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  • दतिया में बीजेपी की अग्निपरीक्षा नरोत्तम समर्थकों की नाराजगी और जातीय समीकरणों के बीच फंसा उपचुनाव

    दतिया में बीजेपी की अग्निपरीक्षा नरोत्तम समर्थकों की नाराजगी और जातीय समीकरणों के बीच फंसा उपचुनाव


    दतिया  दतिया विधानसभा उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी के सामने इस बार सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं बल्कि बदले हुए राजनीतिक समीकरण बन गए हैं। पूर्व गृह मंत्री और लंबे समय तक दतिया की राजनीति का प्रमुख चेहरा रहे नरोत्तम मिश्रा को टिकट नहीं मिलने के बाद चुनावी माहौल बदलता नजर आ रहा है। पार्टी ने उनकी जगह आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया है लेकिन जमीन पर नरोत्तम मिश्रा के प्रभाव और समर्थकों की भावनाएं अब भी चुनावी चर्चा का केंद्र बनी हुई हैं।

    ग्रामीण इलाकों में कई मतदाता आज भी नरोत्तम मिश्रा को दादा के नाम से याद करते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि क्षेत्र की समस्याओं के समाधान में उनकी सक्रिय भूमिका रहती थी। ऐसे में टिकट बदलने के फैसले के बाद कुछ समर्थकों में नाराजगी दिखाई दे रही है। हालांकि पार्टी इसे पूरी तरह नियंत्रित करने का दावा कर रही है।

    पिछले करीब 18 वर्षों में दतिया बीजेपी संगठन में नरोत्तम मिश्रा का मजबूत प्रभाव रहा। इस दौरान उनका समर्थक नेटवर्क बूथ स्तर तक सक्रिय रहा और चुनावी प्रबंधन की जिम्मेदारी भी काफी हद तक इसी टीम के पास रही। अब नए उम्मीदवार के साथ पार्टी को बूथ स्तर पर संगठन को फिर से सक्रिय करना पड़ रहा है। पुराने कार्यकर्ता दोबारा मैदान में जरूर उतरे हैं लेकिन स्थानीय स्तर पर उनका जनसंपर्क पहले जैसा मजबूत नहीं माना जा रहा।

    इसी चुनौती को देखते हुए बीजेपी ने चुनाव प्रचार में पूरी ताकत झोंक दी है। अब तक आठ मंत्री क्षेत्र में प्रचार कर चुके हैं जबकि 20 विधायकों को अलग अलग शक्ति केंद्रों की जिम्मेदारी सौंपी गई है। विभिन्न मोर्चों के पदाधिकारी भी लगातार मतदाताओं तक पहुंचने में जुटे हैं। पार्टी को उम्मीद है कि व्यापक संगठनात्मक अभियान से संभावित नुकसान की भरपाई की जा सकेगी।

    नरोत्तम मिश्रा भी चुनावी अभियान से पूरी तरह दूर नहीं हैं। उन्हें चुनाव संचालन समिति का अध्यक्ष बनाया गया है और उनके फोटो मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव तथा प्रदेश अध्यक्ष के साथ प्रचार सामग्री में प्रमुखता से लगाए गए हैं। हालांकि उनका प्रचार करने का तरीका अलग है। वे उम्मीदवार के साथ मंच साझा करने के बजाय स्वयं घर घर जाकर मतदाताओं से संपर्क कर रहे हैं।

    नरोत्तम मिश्रा ने समर्थकों की नाराजगी के सवाल पर कहा कि अब पार्टी में कोई असंतुष्ट नहीं है और सभी कार्यकर्ता भाजपा की जीत के लिए काम कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि पार्टी ने उन्हें लंबे समय तक विधायक और मंत्री बनने का अवसर दिया और अब वे केवल एक कार्यकर्ता के रूप में संगठन की जिम्मेदारी निभाना चाहते हैं।

    राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस उपचुनाव में जातीय समीकरण भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। खासकर ब्राह्मण मतदाताओं का रुझान चुनाव परिणाम को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में दतिया का उपचुनाव केवल उम्मीदवारों की लड़ाई नहीं बल्कि संगठन की मजबूती स्थानीय नेतृत्व और सामाजिक समीकरणों की भी बड़ी परीक्षा बन गया है।

  • सात सीटों में से अधिकांश पर भाजपा की बढ़त, कुछ जगह मुकाबला रोमांचक…

    सात सीटों में से अधिकांश पर भाजपा की बढ़त, कुछ जगह मुकाबला रोमांचक…

    नई दिल्ली।देश के पांच राज्यों में हुए विधानसभा उपचुनावों की मतगणना जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, राजनीतिक माहौल लगातार बदलता हुआ दिखाई दे रहा है। शुरुआती रुझानों ने कई जगहों पर स्पष्ट बढ़त और कुछ स्थानों पर कड़े मुकाबले की तस्वीर पेश की है। कुल मिलाकर सात विधानसभा सीटों पर हुए इन उपचुनावों ने सियासी हलकों में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है, जहां हर अपडेट के साथ समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं।

    महाराष्ट्र की बारामती सीट इस पूरे चुनावी परिदृश्य का सबसे अहम केंद्र बनी हुई है। यहां से सुनेत्रा पवार आगे चल रही हैं और मजबूत बढ़त बनाए हुए हैं। इस सीट पर मतदाताओं का रुझान शुरुआत से ही खास चर्चा में रहा है, क्योंकि यह क्षेत्र राज्य की राजनीति में लंबे समय से प्रभावशाली भूमिका निभाता आया है। शुरुआती आंकड़ों के अनुसार यहां मुकाबला एक तरफ झुकता हुआ दिखाई दे रहा है, जिससे राजनीतिक विश्लेषक भी इसके संभावित परिणामों पर नजर बनाए हुए हैं।

    इसी राज्य की राहुरी सीट पर भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार अक्षय कर्डिले ने बढ़त हासिल कर ली है। वे लगातार मजबूत स्थिति बनाए हुए हैं और उनके निकटतम प्रतिद्वंदी पीछे चलते नजर आ रहे हैं। इस सीट पर चुनाव प्रचार के दौरान दोनों प्रमुख दलों ने पूरी ताकत लगाई थी, लेकिन शुरुआती रुझानों में भाजपा का पलड़ा भारी दिखाई दे रहा है।

    कर्नाटक की दावणगेरे साउथ सीट पर भी भाजपा उम्मीदवार ने बढ़त बना रखी है, जबकि कांग्रेस उम्मीदवार पीछे चल रहे हैं। वहीं इसी राज्य की बागलकोट सीट पर स्थिति इसके बिल्कुल उलट नजर आ रही है, जहां कांग्रेस उम्मीदवार आगे चल रहे हैं और भाजपा उम्मीदवार दूसरे स्थान पर हैं। यह स्थिति कर्नाटक में चुनावी प्रतिस्पर्धा को और दिलचस्प बना रही है, क्योंकि दोनों दल अलग-अलग सीटों पर बढ़त और नुकसान का सामना कर रहे हैं।

    त्रिपुरा की धर्मनगर सीट पर भी भाजपा उम्मीदवार आगे चल रहे हैं। यहां मतगणना के शुरुआती चरण से ही पार्टी को बढ़त मिलती दिख रही है। इसी तरह गुजरात की उमरेठ सीट पर भी भाजपा ने मजबूत पकड़ बनाई हुई है और उम्मीदवार ने बड़ी बढ़त दर्ज की है। नागालैंड की कोरिडांग सीट पर भी भाजपा उम्मीदवार मामूली अंतर से आगे हैं, जिससे यहां मुकाबला अभी पूरी तरह खत्म नहीं माना जा सकता।

    इन सभी सीटों के शुरुआती रुझानों से यह साफ संकेत मिल रहे हैं कि कई राज्यों में सत्तारूढ़ दल का प्रभाव अभी भी मजबूत बना हुआ है, जबकि कुछ स्थानों पर विपक्षी दलों ने भी कड़ा संघर्ष किया है। हालांकि अभी अंतिम परिणाम आना बाकी है, इसलिए कई सीटों पर स्थिति बदलने की संभावना भी बनी हुई है।

    कुल मिलाकर इन उपचुनावों ने राजनीतिक माहौल को और अधिक सक्रिय और रोचक बना दिया है। हर राउंड की गिनती के साथ बढ़त और हार का अंतर बदल रहा है, जिससे यह स्पष्ट हो रहा है कि अंतिम नतीजे तक किसी भी तरह का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। अब सभी की नजरें अंतिम परिणामों पर टिकी हैं, जो यह तय करेंगे कि राजनीतिक समीकरण किस दिशा में आगे बढ़ेंगे।