिए हैं और वहां अपना मोर्चा स्थापित कर लिया है।

    किसान नेताओं ने स्पष्ट किया है कि वे 29 अगस्त तक खनौरी सीमा पर ही बने रहेंगे। संगठन की ओर से यह भी साफ किया गया है कि राष्ट्रीय राजमार्ग के यातायात को पूरी तरह बाधित नहीं किया जाएगा। किसान केवल सड़क के एक किनारे बैठकर अपना विरोध दर्ज कराएंगे ताकि आम जनता को अत्यधिक असुविधा का सामना न करना पड़े। इस पूरे घटनाक्रम के बीच राज्य प्रशासन की ओर से मुख्यमंत्री स्तर की वार्ता का न्योता दिया गया था, जिसे किसान प्रतिनिधियों ने स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

    किसान प्रतिनिधियों का तर्क है कि उनकी प्रमुख मांगें केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र से संबंधित हैं, इसलिए राज्य स्तर की बैठकों से समाधान निकलना संभव नहीं है। उन्होंने मांग रखी है कि केंद्रीय कृषि मंत्री अथवा केंद्र सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों के साथ उनकी सीधी वार्ता आयोजित कराई जाए। उनका कहना है कि पिछले आंदोलनों के दौरान जिन बिंदुओं पर बातचीत रुक गई थी, वहीं से पुनः नए सिरे से आधिकारिक चर्चा शुरू की जानी चाहिए।

    दूसरी ओर, सीमावर्ती क्षेत्रों पर लगातार दूसरे दिन भी पुलिस और सुरक्षा बलों की भारी तैनाती देखने को मिली। सुरक्षा के दृष्टिकोण से कई स्थानों पर बैरिकेडिंग की गई है और मुख्य रास्तों को सील कर दिया गया है। इसके चलते दिल्ली और पंजाब को जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग पर भारी वाहनों के साथ-साथ यात्री वाहनों की आवाजाही पर व्यापक प्रभाव पड़ा है। यातायात को सुचारू रखने के लिए प्रशासन ने विभिन्न वैकल्पिक मार्गों से गाड़ियों को डाइवर्ट किया है।

    मध्य प्रदेश जैसे कृषि प्रधान राज्यों के किसान संगठन भी देश के विभिन्न हिस्सों में चल रहे किसान आंदोलनों और उनकी मांगों पर लगातार नजर बनाए रखते हैं। कृषि नीतियों, न्यूनतम समर्थन मूल्य तथा अन्य वित्तीय राहत से जुड़े मुद्दे देश भर के किसान समुदायों के लिए अत्यंत संवेदनशील और प्रासंगिक माने जाते हैं।

    वरिष्ठ पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी स्वयं बॉर्डर पर पहुंचकर सुरक्षा व्यवस्था तथा कंक्रीट बैरिकेडिंग का जायजा ले रहे हैं। गश्त बढ़ा दी गई है और सभी संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है। पंजाब और हरियाणा दोनों पक्षों के पुलिस अधिकारी लगातार प्रदर्शनकारियों से संवाद स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं ताकि शांति व्यवस्था बनी रहे और किसी भी प्रकार की अप्रिय स्थिति से निपटा जा सके।

    किसान प्रतिनिधियों का कहना है कि वे किसी भी स्थिति में कानून और व्यवस्था को अपने हाथ में नहीं लेंगे और उनका यह प्रदर्शन पूरी तरह से अनुशासित तथा शांतिपूर्ण रहेगा। हालांकि जब तक केंद्रीय स्तर पर उनकी वार्ता की मांग पूरी नहीं हो जाती, तब तक वे खनौरी बॉर्डर पर ही अपना ठहराव जारी रखेंगे।

    फिलहाल, सुरक्षा बल पूरी तरह से अलर्ट मोड पर हैं और पुलिस प्रशासन स्थिति की लगातार समीक्षा कर रहा है। सीमा से सटे ग्रामीण क्षेत्रों में पुलिस बलों की अतिरिक्त टुकड़ियां तैनात की गई हैं। अब यह देखना होगा कि आने वाले दिनों में केंद्रीय स्तर से संवाद की प्रक्रिया शुरू होती है या प्रदर्शन स्थल पर गतिरोध इसी प्रकार बरकरार रहता है।

  • भारत-चीन सीमा वार्ता में डिलिमिटेशन, सीमा प्रबंधन और ट्रांस-बॉर्डर सहयोग पर बातचीत, एलएसी पर शांति बनाए रखने पर जोर

    भारत-चीन सीमा वार्ता में डिलिमिटेशन, सीमा प्रबंधन और ट्रांस-बॉर्डर सहयोग पर बातचीत, एलएसी पर शांति बनाए रखने पर जोर

    नई दिल्ली । भारत और चीन ने सीमा मामलों पर परामर्श और समन्वय के लिए कार्य तंत्र यानी डब्ल्यूएमसीसी की 36वीं बैठक में सीमा से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर विस्तृत चर्चा की। नई दिल्ली में 6 अगस्त को आयोजित बैठक में दोनों देशों ने सीमा निर्धारण, सीमा प्रबंधन, मौजूदा तंत्र को मजबूत करने और सीमा पार सहयोग से जुड़े विषयों पर विचार साझा किए। वार्ता के दौरान लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल यानी एलएसी पर मौजूदा स्थिति की भी समीक्षा की गई।

    बैठक में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिव सुजीत घोष ने किया, जबकि चीनी प्रतिनिधिमंडल की अगुवाई चीन के विदेश मंत्रालय के बाउंड्री और ओशनिक अफेयर्स डिपार्टमेंट की महानिदेशक होउ यांकी ने की। दोनों पक्षों के बीच बातचीत को स्पष्ट और व्यावहारिक बताया गया। चर्चा का मुख्य उद्देश्य सीमा क्षेत्रों में स्थिरता बनाए रखने और लंबित मुद्दों के समाधान के लिए संवाद को आगे बढ़ाना रहा।

    भारत और चीन ने इस बात पर जोर दिया कि सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति और स्थिरता दोनों देशों के व्यापक द्विपक्षीय संबंधों के विकास के लिए महत्वपूर्ण है। एलएसी पर किसी भी तरह की गलतफहमी या गलत आकलन को रोकने के लिए दोनों पक्षों ने मौजूदा राजनयिक और सैन्य माध्यमों का इस्तेमाल जारी रखने पर सहमति जताई।

    इन माध्यमों में डब्ल्यूएमसीसी के अलावा स्थानीय कमांडर स्तर की बैठकें और पहले से निर्धारित अन्य संवाद तंत्र शामिल हैं। दोनों देशों का मानना है कि नियमित बातचीत के जरिए सीमा पर पैदा होने वाली परिस्थितियों को बेहतर तरीके से संभाला जा सकता है और लंबित मामलों के समाधान की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।

    बैठक में 24वें विशेष प्रतिनिधि स्तर के दौर की वार्ता के परिणामों के बाद सीमा से जुड़े विषयों पर आगे चर्चा की गई। इसमें सीमा निर्धारण, सीमा प्रबंधन, संस्थागत तंत्र के निर्माण और सीमा पार सहयोग जैसे मुद्दे प्रमुख रहे। दोनों पक्षों ने इन क्षेत्रों में आपसी संवाद और समन्वय बनाए रखने की जरूरत पर सहमति जताई।

    भारत ने सीमा पार नदियों से संबंधित विशेषज्ञ स्तर के तंत्र की अगली बैठक जल्द आयोजित करने की आवश्यकता भी दोहराई। भारतीय पक्ष ने विशेष रूप से चीन की ओर से ऊपरी क्षेत्रों में प्रस्तावित या संचालित परियोजनाओं से जुड़े तकनीकी विवरण साझा करने के महत्व पर जोर दिया। सीमा पार नदियों से जुड़े विषय भारत के लिए रणनीतिक और पर्यावरणीय दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।

    भारत और चीन के संबंधों में हाल के समय में लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने से जुड़े कुछ कदम भी उठाए गए हैं। इनमें कैलाश मानसरोवर यात्रा की दोबारा शुरुआत और दोनों देशों के बीच नागरिक विमानन संपर्क बहाल करना शामिल है। इन कदमों को दोनों देशों के बीच जनस्तरीय संपर्क सुधारने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    विदेश मंत्रालय ने भी भारत-चीन संबंधों में सकारात्मक प्रगति की उम्मीद जताई है। मंत्रालय के अनुसार दोनों देशों के बीच बातचीत जारी है और संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए लोगों के बीच संपर्क बेहतर करने वाले कदम उठाए जा रहे हैं। भारत का मानना है कि इस तरह के प्रयासों से द्विपक्षीय संबंधों में सकारात्मक माहौल मजबूत हो सकता है।

    इस बीच चीन के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भारतीयों और भारतीय संस्कृति के खिलाफ आपत्तिजनक सामग्री बढ़ने को लेकर भी भारतीय समुदाय की चिंताएं सामने आई हैं। बीजिंग स्थित भारतीय दूतावास के एक खुले संवाद कार्यक्रम में समुदाय के सदस्यों ने यह मुद्दा उठाया था। सीमा संबंधी बातचीत के साथ लोगों के बीच संपर्क और आपसी विश्वास मजबूत करना भी भारत-चीन संबंधों के लिए महत्वपूर्ण बना हुआ है।

  • भारत-नेपाल सीमा पर फिर बढ़ा तनाव, सुस्ता में अस्थायी बांध तोड़े जाने के आरोप से विवाद गहराया

    भारत-नेपाल सीमा पर फिर बढ़ा तनाव, सुस्ता में अस्थायी बांध तोड़े जाने के आरोप से विवाद गहराया

    नई दिल्ली । भारत और नेपाल के बीच सीमा से जुड़े संवेदनशील सुस्ता क्षेत्र में एक बार फिर तनाव की स्थिति बन गई है। नेपाल की ओर से आरोप लगाया गया है कि भारतीय सशस्त्र सीमा बल के जवानों ने नेपाली क्षेत्र में प्रवेश कर वहां बनाया जा रहा एक अस्थायी मिट्टी का बांध हटा दिया। नेपाली पक्ष का कहना है कि यह बांध नारायणी नदी के बढ़ते जलस्तर और संभावित बाढ़ से स्थानीय बस्तियों की सुरक्षा के उद्देश्य से बनाया जा रहा था। इस घटना के बाद सीमा क्षेत्र में कुछ समय के लिए तनावपूर्ण माहौल बन गया, हालांकि प्रशासनिक हस्तक्षेप के बाद स्थिति सामान्य बताई जा रही है।

    बताया जा रहा है कि विवाद उस समय सामने आया जब स्थानीय स्तर पर अस्थायी तटबंध निर्माण का कार्य चल रहा था। नेपाल का दावा है कि भारतीय सुरक्षा कर्मियों ने इस निर्माण पर आपत्ति जताई और बाद में बांध को हटाने की कार्रवाई की। इस दौरान स्थानीय लोगों और भारतीय सुरक्षाकर्मियों के बीच बहस भी हुई। घटना का एक वीडियो भी सामने आने की चर्चा है, जिसके बाद मामला दोनों देशों के अधिकारियों तक पहुंच गया।

    नेपाल सरकार ने इस घटनाक्रम को गंभीरता से लेते हुए राजनयिक स्तर पर भारत के समक्ष अपना विरोध दर्ज कराया है। नेपाल का कहना है कि सीमा से जुड़े मामलों में पहले से तय व्यवस्थाओं का सम्मान किया जाना चाहिए और किसी भी कार्रवाई से पहले आपसी समन्वय आवश्यक है। वहीं भारतीय पक्ष की ओर से यह बताया गया कि जिस क्षेत्र में निर्माण किया जा रहा था, वह लंबे समय से विवादित माना जाता है और ऐसे इलाकों में यथास्थिति बनाए रखने पर दोनों देशों के बीच पहले भी सहमति बन चुकी है।

    सुस्ता क्षेत्र भारत और नेपाल के बीच लंबे समय से विवाद का विषय रहा है। दोनों देश इस क्षेत्र पर अपना-अपना दावा करते रहे हैं। समय-समय पर सीमा निर्धारण, नदी की धारा में बदलाव और स्थानीय गतिविधियों को लेकर मतभेद सामने आते रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि नदी के मार्ग में परिवर्तन के कारण इस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति भी समय के साथ बदलती रही है, जिससे सीमा संबंधी विवाद और जटिल हो गया है।

    स्थानीय प्रशासन ने बताया कि हालात पूरी तरह नियंत्रण में हैं और किसी प्रकार की अप्रिय घटना नहीं हुई है। एहतियात के तौर पर सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की गई है ताकि दोनों ओर के नागरिकों के बीच किसी प्रकार का तनाव न बढ़े। प्रशासन लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए है और संवाद के माध्यम से समाधान निकालने की कोशिश की जा रही है।

    भारत और नेपाल के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संबंध बेहद मजबूत रहे हैं। दोनों देशों के बीच खुली सीमा व्यवस्था के कारण लाखों लोग रोजमर्रा के आवागमन और व्यापार से जुड़े हैं। ऐसे में सीमा से जुड़े किसी भी विवाद का शांतिपूर्ण और आपसी सहमति से समाधान निकालना दोनों देशों के हित में माना जाता है। जानकारों का मानना है कि संवाद और कूटनीतिक स्तर पर निरंतर संपर्क बनाए रखने से इस प्रकार के विवादों का स्थायी समाधान संभव हो सकता है और द्विपक्षीय संबंधों में विश्वास कायम रहेगा।

  • सीमा पर बांध हटाने के आरोप से बढ़ा तनाव, भारत-नेपाल अधिकारियों की बातचीत पर टिकी निगाहें

    सीमा पर बांध हटाने के आरोप से बढ़ा तनाव, भारत-नेपाल अधिकारियों की बातचीत पर टिकी निगाहें


    नई दिल्ली । 
    भारत-नेपाल सीमा पर एक बार फिर तनाव की स्थिति बन गई है। नेपाल के नवलपरासी वेस्ट जिले में स्थानीय लोगों ने भारतीय सुरक्षाकर्मियों पर नेपाल की सीमा में प्रवेश कर अस्थायी मिट्टी के बांध को हटाने का आरोप लगाया है। इस घटना के बाद सीमा क्षेत्र में कुछ समय के लिए तनावपूर्ण माहौल बन गया। स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियां पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं तथा मामले के समाधान के लिए दोनों देशों के अधिकारियों के बीच बातचीत की प्रक्रिया शुरू होने की उम्मीद जताई जा रही है।

    बताया जा रहा है कि संबंधित अस्थायी बांध स्थानीय ग्रामीणों ने नारायणी नदी के बढ़ते जलस्तर और संभावित बाढ़ से अपने गांवों की सुरक्षा के उद्देश्य से बनाया था। ग्रामीणों का कहना है कि यह संरचना बारिश के मौसम में नदी का पानी आबादी वाले क्षेत्रों में प्रवेश करने से रोकने के लिए तैयार की गई थी। इसी बांध को हटाए जाने के आरोप के बाद स्थानीय लोगों में नाराजगी देखने को मिली।

    घटना के दौरान स्थानीय नागरिकों और भारतीय सुरक्षाकर्मियों के बीच कहासुनी होने की भी जानकारी सामने आई है। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, जैसे ही लोगों ने बांध के पास गतिविधियां देखीं, बड़ी संख्या में ग्रामीण मौके पर पहुंच गए और विरोध दर्ज कराया। स्थिति को देखते हुए नेपाल के सुरक्षा बल भी घटनास्थल पर पहुंचे और दोनों पक्षों के बीच तनाव कम कराने का प्रयास किया।

    नेपाल के स्थानीय सुरक्षा अधिकारियों का कहना है कि पहले भी इस क्षेत्र में बाढ़ सुरक्षा से जुड़े निर्माण कार्यों को लेकर कई बार चर्चा हो चुकी है। उनका दावा है कि स्थायी संरचना के निर्माण में बाधाएं आने के बाद ग्रामीणों ने अस्थायी रूप से मिट्टी का बांध तैयार किया था, ताकि मानसून के दौरान बस्तियों को नुकसान से बचाया जा सके। इसी कारण ग्रामीण इस संरचना को अपने लिए महत्वपूर्ण मानते हैं।

    जिला प्रशासन ने घटना की पुष्टि करते हुए कहा है कि सीमा क्षेत्र में बांध को लेकर विवाद की जानकारी मिली है। प्रशासन का कहना है कि मामले की वास्तविक परिस्थितियों का आकलन किया जा रहा है और दोनों देशों के संबंधित अधिकारियों के बीच समन्वय स्थापित किया जा रहा है। उद्देश्य यह है कि सीमा पर शांति और सामान्य स्थिति बनी रहे तथा किसी भी प्रकार का तनाव आगे न बढ़े।

    भारत और नेपाल के बीच खुली सीमा होने के कारण दोनों देशों के नागरिकों का लंबे समय से सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक स्तर पर गहरा जुड़ाव रहा है। हालांकि समय-समय पर सीमा निर्धारण, नदी प्रबंधन और बाढ़ नियंत्रण से जुड़े मुद्दों पर स्थानीय स्तर पर विवाद सामने आते रहे हैं। ऐसे मामलों का समाधान आमतौर पर प्रशासनिक और कूटनीतिक संवाद के माध्यम से किया जाता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि सीमा क्षेत्रों में नदी के बहाव, बाढ़ नियंत्रण और सुरक्षात्मक निर्माण जैसे विषय दोनों देशों के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में किसी भी निर्माण या कार्रवाई को लेकर स्थानीय प्रशासन और संबंधित एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक होता है, ताकि सीमा क्षेत्र में रहने वाले लोगों के हित सुरक्षित रह सकें।

    फिलहाल दोनों देशों के अधिकारियों के बीच प्रस्तावित वार्ता पर सभी की निगाहें टिकी हैं। उम्मीद की जा रही है कि बातचीत के माध्यम से स्थिति स्पष्ट होगी और सीमा क्षेत्र में उत्पन्न विवाद का शांतिपूर्ण एवं पारस्परिक सहमति से समाधान निकाला जाएगा।

  • नेपाल की भारत से नई अपील, सीमा पार यात्रा के लिए राष्ट्रीय पहचान पत्र को मान्यता देने का अनुरोध

    नेपाल की भारत से नई अपील, सीमा पार यात्रा के लिए राष्ट्रीय पहचान पत्र को मान्यता देने का अनुरोध

    नई दिल्ली । नेपाल ने भारत सरकार से औपचारिक रूप से अनुरोध किया है कि वह नेपाली नागरिकों के राष्ट्रीय पहचान पत्र (नेशनल आइडेंटिटी कार्ड) को सीमा पार यात्रा और हवाई सफर के लिए वैध यात्रा दस्तावेज के रूप में मान्यता दे। नेपाल का कहना है कि इस कदम से दोनों देशों के बीच लोगों की आवाजाही अधिक सुरक्षित, आसान और आधुनिक पहचान प्रणाली के अनुरूप हो सकेगी।

    नेपाल और भारत के बीच लंबे समय से खुली सीमा व्यवस्था लागू है, जिसके तहत दोनों देशों के नागरिकों को सामान्य परिस्थितियों में बिना पासपोर्ट और वीजा के एक-दूसरे के देश में आने-जाने की अनुमति है। हालांकि, वर्तमान व्यवस्था में भारत मुख्य रूप से नेपाली नागरिकों के पासपोर्ट और नागरिकता प्रमाण पत्र को आधिकारिक पहचान दस्तावेज के रूप में स्वीकार करता है। अब नेपाल चाहता है कि उसके राष्ट्रीय पहचान पत्र को भी इसी श्रेणी में शामिल किया जाए।

    नेपाल के आव्रजन विभाग के अनुसार, इस संबंध में जून के अंतिम सप्ताह में भारत सरकार को औपचारिक प्रस्ताव भेजा गया था। प्रस्ताव में अनुरोध किया गया है कि नेपाली नागरिकों के लिए राष्ट्रीय पहचान पत्र को सीमा पार आवागमन और हवाई यात्रा के दौरान वैध पहचान दस्तावेज के रूप में मान्यता दी जाए।

    नेपाल सरकार का कहना है कि राष्ट्रीय पहचान पत्र आधुनिक बायोमेट्रिक तकनीक पर आधारित है। इसमें फिंगरप्रिंट, चेहरे की पहचान और आईरिस स्कैन जैसी महत्वपूर्ण जानकारियां सुरक्षित रहती हैं। इसके कारण यह पारंपरिक नागरिकता प्रमाण पत्र की तुलना में अधिक सुरक्षित और विश्वसनीय माना जाता है।

    नेपाल में सरकार विभिन्न सरकारी सेवाओं के लिए राष्ट्रीय पहचान पत्र के उपयोग को लगातार बढ़ावा दे रही है। पासपोर्ट आवेदन, बैंक खाता खोलने, भूमि पंजीकरण और अन्य कई सरकारी कार्यों में इस पहचान पत्र को अनिवार्य बनाया जा रहा है। सरकार का उद्देश्य धीरे-धीरे पुराने नागरिकता प्रमाण पत्रों की जगह डिजिटल रूप से सत्यापित किए जा सकने वाले पहचान पत्रों को लागू करना है।

    नेपाल की ओर से प्रस्ताव भेजे जाने के बाद काठमांडू स्थित भारतीय दूतावास के अधिकारियों ने राष्ट्रीय पहचान पत्र से जुड़े तकनीकी और सुरक्षा पहलुओं के बारे में जानकारी भी प्राप्त की है। बताया गया कि यह औपचारिक वार्ता नहीं थी, बल्कि कार्ड की विशेषताओं और सुरक्षा व्यवस्था को समझने के उद्देश्य से जानकारी का आदान-प्रदान किया गया।

    नेपाल के अधिकारियों का मानना है कि यदि राष्ट्रीय पहचान पत्र को भारत में भी वैध यात्रा दस्तावेज का दर्जा मिल जाता है तो दोनों देशों की सुरक्षा व्यवस्था और पहचान सत्यापन प्रक्रिया अधिक प्रभावी हो जाएगी। इससे सीमा पार आवाजाही के दौरान पहचान संबंधी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और विश्वसनीयता भी बढ़ेगी।

    वर्तमान व्यवस्था के तहत भारत आने वाले नेपाली नागरिकों के लिए पासपोर्ट और नागरिकता प्रमाण पत्र स्वीकार किए जाते हैं। वहीं नेपाल जाने वाले भारतीय नागरिक पासपोर्ट, मतदाता पहचान पत्र अथवा केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा जारी कुछ अन्य मान्य पहचान पत्रों का उपयोग कर सकते हैं।

    नेपाल के राष्ट्रीय पहचान एवं नागरिक पंजीकरण विभाग के अनुसार अब तक 45 लाख से अधिक नागरिकों को राष्ट्रीय पहचान पत्र जारी किए जा चुके हैं, जबकि लगभग दो करोड़ लोगों ने इसके लिए पंजीकरण कराया है। नेपाल को उम्मीद है कि भविष्य में इस डिजिटल पहचान प्रणाली को भारत की मान्यता मिलने से दोनों देशों के बीच आवागमन और अधिक सुरक्षित तथा सुविधाजनक हो सकेगा।

  • स्यूटा सीमा पर अचानक बढ़ी प्रवासियों की भीड़ ने बढ़ाई यूरोप की चिंता, आर्थिक संकट और अफवाहों की भी चर्चा

    स्यूटा सीमा पर अचानक बढ़ी प्रवासियों की भीड़ ने बढ़ाई यूरोप की चिंता, आर्थिक संकट और अफवाहों की भी चर्चा

    नई दिल्ली । स्पेन के उत्तर अफ्रीका स्थित स्वायत्त क्षेत्र स्यूटा में बड़ी संख्या में प्रवासियों के एक साथ पहुंचने की घटना ने पूरे यूरोप का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। सीमावर्ती क्षेत्र में अचानक बढ़ी भीड़ के कारण सुरक्षा व्यवस्था पर दबाव बढ़ गया और प्रशासन को स्थिति नियंत्रित करने के लिए अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती करनी पड़ी। इस घटनाक्रम ने एक बार फिर अवैध प्रवासन, सीमा प्रबंधन और मानवीय चुनौतियों को लेकर व्यापक चर्चा शुरू कर दी है।

    स्यूटा भौगोलिक रूप से अफ्रीका महाद्वीप में स्थित स्पेन का एक क्षेत्र है, जिसकी सीमा सीधे मोरक्को से लगती है। यही कारण है कि यह लंबे समय से यूरोप पहुंचने की कोशिश करने वाले प्रवासियों के लिए प्रमुख प्रवेश बिंदु माना जाता रहा है। समुद्र और भूमि दोनों मार्गों से यहां पहुंचना अपेक्षाकृत आसान होने के कारण समय-समय पर बड़ी संख्या में लोग इस रास्ते का उपयोग करने का प्रयास करते हैं।

    विश्लेषकों के अनुसार, इस बार अचानक बड़ी संख्या में लोगों के सीमा की ओर बढ़ने के पीछे कई कारण एक साथ सक्रिय रहे। इनमें कानूनी प्रक्रियाओं को लेकर फैली गलत जानकारियां भी शामिल हैं। बताया गया कि स्पेन की न्यायिक प्रक्रिया से जुड़ी कुछ खबरों को मानव तस्करी से जुड़े नेटवर्क ने गलत तरीके से प्रचारित किया। इसके बाद यह अफवाह फैल गई कि समुद्री मार्ग से स्पेन पहुंचने वाले लोगों को तुरंत वापस नहीं भेजा जाएगा। ऐसी सूचनाओं ने कई लोगों को जोखिम उठाकर सीमा पार करने के लिए प्रेरित किया।

    दूसरा महत्वपूर्ण कारण मोरक्को की आर्थिक परिस्थितियों को माना जा रहा है। बेरोजगारी, महंगाई और सीमित रोजगार अवसरों के चलते बड़ी संख्या में युवा बेहतर भविष्य की तलाश में विदेश जाने की कोशिश कर रहे हैं। कई प्रवासियों का मानना है कि यूरोप में उन्हें रोजगार, शिक्षा और बेहतर जीवन स्तर के अधिक अवसर मिल सकते हैं। यही उम्मीद उन्हें कठिन और जोखिम भरी यात्रा के लिए भी तैयार कर देती है।

    भौगोलिक स्थिति भी इस पूरी घटना में अहम भूमिका निभाती है। स्यूटा और मेलिला अफ्रीका में स्थित स्पेन के दो ऐसे क्षेत्र हैं, जहां से यूरोपीय संघ की सीमा तक पहुंच संभव है। इसी वजह से ये इलाके लंबे समय से अवैध प्रवासन के प्रमुख मार्ग माने जाते रहे हैं। कई प्रवासी समुद्र तैरकर, रबर ट्यूब या अन्य अस्थायी साधनों की मदद से स्यूटा के तट तक पहुंचने का प्रयास करते हैं। अचानक बड़ी संख्या में लोगों के पहुंचने से सीमा सुरक्षा एजेंसियों के सामने स्थिति को नियंत्रित करना चुनौतीपूर्ण हो गया।

    घटना के बाद स्पेन सरकार ने सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करते हुए अतिरिक्त बलों की तैनाती की और सीमा पर निगरानी बढ़ा दी। प्रशासन ने मानवीय सहायता के साथ-साथ आव्रजन नियमों के अनुसार कार्रवाई शुरू की। जिन लोगों के पास वैध दस्तावेज नहीं थे, उनके मामलों की कानूनी प्रक्रिया के तहत जांच की गई तथा कई प्रवासियों को वापस भेजने की कार्रवाई भी की गई। वहीं, अस्थायी शिविरों और राहत व्यवस्थाओं पर भी प्रशासन को अतिरिक्त संसाधन लगाने पड़े।

    इस घटनाक्रम ने पूरे यूरोप में सीमा सुरक्षा, मानव तस्करी और अवैध प्रवासन को लेकर नई बहस छेड़ दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल सीमा सुरक्षा कड़ी करने से समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं होगा। इसके लिए मानव तस्करी के नेटवर्क पर प्रभावी कार्रवाई, प्रवासन से जुड़े भ्रम फैलाने वाली अफवाहों पर रोक और मूल देशों में रोजगार एवं आर्थिक अवसरों को बढ़ाने जैसे दीर्घकालिक उपाय भी आवश्यक होंगे।

  • बांग्लादेशी घुसपैठ पर संसदीय समिति सख्त, सीमाओं पर संयुक्त निगरानी तंत्र बनाने की दी सिफारिश।

    बांग्लादेशी घुसपैठ पर संसदीय समिति सख्त, सीमाओं पर संयुक्त निगरानी तंत्र बनाने की दी सिफारिश।

    नई दिल्ली। भारत और बांग्लादेश के बीच द्विपक्षीय संबंधों और सीमा प्रबंधन को लेकर संसद की विदेश मामलों की स्थायी समिति ने एक महत्वपूर्ण समीक्षा रिपोर्ट प्रस्तुत की है। वरिष्ठ सांसद शशि थरूर की अध्यक्षता वाली इस समिति ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि पड़ोसी देश बांग्लादेश से होने वाली अवैध घुसपैठ आज भी भारत की आंतरिक सुरक्षा और जनसांख्यिकी के लिए एक अत्यंत गंभीर चिंता का विषय बनी हुई है। समिति ने इस संवेदनशील समस्या से निपटने के लिए दोनों देशों के बीच एक समर्पित ‘संयुक्त कार्य समूह’ या स्थायी द्विपक्षीय तंत्र स्थापित करने का सुझाव दिया है, ताकि सीमा पार से होने वाली गतिविधियों पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सके।

    रिपोर्ट में उजागर किया गया है कि वर्तमान समय में लगभग 2,369 संदिग्ध प्रवासियों की राष्ट्रीयता की पुष्टि का मामला बांग्लादेश सरकार के पास लंबित पड़ा हुआ है। स्थायी समिति का मानना है कि दोनों देशों के बीच एक औपचारिक और जवाबदेह प्रशासनिक ढांचा बनने से पहचान सत्यापन की यह प्रक्रिया त्वरित गति से पूरी की जा सकेगी। इसके साथ ही, समिति ने यह मानवीय और कानूनी हिदायत भी दी है कि जांच और सत्यापन की पूरी प्रक्रिया के दौरान पूरी सतर्कता बरती जाए ताकि किसी भी भारतीय नागरिक को गलती से सीमा पार न भेजा जाए और हिरासत में लिए गए व्यक्तियों के साथ मानवीय दृष्टिकोण अपनाया जाए।

    सीमा सुरक्षा के तकनीकी पहलुओं का उल्लेख करते हुए रिपोर्ट में बताया गया है कि दोनों देशों के बीच फैली 4,096 किलोमीटर लंबी कुल सीमा में से लगभग 3,231 किलोमीटर हिस्से में ही सुरक्षा बाड़ लगाई जा सकी है। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों, नदी क्षेत्रों और विवादित भूखंडों के कारण अभी भी करीब 864 किलोमीटर की सीमा बिना बाड़ के खुली हुई है, जिसका फायदा अवैध गतिविधियों के लिए उठाया जाता है। रिपोर्ट के अनुसार इस घुसपैठ का सबसे अधिक प्रतिकूल प्रभाव सीमावर्ती राज्यों जैसे पश्चिम बंगाल और असम पर पड़ रहा है, जहां सुरक्षा एजेंसियों को लगातार सतर्क रहना पड़ता है।

    सुरक्षा चिंताओं के अलावा समिति ने दोनों देशों के बीच व्यापारिक नियमों के दुरुपयोग पर भी गंभीर आपत्ति जताई है। रिपोर्ट के मुताबिक, दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार क्षेत्र (साफ्टा) के तहत मिलने वाली रियायतों का गलत फायदा उठाकर तीसरे देशों की सामग्री, विशेष रूप से चीनी कपड़ों और उत्पादों को बांग्लादेश के रास्ते भारतीय बाजारों में खपाया जा रहा है। इससे घरेलू उद्योगों और निष्पक्ष व्यापार प्रतिस्पर्धा को भारी नुकसान पहुंच रहा है। समिति ने वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय को व्यापारिक नियमों को और अधिक कड़ा करने और उच्च स्तर पर इस मुद्दे को उठाने का परामर्श दिया है।

    संसदीय समिति ने सुरक्षा और व्यापारिक कड़ाई के साथ-साथ कूटनीतिक और सांस्कृतिक संबंधों को पुनः पटरी पर लाने की आवश्यकता पर भी बल दिया है। स्थिति सामान्य होते ही वीजा सेवाओं को चरणबद्ध तरीके से सुचारू करने, वार्षिक संयुक्त साहित्य महोत्सवों के आयोजन और युवाओं के आदान-प्रदान के माध्यम से जन-सामान्य के बीच आपसी विश्वास बढ़ाने की सिफारिश की गई है। इसके अतिरिक्त, समिति ने वैश्विक पटल पर भारत की वैज्ञानिक और कूटनीतिक पहुंच बढ़ाने के लिए ‘ध्रुवीय राजदूत’ की नियुक्ति और अंटार्कटिका में अनुसंधान केंद्रों के निर्माण में तेजी लाने का सुझाव भी दिया है।

  • भारत-चीन संबंधों पर जयशंकर का स्पष्ट संदेश, सीमा पर स्थायी शांति के बिना सामान्य रिश्तों की नहीं बन सकती मजबूत नींव

    भारत-चीन संबंधों पर जयशंकर का स्पष्ट संदेश, सीमा पर स्थायी शांति के बिना सामान्य रिश्तों की नहीं बन सकती मजबूत नींव

    नई दिल्ली । भारत और चीन के बीच संबंधों को सामान्य बनाने की दिशा में जारी प्रयासों के बीच विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने स्पष्ट किया है कि दोनों देशों के रिश्तों में स्थायी सुधार तभी संभव है, जब सीमा क्षेत्रों में पूरी तरह शांति और स्थिरता बनी रहे। उन्होंने कहा कि वास्तविक नियंत्रण रेखा पर शांतिपूर्ण माहौल दोनों देशों के बीच विश्वास बहाली और सामान्य संबंधों की सबसे पहली तथा अनिवार्य शर्त है। यह संदेश उन्होंने चीन के विदेश मंत्री वांग यी के साथ हुई द्विपक्षीय बैठक के दौरान दिया, जिसमें दोनों देशों के संबंधों से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई।

    बैठक के दौरान भारत ने यह भी दोहराया कि दोनों देशों के बीच संबंध आपसी सम्मान, समान हितों और संवेदनशीलता के सिद्धांतों पर आधारित होने चाहिए। विदेश मंत्री ने कहा कि भारत और चीन जैसे बड़े तथा प्रभावशाली पड़ोसी देशों के बीच स्थिर और संतुलित संबंध केवल द्विपक्षीय हितों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि एशिया और वैश्विक स्तर पर भी उनका व्यापक प्रभाव पड़ता है। इसलिए दोनों देशों के बीच विश्वास और सहयोग को मजबूत करने के लिए संवेदनशील मुद्दों का समाधान जिम्मेदारी और संवाद के माध्यम से किया जाना आवश्यक है।

    विदेश मंत्री ने सीमा क्षेत्रों में हालात सुधारने के लिए पिछले कुछ समय में उठाए गए कदमों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि दोनों देशों ने विभिन्न स्तरों पर संवाद और समन्वय के जरिए कई सकारात्मक पहल की हैं। इसके बावजूद सीमा क्षेत्रों में स्थायी शांति बनाए रखने के लिए सैन्य और राजनयिक तंत्र के बीच निरंतर संपर्क तथा सक्रिय सहयोग की आवश्यकता बनी हुई है। उन्होंने इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने पर विशेष जोर दिया ताकि भविष्य में किसी भी प्रकार के तनाव की संभावना कम हो सके।

    भारत ने बैठक के दौरान आर्थिक और व्यापारिक मुद्दों को भी प्रमुखता से उठाया। विदेश मंत्री ने कहा कि भारतीय कंपनियों को चीन के बाजार में निष्पक्ष और पारदर्शी अवसर मिलने चाहिए। उन्होंने दोनों देशों के बीच बढ़ते व्यापार असंतुलन पर चिंता व्यक्त करते हुए इसे संतुलित करने की आवश्यकता बताई। साथ ही उन्होंने भरोसेमंद और स्थिर सप्लाई चेन की अहमियत पर बल देते हुए कहा कि वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए आर्थिक सहयोग को अधिक पारदर्शी और संतुलित बनाना समय की मांग है।

    बैठक में दोनों देशों के बीच लोगों के स्तर पर संपर्क बढ़ाने की आवश्यकता पर भी सहमति जताई गई। विदेश मंत्री ने कहा कि नियमित संवाद, सांस्कृतिक आदान-प्रदान, यात्रा सुविधाओं में सुधार और विभिन्न द्विपक्षीय तंत्रों की सक्रिय बैठकों से आपसी विश्वास को और मजबूत किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच सहयोग के विभिन्न क्षेत्रों में निरंतर संवाद बनाए रखना भविष्य के संबंधों के लिए महत्वपूर्ण रहेगा।

    भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि दोनों देशों के बीच मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन उन्हें विवाद या टकराव में बदलने से रोकना दोनों पक्षों की साझा जिम्मेदारी है। विदेश मंत्री ने कहा कि संवाद और कूटनीति ही ऐसे मुद्दों का सबसे प्रभावी समाधान है। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत रचनात्मक सहयोग और सकारात्मक संबंधों का पक्षधर है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमा की स्थिरता से जुड़े मुद्दों पर किसी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा।

    हाल के समय में दोनों देशों के बीच कई क्षेत्रों में संवाद और सहयोग बढ़ाने की दिशा में सकारात्मक पहल देखने को मिली है। हालांकि भारत का स्पष्ट मानना है कि सीमा पर स्थायी शांति और विश्वास का वातावरण ही भविष्य में मजबूत, संतुलित और दीर्घकालिक भारत-चीन संबंधों की वास्तविक आधारशिला बन सकता है।

  • नेपाल में बालेन शाह के खिलाफ विरोध प्रदर्शन जारी… भारत ने सीमा पर बढ़ाई चौकसी

    नेपाल में बालेन शाह के खिलाफ विरोध प्रदर्शन जारी… भारत ने सीमा पर बढ़ाई चौकसी


    नई दिल्ली।
    भारत (India) की जमीन कब्जा करने के नेपाली पीएम बालेन शाह (Nepali PM Balen Shah) के दावे पर भारतीय विदेश मंत्रालय ने सधी हुई प्रक्रिया दी है। कहा कि सीमा विवादों को सुलझाने के लिए दोनों देशों के बीच एक स्थापित तंत्र है, जिसके जरिये समाधान निकाला जाएगा। साथ ही इसमें किसी भी तीसरे पक्ष की भूमिका को खारिज कर दिया। इस बीच उत्तराखंड (Uttarakhand) से सटे नेपाल के विभिन्न क्षेत्रों में विरोध प्रदर्शन जारी हैं। बालेन शाह के बयान के खिलाफ डडेलधुरा समेत कई स्थानों पर विभिन्न छात्र और युवा संगठनों के कार्यकर्ता विरोध दर्ज करा रहे हैं। इस बीच भारत-नेपाल सीमा (India-Nepal border) पर सुरक्षा एजेंसियों ने सतर्कता बढ़ा दी है।

    सीमावर्ती क्षेत्रों में सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) और स्थानीय पुलिस ने संयुक्त रूप से गश्त तेज कर दी है। सुरक्षा एजेंसियां घुसपैठ, तस्करी और अन्य अवैध गतिविधियों पर नजर रखने के लिए पगडंडी मार्गों, चेकपोस्टों और सीमावर्ती गांवों में लगातार निगरानी कर रही हैं। विशेष रूप से उन क्षेत्रों पर फोकस किया जा रहा है जहां सीमा अपेक्षाकृत खुली है और लोगों का आवागमन अधिक रहता है।


    एसएसबी और स्थानीय पुलिस की संयुक्त गश्त

    मंगलवार को बलुवाकोट क्षेत्र में थानाध्यक्ष नीमा बोहरा के नेतृत्व में पुलिस और एसएसबी की टीम ने संयुक्त गश्त की। इस दौरान जवानों ने संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखने के साथ ही स्थानीय लोगों से सतर्क रहने और किसी भी संदिग्ध व्यक्ति अथवा घटना की जानकारी तुरंत पुलिस को देने की अपील की। सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति और सुरक्षा बनाए रखने के लिए नियमित गश्त और निगरानी जारी रहेगी।


    बालेन शाह के बयान पर विदेश मंत्रालय

    विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने मंगलवार को साप्ताहिक प्रेस ब्रीफिंग में कहा कि हमने भारत-नेपाल सीमा के संबंध में नेपाल के प्रधानमंत्री की टिप्पणियों के साथ-साथ इस मामले पर नेपाली विदेश मंत्रालय द्वारा जारी बयान को भी देखा है।

    रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत-नेपाल सीमा का लगभग 98 फीसदी हिस्सा निर्धारित हो चुका है, फिर भी कुछ हिस्से को सुलझाना बाकी है। उन्होंने कहा कि गंडक नदी के बहाव में परिवर्तन के कारण यह स्थिति उत्पन्न हुई है। इसके अतिरिक्त सीमा के निर्धारित हिस्सों में सीमा पार कब्जे और नो-मैन्स लैंड पर अतिक्रमण के मामले भी हैं, जिनका संयुक्त रूप से मानचित्रण किया जा रहा है। रणधीर जायसवाल ने कहा कि हमने सीमा संबंधी सभी मामलों से निपटने के लिए द्विपक्षीय तंत्र स्थापित किए हैं। सभी संबंधित पक्षों को यह स्पष्ट होना चाहिए कि भारत और नेपाल के बीच द्विपक्षीय मामलों में किसी तीसरे पक्ष की कोई भूमिका नहीं है।

    हाल में पाकिस्तान और यूरोपीय संघ के संयुक्त बयान में जम्मू-कश्मीर के उल्लेख पर भी भारत ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। जायसवाल ने कहा कि हम संयुक्त प्रेस बयान में भारत के अंदरूनी मामलों पर ऐसे बेवजह जिक्र को पूरी तरह से खारिज करते हैं।