Tag: Brent crude

  • होर्मुज तनाव से उछला कच्चा तेल, 95 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंचा ब्रेंट; पेट्रोल-डीजल कीमतों पर बढ़ी चिंता

    होर्मुज तनाव से उछला कच्चा तेल, 95 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंचा ब्रेंट; पेट्रोल-डीजल कीमतों पर बढ़ी चिंता


    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर एक बार फिर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर दिखाई देने लगा है। अमेरिका और ईरान के बीच जारी टकराव तथा होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े घटनाक्रमों के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया है। तेल बाजार में बढ़ती अनिश्चितता के कारण निवेशकों और आयातक देशों की चिंताएं भी बढ़ गई हैं।

    बाजार आंकड़ों के अनुसार ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई और यह 95 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया। वहीं अमेरिकी बेंचमार्क डब्ल्यूटीआई (WTI) क्रूड में भी तेजी देखने को मिली। विशेषज्ञों का कहना है कि तेल आपूर्ति मार्गों को लेकर पैदा हुई आशंकाओं ने बाजार की धारणा को प्रभावित किया है, जिसके चलते कीमतों में तेजी आई है।

    होर्मुज जलडमरूमध्य को दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में गिना जाता है। वैश्विक स्तर पर समुद्री मार्ग से होने वाले तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार का सैन्य तनाव या आपूर्ति बाधित होने की आशंका सीधे तेल बाजार को प्रभावित करती है। रिपोर्टों के अनुसार हालिया घटनाओं के बाद निवेशकों ने आपूर्ति जोखिम को लेकर सतर्क रुख अपनाया है।

    विश्लेषकों का मानना है कि यदि क्षेत्र में तनाव और बढ़ता है या तेल आपूर्ति प्रभावित होती है तो कच्चे तेल की कीमतों में और तेजी देखने को मिल सकती है। हालांकि बाजार की दिशा काफी हद तक आने वाले दिनों में राजनीतिक और सैन्य घटनाक्रमों पर निर्भर करेगी। फिलहाल निवेशक हर नए घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं।

    भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों के लिए कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी महत्वपूर्ण मानी जाती है। देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बदलाव का असर परिवहन, उद्योग और महंगाई पर पड़ सकता है। हालांकि पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतें केवल कच्चे तेल की दरों से तय नहीं होतीं, बल्कि इनमें कर, परिवहन लागत, विनिमय दर और तेल विपणन कंपनियों की मूल्य निर्धारण नीति भी अहम भूमिका निभाती है।

    विशेषज्ञों के अनुसार यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो भविष्य में ईंधन कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि फिलहाल किसी तत्काल मूल्य वृद्धि को लेकर आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।

    देश के प्रमुख महानगरों में पेट्रोल और डीजल की कीमतें स्थिर बनी हुई हैं। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई जैसे शहरों में ईंधन दरों में फिलहाल कोई बड़ा बदलाव दर्ज नहीं किया गया है। इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय बाजार में जारी उतार-चढ़ाव के कारण उपभोक्ताओं और उद्योग जगत की निगाहें तेल बाजार पर टिकी हुई हैं।

    आर्थिक जानकारों का मानना है कि आने वाले दिनों में पश्चिम एशिया की स्थिति, वैश्विक मांग और आपूर्ति संतुलन तथा प्रमुख तेल उत्पादक देशों की नीतियां कच्चे तेल की कीमतों की दिशा तय करेंगी। ऐसे में ऊर्जा बाजार में अस्थिरता का दौर कुछ समय तक जारी रह सकता है।

  • अमेरिका-ईरान तनाव से तेल बाजार में भूचाल, ब्रेंट क्रूड 110 डॉलर के पार

    अमेरिका-ईरान तनाव से तेल बाजार में भूचाल, ब्रेंट क्रूड 110 डॉलर के पार



    नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का असर अब वैश्विक तेल बाजार पर साफ नजर आने लगा है। लगातार तीसरे दिन कच्चे तेल की कीमतों में उछाल दर्ज किया गया। होर्मुज स्ट्रेट में बढ़ती सख्ती और जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सप्लाई पर दबाव बढ़ गया है। इसी के चलते ब्रेंट क्रूड 110 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गया, जबकि वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) करीब 107 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया।

    फरवरी से अब तक 50% से ज्यादा महंगा हुआ तेल

    विशेषज्ञों का कहना है कि होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में शामिल है। यहां तनाव बढ़ने से वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हुई है। फरवरी से अब तक कच्चे तेल की कीमतों में 50 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोतरी हो चुकी है। वहीं पिछले सप्ताह ही कीमतों में करीब 8 प्रतिशत का उछाल दर्ज किया गया था।

    ट्रंप चाहते हैं कि ईरान जल्द समझौते के लिए तैयार हो जाए। माना जा रहा है कि यदि दोनों देशों के बीच सहमति बनती है तो होर्मुज स्ट्रेट में बाधाएं कम हो सकती हैं और तेल परिवहन सामान्य हो सकता है।

    ट्रंप ने दी सख्त चेतावनी

    पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार ईरान पर दबाव बना रहे हैं। उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ईरान को चेतावनी देते हुए कहा कि तेहरान के पास समय बहुत कम है और उसे जल्द फैसला लेना होगा। ट्रंप ने कहा कि ईरान को केवल एक परमाणु साइट संचालित करने की अनुमति होगी, जबकि बाकी साइटों को बंद करना पड़ेगा।

    इसके अलावा ट्रंप ने हाई एनरिच्ड यूरेनियम का भंडार अमेरिका को सौंपने की बात कही। उन्होंने यह भी साफ किया कि अमेरिका ईरान की विदेशों में फ्रीज की गई संपत्तियों का बड़ा हिस्सा जारी नहीं करेगा।

    ईरान ने भी दी जवाबी धमकी

    ट्रंप के बयान के बाद ईरान की ओर से भी तीखी प्रतिक्रिया सामने आई। ईरानी सैन्य प्रवक्ता अबोलफजल शेकर्ची ने कहा कि यदि ईरान पर दोबारा हमला हुआ तो उसके गंभीर परिणाम होंगे। उन्होंने चेतावनी दी कि क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी संसाधनों और ठिकानों को निशाना बनाने में देर नहीं लगेगी।

    यूएई के न्यूक्लियर प्लांट के पास ड्रोन हमला

    इसी बीच संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के अल धफरा क्षेत्र स्थित बराकाह न्यूक्लियर पावर प्लांट के बाहरी हिस्से में ड्रोन हमला होने की खबर सामने आई है। हमले के बाद इलाके में आग लग गई, हालांकि सुरक्षा और दमकल टीमों ने तुरंत मौके पर पहुंचकर स्थिति को नियंत्रित कर लिया। अधिकारियों के मुताबिक, इस घटना में किसी के हताहत होने की सूचना नहीं है।

  • वैश्विक संकट का असर जारी, कच्चा तेल 100 डॉलर के आसपास रहने की संभावना

    वैश्विक संकट का असर जारी, कच्चा तेल 100 डॉलर के आसपास रहने की संभावना

    नई दिल्ली । वैश्विक ऊर्जा बाजार एक बार फिर अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है, जहां कच्चे तेल की कीमतों में स्थिरता की बजाय उतार-चढ़ाव का दबाव बना हुआ है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और आपूर्ति श्रृंखला में बाधाओं के कारण आने वाले समय में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी रह सकती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही रणनीतिक समुद्री मार्गों में कुछ राहत मिले, लेकिन वैश्विक बाजार पर इसका तात्कालिक असर सीमित रहेगा।

    विश्लेषकों के अनुसार, शिपिंग व्यवस्था, रिफाइनरी संचालन और टैंकरों की उपलब्धता पर पड़ रहे दबाव के कारण तेल की सप्लाई चेन पूरी तरह सामान्य नहीं हो पा रही है। इन बाधाओं के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों पर लगातार दबाव बना हुआ है और बड़े सुधार की संभावना फिलहाल कमजोर दिखाई दे रही है।

    रिपोर्ट में यह भी अनुमान जताया गया है कि आने वाले समय में ब्रेंट क्रूड की औसत कीमत लगभग 97 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रह सकती है। इसका मतलब है कि ऊर्जा बाजार को मध्यम अवधि में सप्लाई की कमी और भू-राजनीतिक तनाव दोनों का सामना करना पड़ सकता है। यह स्थिति वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण संकेत मानी जा रही है, क्योंकि तेल की कीमतों का सीधा असर परिवहन, उत्पादन और महंगाई पर पड़ता है।

    हाल के दिनों में तेल बाजार में तेजी भी देखी गई है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ब्रेंट क्रूड की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर कारोबार कर रही है, जबकि अन्य बेंचमार्क भी इसी स्तर के आसपास मजबूती दिखा रहे हैं। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि यह बढ़त केवल मांग और आपूर्ति के असंतुलन का परिणाम नहीं है, बल्कि इसमें राजनीतिक तनाव और क्षेत्रीय अस्थिरता की भी अहम भूमिका है।

    इसके अलावा, उत्पादन में भी गिरावट देखने को मिली है। प्रमुख तेल उत्पादक समूह द्वारा हाल के महीनों में उत्पादन में कटौती के कारण वैश्विक आपूर्ति और सीमित हो गई है। उत्पादन में इस कमी ने कीमतों को और अधिक मजबूती दी है और बाजार में अस्थिरता को बढ़ा दिया है।

    विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि सिर्फ समुद्री मार्गों के सामान्य होने से बाजार तुरंत स्थिर नहीं होगा। लॉजिस्टिक चुनौतियां, सप्लाई चेन की बाधाएं और उत्पादन में असंतुलन आने वाले महीनों तक जारी रह सकते हैं। इसका सीधा असर तेल की कीमतों पर देखने को मिलेगा।

    कुल मिलाकर, कच्चे तेल का बाजार फिलहाल एक संवेदनशील दौर से गुजर रहा है, जहां हर भू-राजनीतिक घटना कीमतों को प्रभावित करने की क्षमता रखती है। जब तक वैश्विक स्तर पर तनाव और आपूर्ति से जुड़ी समस्याएं पूरी तरह हल नहीं होतीं, तब तक तेल की कीमतों में बड़ी गिरावट की उम्मीद कम ही दिखाई देती है।

  • कच्चे तेल की तेजी से शेयर बाजार दबाव में, बैंकिंग शेयरों में भारी बिकवाली

    कच्चे तेल की तेजी से शेयर बाजार दबाव में, बैंकिंग शेयरों में भारी बिकवाली


    नई दिल्ली| कच्चे तेल की लगातार बढ़ती कीमतों और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारतीय शेयर बाजार मंगलवार को कमजोरी के साथ खुला। शुरुआती कारोबार में निवेशकों ने सतर्क रुख अपनाया, जिसका असर सीधे प्रमुख सूचकांकों पर दिखाई दिया।

    सुबह 9:17 बजे तक सेंसेक्स करीब 203 अंक गिरकर 77,099 के स्तर पर कारोबार कर रहा था, जबकि निफ्टी लगभग 50 अंक टूटकर 24,042 पर पहुंच गया। बाजार में शुरुआती गिरावट का मुख्य कारण कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और वैश्विक तनाव को माना जा रहा है।

    सेक्टोरल फ्रंट पर बैंकिंग शेयरों में सबसे ज्यादा बिकवाली देखने को मिली। Nifty Bank Index में आधा प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई। इसके अलावा फाइनेंशियल सर्विसेज, फार्मा, हेल्थकेयर और सर्विस सेक्टर भी लाल निशान में रहे।

    हालांकि कुछ सेक्टरों में मजबूती भी देखी गई। एनर्जी, मेटल, इंफ्रास्ट्रक्चर, ऑटो और डिफेंस सेक्टर में खरीदारी का रुझान बना रहा। मिडकैप और स्मॉलकैप इंडेक्स ने बेहतर प्रदर्शन करते हुए हरे निशान में कारोबार किया, जिससे व्यापक बाजार में कुछ संतुलन देखने को मिला।

    एशियाई बाजारों में भी मिला-जुला रुख रहा। टोक्यो, शंघाई और हांगकांग के बाजार कमजोर रहे, जबकि बैंकॉक और सोल में हल्की तेजी देखी गई। वहीं अमेरिकी बाजारों में सोमवार को डाओ जोन्स में गिरावट और नैस्डैक में हल्की तेजी दर्ज की गई।

    बाजार पर सबसे बड़ा दबाव कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल से आया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड करीब 109 डॉलर प्रति बैरल और डब्ल्यूटीआई क्रूड लगभग 97 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह तेजी मध्य पूर्व में जारी भू-राजनीतिक तनाव का परिणाम है, खासकर अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ती अनिश्चितता के कारण। रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान के शांति प्रस्ताव पर अमेरिका की असहमति ने भी बाजारों में अस्थिरता बढ़ाई है, जिससे ऊर्जा कीमतों में तेजी आई है।

    जब तक कच्चे तेल की कीमतों और वैश्विक तनाव में स्थिरता नहीं आती, तब तक शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव बने रहने की संभावना जताई जा रही है।

  • वैश्विक संकट के बीच भारत में पेट्रोल डीजल की कीमतें स्थिर कई देशों में 85 प्रतिशत तक उछाल के बावजूद उपभोक्ताओं को राहत

    वैश्विक संकट के बीच भारत में पेट्रोल डीजल की कीमतें स्थिर कई देशों में 85 प्रतिशत तक उछाल के बावजूद उपभोक्ताओं को राहत

    नई दिल्ली: वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच जहां कई देशों में ईंधन की कीमतों में भारी उछाल देखने को मिल रहा है वहीं भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें स्थिर बनी हुई हैं यह स्थिति ऐसे समय में सामने आई है जब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में आपूर्ति बाधित होने की आशंकाओं के कारण ब्रेंट क्रूड की कीमतों में वृद्धि दर्ज की जा रही है इसके बावजूद भारतीय उपभोक्ताओं को फिलहाल राहत मिलती नजर आ रही है

    दुनिया के कई हिस्सों में ईंधन की कीमतों में तेज बढ़ोतरी ने आम लोगों की जेब पर सीधा असर डाला है आंकड़ों के अनुसार यूएई में डीजल की कीमतों में लगभग 85 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका में भी डीजल की कीमतें 60 प्रतिशत से अधिक बढ़ी हैं वहीं कनाडा पाकिस्तान फ्रांस श्रीलंका और ब्रिटेन जैसे देशों में यह वृद्धि 35 से 50 प्रतिशत के बीच दर्ज की गई है यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से भू राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की आपूर्ति में अनिश्चितता के कारण मानी जा रही है

    पेट्रोल की कीमतों का रुझान भी इसी प्रकार का रहा है पाकिस्तान में पेट्रोल की कीमतों में सबसे अधिक लगभग 44 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है जबकि अमेरिका और यूएई में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है अन्य देशों जैसे कनाडा श्रीलंका और चीन में भी पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोतरी हुई है हालांकि ब्राजील और रूस जैसे देशों में यह वृद्धि अपेक्षाकृत कम रही है

    इसके विपरीत भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें वर्ष की शुरुआत के स्तर पर ही स्थिर बनी हुई हैं डीजल की कीमत लगभग 87 रुपए प्रति लीटर और पेट्रोल की कीमत करीब 94 रुपए प्रति लीटर के आसपास बनी हुई है यह स्थिरता ऐसे समय में महत्वपूर्ण मानी जा रही है जब वैश्विक बाजार में अस्थिरता अपने चरम पर है और कई देश महंगाई के दबाव से जूझ रहे हैं

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में कीमतों को नियंत्रित रखने में सरकारी नीतियों और सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों की रणनीति का महत्वपूर्ण योगदान है तेल कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बाजार से ईंधन की खरीद इस तरह कर रही हैं जिससे खुदरा कीमतों को स्थिर रखा जा सके हालांकि इसके चलते कंपनियों पर आर्थिक दबाव भी बढ़ सकता है

    आर्थिक विश्लेषण यह भी संकेत देता है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और बढ़ती हैं तो भारतीय तेल कंपनियों को नुकसान उठाना पड़ सकता है अनुमान के अनुसार यदि कीमतें 135 से 165 डॉलर प्रति बैरल के बीच रहती हैं तो पेट्रोल पर प्रति लीटर लगभग 18 रुपए और डीजल पर लगभग 35 रुपए तक का नुकसान हो सकता है इसके अलावा कच्चे तेल की कीमत में हर 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी से लागत में करीब 6 रुपए प्रति लीटर की वृद्धि हो सकती है

    कुल मिलाकर वर्तमान स्थिति यह दर्शाती है कि जहां वैश्विक बाजार में अस्थिरता और महंगाई का दबाव बढ़ रहा है वहीं भारत में संतुलित नीतियों और प्रबंधन के चलते ईंधन की कीमतों को स्थिर बनाए रखने में सफलता मिली है यह न केवल उपभोक्ताओं के लिए राहत की बात है बल्कि आर्थिक स्थिरता बनाए रखने में भी सहायक साबित हो रही है

  • पश्चिम एशिया में तनाव कम होने की उम्मीद से कच्चे तेल की कीमतों में तेज गिरावट…

    पश्चिम एशिया में तनाव कम होने की उम्मीद से कच्चे तेल की कीमतों में तेज गिरावट…

    नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में तनाव में नरमी की उम्मीदों के बीच अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल के बाजार में शुक्रवार को तेज गिरावट दर्ज की गई। भू राजनीतिक मोर्चे पर संघर्ष कम होने और संभावित शांति वार्ताओं की उम्मीदों ने निवेशकों की धारणा को प्रभावित किया, जिसके चलते कच्चे तेल की कीमतों में करीब 2 प्रतिशत तक की गिरावट देखने को मिली। लंबे समय से जारी अस्थिरता के बीच यह गिरावट वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देखी जा रही है।

    बाजार में कारोबार के दौरान ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स में दबाव बना रहा और यह शुरुआती सत्र में गिरकर दिन के निचले स्तर के करीब पहुंच गया। दिनभर के उतार चढ़ाव के बीच इसमें एक प्रतिशत से अधिक की कमजोरी दर्ज की गई और यह 97 डॉलर प्रति बैरल के आसपास ट्रेड करता नजर आया। इसी तरह अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट क्रूड में भी कमजोरी देखने को मिली और यह लगभग 2 प्रतिशत गिरकर 92 डॉलर प्रति बैरल के आसपास आ गया। इस गिरावट ने ऊर्जा बाजार में सतर्कता का माहौल और गहरा कर दिया है।

    हालांकि इससे पहले के कारोबारी सत्र में कच्चे तेल की कीमतों में मजबूत तेजी देखने को मिली थी, जब ब्रेंट और डब्ल्यूटीआई दोनों में उल्लेखनीय बढ़त दर्ज की गई थी। उस समय भू राजनीतिक तनाव और आपूर्ति को लेकर चिंताओं ने कीमतों को ऊपर धकेला था, लेकिन ताजा घटनाक्रमों ने इस रुझान को उलट दिया है।

    घरेलू बाजार में भी कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव देखा गया। मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज में क्रूड ऑयल के भाव में तेज गिरावट आई और यह 2 प्रतिशत से अधिक टूटकर निचले स्तर पर आ गया। वैश्विक संकेतों के असर से घरेलू ट्रेडर्स में भी सतर्कता बढ़ी और खरीदारी का रुझान कमजोर रहा।

    इस बीच पश्चिम एशिया में कूटनीतिक हलचल और संघर्ष विराम की चर्चाओं ने बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाई है। प्रमुख वैश्विक संकेतों और शांति की संभावनाओं ने निवेशकों के बीच जोखिम कम होने की उम्मीद को मजबूत किया है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि स्थिति अभी पूरी तरह स्थिर नहीं है और किसी भी नए घटनाक्रम से बाजार में तेजी से बदलाव संभव है।

    वैश्विक शेयर बाजारों पर भी इस घटनाक्रम का मिश्रित असर देखने को मिला। एशियाई बाजारों में कमजोरी दर्ज की गई और प्रमुख सूचकांक दबाव में रहे। दूसरी ओर अमेरिकी बाजारों में हल्की बढ़त के साथ कारोबार बंद हुआ, जिससे वैश्विक निवेश भावना में संतुलन का संकेत मिला।

    घरेलू शेयर बाजार में भी शुरुआती कारोबार में स्थिरता रही और बाद में हल्की तेजी देखने को मिली। निवेशकों ने वैश्विक संकेतों को ध्यान में रखते हुए सतर्क रुख अपनाया और बड़े दांव लगाने से परहेज किया।

    विश्लेषकों के अनुसार कच्चे तेल की कीमतों में यह गिरावट मुख्य रूप से भू राजनीतिक तनाव में संभावित कमी और आपूर्ति को लेकर चिंता घटने के कारण आई है। हालांकि वे यह भी मानते हैं कि ऊर्जा बाजार अभी पूरी तरह स्थिर नहीं हुआ है और आने वाले समय में वैश्विक घटनाक्रम इसकी दिशा को फिर से प्रभावित कर सकते हैं।

  • ईरान-इजरायल टकराव का तेल बाजार पर पड़ा असर, कच्चा तेल 80 डॉलर के पार

    ईरान-इजरायल टकराव का तेल बाजार पर पड़ा असर, कच्चा तेल 80 डॉलर के पार


    नई दिल्ली। अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के बाद मध्य पूर्व में बढ़ते सैन्य तनाव का सीधा असर वैश्विक तेल बाजार पर दिखाई देने लगा है। जवाबी कार्रवाई में ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में मिसाइल और ड्रोन हमले किए, जिनकी जद में दुबई और अबू धाबी जैसे प्रमुख शहरों के साथ कतर, बहरीन, सऊदी अरब और ओमान भी आए। इस घटनाक्रम ने ऊर्जा आपूर्ति को लेकर आशंकाएं बढ़ा दी हैं और निवेशकों में अनिश्चितता का माहौल बना दिया है।

    कीमतों में तेज उछाल
    तनाव बढ़ते ही कच्चे तेल की कीमतों में रिकॉर्ड तेजी दर्ज की गई। वैश्विक बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड, जो शुक्रवार को 72 डॉलर प्रति बैरल के सात महीने के उच्च स्तर पर बंद हुआ था और 2026 के पहले दो महीनों में करीब 19% चढ़ चुका था, अब 12% की छलांग लगाकर 80 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है। यह स्तर पिछले साल जून के बाद पहली बार देखा गया है।

    वहीं अमेरिकी बेंचमार्क वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट में भी करीब 8% की तेजी आई और यह 70 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर निकल गया। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि अगर तनाव लंबा खिंचता है तो कीमतों में और अस्थिरता देखी जा सकती है।

    ईरान की उत्पादन क्षमता और वैश्विक सप्लाई

    भले ही क्षेत्रीय राजनीति में ईरान की स्थिति समय के साथ बदली हो, लेकिन ऊर्जा बाजार में उसकी भूमिका अब भी अहम है। ओपेक+ गठबंधन में वह चौथा सबसे बड़ा उत्पादक देश है। सऊदी अरब के नेतृत्व वाले इस समूह के कुल उत्पादन में ईरान की हिस्सेदारी लगभग 12% है। ईरान प्रतिदिन करीब 3.3 मिलियन बैरल तेल उत्पादन की क्षमता रखता है, जो वैश्विक उत्पादन का लगभग 3% है। उसकी सबसे बड़ी रिफाइनरी की क्षमता लगभग 5 लाख बैरल प्रतिदिन बताई जाती है।

    होर्मुज जलडमरूमध्य पर टिकी निगाहें

    संकट का सबसे संवेदनशील पहलू होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर है। इस समुद्री मार्ग से वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 20% और एलएनजी की बड़ी खेप गुजरती है। यही कारण है कि इसे वैश्विक ऊर्जा सप्लाई का ‘चोक पॉइंट’ माना जाता है। ईरान का लगभग 90% तेल निर्यात भी इसी रास्ते चीन तक पहुंचता है।

    हालांकि ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने एक इंटरव्यू में स्पष्ट किया है कि जलडमरूमध्य को बंद करने का कोई इरादा नहीं है। फिर भी बाजार में आशंकाएं बनी हुई हैं और समुद्री यातायात को लेकर विरोधाभासी रिपोर्टें सामने आ रही हैं।

    100 डॉलर तक पहुंचने की आशंका

    विश्लेषकों, जिनमें बार्कलेज जैसी वित्तीय संस्थाएं शामिल हैं, का कहना है कि यदि होर्मुज जलडमरूमध्य लंबे समय तक बाधित रहता है तो तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती हैं। हालांकि वे यह भी मानते हैं कि यदि हालात जल्द सामान्य हो जाते हैं तो मौजूदा ऊंचे स्तर टिकाऊ नहीं रहेंगे।

    इसी बीच ओपेक+ ने अपनी मासिक बैठक में अप्रैल से उत्पादन बढ़ोतरी की रफ्तार तेज करने पर सहमति जताई है। समूह के प्रमुख सदस्य सऊदी अरब और रूस, जिन्होंने पहली तिमाही में उत्पादन वृद्धि रोकी थी, अब अप्रैल से प्रतिदिन 2,06,000 बैरल अतिरिक्त तेल बाजार में उतारेंगे। यह बढ़ोतरी पिछले दिसंबर में घोषित 1,37,000 बैरल प्रतिदिन की वृद्धि से करीब डेढ़ गुना ज्यादा है।

    मौजूदा हालात में तेल बाजार पूरी तरह भू-राजनीतिक घटनाक्रम पर निर्भर नजर आ रहा है। यदि तनाव और बढ़ता है तो कीमतों में और उछाल संभव है, जबकि कूटनीतिक समाधान की स्थिति में बाजार को कुछ राहत मिल सकती है।