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  • दलाई लामा के अगले अवतार पर फिर गरमाई राजनीति, चीन ने भारत को दी चेतावनी; उत्तराधिकारी को लेकर बढ़ा तनाव

    दलाई लामा के अगले अवतार पर फिर गरमाई राजनीति, चीन ने भारत को दी चेतावनी; उत्तराधिकारी को लेकर बढ़ा तनाव



    नई दिल्ली। तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा के अगले अवतार को लेकर चीन और भारत के बीच कूटनीतिक तनाव एक बार फिर बढ़ता नजर आ रहा है। चीन ने साफ कहा है कि दलाई लामा के पुनर्जन्म का मुद्दा उसका “आंतरिक मामला” है और इसमें किसी बाहरी दखल की अनुमति नहीं दी जाएगी।

    भारत स्थित चीनी दूतावास की प्रवक्ता यू जिंग ने सोशल मीडिया पर बयान जारी कर कहा कि तथाकथित “सेंट्रल तिब्बती एडमिनिस्ट्रेशन” को किसी भी संप्रभु देश की मान्यता नहीं है और उसे पुनर्जन्म प्रक्रिया पर दावा करने का अधिकार नहीं है। चीन ने साथ ही भारत से उम्मीद जताई कि वह तिब्बत की स्वतंत्रता से जुड़ी गतिविधियों को मंच नहीं देगा।

    दरअसल, यह विवाद तब और गहरा गया जब दलाई लामा ने हाल में कहा कि उनके पुनर्जन्म को पहचानने का “एकमात्र अधिकार” गादेन फोद्रांग ट्रस्ट के पास होगा और किसी अन्य संस्था या सरकार को इसमें हस्तक्षेप का अधिकार नहीं है।

    चीन ने इस बयान पर आपत्ति जताते हुए कहा कि दलाई लामा के किसी भी पुनर्जन्म को बीजिंग की मंजूरी जरूरी होगी। चीन लंबे समय से यह दावा करता रहा है कि तिब्बती बौद्ध परंपरा में पुनर्जन्म की प्रक्रिया चीनी कानूनों और ऐतिहासिक ‘गोल्डन अर्न’ प्रणाली के तहत होनी चाहिए।

    विशेषज्ञों का मानना है कि चीन को सबसे बड़ा डर इस बात का है कि अगला दलाई लामा चीन से बाहर, खासकर भारत में चुना जा सकता है। वर्तमान में तिब्बती निर्वासित सरकार भारत के धर्मशाला में संचालित होती है और दलाई लामा भी लंबे समय से भारत में रह रहे हैं।

    माना जा रहा है कि अगर अगला दलाई लामा भारत या किसी स्वतंत्र देश में चुना जाता है, तो इससे तिब्बत मुद्दे पर चीन की स्थिति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कमजोर पड़ सकती है। यही वजह है कि बीजिंग इस पूरे मामले को लेकर बेहद संवेदनशील नजर आ रहा है।

    वहीं भारत की ओर से आधिकारिक तौर पर ‘वन चाइना’ नीति का सम्मान किया जाता है, लेकिन कई भारतीय नेताओं ने कहा है कि दलाई लामा के उत्तराधिकारी का फैसला तिब्बती परंपरा और उनके अनुयायियों के अनुसार होना चाहिए।

    फिलहाल दलाई लामा के अगले अवतार को लेकर धार्मिक परंपरा, भू-राजनीति और भारत-चीन रिश्तों के बीच नई खींचतान साफ दिखाई दे रही है।

  • भगवान बुद्ध का ज्ञान आज भी उतना ही प्रासंगिक, अमित शाह ने बताया शांति का मार्ग

    भगवान बुद्ध का ज्ञान आज भी उतना ही प्रासंगिक, अमित शाह ने बताया शांति का मार्ग

    नई दिल्ली। लद्दाख की शांत और पवित्र वादियों में उस समय एक विशेष आध्यात्मिक माहौल देखने को मिला जब भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेषों के दर्शन के लिए लोगों की बड़ी संख्या एकत्र हुई। इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में Amit Shah ने कहा कि भगवान बुद्ध का संदेश केवल अतीत की धरोहर नहीं है, बल्कि यह आज भी उतना ही जीवंत और प्रासंगिक है जितना वह 2500 साल पहले था।

    उनके अनुसार बुद्ध का ज्ञान मानव जीवन के हर दौर में दिशा दिखाने वाला प्रकाश है।

    अपने संबोधन में उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि बुद्ध पूर्णिमा का यह अवसर केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि एक गहरी आध्यात्मिक अनुभूति का क्षण है। जब इतने लंबे अंतराल के बाद पवित्र अवशेषों का पुनः आगमन लद्दाख की धरती पर हुआ, तो यह न केवल आस्था का विषय बना, बल्कि लोगों के लिए एक भावनात्मक और ऐतिहासिक क्षण भी साबित हुआ। इस आयोजन ने क्षेत्र में शांति और सकारात्मक ऊर्जा का वातावरण निर्मित किया।

    अमित शाह ने भगवान बुद्ध के जीवन को मानवता के लिए एक आदर्श उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि सिद्धार्थ से तथागत बनने की यात्रा करुणा, त्याग और आत्मज्ञान की ऐसी मिसाल है, जो हर व्यक्ति को जीवन में सही दिशा अपनाने की प्रेरणा देती है। बुद्ध का संदेश अहिंसा, मध्यम मार्ग और संतुलित जीवन पर आधारित था, जो आज के समय में पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।

    उन्होंने यह भी कहा कि इतिहास में बहुत कम ऐसे व्यक्तित्व हुए हैं जिनके जीवन की घटनाएं इतनी गहराई से प्रतीकात्मक हों। जन्म, ज्ञान प्राप्ति और महापरिनिर्वाण जैसे महत्वपूर्ण पड़ावों का एक ही आध्यात्मिक अर्थ में जुड़ जाना उनके जीवन की विशिष्टता को दर्शाता है। यह अपने आप में मानवता के लिए एक दुर्लभ और प्रेरणादायक उदाहरण है।

    लद्दाख की सांस्कृतिक विरासत पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि यह क्षेत्र सदियों से बौद्ध धम्म का केंद्र रहा है। यहां न केवल बौद्ध विचारधारा को संरक्षित किया गया, बल्कि उसे आगे भी बढ़ाया गया। यह भूमि शांति, करुणा और सह-अस्तित्व की जीवंत मिसाल है, जो आज के समय में और भी प्रासंगिक हो गई है।

    अंत में उन्होंने कहा कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में जब दुनिया कई चुनौतियों से गुजर रही है, तब भगवान बुद्ध का संदेश समाधान का मार्ग दिखाता है। उनका विचार आज भी उतना ही प्रभावशाली है और मानवता को एक बेहतर, शांत और संतुलित दिशा की ओर ले जाने की क्षमता रखता है।

  • भूटान का पारो फेस्टिवल संस्कृति आस्था और रंगों का अद्भुत उत्सव..

    भूटान का पारो फेस्टिवल संस्कृति आस्था और रंगों का अद्भुत उत्सव..

    नई दिल्ली:  भूटान अपनी प्राकृतिक सुंदरता और समृद्ध संस्कृति के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। यहां मनाए जाने वाले विभिन्न त्योहार लोगों को अपनी परंपराओं से जोड़ते हैं और सामाजिक एकता को मजबूत करते हैं। इन्हीं में से सबसे प्रमुख और प्रसिद्ध उत्सव है पारो त्शेचू फेस्टिवल

    यह उत्सव हर साल वसंत ऋतु में मनाया जाता है, आमतौर पर अप्रैल के शुरुआती दिनों में। इस वर्ष यह फेस्टिवल 29 मार्च से 2 अप्रैल तक आयोजित किया जा रहा है। यह केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि भूटान की आस्था, संस्कृति और इतिहास का जीवंत प्रदर्शन है

    पारो त्शेचू के दौरान भिक्षु और स्थानीय लोग पारंपरिक मुखौटे पहनकर नृत्य करते हैं और बौद्ध मंत्रों का जाप करते हैं। यह नृत्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि गहरी धार्मिक मान्यताओं और कहानियों को दर्शाता है

    इस उत्सव में लोग रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधानों में शामिल होते हैं, जिससे पूरा वातावरण जीवंत और आकर्षक बन जाता है। यहां होने वाले मुखौटा नृत्य प्राचीन बौद्ध कथाओं और ऐतिहासिक घटनाओं को जीवंत रूप में प्रस्तुत करते हैं

    इस फेस्टिवल में गुरु पद्मसंभव की कहानियों को भी दर्शाया जाता है, जिन्होंने भूटान में बौद्ध धर्म के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। माना जाता है कि उन्होंने भूटान के सम्राट को ठीक करने में मदद की थी और इसी से तिब्बती बौद्ध धर्म की शुरुआत हुई
     पारो त्शेचू फेस्टिवल केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भूटान की संस्कृति, आस्था और विरासत को दुनिया के सामने प्रस्तुत करने वाला एक भव्य उत्सव है

  • मौत के बाद क्या होता है? 10 प्रमुख धर्मों की रहस्यमय मान्यताएं

    मौत के बाद क्या होता है? 10 प्रमुख धर्मों की रहस्यमय मान्यताएं

    नई दिल्ली/मौत के बाद क्या होता है? यह सवाल इंसान के अस्तित्व से जुड़ा सबसे गहरा रहस्य है। अलग-अलग धर्म इस पर अलग-अलग विचार रखते हैं। विश्व में हजारों धर्म हैं, और लगभग हर धर्म में मृत्यु और उसके बाद की जीवन यात्रा पर अलग मान्यता मिलती है। यहाँ 10 प्रमुख धर्मों के दृष्टिकोण पर नजर डालते हैं।

    1. ईसाई धर्म
    ईसाई धर्म में मौत को अंत नहीं बल्कि नई शुरुआत माना जाता है। उनके अनुसार, हर जीव में आत्मा रहती है और मरने के बाद भगवान का न्याय होता है। अच्छे कर्म करने वाले स्वर्ग जाते हैं और पापी नर्क में जन्म लेते हैं।

    2. इस्लाम
    इस्लाम में मृत्यु से डरने की बजाय इसे स्वीकार करना सिखाया जाता है। मुस्लिम मानते हैं कि अल्लाह मृत्यु के समय फरिश्ते भेजते हैं और आत्मा की परीक्षा लेते हैं। पाक आत्मा को बरजख भेजा जाता है, जहां वह कयामत के दिन का इंतजार करती है।

    3. हिंदू धर्म

    हिंदू धर्म में मृत्यु और पुनर्जन्म के चक्र को ‘संसार’ कहा जाता है। आत्मा कई जन्मों में नए शरीर में आती है- कभी इंसान तो कभी जानवर। मोक्ष प्राप्त करने पर पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति मिलती है।

    4. बौद्ध धर्म

    बौद्ध धर्म में जीवन और मृत्यु सतत प्रक्रिया है। आत्मा मृत्यु के बाद अन्य जन्मों में जाती है। पुनर्जन्म का स्वरूप व्यक्ति के कर्मों पर निर्भर करता है।

    5. सिख धर्म

    सिख धर्म में मृत्यु के बाद आत्मा कर्मों के आधार पर पुनर्जन्म प्राप्त करती है। भगवान का ध्यान और अहंकार पर नियंत्रण पाने से आत्मा पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त हो सकती है।

    6. बहाई धर्म
    बहाई धर्म में मृत्यु के बाद आत्मा की यात्रा जारी रहती है। शरीर मिट्टी में मिल जाता है, लेकिन आत्मा स्वतंत्र और खुश रहती है। आत्मा की तरक्की में भगवान की कृपा और जीवित लोगों के नेक कर्म मदद करते हैं। मृत्यु को भय की चीज नहीं माना जाता।

    7. जैन धर्म

    जैन धर्म में आत्मा हमेशा जीवित रहती है। मृत्यु और पुनर्जन्म का चक्र केवल कर्मों से तय होता है। अहिंसा और अच्छे कर्म के माध्यम से आत्मा पुनर्जन्म के बंधन से मुक्त होती है।

    8. जोरोस्ट्रियन धर्म

    जोरोस्ट्रियन धर्म में मृत्यु के बाद आत्मा का न्याय ‘चिनवट ब्रिज’ पर होता है। अच्छे कर्म करने वाले स्वर्ग जाते हैं और बुरे कर्म करने वाले नर्क में। अंततः सभी आत्माएं शुद्ध होकर भगवान के पास लौट जाती हैं।

    9. शिंटो धर्म जापान 

    शिंटो धर्म में आत्मा शरीर की मृत्यु के बाद जीवित रहती है और जिंदा लोगों की सहायता करती है। मरने के बाद व्यक्ति पवित्र आत्मा बन जाता है और परिवार और समुदाय की रक्षा करता है।

    10. अन्य प्राचीन और लोकधर्म

    अफ्रीकी, इंडिजिनस और अन्य लोकधर्मों में मृत्यु के बाद आत्मा की यात्रा विभिन्न रूपों में देखी जाती है। कुछ में आत्मा पूर्वजों के साथ मिलती है, कुछ में जीवन और प्रकृति के चक्र में सम्मिलित होती है।
    मृत्यु के बाद जीवन को लेकर इन सभी धर्मों की मान्यताएं भले ही अलग हों, लेकिन एक साझा संदेश है: मृत्यु अंत नहीं, बल्कि नई यात्रा की शुरुआत है। चाहे स्वर्ग, नर्क या पुनर्जन्म हो, सभी धर्म आत्मा के महत्व और उसके कर्मों पर जोर देते हैं।

  • महाबोधि महोत्सव भारत और श्रीलंका के बीच बौद्ध धर्म की साझा विरासत का प्रतीक: प्रधानमंत्री

    महाबोधि महोत्सव भारत और श्रीलंका के बीच बौद्ध धर्म की साझा विरासत का प्रतीक: प्रधानमंत्री


    – प्रधानमंत्री ने महाबोधि महोत्सव के लिए भेजा शुभकामना संदेश, भगवान बुद्ध के संदेश को बताया आधुनिक विश्व की आवश्यकता

    भोपाल। मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में स्थित विश्व धरोहर सांची में शनिवार को बुद्ध जम्बू द्वीप पार्क में दो दिवसीय महाबोधि महोत्सव-2025 का विधिवत शुभारंभ हुआ। ‘महाबोधि महोत्सव’ और चेतियागिरी विहार के 73वें वार्षिकोत्सव के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शुभकामना संदेश प्रेषित किया है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने पत्र में सांची को भारत और श्रीलंका के बीच बौद्ध धर्म की साझा विरासत का प्रतीक बताते हुए कहा कि यह आयोजन दोनों देशों के भविष्य की अपार संभावनाओं को दर्शाता है।


    बुद्ध का संदेश और आधुनिक विश्व

    प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संदेश में रेखांकित किया कि भगवान बुद्ध अपनी शिक्षाओं के माध्यम से आज भी विश्व पर गहरा प्रभाव बनाए हुए हैं। आधुनिक विश्व की चुनौतियों के बीच उनका शांति, करुणा और प्रज्ञा का संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है। उन्होंने चेतियागिरी विहार की महत्ता का उल्लेख करते हुए कहा कि भगवान बुद्ध के परम शिष्यों- ‘सारिपुत्र और महामोग्गल्लान’ के पवित्र अवशेषों (अस्थि कलश) के संरक्षक के रूप में यह स्थान भारत की सांस्कृतिक विरासत में विशिष्ट स्थान रखता है। सांची हमारी प्राचीन आध्यात्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान के बीच एक सेतु का कार्य करता है। प्रधानमंत्री मोदी ने ‘नमो बुद्धाय’ के उद्घोष के साथ मध्य प्रदेश सरकार और महाबोधि सोसाइटी ऑफ श्रीलंका को इस आयोजन के लिए शुभकामनाएं दीं।


    सांची में महाबोधि महोत्सव का भव्य आगाज

    सांची के बुद्ध जम्बू द्वीप पार्क में संस्कृति विभाग, जिला प्रशासन रायसेन और महाबोधि सोसाइटी ऑफ श्रीलंका के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय ‘महाबोधि महोत्सव-2025’ का शनिवार को विधिवत शुभारंभ हुआ। महोत्सव की पहली शाम श्रीलंका की सुप्रसिद्ध कलाकार ललिता गोमस के लोक नृत्य एवं गायन से सजी। इसके अलावा भगवान बुद्ध के जीवन पर केंद्रित ‘नृत्य नाटिका’ और ‘द साया बैंड’ की भक्तिमय प्रस्तुतियाँ मुख्य आकर्षण रहीं। दूसरे दिन रविवार को देश के प्रतिष्ठित कवियों के साथ ‘अखिल भारतीय कवि सम्मेलन’ का आयोजन होगा, जिसमें सूर्यकुमार पांडेय, सुमित मिश्रा और अभिसार शुक्ला जैसे नामचीन कवि काव्य पाठ करेंगे। पर्यटकों और कला प्रेमियों के लिए इस गरिमामयी आयोजन में प्रवेश पूर्णतः निःशुल्क रखा गया है। कार्यक्रम शाम 6:30 बजे से प्रारंभ हुआ।