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  • TMC को हाईकोर्ट से नहीं मिली राहत, ईडी द्वारा फ्रीज किए गए तीन बैंक खाते फिलहाल रहेंगे बंद

    TMC को हाईकोर्ट से नहीं मिली राहत, ईडी द्वारा फ्रीज किए गए तीन बैंक खाते फिलहाल रहेंगे बंद


    नई दिल्ली। तृणमूल कांग्रेस (TMC) को सोमवार को कलकत्ता हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा। अदालत ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा फ्रीज किए गए पार्टी के तीन बैंक खातों के संचालन की अंतरिम अनुमति देने से इनकार कर दिया। इन खातों में कुल 440.42 करोड़ रुपये जमा बताए गए हैं।

    ईडी ने यह कार्रवाई राज्य पुलिस की एफआईआर के आधार पर शुरू की गई जांच के तहत की है। जांच एजेंसी कथित वित्तीय अनियमितताओं, अवैध धन जुटाने और पार्टी के कुछ बैंक खातों के माध्यम से हुए संदिग्ध लेनदेन की पड़ताल कर रही है।

    हाईकोर्ट ने खारिज की अंतरिम राहत की मांग
    मामले की सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति कृष्णा राव ने 13 जुलाई को अंतरिम आदेश सुरक्षित रख लिया था। सोमवार को अदालत ने अपना फैसला सुनाते हुए टीएमसी की अंतरिम राहत की मांग खारिज कर दी। इसके साथ ही पार्टी के तीनों बैंक खाते फिलहाल फ्रीज ही रहेंगे।

    जांच में क्या सामने आया?
    रिपोर्ट के मुताबिक, ईडी की प्रारंभिक जांच में दावा किया गया है कि अप्रैल 2023 से जून 2026 के बीच टीएमसी के बैंक खातों से करीब 160 करोड़ रुपये केयरवेल एविएशन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड और उससे जुड़ी एक अन्य इकाई को ट्रांसफर किए गए। जांच एजेंसी का यह भी आरोप है कि संबंधित कंपनी ने 2023 से 2026 के बीच 82.96 करोड़ रुपये एक अन्य नई कंपनी को भेजे। अधिकारियों के अनुसार, इस धनराशि का आगे भी लेनदेन किया गया।

    जेट और हेलीकॉप्टर खरीद की जांच
    ईडी के अनुसार, जांच के दौरान यह भी सामने आया कि कथित लेनदेन में से 112 करोड़ रुपये का उपयोग एम्ब्रेयर लेगेसी 600 बिजनेस जेट और अगस्तावेस्टलैंड 109SP हेलीकॉप्टर की खरीद में किया गया। एजेंसी इस पूरे वित्तीय लेनदेन और धन के स्रोत की जांच कर रही है। फिलहाल मामले की जांच जारी है और अदालत में इस संबंध में आगे की सुनवाई होना बाकी है।

  • पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने की दिशा में बड़ा कदम, आरजी कर मामले की नए सिरे से होगी गहन जांच

    पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने की दिशा में बड़ा कदम, आरजी कर मामले की नए सिरे से होगी गहन जांच


    नई दिल्ली । आरजी कर मामले में एक बार फिर न्यायिक सख्ती देखने को मिली है। कलकत्ता हाईकोर्ट ने मामले में लगाए गए गंभीर आरोपों को ध्यान में रखते हुए नए सिरे से जांच कराने के आदेश दिए हैं। अदालत के इस फैसले के बाद पूरे मामले ने एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा पकड़ ली है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि जांच के दौरान सबूतों से किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ हुई है तो उसकी गहराई से पड़ताल की जानी चाहिए ताकि सच्चाई पूरी तरह सामने आ सके और पीड़ित परिवार को न्याय मिल सके।

    अदालत ने विशेष जांच दल को घटना की पूरी श्रृंखला की दोबारा जांच करने का निर्देश दिया है। जांच केवल घटना तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि घटना वाली रात के भोजन से लेकर अंतिम संस्कार तक की सभी परिस्थितियों की बारीकी से समीक्षा की जाएगी। अदालत ने यह भी कहा है कि जांच एजेंसी किसी भी व्यक्ति से पूछताछ कर सकती है और जरूरत पड़ने पर नए तथ्यों को भी रिकॉर्ड में शामिल कर सकती है।

    मामले में गठित विशेष जांच दल का नेतृत्व वरिष्ठ अधिकारी करेंगे और टीम को पूरी स्वतंत्रता के साथ काम करने की अनुमति दी गई है। अदालत ने यह साफ कर दिया है कि जांच निष्पक्ष और पारदर्शी होनी चाहिए ताकि किसी भी प्रकार के संदेह की गुंजाइश न बचे। जांच एजेंसी को यह भी निर्देश दिया गया है कि पीड़ित परिवार द्वारा लगाए गए सभी आरोपों का सत्यापन गंभीरता और संवेदनशीलता के साथ किया जाए।

    इस फैसले के बाद मामले से जुड़े कई सवाल फिर चर्चा में आ गए हैं। सबूतों से छेड़छाड़ के दावों ने पहले ही मामले को संवेदनशील बना दिया था और अब अदालत के हस्तक्षेप ने जांच की दिशा को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है। माना जा रहा है कि दोबारा जांच के दौरान कई ऐसे तथ्य सामने आ सकते हैं जो अब तक स्पष्ट नहीं हो पाए थे।

    हाईकोर्ट ने जांच एजेंसी को तय समय सीमा के भीतर रिपोर्ट सौंपने का निर्देश भी दिया है। अदालत की निगरानी में होने वाली इस जांच पर अब सभी की नजरें टिकी हुई हैं। पीड़ित परिवार ने अदालत के फैसले को राहत भरा कदम बताया है और उम्मीद जताई है कि इस बार पूरी सच्चाई सामने आएगी।

    मामले को लेकर राजनीतिक और सामाजिक हलकों में भी प्रतिक्रिया तेज हो गई है। कई लोगों का मानना है कि अदालत का यह आदेश न्याय व्यवस्था में विश्वास को मजबूत करेगा। वहीं विशेषज्ञों का कहना है कि संवेदनशील मामलों में निष्पक्ष जांच ही न्याय की सबसे बड़ी आधारशिला होती है।

    अब सभी की निगाहें जांच एजेंसी की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं। यह जांच केवल एक मामले की सच्चाई सामने लाने तक सीमित नहीं मानी जा रही बल्कि इसे न्यायिक पारदर्शिता और जवाबदेही की बड़ी परीक्षा के रूप में भी देखा जा रहा है।