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  • पति के दबाव में मायके की संपत्ति मांगना भी माना जाएगा दहेज की मांग, कलकत्ता हाईकोर्ट ने स्पष्ट की कानून की अहम व्याख्या

    पति के दबाव में मायके की संपत्ति मांगना भी माना जाएगा दहेज की मांग, कलकत्ता हाईकोर्ट ने स्पष्ट की कानून की अहम व्याख्या

    नई दिल्ली । दहेज से जुड़े मामलों की कानूनी व्याख्या को और स्पष्ट करते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा है कि किसी महिला का अपनी पैतृक संपत्ति में हिस्सा मांगना उसका वैधानिक अधिकार है, लेकिन यदि यह मांग पति या ससुराल पक्ष के दबाव, उत्पीड़न या मजबूरी के कारण की जाती है तो इसे दहेज की मांग माना जाएगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में भारतीय दंड संहिता की दहेज हत्या से संबंधित प्रावधान लागू हो सकते हैं।

    यह फैसला वर्ष 2014 में हुई एक महिला और उसकी नाबालिग बेटी की मौत से जुड़े मामले में सुनाया गया। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण करते हुए पाया कि महिला अपने वैवाहिक जीवन के दौरान लगातार मानसिक दबाव और आर्थिक उत्पीड़न का सामना कर रही थी। जांच और गवाहों के आधार पर यह भी सामने आया कि महिला पर मायके से धन और पैतृक संपत्ति में हिस्से की राशि लाने का लगातार दबाव बनाया जा रहा था।

    अदालत ने कहा कि महिला को अपने पैतृक अधिकार का दावा करने से कोई नहीं रोक सकता, क्योंकि यह उसका कानूनी अधिकार है। हालांकि यदि पति इस अधिकार का इस्तेमाल अपने आर्थिक लाभ के लिए करवाने का दबाव बनाता है और महिला को मजबूर करता है कि वह मायके से संपत्ति या धन लेकर आए, तो ऐसी स्थिति सामान्य संपत्ति विवाद नहीं रह जाती, बल्कि दहेज की मांग की श्रेणी में आती है। अदालत ने माना कि कानून की व्यापक भावना भी इसी सिद्धांत का समर्थन करती है।

    सुनवाई के दौरान पति ने तर्क दिया कि उसकी पत्नी केवल अपने वैधानिक हिस्से की मांग कर रही थी, इसलिए इसे दहेज की मांग नहीं कहा जा सकता। अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों से यह स्पष्ट हुआ कि महिला के भाई ने पहले ही पैतृक संपत्ति का एक हिस्सा बेचकर उसे धनराशि दी थी, लेकिन इसके बावजूद पति लगातार शेष संपत्ति से भी पैसा लाने के लिए दबाव बना रहा था। अदालत ने माना कि यही दबाव महिला की मानसिक स्थिति पर गंभीर प्रभाव डालने वाला महत्वपूर्ण कारण बना।

    मामले में प्राथमिकी दर्ज होने में हुई देरी को लेकर भी पति की ओर से सवाल उठाए गए। अदालत ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि किसी परिवार में अचानक हुई दुखद मृत्यु के बाद परिजन स्वाभाविक रूप से मानसिक आघात की स्थिति में होते हैं। ऐसे समय कानूनी सलाह लेकर शिकायत दर्ज कराना असामान्य नहीं माना जा सकता। केवल देरी के आधार पर शिकायत की विश्वसनीयता पर संदेह नहीं किया जा सकता।

    साक्ष्यों की समीक्षा के बाद अदालत ने पाया कि सास-ससुर के विरुद्ध पर्याप्त और ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं थे। गवाहों के बयानों में भी उनकी प्रत्यक्ष भूमिका सिद्ध नहीं हो सकी। इसी आधार पर उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया गया। वहीं पति के खिलाफ उपलब्ध साक्ष्यों को पर्याप्त मानते हुए उसकी दोषसिद्धि को बरकरार रखा गया।

    हालांकि अदालत ने सजा के प्रश्न पर विचार करते हुए आजीवन कारावास को संशोधित कर दस वर्ष के कठोर कारावास में बदल दिया। अदालत ने कहा कि दहेज हत्या के मामलों में आजीवन कारावास का प्रावधान अत्यंत गंभीर और दुर्लभ परिस्थितियों में लागू किया जाना चाहिए। इस निर्णय के साथ अदालत ने यह भी स्पष्ट संदेश दिया कि महिलाओं के पैतृक संपत्ति संबंधी अधिकारों का सम्मान किया जाना चाहिए, लेकिन यदि उन अधिकारों का उपयोग ससुराल पक्ष आर्थिक लाभ प्राप्त करने के लिए दबाव बनाकर कराता है, तो कानून उसे दहेज की मांग के रूप में देखेगा और उसके अनुसार कार्रवाई की जाएगी।

  • बंगाल में आरक्षण नीति पर नया मोड़, ओबीसी कोटा गणित बदला; कई समुदायों की स्थिति में बड़ा बदलाव

    बंगाल में आरक्षण नीति पर नया मोड़, ओबीसी कोटा गणित बदला; कई समुदायों की स्थिति में बड़ा बदलाव

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल में आरक्षण व्यवस्था को लेकर बड़ा प्रशासनिक और नीतिगत बदलाव देखने को मिला है, जहां ओबीसी वर्गीकरण प्रणाली में संशोधन कर पुरानी सूची को फिर से लागू कर दिया गया है। इस फैसले के बाद राज्य की आरक्षण संरचना में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ है, जिससे सामाजिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर नई चर्चा शुरू हो गई है। यह कदम अदालत के निर्देशों और मौजूदा नियमों के अनुपालन के संदर्भ में उठाया गया बताया जा रहा है, जिसके तहत पहले लागू संशोधित ओबीसी सूची को रद्द कर दिया गया है।

    इस बदलाव के बाद राज्य में 2010 से पहले की ओबीसी सूची को बहाल किया गया है, जिसमें कई पारंपरिक समुदायों को फिर से शामिल किया गया है। इस सूची के अनुसार अब संबंधित समुदायों को सरकारी नौकरियों और अन्य नियुक्तियों में निर्धारित आरक्षण का लाभ मिलेगा। प्रशासनिक स्तर पर इस निर्णय को व्यवस्था में पारदर्शिता और संतुलन लाने की दिशा में उठाया गया कदम बताया जा रहा है।

    पहले राज्य में ओबीसी आरक्षण को दो श्रेणियों में बांटा गया था, जिसमें एक वर्ग को अधिक पिछड़ा मानते हुए अलग प्रतिशत का लाभ दिया जाता था, जबकि दूसरे वर्ग को अलग कोटा मिलता था। लेकिन अब इस पूरी व्यवस्था को समाप्त कर एकीकृत प्रणाली लागू की गई है, जिससे आरक्षण ढांचे में व्यापक बदलाव देखने को मिल रहा है।

    इस फैसले के बाद बड़ी संख्या में पहले जारी किए गए ओबीसी प्रमाणपत्रों की वैधता पर भी प्रभाव पड़ा है। बताया जा रहा है कि 2010 के बाद जारी कई प्रमाणपत्र अब इस नई व्यवस्था के दायरे में नहीं आते, जिससे प्रभावित लोगों की संख्या लाखों में है। हालांकि पहले से नौकरी प्राप्त कर चुके कर्मचारियों की स्थिति को सुरक्षित रखा गया है और पुराने प्रमाणपत्रों को मान्यता दी गई है।

    नई सूची में कई पारंपरिक सामाजिक समुदायों को शामिल किया गया है, जो लंबे समय से पिछड़ा वर्ग की श्रेणी में आते रहे हैं। इसके साथ ही कुछ अल्पसंख्यक समुदायों को भी पिछड़ा वर्ग में शामिल किया गया है, जिससे आरक्षण ढांचे का सामाजिक संतुलन बदलता हुआ दिखाई दे रहा है।

    इस निर्णय के बाद राज्य में राजनीतिक हलचल भी तेज हो गई है। विभिन्न स्तरों पर इसे सामाजिक न्याय और प्रशासनिक सुधार से जोड़कर देखा जा रहा है, जबकि कुछ वर्ग इसे आरक्षण नीति में बड़ा बदलाव मान रहे हैं। आने वाले समय में यह बदलाव राज्य की सामाजिक संरचना और सरकारी नौकरियों की प्रक्रिया पर गहरा प्रभाव डाल सकता है।

  • कोर्ट में सक्रिय दिखीं ममता बनर्जी, चुनावी हिंसा मामले में पेश की पैरवी, बाहर विरोध और नारेबाजी ने खींचा ध्यान

    कोर्ट में सक्रिय दिखीं ममता बनर्जी, चुनावी हिंसा मामले में पेश की पैरवी, बाहर विरोध और नारेबाजी ने खींचा ध्यान

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर अदालत और सियासी हलकों के केंद्र में आ गई है, जब राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई के लिए काला कोट पहनकर कलकत्ता हाईकोर्ट पहुंचीं। यह मामला राज्य में हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों के बाद सामने आए कथित चुनावी हिंसा से जुड़ा था, जिसकी सुनवाई के दौरान उन्होंने अदालत के समक्ष अपनी बात रखी और पूरे घटनाक्रम पर गंभीर चिंता जताई।

    सुनवाई के दौरान ममता बनर्जी ने राज्य में चुनाव परिणामों के बाद हुई घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि कई जगहों पर हिंसा, आगजनी और अन्य आपराधिक गतिविधियों की शिकायतें सामने आई हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि कई मामलों में पुलिस द्वारा एफआईआर दर्ज करने की अनुमति नहीं दी जा रही, जिससे पीड़ित पक्षों को न्याय मिलने में कठिनाई हो रही है। उन्होंने अदालत से इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच और प्रभावित लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की अपील की।

    ममता बनर्जी के साथ उनके कुछ वरिष्ठ सहयोगी भी मौजूद रहे, और पूरे कोर्ट परिसर में उनकी मौजूदगी ने मीडिया और वकीलों का ध्यान खींच लिया। सुनवाई के दौरान उनका व्यवहार पूरी तरह औपचारिक और कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप रहा, जहां उन्होंने अपनी पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हुए बताया कि वे पहले भी वकालत से जुड़ी रही हैं और कानून की समझ रखती हैं।

    हालांकि सुनवाई समाप्त होने के बाद जैसे ही वह कोर्ट रूम से बाहर निकलीं, माहौल अचानक बदल गया। परिसर के गलियारों में मौजूद कुछ लोगों की भीड़ ने उन्हें घेर लिया और नारेबाजी शुरू हो गई। इस दौरान राजनीतिक नारे लगाए गए, जिससे वातावरण कुछ देर के लिए तनावपूर्ण हो गया। सुरक्षा कर्मियों ने स्थिति को नियंत्रित किया और उन्हें सुरक्षित बाहर निकाला गया।

    यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय पर सामने आया है जब राज्य में चुनावी हिंसा को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप पहले से ही तेज हैं। विभिन्न पक्षों की ओर से अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं। एक ओर जहां कुछ याचिकाओं में यह आरोप लगाया गया है कि चुनाव परिणामों के बाद हिंसा के चलते कई लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए, वहीं दूसरी ओर सत्तारूढ़ पक्ष का कहना है कि शिकायतों की संख्या को लेकर तथ्य अलग हैं और कई मामलों में सही कानूनी प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।

    इस मामले की पृष्ठभूमि में यह भी सामने आता है कि ममता बनर्जी का कानूनी क्षेत्र से पुराना जुड़ाव रहा है। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा के बाद कानून की पढ़ाई की थी और कुछ समय तक अदालत में वकालत भी की थी, जिसके बाद उन्होंने पूरी तरह राजनीति में प्रवेश किया।

    राजनीतिक और कानूनी दोनों ही स्तरों पर यह मामला अब चर्चा का विषय बन गया है। अदालत में रखी गई दलीलों के साथ-साथ बाहर हुई घटनाओं ने इसे और अधिक संवेदनशील बना दिया है। आने वाले समय में इस मामले की सुनवाई और उससे जुड़े तथ्य राज्य की राजनीतिक दिशा पर भी असर डाल सकते हैं।

  • 40,000 पैकेट बिरयानी की तैयारी, मस्जिद कार्यक्रम को लेकर इलाक़े में उत्साह

    40,000 पैकेट बिरयानी की तैयारी, मस्जिद कार्यक्रम को लेकर इलाक़े में उत्साह


    बहरामपुर । TMC के निलंबित विधायक हुमायूं कबीर (Humayun Kabir) ने पश्चिम बंगाल (West Bengal) के मुर्शिदाबाद जिले में ‘बाबरी जैसी मस्जिद’ (Babri Mosque) बनाने का ऐलान कर बड़ा बखेड़ा खड़ा कर दिया है। शुक्रवार को कलकत्ता हाईकोर्ट (Calcutta High Court) ने भी मस्जिद के निर्माण में हस्तक्षेप करने के इनकार कर दिया है। इसके बाद अब शिलान्यास समारोह को भव्य बनाने की तैयारियां शुरू हो गई हैं। समारोह स्थल को एक विशाल कार्यस्थल में बदल दिया गया है जहां शनिवार को बाबरी जैसी मस्जिद का शिलान्यास होगा। जानकारी के मुताबिक समारोह में सऊदी अरब के मौलवियों के आने की संभावना है। वहीं यहां हजारों लोगों के लिए भोजन तैयार किया जा रहा है। अधिकारियों ने समारोह से पहले सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी है।

    इससे पहले TMC ने हुमायूं कबीर को पार्टी से निकाल दिया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बिना नाम लिए इस तरह के आयोजनों के खिलाफ चेतावनी भी जारी की है। हालांकि कबीर राजनीतिक घटनाक्रम और प्रशासनिक दबाव से बेपरवाह दिखे। कबीर ने पत्रकारों से कहा है कि शनिवार को मोरादघी के पास 25 बीघा जमीन पर लगभग तीन लाख लोग इकट्ठा होंगे। उन्होंने यह भी बताया कि कई राज्यों के धार्मिक नेताओं ने अपनी उपस्थिति की पुष्टि की है। कबीर ने बटुआ, “सऊदी अरब से दो काजी सुबह कोलकाता हवाई अड्डे से एक विशेष काफिले में पहुंचेंगे।”

    60-70 लाख रुपए खानपान में खर्च
    राज्य के एकमात्र उत्तर-दक्षिण मुख्य राजमार्ग एनएच-12 के किनारे स्थित विशाल आयोजन स्थल पर जोर-शोर से तैयारियां चल रही हैं। भीड़ के लिए शाही बिरयानी बनाने के लिए मुर्शिदाबाद की सात खानपान एजेंसियों को अनुबंध दिया गया है। विधायक के एक करीबी सहयोगी ने बताया कि मेहमानों के लिए लगभग 40,000 पैकेट और स्थानीय लोगों के लिए 20,000 पैकेट बनाए जा रहे हैं, जिससे सिर्फ भोजन का खर्च 30 लाख रुपए से अधिक हो जाएगा। उन्होंने कहा, “आयोजन स्थल का बजट लगभग 60-70 लाख रुपए होगा।”

    मंच पर 400 मेहमानों के बैठने की व्यवस्था
    धान के खेतों के ऊपर बना मुख्य मंच इस विशाल आयोजन का सबसे स्पष्ट प्रतीक बन गया है। करीबी सहयोगी ने बताया कि 150 फुट लंबा और 80 फुट चौड़ा यह मंच लगभग 400 मेहमानों के बैठने की क्षमता के साथ 10 लाख रुपए की अनुमानित लागत से बनाया जा रहा है। आयोजकों ने बताया कि लगभग 3,000 स्वयंसेवक भीड़ को नियंत्रित करने, मार्गों को नियंत्रित करने और NH-12 पर अवरोधों को रोकने के लिए तैनात किए गए हैं। इनमें से 2,000 ने शुक्रवार सुबह से ही काम शुरू कर दिया था।

    कुरान की आयतों के साथ शुरू होगा समारोह
    कबीर ने कहा कि समारोह पूर्वाह्न 10 बजे कुरान की आयतों के साथ शुरू होगा, जिसके बाद दोपहर में आधारशिला समारोह होगा। उन्होंने कहा, “औपचारिकताएं दो घंटे पहले शुरू हो जाएंगी। पुलिस के निर्देशानुसार शाम चार बजे तक मैदान खाली कर दिया जाएगा।”

    3000 पुलिसकर्मी तैनात
    इस बीच शुक्रवार को कलकत्ता हाईकोर्ट के निर्देश के बाद जिला पुलिस ने सार्वजनिक व्यवस्था और NH-12 पर निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए हुमायूं कबीर की टीम के साथ कई दौर की चर्चा की। जिला पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि बेलडांगा और रानीनगर थाना क्षेत्र में लगभग 3,000 पुलिसकर्मियों को तैनात किया जाएगा।