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  • Cancer का खतरा कम करने की नई रणनीति, समय पर जांच से बच सकती हैं हजारों जानें, जानें भारत का पूरा प्लान

    Cancer का खतरा कम करने की नई रणनीति, समय पर जांच से बच सकती हैं हजारों जानें, जानें भारत का पूरा प्लान


    नई दिल्ली। भारत में कैंसर का बढ़ता संकट केवल मरीजों की संख्या तक सीमित नहीं है बल्कि सबसे बड़ी चुनौती बीमारी की देर से पहचान है। अस्पतालों तक पहुंचने वाले बड़ी संख्या में मरीजों में कैंसर काफी आगे बढ़ चुका होता है। ऐसी स्थिति में इलाज मुश्किल होने के साथ महंगा भी हो जाता है और मरीज के ठीक होने की संभावना कम हो सकती है। यही वजह है कि कैंसर के खिलाफ लड़ाई में आधुनिक उपचार के साथ समय पर पहचान और बचाव पर सबसे ज्यादा जोर देने की जरूरत है।

    कैंसर के मामलों में बढ़ोतरी के पीछे बढ़ती उम्र के साथ बदलती जीवनशैली धूम्रपान तंबाकू का सेवन असंतुलित खानपान शारीरिक गतिविधियों की कमी और पर्यावरणीय कारणों को महत्वपूर्ण माना जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार कैंसर के कई जोखिम कारकों को जीवनशैली में बदलाव और समय पर जांच के जरिए कम किया जा सकता है। इसलिए कैंसर के खिलाफ जागरूकता की शुरुआत इलाज के बाद नहीं बल्कि बचपन से होनी चाहिए।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूलों में बच्चों को स्वस्थ जीवनशैली के बारे में जानकारी देना बेहद जरूरी है। खानपान शारीरिक गतिविधि मानसिक स्वास्थ्य नशे से दूरी टीकाकरण और व्यक्तिगत स्वास्थ्य जैसे विषयों को जीवन कौशल का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। बचपन से अच्छी आदतें विकसित होने पर भविष्य में कैंसर के साथ साथ हृदय रोग डायबिटीज और दूसरी गंभीर बीमारियों के जोखिम को भी कम किया जा सकता है।

    कैंसर की शुरुआती पहचान के लिए एक आसान बात लोगों को हमेशा याद रखनी चाहिए। अगर शरीर में कोई असामान्य लक्षण लगातार तीन सप्ताह या उससे अधिक समय तक बना रहता है तो उसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। लगातार दर्द शरीर में असामान्य गांठ बिना वजह वजन कम होना लंबे समय तक रहने वाली खांसी निगलने में परेशानी असामान्य रक्तस्राव या लंबे समय से बनी कमजोरी जैसे लक्षणों की स्थिति में डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। हालांकि ऐसे लक्षण हमेशा कैंसर का संकेत नहीं होते लेकिन लगातार बने रहने पर चिकित्सकीय जांच जरूरी हो जाती है।

    स्क्रीनिंग भी कैंसर से होने वाली मौतों को कम करने में अहम भूमिका निभा सकती है। कुछ कैंसर की पहचान शुरुआती चरण में स्क्रीनिंग के जरिए की जा सकती है। यही वह समय होता है जब उपचार के विकल्प अपेक्षाकृत बेहतर हो सकते हैं। आने वाले समय में तकनीक इस क्षेत्र को और मजबूत कर सकती है। मल्टी कैंसर अर्ली डिटेक्शन जैसे रक्त आधारित परीक्षणों पर दुनियाभर में शोध जारी है। इनका उद्देश्य एक ही रक्त नमूने से कई प्रकार के कैंसर से जुड़े संकेतों की पहचान करना है। हालांकि ऐसे परीक्षणों को व्यापक स्तर पर अपनाने से पहले उनकी सटीकता उपयोगिता और चिकित्सकीय प्रभाव का वैज्ञानिक मूल्यांकन जरूरी है।

    भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भी कैंसर की पहचान और रिसर्च में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। मेडिकल इमेजिंग और पैथोलॉजी डेटा के बड़े डेटाबेस की मदद से AI आधारित सिस्टम को प्रशिक्षित किया जा सकता है। इससे संदिग्ध मामलों की पहचान में डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों को सहायता मिल सकती है और जरूरत पड़ने पर मरीजों को विशेषज्ञ केंद्र तक जल्दी पहुंचाया जा सकता है।

    भारत जैसे विशाल देश में कैंसर स्क्रीनिंग का एक ही मॉडल सभी क्षेत्रों के लिए प्रभावी नहीं हो सकता। गांवों और दूरदराज के इलाकों तक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाने के लिए कम्युनिटी हेल्थ वर्कर्स मोबाइल डायग्नोस्टिक सेवाएं डिजिटल रिस्क असेसमेंट और मजबूत रेफरल सिस्टम की जरूरत होगी। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से लेकर बड़े कैंसर अस्पताल तक मरीजों को समय पर जोड़ना इस पूरी व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हो सकती है।

    कैंसर के खिलाफ भारत की असली सफलता केवल आधुनिक मशीनों अस्पतालों या महंगे उपचारों की संख्या से तय नहीं होगी। असली सफलता तब मानी जाएगी जब बीमारी की पहचान शुरुआती चरण में होने लगे और कम मरीज गंभीर अवस्था में अस्पताल पहुंचें। जागरूकता समय पर जांच स्वस्थ जीवनशैली AI आधारित तकनीक और मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था मिलकर कैंसर के खिलाफ भारत की लड़ाई को नई दिशा दे सकते हैं।

  • BreathEasy तकनीक से बदल सकती है कैंसर स्क्रीनिंग, कुत्ते सूंघकर करेंगे शुरुआती पहचान, जानिए कैसे करेगा काम

    BreathEasy तकनीक से बदल सकती है कैंसर स्क्रीनिंग, कुत्ते सूंघकर करेंगे शुरुआती पहचान, जानिए कैसे करेगा काम


    नई दिल्ली । कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के इलाज में समय पर पहचान सबसे बड़ी चुनौती मानी जाती है। यदि शुरुआती चरण में बीमारी का पता चल जाए तो उपचार की सफलता की संभावना काफी बढ़ जाती है। इसी दिशा में भारत की एक डीप टेक स्टार्टअप डॉग्नोसिस ऐसी नई तकनीक विकसित कर रही है जो भविष्य में कैंसर की स्क्रीनिंग का तरीका बदल सकती है। इस तकनीक की खास बात यह है कि इसमें ब्लड टेस्ट या स्कैन की जगह केवल व्यक्ति की सांस के नमूने का विश्लेषण किया जाएगा और इस प्रक्रिया में प्रशिक्षित कुत्तों की असाधारण सूंघने की क्षमता का उपयोग होगा।

    कंपनी ने अपनी इस तकनीक का नाम ब्रीथईजी रखा है। इसका उद्देश्य कैंसर का अंतिम निदान करना नहीं बल्कि उन लोगों की पहचान करना है जिनमें कैंसर होने का जोखिम अधिक हो सकता है। ऐसे लोगों को बाद में बायोप्सी ब्लड टेस्ट या इमेजिंग जैसी पारंपरिक जांच कराने की सलाह दी जाएगी। यदि मौजूदा क्लिनिकल ट्रायल सफल रहते हैं तो कंपनी वर्ष 2027 की शुरुआत में इस तकनीक को भारत में व्यावसायिक रूप से लॉन्च करने की योजना बना रही है।

    यह तकनीक एक वैज्ञानिक सिद्धांत पर आधारित है। जब शरीर में कैंसर कोशिकाएं विकसित होती हैं तो वे वॉलेटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड्स नामक सूक्ष्म रासायनिक अणु छोड़ती हैं जो सांस के साथ बाहर निकलते हैं। इंसानों की तुलना में कुत्तों की सूंघने की क्षमता कई हजार गुना अधिक संवेदनशील होती है इसलिए वे इन सूक्ष्म रासायनिक संकेतों को पहचान सकते हैं। डॉग्नोसिस मुख्य रूप से बीगल नस्ल के प्रशिक्षित कुत्तों का उपयोग कर रही है हालांकि अन्य नस्लों को भी इस कार्य के लिए तैयार किया जा रहा है।

    कंपनी की तकनीक केवल कुत्तों के व्यवहार पर निर्भर नहीं रहती। इसके साथ एक आधुनिक ब्रेन कंप्यूटर इंटरफेस भी विकसित किया गया है जो नमूने को सूंघते समय कुत्ते के मस्तिष्क की गतिविधियों को रिकॉर्ड और विश्लेषित करता है। इससे परिणामों की विश्वसनीयता बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। सांस का नमूना एक विशेष मास्क में लगभग दस मिनट तक सांस लेने के बाद लिया जाता है और फिर उसे स्वचालित प्रणाली में जांचा जाता है। कंपनी का दावा है कि यह प्लेटफॉर्म एक बार में 200 से अधिक नमूनों की जांच बिना मानवीय हस्तक्षेप के कर सकता है।

    फिलहाल यह तकनीक बड़े स्तर के क्लिनिकल परीक्षणों से गुजर रही है। शुरुआती अध्ययनों में कुछ मामलों में गलत पॉजिटिव और गलत निगेटिव परिणाम भी सामने आए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तकनीक में संभावनाएं जरूर हैं लेकिन इसे नियमित स्वास्थ्य सेवाओं का हिस्सा बनाने से पहले बड़े पैमाने पर वैज्ञानिक प्रमाण और व्यापक परीक्षण आवश्यक होंगे।

    विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि यह तकनीक कैंसर का अंतिम इलाज या अंतिम जांच नहीं है। इसका उद्देश्य केवल शुरुआती स्क्रीनिंग करना है ताकि जोखिम वाले लोगों की समय रहते पहचान हो सके और उन्हें आगे की आवश्यक चिकित्सीय जांच के लिए भेजा जा सके। यदि यह तकनीक सफल साबित होती है तो भविष्य में वार्षिक हेल्थ चेकअप का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती है और कैंसर जैसी गंभीर बीमारी की जल्द पहचान में बड़ी भूमिका निभा सकती है।