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  • भारत के डिफेंस एक्सपोर्ट में ब्रह्मोस सबसे आगे, 2027-28 तक आएगा हल्का वर्जन: CEO जयतीर्थ जोशी

    भारत के डिफेंस एक्सपोर्ट में ब्रह्मोस सबसे आगे, 2027-28 तक आएगा हल्का वर्जन: CEO जयतीर्थ जोशी


    नई दिल्ली। भारत की सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस को पूरी तरह स्वदेशी बनाने की दिशा में तेजी से काम किया जा रहा है। ब्रह्मोस एयरोस्पेस के एमडी और सीईओ डॉ. जयतीर्थ आर. जोशी के मुताबिक, भारत के रक्षा निर्यात में ब्रह्मोस की अहम भूमिका है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान इस मिसाइल के इस्तेमाल के बाद वैश्विक स्तर पर इसकी क्षमता और प्रतिष्ठा को लेकर चर्चा बढ़ी है। कंपनी अब उत्पादन बढ़ाने, सप्लाई चेन मजबूत करने और ब्रह्मोस के हल्के वर्जन विकसित करने पर जोर दे रही है।

    ब्रह्मोस को भारतीय थल सेना, नौसेना और वायुसेना में शामिल किया जा चुका है। अब इसके नेक्स्ट जेनरेशन वर्जन ब्रह्मोस-एनजी पर काम चल रहा है। इसके अलावा, लंबी दूरी तक मार करने वाले स्ट्राइक वेरिएंट की अवधारणा पर भी काम किया जा रहा है।

    डिफेंस एक्सपोर्ट में ब्रह्मोस की बढ़ती भूमिका
    भारत का रक्षा निर्यात सालाना 62.7 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 38,400 करोड़ रुपये तक पहुंचने का दावा किया गया है। इसमें ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम की अहम हिस्सेदारी है।

    डॉ. जोशी के मुताबिक, ब्रह्मोस की निर्यात सफलता की शुरुआत 2025 में इसके युद्ध में इस्तेमाल से पहले ही हो गई थी। वर्ष 2022 में भारत को इस मिसाइल के लिए पहला बड़ा निर्यात ऑर्डर मिला था। इस सौदे ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय रक्षा उत्पादों की संभावनाओं को मजबूती दी।

    फिलीपींस के साथ शुरुआती निर्यात समझौते के बाद इस साल दक्षिण-पूर्व एशिया के दो और देशों के साथ सौदे किए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, फिलीपींस, इंडोनेशिया और वियतनाम को मिले ऑर्डर और डिलीवरी के साथ ब्रह्मोस का निर्यात 600 मिलियन डॉलर से अधिक होने का अनुमान है।

    सप्लाई चेन मजबूत करने के लिए बढ़ेंगे साझेदार
    ब्रह्मोस की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए कंपनी उत्पादन क्षमता और सप्लाई चेन का विस्तार कर रही है। डॉ. जोशी ने बताया कि हैदराबाद, नागपुर, पिलानी और लखनऊ स्थित उत्पादन इकाइयां तेजी से काम कर रही हैं।

    कंपनी हर सिस्टम और सब-सिस्टम के लिए औद्योगिक साझेदारों की संख्या बढ़ाने की तैयारी में है। अभी जहां एक या दो प्रमुख साझेदारों पर निर्भरता रही है, वहीं इसे बढ़ाकर 45 सोर्स तक विकसित करने की योजना है। इससे उत्पादन में तेजी लाने के साथ गुणवत्ता और लागत के स्तर पर प्रतिस्पर्धा बढ़ाने में मदद मिलने की उम्मीद है।

    2027-28 तक तैयार हो सकता है ब्रह्मोस-एनजी का प्रोटोटाइप
    ब्रह्मोस के नए संस्करणों में ब्रह्मोस-एनजी यानी नेक्स्ट जेनरेशन मिसाइल महत्वपूर्ण है। यह मौजूदा मिसाइल की तुलना में छोटी और हल्की होगी। इसका उद्देश्य लड़ाकू विमानों में इसे एकीकृत करना आसान बनाना और भारत की हवाई हमले की क्षमता को मजबूत करना है।

    इस मिसाइल को भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) और रूस की एनपीओ मशीनोस्ट्रोयेनिया के सहयोग से विकसित किया जा रहा है।

    डॉ. जोशी के अनुसार, ब्रह्मोस-एनजी का पहला प्रोटोटाइप 2027 या 2028 तक तैयार होने की उम्मीद है। इसमें अधिक स्वदेशी तकनीक और उन्नत सामग्री का इस्तेमाल करने की योजना है। इसके लिए व्यापक अनुसंधान एवं विकास की जरूरत होगी।

    1,500 किलोमीटर रेंज वाले वर्जन पर भी काम
    ब्रह्मोस एयरोस्पेस 1,500 किलोमीटर की रेंज वाले स्ट्राइक वेरिएंट पर भी काम कर रहा है। कंपनी के मुताबिक, मिसाइल ने जमीन, समुद्र और हवा से किए गए परीक्षणों में लंबी दूरी तक मार करने की क्षमता दिखाई है। हालांकि, 1,500 किलोमीटर रेंज वाला वर्जन अभी अवधारणा के स्तर पर है।

    ब्रह्मोस की खासियत इसकी सुपरसोनिक गति, सटीक निशाना लगाने की क्षमता और अलग-अलग प्लेटफॉर्म से लॉन्च किए जाने की सुविधा है। नए संस्करणों के विकास से भारतीय सेनाओं की परिचालन क्षमता बढ़ाने और अंतरराष्ट्रीय बाजार में निर्यात की संभावनाओं को मजबूत करने का लक्ष्य है।

    नौसेना के लिए ब्रह्मोस का नया कॉन्ट्रैक्ट
    रक्षा मंत्रालय ने 6 अक्टूबर को भारतीय नौसेना के जहाजों के लिए ब्रह्मोस फायर कंट्रोल सिस्टम और लॉन्चर खरीदने के लिए ब्रह्मोस एयरोस्पेस के साथ अनुबंध किया। इस परियोजना में कम से कम 68 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल किया जाएगा। इसमें सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) सहित विभिन्न भारतीय उद्योगों की भागीदारी भी रहेगी।

    डॉ. जोशी के मुताबिक, ऑपरेशन सिंदूर ने ब्रह्मोस की परिचालन क्षमता को प्रदर्शित किया है। कंपनी का जोर अब इस मिसाइल को अधिक स्वदेशी बनाने, उत्पादन बढ़ाने और नई पीढ़ी के संस्करणों को विकसित करने पर है।

  • तुर्किये-पाकिस्तान के साथ इंडोनेशिया के रक्षा समझौते से ब्रह्मोस तकनीक पर सवाल, विशेषज्ञों ने बताई भारत की सुरक्षा रणनीति

    तुर्किये-पाकिस्तान के साथ इंडोनेशिया के रक्षा समझौते से ब्रह्मोस तकनीक पर सवाल, विशेषज्ञों ने बताई भारत की सुरक्षा रणनीति

    नई दिल्ली । तुर्किये, कतर, पाकिस्तान और इंडोनेशिया के बीच रक्षा सहयोग बढ़ाने के लिए हुए बद्र मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) के बाद भारत के रक्षा हितों को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। इस समझौते का उद्देश्य सैन्य उत्पादन, रक्षा क्षमताओं, तकनीकी प्रशिक्षण और अनुसंधान एवं विकास के क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाना है। इसके बाद सवाल उठने लगे हैं कि क्या इस साझेदारी से भारत और इंडोनेशिया के बीच हुए मिसाइल सौदों की सुरक्षा पर असर पड़ सकता है और क्या भारत की संवेदनशील सैन्य तकनीक उसके प्रतिद्वंद्वी देशों तक पहुंचने का जोखिम पैदा हो सकता है।

    भारत ने जुलाई 2026 में इंडोनेशिया के साथ करीब 630 मिलियन डॉलर यानी लगभग 5,300 करोड़ रुपये के दो रक्षा समझौते किए थे। इनमें ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल और अस्त्र हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइल की बिक्री से संबंधित समझौते शामिल हैं। ऐसे में चार देशों के नए रक्षा सहयोग को लेकर यह सवाल उठ रहा है कि इंडोनेशिया के दूसरे देशों के साथ बढ़ते सैन्य संबंधों का इन सौदों पर कोई प्रभाव पड़ेगा या नहीं। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में विशेषज्ञों ने केवल बद्र MoU के आधार पर भारतीय मिसाइल तकनीक को खतरा मानने की आशंका को उचित नहीं बताया है।

    डीआरडीओ के चेयरमैन एमेरिटस और ब्रह्मोस एयरोस्पेस के पूर्व महानिदेशक, मुख्य कार्यकारी अधिकारी एवं प्रबंध निदेशक सुधीर कुमार मिश्रा के अनुसार, इंडोनेशिया के साथ हुए समझौतों में तकनीकी जानकारी की सुरक्षा के लिए पर्याप्त प्रावधान शामिल किए गए हैं। उन्होंने कहा कि इंडोनेशिया को हथियारों के इस्तेमाल से संबंधित उपयोगकर्ता पुस्तिका दी जाएगी, न कि तकनीक हस्तांतरण से जुड़ी पुस्तिका। उनके मुताबिक, समझौतों में डेटा सुरक्षा, बौद्धिक संपदा अधिकार और रक्षा संप्रभुता से जुड़े सख्त प्रावधान भी शामिल हैं, जिनका पालन इंडोनेशिया को करना होगा।

    मिश्रा की राय में, इन सुरक्षा उपायों के रहते ब्रह्मोस और अस्त्र मिसाइलों की संवेदनशील तकनीक भारत के प्रतिद्वंद्वियों तक पहुंचने की आशंका नहीं है। हथियारों का इस्तेमाल करने के लिए जरूरी जानकारी साझा करना और उनके निर्माण या तकनीकी विकास से जुड़ी विस्तृत जानकारी हस्तांतरित करना अलग-अलग बातें हैं। यही अंतर भारत के रक्षा निर्यात समझौतों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    रक्षा विशेषज्ञ और सेवानिवृत्त ग्रुप कैप्टन अजय अहलावत ने भी भारत-इंडोनेशिया रक्षा सौदों के प्रभावित होने की अटकलों को खारिज किया। वह सेंटर फॉर एयरोस्पेस पावर एंड स्ट्रेटेजिक स्टडीज में वरिष्ठ फेलो हैं। उनके अनुसार, किसी समझौता ज्ञापन को सैन्य गठबंधन के बराबर नहीं माना जा सकता। केवल एक MoU पर हस्ताक्षर होने से यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि पहले से तय रक्षा निर्यात सौदे खतरे में पड़ गए हैं।

    अहलावत ने बद्र समझौते की भाषा को रक्षा अनुसंधान एवं विकास में सहयोग और कार्य विभाजन की व्यवस्था के रूप में देखा। उनके मुताबिक, यह साझा इस्लामी पहचान वाले देशों के बीच रक्षा क्षेत्र में तालमेल बढ़ाने की कोशिश भी हो सकती है। उन्होंने कहा कि भारत को इस घटनाक्रम पर नजर रखनी चाहिए, लेकिन इसे लेकर अनावश्यक चिंता नहीं करनी चाहिए। किसी देश को हथियार बेचने का अर्थ यह नहीं है कि उसे उनके निर्माण और विकास की पूरी तकनीक भी सौंप दी जाए।

    भारत के लिए आगे सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि बद्र MoU के तहत चारों देशों के बीच रक्षा अनुसंधान, सैन्य उत्पादन और तकनीकी सहयोग किस स्तर तक बढ़ता है। साथ ही, भारत-इंडोनेशिया समझौतों में तय सुरक्षा प्रावधान किस तरह लागू होते हैं, यह भी अहम रहेगा। फिलहाल विशेषज्ञों की राय है कि नए रक्षा सहयोग पर नजर रखना जरूरी है, लेकिन केवल इस समझौते के आधार पर ब्रह्मोस और अस्त्र की तकनीक की सुरक्षा को लेकर खतरे का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।

  • मोदी-पुतिन बैठक में रक्षा और व्यापार पर फोकस, Su-57, S-400 और ब्रह्मोस-NG सहयोग पर चर्चा की उम्मीद

    मोदी-पुतिन बैठक में रक्षा और व्यापार पर फोकस, Su-57, S-400 और ब्रह्मोस-NG सहयोग पर चर्चा की उम्मीद

    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच भारत मंडपम में अहम बैठक हो रही है। दोनों नेताओं की मुलाकात के दौरान भारत और रूस के बीच रक्षा सहयोग सहित कई महत्वपूर्ण विषयों पर बातचीत जारी है। बैठक में दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडल भी मौजूद हैं। बातचीत का दायरा रक्षा सौदों के अलावा व्यापार, उद्योग, परमाणु ऊर्जा और रोजगार से जुड़े क्षेत्रों तक रहने की संभावना है।

    मुलाकात के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और व्लादिमीर पुतिन ने एक-दूसरे से गले मिलकर अभिवादन किया। इसके बाद दोनों देशों के बीच सहयोग से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर चर्चा शुरू हुई। रक्षा क्षेत्र में Su-57 फाइटर जेट, S-400 की बाकी खेप और एडवांस ब्रह्मोस-NG जैसे विषयों पर बातचीत होने की संभावना जताई जा रही है।

    रूस की ओर से भारत में Su-57 फाइटर जेट के उत्पादन और इससे जुड़ी जरूरी तकनीक साझा करने की पेशकश पर भी समझौते की उम्मीद है। Su-57 को एडवांस स्टेल्थ फाइटर जेट के तौर पर पेश किया गया है। इस विमान की क्षमताओं को लेकर भी बातचीत में चर्चा होने की संभावना है।

    भारत-रूस संबंधों में रक्षा सहयोग के अलावा आर्थिक और औद्योगिक साझेदारी को आगे बढ़ाने के मुद्दे भी महत्वपूर्ण रहेंगे। दोनों देशों के बीच उद्योग, रेलवे, स्टील और टनलिंग जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर चर्चा संभव है। इसके साथ भारतीय कंपनियों के लिए रूसी बाजार में अधिक अवसर उपलब्ध कराने के विषय पर भी बातचीत हो सकती है।

    परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाना भी बैठक के संभावित एजेंडे में शामिल है। इसके अलावा महत्वपूर्ण खनिजों, कुशल कामगारों और उर्वरक से जुड़े क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच सहयोग को और मजबूत करने पर विचार किया जा सकता है। खनिजों की खोज और उनकी आपूर्ति के क्षेत्र में साझेदारी बढ़ाने तथा नए संयुक्त प्रोजेक्ट शुरू करने पर भी चर्चा संभव है।

    व्यापारिक संबंधों को लेकर भी दोनों देशों के बीच महत्वपूर्ण बातचीत की संभावना है। भारत और रूस के बीच वर्ष 2030 तक द्विपक्षीय कारोबार को 100 अरब डॉलर तक पहुंचाने के लक्ष्य पर चर्चा हो सकती है। इसके लिए विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने और दोनों देशों की कंपनियों के लिए नए अवसर तैयार करने पर विचार किया जा सकता है।

    राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन गुरुवार देर रात भारत की राजधानी दिल्ली पहुंचे थे। उनके आगमन पर एयरपोर्ट पर विदेश राज्य मंत्री केवी सिंह ने उनका स्वागत किया था। इसके बाद अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति के बीच भारत मंडपम में बैठक हो रही है।

    बैठक में रक्षा सहयोग से जुड़े प्रस्तावों के साथ आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी के विभिन्न पहलुओं पर बातचीत पर नजर है। Su-57, S-400 और ब्रह्मोस-NG जैसे रक्षा विषयों के अलावा उद्योग, रेलवे, स्टील, टनलिंग, परमाणु ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज, उर्वरक और कुशल कामगारों से जुड़े संभावित सहयोग पर भी चर्चा होने की संभावना है। दोनों देशों के बीच व्यापार को 2030 तक 100 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य भी बातचीत के प्रमुख मुद्दों में शामिल हो सकता है।

  • इंडोनेशिया के साथ रक्षा समझौतों का जिक्र करते हुए पीएम मोदी ने कहा, वैश्विक स्तर पर बढ़ी भारतीय रक्षा तकनीक की साख

    इंडोनेशिया के साथ रक्षा समझौतों का जिक्र करते हुए पीएम मोदी ने कहा, वैश्विक स्तर पर बढ़ी भारतीय रक्षा तकनीक की साख

    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को प्रसारित ‘मन की बात’ कार्यक्रम के 136वें एपिसोड में भारत की बढ़ती रक्षा क्षमताओं और स्वदेशी रक्षा तकनीक पर दुनिया के बढ़ते विश्वास का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि रक्षा उत्पादन, रक्षा निर्यात और मित्र देशों के साथ रणनीतिक सहयोग के क्षेत्र में भारत लगातार नई उपलब्धियां हासिल कर रहा है। प्रधानमंत्री ने हाल ही में हुई अपनी इंडोनेशिया यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच ब्रह्मोस और अस्त्र मिसाइलों से जुड़े महत्वपूर्ण समझौते भारत की रक्षा तकनीक पर वैश्विक भरोसे को दर्शाते हैं।

    प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत का रक्षा क्षेत्र अब केवल घरेलू जरूरतों तक सीमित नहीं है, बल्कि देश स्वदेशी तकनीक के दम पर मित्र देशों के लिए भी एक भरोसेमंद रक्षा साझेदार बनकर उभर रहा है। उन्होंने कहा कि आधुनिक रक्षा उपकरणों के विकास और निर्यात में भारत की बढ़ती भागीदारी आत्मनिर्भर भारत अभियान की सफलता को भी मजबूत कर रही है।

    इंडोनेशिया के साथ हुए समझौतों का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने बताया कि दोनों देशों ने ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल और अस्त्र एयर-टू-एयर मिसाइल से जुड़े महत्वपूर्ण रक्षा सहयोग को आगे बढ़ाया है। इसके अलावा समुद्री सुरक्षा और रणनीतिक सहयोग को मजबूत करने के लिए भी दोनों देशों ने साझा रूपरेखा तैयार की है। उन्होंने कहा कि इस तरह के समझौते भारत की तकनीकी क्षमता और वैश्विक विश्वसनीयता को नई पहचान दे रहे हैं।

    प्रधानमंत्री मोदी ने कारगिल विजय दिवस के अवसर पर वर्ष 1999 के युद्ध में शहीद हुए सैनिकों को श्रद्धांजलि भी अर्पित की। उन्होंने कहा कि 26 जुलाई हर भारतीय के लिए गर्व का दिन है, क्योंकि इसी दिन भारतीय सैनिकों ने कठिन परिस्थितियों में अदम्य साहस और वीरता का परिचय देते हुए कारगिल की चोटियों पर विजय प्राप्त की थी। उन्होंने कहा कि देश अपने वीर सैनिकों के बलिदान को कभी नहीं भूल सकता और नई पीढ़ी तक उनकी गाथाएं पहुंचाना सभी की जिम्मेदारी है।

    उन्होंने बताया कि इसी उद्देश्य से इस वर्ष विशेष ‘शौर्य विजय यात्रा’ का आयोजन किया गया है। यह मोटरसाइकिल अभियान राष्ट्रीय युद्ध स्मारक, नई दिल्ली से शुरू होकर कारगिल युद्ध स्मारक, द्रास तक पहुंचेगा। प्रधानमंत्री ने कहा कि यह अभियान देशवासियों को सैनिकों के बलिदान और राष्ट्र के प्रति उनके समर्पण की याद दिलाने का माध्यम बनेगा।

    प्रधानमंत्री ने भारतीय नौसेना में शामिल आधुनिक युद्धपोत आईएनएस महेंद्रगिरी का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि यह युद्धपोत भारत में डिजाइन और निर्मित किया गया है तथा इसमें 75 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री का उपयोग हुआ है। उनके अनुसार यह भारत की बढ़ती तकनीकी क्षमता और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का सशक्त उदाहरण है।

    उन्होंने रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन द्वारा विकसित पिनाका लॉन्ग रेंज गाइडेड रॉकेट प्रणाली और अन्य स्वदेशी रक्षा प्रणालियों का भी जिक्र किया। प्रधानमंत्री ने कहा कि इन उपलब्धियों के पीछे भारतीय वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की वर्षों की मेहनत और नवाचार की भावना है। उन्होंने हाल में सफल रहे स्वदेशी मिसाइल परीक्षणों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत लगातार अपनी रक्षा तैयारियों को आधुनिक और सशक्त बना रहा है।

    प्रधानमंत्री ने देशवासियों से कारगिल विजय दिवस के अवसर पर वीर शहीदों को श्रद्धांजलि देने और सुरक्षित, सक्षम तथा आत्मनिर्भर भारत के निर्माण के संकल्प को और मजबूत करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि भारत अपने सैनिकों के साहस और स्वदेशी तकनीक की शक्ति के बल पर वैश्विक मंच पर नई पहचान बना रहा है।

  • इंडोनेशिया में भारत की कूटनीतिक ताकत का बड़ा प्रदर्शन, 20 अहम समझौतों के साथ रक्षा, व्यापार और समुद्री सहयोग को मिली नई दिशा

    इंडोनेशिया में भारत की कूटनीतिक ताकत का बड़ा प्रदर्शन, 20 अहम समझौतों के साथ रक्षा, व्यापार और समुद्री सहयोग को मिली नई दिशा

    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दो दिवसीय इंडोनेशिया यात्रा भारत की कूटनीतिक और रणनीतिक प्राथमिकताओं के लिहाज से महत्वपूर्ण साबित हुई है। जकार्ता में इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो के साथ हुई उच्चस्तरीय वार्ता के दौरान दोनों देशों ने रक्षा, समुद्री सुरक्षा, कृषि, अंतरिक्ष, चुनाव प्रबंधन, निवेश और महत्वपूर्ण खनिजों सहित कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई। इस दौरान दोनों पक्षों के बीच अनेक महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए, जिन्हें हिंद-प्रशांत क्षेत्र में दोनों देशों की साझेदारी को नई दिशा देने वाला कदम माना जा रहा है।

    यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी का औपचारिक स्वागत किया गया और राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो ने उन्हें इंडोनेशिया के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘बिंतांग आदिपूर्णा’ से सम्मानित किया। प्रधानमंत्री ने इस सम्मान को भारत के 140 करोड़ नागरिकों का सम्मान बताते हुए इंडोनेशिया की सरकार और वहां की जनता के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और लोकतांत्रिक संबंध समय के साथ और अधिक मजबूत हुए हैं तथा भविष्य में यह साझेदारी नई ऊंचाइयों तक पहुंचेगी।

    द्विपक्षीय वार्ता में रक्षा सहयोग सबसे प्रमुख विषय रहा। दोनों देशों के बीच ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल सहयोग को लेकर महत्वपूर्ण समझौता हुआ, जिसे भारत के रक्षा निर्यात और स्वदेशी रक्षा उद्योग के लिए बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। इसके साथ ही समुद्री सुरक्षा, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग और सामरिक समन्वय को भी आगे बढ़ाने पर सहमति बनी। विशेषज्ञों का मानना है कि इन समझौतों से क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग और आपसी विश्वास को नई मजबूती मिलेगी।

    बैठक के दौरान चुनाव प्रबंधन और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग प्रणाली में सहयोग, कृषि अनुसंधान, खाद्य सुरक्षा, अंतरिक्ष विज्ञान, तकनीकी साझेदारी तथा क्रिटिकल मिनरल्स में निवेश जैसे विषयों पर भी महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए। दोनों देशों ने विज्ञान, नवाचार और उभरती तकनीकों के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की प्रतिबद्धता दोहराई। इससे आर्थिक संबंधों के साथ-साथ तकनीकी साझेदारी के नए अवसर खुलने की उम्मीद है।

    इंडोनेशिया की संसद को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत और इंडोनेशिया मिलकर दुनिया में मानवता को नई ऊर्जा प्रदान कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि भारत विस्तारवाद नहीं बल्कि विकासवाद की नीति में विश्वास रखता है। प्रधानमंत्री ने दोनों देशों की समुद्री निकटता का उल्लेख करते हुए कहा कि भौगोलिक दूरी भले अधिक दिखाई देती हो, लेकिन समुद्र दोनों देशों के बीच सहयोग और विश्वास का मजबूत सेतु है। उन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों, शांति और साझा विकास को दोनों देशों की साझेदारी का आधार बताया।

    प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि भारत और इंडोनेशिया का संबंध केवल सरकारों तक सीमित नहीं है, बल्कि दोनों देशों की जनता, संस्कृति, इतिहास और सभ्यताओं के बीच गहरे जुड़ाव पर आधारित है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि दोनों देश वैश्विक चुनौतियों का समाधान सहयोग, संवाद और परस्पर सम्मान के माध्यम से तलाशने के लिए प्रतिबद्ध हैं। उन्होंने राष्ट्रपति प्रबोवो के साथ अपने व्यक्तिगत संबंधों का भी उल्लेख करते हुए दोनों देशों के बीच बढ़ते विश्वास को रेखांकित किया।

    यात्रा के अंतिम चरण में प्रधानमंत्री मोदी जकार्ता में भारतीय समुदाय को भी संबोधित करेंगे। इस कार्यक्रम के माध्यम से भारत की विकास यात्रा, वैश्विक भूमिका और प्रवासी भारतीयों के योगदान पर विशेष जोर दिए जाने की उम्मीद है। कुल मिलाकर यह यात्रा भारत और इंडोनेशिया के बीच व्यापक रणनीतिक साझेदारी, रक्षा सहयोग, आर्थिक संबंधों और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में साझा दृष्टिकोण को और अधिक मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में देखी जा रही है।

  • भारत-इंडोनेशिया संबंधों को नई रणनीतिक मजबूती, पीएम मोदी और राष्ट्रपति प्रबोवो की वार्ता में व्यापार, रक्षा और समुद्री सहयोग पर बनी व्यापक सहमति

    भारत-इंडोनेशिया संबंधों को नई रणनीतिक मजबूती, पीएम मोदी और राष्ट्रपति प्रबोवो की वार्ता में व्यापार, रक्षा और समुद्री सहयोग पर बनी व्यापक सहमति

    नई दिल्ली । भारत और इंडोनेशिया के बीच रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत बनाने की दिशा में मंगलवार को महत्वपूर्ण कदम उठाया गया। इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो के बीच हुई द्विपक्षीय वार्ता में व्यापार, रक्षा, समुद्री सुरक्षा, कृषि, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य और मानव विकास सहित कई अहम क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर व्यापक चर्चा हुई। दोनों नेताओं ने इस बात पर सहमति जताई कि बदलते वैश्विक और क्षेत्रीय परिदृश्य में दोनों देशों के बीच सहयोग को नई गति देना समय की आवश्यकता है।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वार्ता के बाद कहा कि पिछले कुछ वर्षों में भारत और इंडोनेशिया के संबंधों में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के रिश्तों में केवल मजबूती ही नहीं आई है, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग का दायरा भी लगातार विस्तृत हुआ है। प्रधानमंत्री ने विश्वास जताया कि मौजूदा बैठक से रणनीतिक साझेदारी और अधिक मजबूत होगी तथा क्षेत्रीय एवं वैश्विक स्तर पर सहयोग के नए अवसर तैयार होंगे।

    वार्ता के दौरान आर्थिक सहयोग को विशेष प्राथमिकता दी गई। दोनों नेताओं ने व्यापार और निवेश बढ़ाने के साथ-साथ कृषि, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और मानव संसाधन विकास के क्षेत्र में साझेदारी को विस्तार देने पर विचार-विमर्श किया। दोनों पक्षों ने इस बात पर जोर दिया कि आपसी सहयोग से न केवल दोनों देशों की अर्थव्यवस्था को लाभ मिलेगा, बल्कि क्षेत्रीय विकास और स्थिरता को भी मजबूती मिलेगी।

    रक्षा और सुरक्षा सहयोग भी बैठक का प्रमुख केंद्र रहा। हिंद-प्रशांत क्षेत्र के दो महत्वपूर्ण समुद्री देशों के रूप में भारत और इंडोनेशिया ने समुद्री सुरक्षा, रक्षा सहयोग और क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर साझा दृष्टिकोण दोहराया। दोनों देशों ने समुद्री मार्गों की सुरक्षा, रणनीतिक समन्वय और रक्षा क्षमता को मजबूत करने की दिशा में सहयोग बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की। इस दौरान रक्षा क्षेत्र में हुए समझौतों को दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि माना गया।

    संयुक्त प्रेस वार्ता में प्रधानमंत्री मोदी ने बताया कि दोनों देशों के बीच कई महत्वपूर्ण समझौते हुए हैं। इनमें सबसे प्रमुख ब्रह्मोस मिसाइल प्रणाली से जुड़ा सहयोग रहा, जिसके तहत भारत इंडोनेशिया को अतिरिक्त ब्रह्मोस मिसाइल यूनिट उपलब्ध कराएगा। इसके साथ ही इंडोनेशिया ने भारतीय ‘अस्त्र’ एयर-टू-एयर मिसाइल प्रणाली को खरीदने का निर्णय भी लिया है। इन समझौतों को भारत के रक्षा निर्यात और दोनों देशों के बढ़ते रक्षा सहयोग की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

    प्रधानमंत्री मोदी का तीन दिवसीय इंडोनेशिया दौरा केवल रणनीतिक और आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक संबंधों को भी नई ऊर्जा देने का प्रयास माना जा रहा है। उन्होंने साझा सांस्कृतिक विरासत का उल्लेख करते हुए कहा कि योग्याकार्ता स्थित एक हजार वर्ष से अधिक पुराने प्रम्बानन मंदिर का पुनर्निर्माण परियोजना दोनों देशों के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों का प्रतीक है। प्रधानमंत्री बुधवार को राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो के साथ इस परियोजना का शुभारंभ करेंगे।

    दौरे के दौरान प्रधानमंत्री भारतीय समुदाय को भी संबोधित करेंगे। माना जा रहा है कि यह यात्रा भारत और इंडोनेशिया के बीच व्यापक रणनीतिक सहयोग, रक्षा साझेदारी, आर्थिक संबंधों और सांस्कृतिक जुड़ाव को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। दोनों देशों ने भविष्य में आपसी विश्वास, साझा हितों और क्षेत्रीय शांति को आधार बनाकर सहयोग को और अधिक मजबूत करने की प्रतिबद्धता दोहराई।

  • भारत-इंडोनेशिया रक्षा साझेदारी को नई मजबूती, ब्रह्मोस मिसाइल आपूर्ति समझौते से स्वदेशी रक्षा उद्योग को मिलेगा बड़ा प्रोत्साहन

    भारत-इंडोनेशिया रक्षा साझेदारी को नई मजबूती, ब्रह्मोस मिसाइल आपूर्ति समझौते से स्वदेशी रक्षा उद्योग को मिलेगा बड़ा प्रोत्साहन

    नई दिल्ली । भारत और इंडोनेशिया ने रक्षा सहयोग को नई ऊंचाई देते हुए ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल की आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण समझौता किया है। इस करार को भारत के रक्षा निर्यात, स्वदेशी सैन्य तकनीक और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में रणनीतिक साझेदारी के लिहाज से एक अहम उपलब्धि माना जा रहा है। समझौते के साथ दोनों देशों ने रक्षा, समुद्री सुरक्षा, औद्योगिक सहयोग और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी संबंधों को और मजबूत बनाने पर सहमति जताई है।

    यह समझौता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया यात्रा के दौरान संपन्न हुआ, जो उनके तीन देशों के विदेश दौरे का पहला चरण है। इस अवसर पर दोनों देशों के बीच कई रणनीतिक और आर्थिक समझौतों को अंतिम रूप दिया गया। ब्रह्मोस मिसाइल की आपूर्ति के साथ भारत की स्वदेशी रक्षा उत्पादन क्षमता को वैश्विक स्तर पर नई पहचान मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।

    समझौते के तहत इंडोनेशिया भारत में विकसित ‘अस्त्र’ एयर-टू-एयर मिसाइल प्रणाली की खरीद भी करेगा। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन द्वारा विकसित यह मिसाइल ‘बियॉन्ड विजुअल रेंज’ क्षमता से लैस है और आधुनिक हवाई युद्ध की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार की गई है। यह तेजी से दिशा बदलने वाले दुश्मन के लड़ाकू विमानों को लक्ष्य बनाकर उन्हें प्रभावी ढंग से निष्क्रिय करने में सक्षम मानी जाती है।

    जानकारी के अनुसार भारत भविष्य में इंडोनेशिया को ब्रह्मोस मिसाइल की अतिरिक्त बैटरियां भी उपलब्ध करा सकता है। यदि ऐसा होता है तो यह भारत के रक्षा निर्यात कार्यक्रम को और मजबूती देगा तथा स्वदेशी रक्षा उद्योग के लिए नए अवसर तैयार करेगा। हाल के वर्षों में भारत ने रक्षा उपकरणों के निर्यात को बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया है और कई मित्र देशों के साथ इस दिशा में सहयोग लगातार बढ़ रहा है।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दोनों देशों के बीच बढ़ते विश्वास को इस साझेदारी की सबसे बड़ी ताकत बताया। उन्होंने कहा कि भारत और इंडोनेशिया के बीच रक्षा, सुरक्षा और समुद्री सहयोग लगातार मजबूत हो रहा है। उनके अनुसार नए समझौतों से रक्षा आदान-प्रदान, आपदा प्रबंधन, औद्योगिक सहयोग और क्षमता निर्माण जैसे क्षेत्रों में भी व्यापक सहयोग का मार्ग प्रशस्त होगा।

    रक्षा क्षेत्र के अलावा दोनों देशों ने स्वास्थ्य, खनिज संसाधन और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी कई महत्वपूर्ण पहल की हैं। भारत की गुणवत्तापूर्ण और किफायती दवाओं की उपलब्धता इंडोनेशिया में और आसान बनाने पर सहमति बनी है। साथ ही डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों के प्रशिक्षण एवं क्षमता विकास में भी भारत सहयोग करेगा, जिससे स्वास्थ्य क्षेत्र में द्विपक्षीय संबंध और मजबूत होंगे।

    भारत और इंडोनेशिया ने आवश्यक खनिजों की आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने के लिए स्टील, मिनरल्स और आधुनिक तकनीक के क्षेत्र में भी सहयोग बढ़ाने का निर्णय लिया है। इसके अलावा भारत इंडोनेशिया को विशेष इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन विकसित करने और चुनावी प्रौद्योगिकी से जुड़ा तकनीकी सहयोग भी उपलब्ध कराएगा। इन पहलों को दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक रणनीतिक सहयोग का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।

    यात्रा के दौरान इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्राबोवो सुबियांतो ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देश के सर्वोच्च नागरिक एवं सैन्य सम्मान ‘बिंतांग आदिपूर्णा ऑफ द रिपब्लिक ऑफ इंडोनेशिया’ से सम्मानित किया। यह सम्मान उन व्यक्तियों को प्रदान किया जाता है जिन्होंने असाधारण योगदान और उत्कृष्ट सेवाएं दी हों। इस सम्मान को भारत और इंडोनेशिया के बीच मजबूत होते संबंधों तथा पारस्परिक विश्वास का प्रतीक माना जा रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रह्मोस और ‘अस्त्र’ जैसी स्वदेशी रक्षा प्रणालियों का निर्यात भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता, तकनीकी क्षमता और वैश्विक रक्षा बाजार में बढ़ती उपस्थिति को और मजबूत करेगा। साथ ही यह समझौता इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में दोनों देशों के रणनीतिक सहयोग को नई दिशा देने के साथ भारत के घरेलू रक्षा उद्योग, अनुसंधान और विनिर्माण क्षेत्र के लिए भी दीर्घकालिक अवसरों का मार्ग प्रशस्त करेगा।

  • ब्रह्मोस की बराबरी का दावा, लेकिन ‘फेल’ रही फतह-3! चीन की मिसाइल बेचने में जुटा पाकिस्तान, खाड़ी देशों को साधने की कोशिश

    ब्रह्मोस की बराबरी का दावा, लेकिन ‘फेल’ रही फतह-3! चीन की मिसाइल बेचने में जुटा पाकिस्तान, खाड़ी देशों को साधने की कोशिश




    नई दिल्ली। भारत के खिलाफ सैन्य संतुलन बनाने की कोशिश में पाकिस्तान अब चीन निर्मित हथियारों को खाड़ी देशों तक पहुंचाने की रणनीति पर काम कर रहा है। पाकिस्तानी सेना अपनी ‘फतह-3’ मिसाइल को भारत की ब्रह्मोस मिसाइल का जवाब बताकर सऊदी अरब और कतर जैसे देशों को आकर्षित करने में जुटी है। हालांकि रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान यह मिसाइल भारतीय एयर डिफेंस सिस्टम के सामने प्रभावी साबित नहीं हो सकी थी।

    रिपोर्ट्स के मुताबिक पाकिस्तान खुद को खाड़ी देशों का सुरक्षा साझेदार दिखाने की कोशिश कर रहा है। अमेरिका-ईरान तनाव के बाद इस्लामाबाद ने रक्षा सहयोग को बढ़ाने के लिए चीन के हथियारों को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया है। पहले जेएफ-17 फाइटर जेट और अब फतह-3 मिसाइल को लेकर पाकिस्तान बड़े दावे कर रहा है।

    पाकिस्तानी मीडिया फतह-3 को सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल बताते हुए इसे ब्रह्मोस की टक्कर का हथियार बता रहा है। दावा किया जा रहा है कि यह जमीन और समुद्री दोनों लक्ष्यों पर हमला करने में सक्षम है और कम ऊंचाई पर तेज रफ्तार से उड़ान भरने के कारण इसे रोकना मुश्किल है। लेकिन रक्षा जानकारों का कहना है कि इसकी तकनीक काफी हद तक चीन की HD-1 मिसाइल पर आधारित है, जिसे Guangdong Hongda कंपनी ने विकसित किया था।

    बताया जा रहा है कि फतह-3 की रेंज करीब 290 से 450 किलोमीटर तक है और यह 240 से 450 किलोग्राम तक का वारहेड ले जा सकती है। इसकी गति 2.5 से 4 मैक तक बताई जाती है। वहीं दूसरी ओर भारत की ब्रह्मोस मिसाइल लंबी रेंज, अधिक सटीकता और भारी मारक क्षमता के लिए जानी जाती है।

    ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने ब्रह्मोस मिसाइलों के जरिए पाकिस्तान के कई अहम सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया था। रिपोर्ट्स के अनुसार नूर खान एयरबेस के पास हुए हमलों ने पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था को झटका दिया था। इसके बाद पाकिस्तान ने अपनी मिसाइल क्षमता को बढ़ाने और नए खरीदार तलाशने की कोशिशें तेज कर दी हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि चीन पाकिस्तान के जरिए खाड़ी देशों के हथियार बाजार में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है, जहां अब तक अमेरिका और पश्चिमी देशों का दबदबा रहा है। इसी रणनीति के तहत पाकिस्तान खुद को रक्षा साझेदार के रूप में पेश कर रहा है और चीनी तकनीक वाले हथियारों को “कम लागत वाला विकल्प” बताकर प्रचारित कर रहा है।

    रिपोर्ट्स में यह भी कहा जा रहा है कि सऊदी अरब भविष्य में फतह-3 मिसाइल या जेएफ-17 फाइटर जेट में रुचि दिखा सकता है, क्योंकि वह क्षेत्रीय खतरों को देखते हुए अपनी सैन्य ताकत को तेजी से बढ़ा रहा है। हालांकि रक्षा विश्लेषकों का कहना है कि ब्रह्मोस जैसी उन्नत मिसाइल प्रणाली की बराबरी करना पाकिस्तान और चीन दोनों के लिए अभी बड़ी चुनौती बना हुआ है।