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  • रात में फोन चलाने की आदत पड़ सकती है भारी: रिसर्च में नींद से लेकर एकाग्रता तक पर असर के संकेत

    रात में फोन चलाने की आदत पड़ सकती है भारी: रिसर्च में नींद से लेकर एकाग्रता तक पर असर के संकेत


    नई दिल्ली। मोबाइल आज हमारी जिंदगी का ऐसा हिस्सा बन चुका है जिससे दूरी बनाना आसान नहीं है। सुबह आंख खुलते ही फोन देखना हो या रात को सोने से ठीक पहले सोशल मीडिया स्क्रॉल करना हो स्क्रीन हमारी रोजमर्रा की आदतों में शामिल हो चुकी है। कई लोग काम के दौरान बार बार नोटिफिकेशन देखते हैं तो कुछ लोग खाली समय मिलते ही रील्स वीडियो और सोशल मीडिया पर चले जाते हैं। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि मोबाइल हमारा कितना समय ले रहा है बल्कि अब यह भी चिंता बढ़ रही है कि इसका लगातार इस्तेमाल हमारी नींद ध्यान और दिमागी कार्यक्षमता को किस तरह प्रभावित कर रहा है।

    हालिया शोधों में मोबाइल और स्क्रीन टाइम को लेकर कई महत्वपूर्ण संकेत मिले हैं। एक बड़े व्यवस्थित विश्लेषण में 21 अध्ययनों और करीब 5.48 लाख लोगों के आंकड़ों को शामिल किया गया। इसमें ज्यादा स्क्रीन टाइम का संबंध कम नींद अनिद्रा के लक्षण देर से सोने और सोने में परेशानी से पाया गया। विश्लेषण के मुताबिक स्क्रीन टाइम के हर अतिरिक्त घंटे के साथ सोने का समय औसतन करीब 13 मिनट तक आगे खिसक सकता है।

    रात में मोबाइल इस्तेमाल करने की समस्या केवल स्क्रीन की रोशनी तक सीमित नहीं है। फोन पर लगातार आने वाले नोटिफिकेशन सोशल मीडिया की पोस्ट वीडियो और मैसेज दिमाग को सक्रिय बनाए रखते हैं। ऐसे में व्यक्ति बिस्तर पर जाने के बाद भी मानसिक रूप से आराम की स्थिति में नहीं पहुंच पाता। नतीजा यह होता है कि सोने में देर लग सकती है और नींद की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।

    2026 में प्रकाशित एक अध्ययन में विश्वविद्यालय के छात्रों पर मोबाइल के सोने से पहले इस्तेमाल का असर देखा गया। शोध में पाया गया कि सोने से पहले लंबे समय तक स्मार्टफोन इस्तेमाल करने वालों में खराब नींद की संभावना अधिक थी। अध्ययन में मोबाइल के लंबे इस्तेमाल का संबंध एकाग्रता और कुछ प्रदर्शन संबंधी मापदंडों में कमी तथा प्रतिक्रिया समय बढ़ने से भी जोड़ा गया। हालांकि शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया कि इन निष्कर्षों को व्यापक आबादी पर लागू करने के लिए आगे बड़े अध्ययनों की जरूरत है।

    यहां सबसे जरूरी बात यह समझना है कि मोबाइल सीधे हमारे ब्रेन को खराब कर रहा है ऐसा कहना वैज्ञानिक तौर पर सही नहीं होगा। असल समस्या अक्सर मोबाइल इस्तेमाल से बनने वाली आदतों की होती है। यदि कोई व्यक्ति रात में देर तक फोन चलाता है और इसके कारण पर्याप्त नींद नहीं ले पाता तो अगले दिन थकान चिड़चिड़ापन ध्यान लगाने में कठिनाई और काम करने की क्षमता में कमी महसूस हो सकती है। लंबे समय तक खराब नींद बनी रहे तो इसका असर मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है।

    एक अन्य 2026 के अध्ययन में वयस्कों के बीच सोशल मीडिया और सोने से पहले स्मार्टफोन इस्तेमाल का संबंध देखा गया। इसमें ज्यादा स्मार्टफोन निर्भरता और बिस्तर पर फोन इस्तेमाल का संबंध खराब नींद से पाया गया जबकि खराब नींद और कुछ कार्यकारी क्षमताओं जैसे वर्किंग मेमोरी तथा ध्यान नियंत्रित करने में आने वाली कठिनाइयों के बीच भी संबंध सामने आया। हालांकि यह अध्ययन भी कारण और परिणाम को पूरी तरह साबित नहीं करता।

    ऐसे में मोबाइल छोड़ना समाधान नहीं है बल्कि इस्तेमाल का तरीका बदलना ज्यादा जरूरी है। खासकर सोने से पहले फोन से दूरी बनाना एक आसान कदम हो सकता है। रात में स्क्रीन टाइम कम करना नोटिफिकेशन बंद रखना और फोन को बिस्तर से दूर रखना मददगार आदतें हो सकती हैं। दिन में भी बिना जरूरत बार बार फोन देखने की आदत को कम किया जा सकता है।

    मोबाइल हमारी जिंदगी को आसान बनाने वाली तकनीक है लेकिन जब यही तकनीक हमारी नींद और रोजमर्रा की एकाग्रता पर हावी होने लगे तो सावधान होने की जरूरत है। फिलहाल वैज्ञानिक प्रमाण यह नहीं कहते कि मोबाइल हमारे ब्रेन को सीधे स्थायी रूप से बदल रहा है लेकिन लगातार और खासकर रात में अत्यधिक इस्तेमाल नींद तथा उससे जुड़ी मानसिक कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकता है। इसलिए सवाल मोबाइल छोड़ने का नहीं बल्कि यह तय करने का है कि मोबाइल हमें चला रहा है या हम मोबाइल को चला रहे हैं।

  • ब्रेन एजिंग को धीमा करने का असरदार फॉर्मूला! उम्र बढ़ने पर भी दिमाग को जवान रखने में मदद कर सकता है संगीत

    ब्रेन एजिंग को धीमा करने का असरदार फॉर्मूला! उम्र बढ़ने पर भी दिमाग को जवान रखने में मदद कर सकता है संगीत


    नई दिल्ली । उम्र बढ़ना जीवन (Life)की एक स्वाभाविक प्रक्रिया है और इसके साथ शरीर के साथ-साथ दिमाग में भी कई तरह के बदलाव आने लगते हैं। बढ़ती उम्र में अक्सर लोगों को चीजें याद रखने में परेशानी होने लगती है किसी व्यक्ति(Decline) का नाम तुरंत याद नहीं आता या फिर एक साथ कई काम करने में पहले जैसी आसानी महसूस नहीं होती। सोचने समझने और जानकारी को प्रोसेस करने की गति भी समय के साथ प्रभावित हो सकती है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि उम्र बढ़ने के साथ दिमागी क्षमता में गिरावट को पूरी तरह स्वीकार कर लिया जाए। विशेषज्ञों और अध्ययनों के अनुसार स्वस्थ जीवनशैली के साथ कुछ मानसिक गतिविधियां दिमाग को लंबे समय तक सक्रिय और मजबूत बनाए रखने में मदद कर सकती हैं। इनमें संगीत सीखना और किसी वाद्य यंत्र को बजाने का अभ्यास एक दिलचस्प और प्रभावी तरीका माना जा रहा है।

    उम्र के साथ मस्तिष्क में धीरे-धीरे संरचनात्मक बदलाव होते हैं। कई लोगों में न्यूरॉन्स के बीच कनेक्शन बनाने और सूचनाओं को तेजी से प्रोसेस करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। मेडिकल रिपोर्ट्स में बताया गया है कि 40 वर्ष की आयु के बाद मस्तिष्क में होने वाले कुछ बदलाव अधिक स्पष्ट हो सकते हैं। इस प्रक्रिया को ब्रेन एट्रोफी या ब्रेन श्रिंकेज कहा जाता है। हालांकि हर व्यक्ति में इसका असर एक जैसा नहीं होता। व्यक्ति की जीवनशैली शिक्षा तनाव का स्तर सामाजिक सक्रियता और शारीरिक स्वास्थ्य जैसे कई कारक दिमाग पर उम्र के प्रभाव को प्रभावित कर सकते हैं।

    विशेषज्ञों का कहना है कि कम उम्र से ही खानपान और जीवनशैली को बेहतर बनाने पर ध्यान देना जरूरी है। नियमित एक्सरसाइज अच्छी नींद संतुलित भोजन और मानसिक रूप से सक्रिय रहने की आदत ब्रेन हेल्थ को बनाए रखने में मदद कर सकती है। इसके साथ ही संगीत से जुड़ी गतिविधियां दिमाग के लिए खासतौर पर उपयोगी हो सकती हैं। किसी संगीत वाद्य यंत्र को सीखते समय दिमाग के कई हिस्से एक साथ सक्रिय होते हैं और यही इसे एक तरह का फुल ब्रेन वर्कआउट बनाता है।

    जब कोई व्यक्ति पियानो गिटार तबला वायलिन या अन्य वाद्य यंत्र बजाना सीखता है तो हाथों और अंगुलियों की गतिविधि के लिए मोटर कॉर्टेक्स सक्रिय होता है। स्वर और ताल को पहचानने के लिए ऑडिटरी सिस्टम काम करता है जबकि याददाश्त और एकाग्रता से जुड़े हिस्सों को भी लगातार सक्रिय रहना पड़ता है। संगीत के दौरान भावनात्मक प्रतिक्रिया और रचनात्मकता भी दिमाग की गतिविधियों का हिस्सा बनती है। यही कारण है कि संगीत प्रशिक्षण को मानसिक लचीलापन बढ़ाने वाली गतिविधियों में शामिल किया जाता है।

    अध्ययनों के अनुसार उम्र बढ़ने के बावजूद मस्तिष्क में नई तंत्रिका कड़ियां बनाने की क्षमता बनी रह सकती है। ऐसे में लगातार नई चीजें सीखना और दिमाग को चुनौती देने वाली गतिविधियों में शामिल होना उपयोगी हो सकता है। संगीत सीखना इस दिशा में एक रोचक विकल्प है क्योंकि इसमें सुनना समझना याद रखना हाथों की गतिविधियों को नियंत्रित करना और भावनात्मक रूप से जुड़ना एक साथ शामिल होता है।

    बढ़ती उम्र के साथ दिमाग की कोशिकाओं के बीच संचार की गति धीमी पड़ सकती है और स्मृति ध्यान तथा निर्णय क्षमता से जुड़े हिस्सों में बदलाव देखने को मिल सकते हैं। कुछ अध्ययनों में उम्र के साथ ग्रे मैटर और व्हाइट मैटर में भी कमी की बात सामने आई है। फिर भी स्वस्थ जीवनशैली और मानसिक सक्रियता इन बदलावों की गति को प्रभावित कर सकती है। महिलाओं में रजोनिवृत्ति के बाद होने वाले हार्मोनल बदलाव भी स्मृति और संज्ञानात्मक क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में महिलाओं के लिए भी संगीत योग ध्यान और सामाजिक जुड़ाव जैसी गतिविधियां ब्रेन हेल्थ को बेहतर बनाए रखने में सहायक हो सकती हैं।

    कुल मिलाकर बढ़ती उम्र को दिमाग की कमजोरी का अंतिम संकेत मानने की जरूरत नहीं है। नियमित शारीरिक गतिविधि पर्याप्त नींद संतुलित खानपान मानसिक व्यायाम और संगीत जैसी नई चीजें सीखने की आदत दिमाग को सक्रिय रखने में मदद कर सकती है। उम्र चाहे जो भी हो दिमाग को चुनौती देना और लगातार कुछ नया सीखते रहना मानसिक सेहत के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है।

  • दिमाग को नई दिशा दे सकता है ध्यान! सिर्फ 7 दिन के अभ्यास में दिखे न्यूरोप्लास्टिसिटी के हैरान करने वाले संकेत

    दिमाग को नई दिशा दे सकता है ध्यान! सिर्फ 7 दिन के अभ्यास में दिखे न्यूरोप्लास्टिसिटी के हैरान करने वाले संकेत


    नई दिल्ली। मस्तिष्क को स्वस्थ रखने के लिए लंबे समय से ध्यान और योग को फायदेमंद माना जाता रहा है। आमतौर पर मेडिटेशन को तनाव कम करने और मन को शांत रखने से जोड़कर देखा जाता है लेकिन एक नए वैज्ञानिक अध्ययन ने इसके प्रभाव को लेकर नई संभावनाएं सामने रखी हैं। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं की ओर से किए गए अध्ययन में महज सात दिनों के गहन ध्यान और मन शरीर से जुड़े अभ्यास के बाद प्रतिभागियों के मस्तिष्क और शरीर में कई मापने योग्य बदलाव देखे गए। शोधकर्ताओं को मस्तिष्क की गतिविधियों के साथ रक्त में मौजूद जैविक संकेतकों प्रतिरक्षा प्रणाली मेटाबॉलिज्म और शरीर की प्राकृतिक दर्द नियंत्रण प्रक्रिया में भी बदलाव के संकेत मिले हैं। सबसे दिलचस्प बात यह रही कि अध्ययन में न्यूरोप्लास्टिसिटी से जुड़े बदलावों के संकेत भी दिखाई दिए।

    न्यूरोप्लास्टिसिटी मस्तिष्क की वह प्राकृतिक क्षमता है जिसके जरिए वह नए अनुभवों और लगातार किए जाने वाले अभ्यास के आधार पर अपनी कार्यप्रणाली और तंत्रिका संबंधों में बदलाव कर सकता है। आसान भाषा में समझें तो मस्तिष्क पूरी तरह स्थिर नहीं होता बल्कि परिस्थितियों और अनुभवों के अनुसार खुद को ढालने की क्षमता रखता है। इसी वजह से वैज्ञानिक ध्यान को केवल मानसिक शांति देने वाली गतिविधि के तौर पर नहीं बल्कि मस्तिष्क और शरीर के बीच होने वाली जटिल जैविक प्रक्रिया के रूप में भी समझने की कोशिश कर रहे हैं।

    इस अध्ययन में 20 स्वस्थ वयस्कों को शामिल किया गया था। सभी प्रतिभागियों ने सात दिनों के एक आवासीय कार्यक्रम में हिस्सा लिया। इस दौरान उन्हें रोजाना ध्यान से संबंधित प्रशिक्षण दिया गया और कुल करीब 33 घंटे का निर्देशित ध्यान कराया गया। कार्यक्रम शुरू होने से पहले और समाप्त होने के बाद प्रतिभागियों के मस्तिष्क की एफएमआरआई जांच की गई। इसके साथ ही उनके रक्त के नमूने लेकर शरीर में होने वाली विभिन्न जैविक प्रक्रियाओं का भी विश्लेषण किया गया।

    शोधकर्ताओं के मुताबिक सात दिन के कार्यक्रम के बाद मस्तिष्क के उन हिस्सों की गतिविधि में कमी देखी गई जो लगातार चलने वाले आंतरिक विचारों और मानसिक बातचीत से जुड़े होते हैं। विशेषज्ञों ने इसे मस्तिष्क की कार्यप्रणाली में संभावित बेहतर दक्षता से जोड़कर देखा है। इसके अलावा रक्त में मौजूद कुछ जैविक संकेतकों प्रतिरक्षा गतिविधि और मेटाबॉलिज्म से जुड़े बदलावों का भी अध्ययन किया गया। इससे यह संकेत मिलता है कि ध्यान का असर केवल व्यक्ति के मानसिक अनुभव तक सीमित नहीं हो सकता बल्कि शरीर की कई प्रक्रियाओं से भी इसका संबंध हो सकता है।

    हालांकि इस अध्ययन के नतीजे उत्साह बढ़ाने वाले हैं लेकिन इन्हें अंतिम निष्कर्ष मानना जल्दबाजी होगी। अध्ययन में केवल 20 स्वस्थ वयस्क शामिल थे और इसकी अवधि भी सिर्फ सात दिन रही। इसलिए यह जानने के लिए बड़े स्तर पर और लंबे समय तक शोध की जरूरत होगी कि ध्यान से होने वाले ये बदलाव कितने स्थायी हैं और अलग अलग उम्र तथा स्वास्थ्य स्थितियों वाले लोगों पर इनका असर कितना अलग हो सकता है।

    फिलहाल यह अध्ययन इस दिशा में महत्वपूर्ण संकेत जरूर देता है कि नियमित और गहन ध्यान मस्तिष्क की कार्यप्रणाली के साथ शरीर की दूसरी जैविक प्रक्रियाओं को भी प्रभावित कर सकता है। यानी ध्यान को सिर्फ तनाव कम करने का माध्यम मानने के बजाय मस्तिष्क और शरीर के समग्र स्वास्थ्य से जुड़ी जीवनशैली की आदत के रूप में भी देखा जा सकता है।

  • वायु प्रदूषण का दिमाग पर गंभीर असर: याददाश्त हो सकती है कमजोर, शोध में सामने आया चौंकाने वाला खुलासा

    वायु प्रदूषण का दिमाग पर गंभीर असर: याददाश्त हो सकती है कमजोर, शोध में सामने आया चौंकाने वाला खुलासा


    नई दिल्ली। वायु प्रदूषण को लेकर दुनिया भर में लगातार चिंता बढ़ती जा रही है। अब तक इसे मुख्य रूप से सांस संबंधी बीमारियों, हृदय रोगों और जीवन प्रत्याशा में कमी के लिए जिम्मेदार माना जाता रहा है, लेकिन हाल ही में सामने आए एक अध्ययन ने इसके एक और गंभीर प्रभाव की ओर ध्यान आकर्षित किया है। शोधकर्ताओं का कहना है कि प्रदूषित हवा का लंबे समय तक संपर्क मानव मस्तिष्क की कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकता है और इससे याददाश्त कमजोर होने का खतरा बढ़ जाता है।

    अध्ययन के अनुसार, वायु प्रदूषण के संपर्क में रहने वाले लोगों में संज्ञानात्मक क्षमता यानी सोचने, समझने, सीखने और याद रखने की शक्ति पर नकारात्मक असर देखा गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि प्रदूषण का प्रभाव इतना गहरा हो सकता है कि यह मस्तिष्क पर लगभग 10 वर्ष अतिरिक्त उम्र बढ़ने के समान असर डाल सकता है। यह निष्कर्ष विशेष रूप से उन लोगों के लिए चिंता का विषय है जो लंबे समय तक अत्यधिक प्रदूषित क्षेत्रों में रहते हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि हवा में मौजूद सूक्ष्म कण, जिन्हें पार्टिकुलेट मैटर (PM2.5 और PM10) कहा जाता है, शरीर में प्रवेश कर रक्त प्रवाह के माध्यम से मस्तिष्क तक पहुंच सकते हैं। ये कण सूजन और ऑक्सीडेटिव तनाव को बढ़ावा देते हैं, जिससे मस्तिष्क की कोशिकाओं को नुकसान पहुंच सकता है। इसके परिणामस्वरूप याददाश्त कमजोर होना, ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई और मानसिक कार्यक्षमता में गिरावट जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं।

    शोध में यह भी पाया गया कि वृद्ध लोगों पर इसका प्रभाव अधिक गंभीर हो सकता है। हालांकि, युवा और मध्यम आयु वर्ग के लोगों में भी लगातार प्रदूषण के संपर्क से संज्ञानात्मक क्षमता में कमी के संकेत मिले हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह समस्या धीरे-धीरे विकसित होती है, इसलिए कई बार लोग इसके शुरुआती लक्षणों को पहचान नहीं पाते।

    विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि वायु प्रदूषण के स्तर को नियंत्रित नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में मानसिक स्वास्थ्य और न्यूरोलॉजिकल समस्याओं के मामले बढ़ सकते हैं। बढ़ते शहरीकरण, वाहनों की संख्या में वृद्धि और औद्योगिक गतिविधियों के कारण कई शहरों में हवा की गुणवत्ता लगातार खराब हो रही है, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों का सुझाव है कि लोग प्रदूषण के अधिक स्तर वाले दिनों में बाहर निकलते समय मास्क का उपयोग करें, घरों और कार्यालयों में वेंटिलेशन का ध्यान रखें तथा जहां संभव हो, एयर प्यूरीफायर का इस्तेमाल करें। इसके अलावा पौधारोपण और प्रदूषण नियंत्रण के सामुदायिक प्रयास भी लंबे समय में सकारात्मक परिणाम दे सकते हैं।

    शोधकर्ताओं का मानना है कि स्वच्छ हवा केवल शारीरिक स्वास्थ्य के लिए ही नहीं, बल्कि मानसिक और बौद्धिक क्षमता को सुरक्षित रखने के लिए भी आवश्यक है। यह अध्ययन इस बात की याद दिलाता है कि वायु प्रदूषण का असर हमारी सांसों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे मस्तिष्क और भविष्य की मानसिक सेहत को भी प्रभावित कर सकता है। इसलिए स्वच्छ पर्यावरण की दिशा में किए गए प्रयास आने वाली पीढ़ियों के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण साबित होंगे।

  • बादाम का जादू: रोज़ खाने से ब्लड शुगर नियंत्रित और मानसिक क्षमता बढ़े..

    बादाम का जादू: रोज़ खाने से ब्लड शुगर नियंत्रित और मानसिक क्षमता बढ़े..

    नई दिल्ली। हाल ही में हुई एक रिसर्च में खुलासा हुआ है कि रोज़ाना थोड़ी मात्रा में बादाम खाने से प्रीडायबिटीज से प्रभावित लोगों के लिए कई स्वास्थ्य लाभ मिल सकते हैं। इस अध्ययन के अनुसार, जिन लोगों ने अपनी डाइट में रोज़ाना लगभग एक मुट्ठी बादाम शामिल किया, उनके ब्लड शुगर लेवल में सुधार हुआ और उनकी मानसिक कार्यक्षमता में भी noticeable बढ़ोतरी देखी गई।

    दुनियाभर में 60 करोड़ से अधिक लोग प्रीडायबिटीज की स्थिति में हैं। इस अवस्था में ब्लड शुगर सामान्य से अधिक होता है, लेकिन डायबिटीज तक नहीं पहुंचता। लंबे समय तक इस स्थिति में रहने से न केवल डायबिटीज का खतरा बढ़ता है, बल्कि दिमाग की कार्यक्षमता भी धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है। इसी चिंता के समाधान के लिए नई दिल्ली में 40 से 60 साल के 60 एशियाई भारतीय वयस्कों पर 24 हफ्तों तक एक अध्ययन किया गया।

    शोध में प्रतिभागियों को दो ग्रुप्स में बांटा गया। पहले ग्रुप को सामान्य संतुलित आहार दिया गया, जबकि दूसरे ग्रुप की डाइट में कुल कैलोरी का 20 प्रतिशत हिस्सा बादाम के रूप में शामिल किया गया। यह मात्रा करीब 32 से 42 ग्राम यानी एक मुट्ठी बादाम रोज़ाना थी। छह महीने के दौरान नियमित जांच के बाद नतीजे बेहद सकारात्मक रहे।

    रोज़ बादाम खाने वाले समूह में दिमाग की कार्यक्षमता में सुधार देखा गया। निर्णय लेने की क्षमता बेहतर हुई और जानकारी को समझने की गति में तेज़ी आई। इसके अलावा ब्लड शुगर लेवल में भी उल्लेखनीय सुधार हुआ। फास्टिंग शुगर और भोजन के बाद का शुगर लेवल कम हुआ और HbA1c स्तर में भी कमी आई।

    मेटाबॉलिक स्वास्थ्य पर भी असर दिखा। प्रतिभागियों का वजन, बॉडी फैट और BMI कम हुआ, साथ ही कोलेस्ट्रॉल और LDL लेवल घटे। शरीर की सूजन और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस के संकेतक भी बेहतर हुए।

    वैज्ञानिकों का कहना है कि भारत और आस-पास के एशियाई देशों में मेटाबॉलिक बीमारियों का खतरा अधिक होता है। इस शोध से यह सिद्ध हुआ कि रोज़ाना मुट्ठी भर बादाम खाने से न केवल प्रीडायबिटीज नियंत्रित रहती है, बल्कि दिल और दिमाग भी स्वस्थ रहते हैं। इस सरल और प्राकृतिक उपाय को अपनी डाइट में शामिल करना बेहद लाभकारी साबित हो सकता है।

  • लाइफस्टाइल तय करती है दिमाग की उम्र, जन्मतिथि नहीं: वैज्ञानिकों का बड़ा खुलासा

    लाइफस्टाइल तय करती है दिमाग की उम्र, जन्मतिथि नहीं: वैज्ञानिकों का बड़ा खुलासा

    नई दिल्ली।अगर आप मानते हैं कि उम्र बढ़ने के साथ दिमाग का कमजोर होना तय है, तो विज्ञान इस सोच को बदलने की तैयारी में है। यूनिवर्सिटी ऑफ फ्लोरिडा की एक नई स्टडी में दावा किया गया है कि दिमाग की असली उम्र आपकी जन्मतिथि से नहीं, बल्कि आपकी रोजमर्रा की जीवनशैली से तय होती है। सही आदतें अपनाकर इंसान अपने दिमाग को 8 साल तक “युवा” बनाए रख सकता है।

    MRI और मशीन लर्निंग से मापी गई ब्रेन एज

    इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने अत्याधुनिक MRI स्कैन और मशीन लर्निंग तकनीक का इस्तेमाल किया। इन तकनीकों के जरिए प्रतिभागियों की ब्रेन एज यानी दिमाग की जैविक उम्र मापी गई। इसे व्यक्ति की वास्तविक उम्र से तुलना कर ब्रेन एज गैप निकाला गया, जो यह बताता है कि दिमाग कितना बूढ़ा या जवान दिखता है।

    128 लोगों पर दो साल तक चला अध्ययन

    इस रिसर्च में मध्यम और अधिक उम्र के 128 लोगों को शामिल किया गया। इनमें से कई लोग घुटनों के ऑस्टियोआर्थराइटिस जैसी क्रॉनिक मस्कुलोस्केलेटल पेन से जूझ रहे थे। आमतौर पर लंबे समय तक रहने वाला दर्द, तनाव, आर्थिक दबाव और सामाजिक समस्याएं दिमागी उम्र को तेज़ी से बढ़ाती हैं।शुरुआती दौर में इन नकारात्मक कारकों का असर जरूर देखा गया, लेकिन दो साल के फॉलो-अप में यह प्रभाव कम होता चला गया। इसकी जगह जीवनशैली से जुड़ी आदतें सबसे ज्यादा असरदार साबित हुईं।

    8 साल तक जवान दिखा दिमाग

    जिन प्रतिभागियों की जीवनशैली ज्यादा सकारात्मक थी, उनके दिमाग स्टडी की शुरुआत में ही औसतन 8 साल तक युवा पाए गए। इतना ही नहीं, समय के साथ उनके दिमाग की उम्र बढ़ने की गति भी धीमी रही। शोधकर्ताओं के मुताबिक अच्छी आदतें मिलकर दिमाग को उम्र से होने वाले नुकसान से बचाती हैं।

    ये आदतें रखती हैं दिमाग को जवान
    शोध में कुछ खास जीवनशैली आदतों को दिमागी सेहत के लिए बेहद फायदेमंद बताया गया:
    गहरी और गुणवत्तापूर्ण नींद ,आशावादी सोच और मानसिक लचीलापन, तनाव पर नियंत्रण और मानसिक शांति ,मजबूत सामाजिक रिश्ते और सपोर्ट सिस्टम ,संतुलित वजन, जिससे सूजन कम होती है तंबाकू से दूरी, जिससे ब्रेन सेल्स सुरक्षित रहती हैं

    डिमेंशिया और अल्जाइमर से बचाव में मदद

    शोधकर्ताओं का कहना है कि आशावाद सीखा जा सकता है तनाव को नए नजरिए से संभाला जा सकता है और नींद से जुड़ी समस्याओं का इलाज संभव है। उम्र बढ़ने के साथ दिमाग डिमेंशिया और अल्जाइमर जैसी बीमारियों के प्रति ज्यादा संवेदनशील हो जाता है, लेकिन यह स्टडी बताती है कि छोटे-छोटे जीवनशैली बदलाव लंबे समय तक दिमाग को स्वस्थ और सक्रिय बनाए रख सकते हैं।
    यह रिसर्च साफ संकेत देती है कि दिमाग की उम्र आपके हाथ में है। अगर आप अपनी आदतों पर ध्यान दें, तो न सिर्फ शरीर बल्कि दिमाग भी उम्र को मात दे सकता है।