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  • 70 साल के बाद कैंसर का बढ़ता खतरा एक्सपर्ट्स ने बताए शुरुआती लक्षण बचाव और समय पर जांच का महत्व

    70 साल के बाद कैंसर का बढ़ता खतरा एक्सपर्ट्स ने बताए शुरुआती लक्षण बचाव और समय पर जांच का महत्व


    नई दिल्ली । उम्र बढ़ने के साथ शरीर में कई तरह के प्राकृतिक बदलाव होते हैं और इसी के साथ कई गंभीर बीमारियों का खतरा भी बढ़ने लगता है। इनमें कैंसर सबसे बड़ी स्वास्थ्य चुनौतियों में से एक माना जाता है। हाल के वर्षों में सामने आई कई अंतरराष्ट्रीय रिसर्च यह संकेत देती हैं कि बुजुर्गों में कैंसर के मामलों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। सबसे चिंता की बात यह है कि बड़ी संख्या में मरीजों में बीमारी का पता तब चलता है जब कैंसर काफी आगे बढ़ चुका होता है। ऐसे में इलाज जटिल हो जाता है और मरीज के पूरी तरह स्वस्थ होने की संभावना भी कम हो सकती है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती उम्र के साथ शरीर की कोशिकाओं में लंबे समय तक होने वाले बदलाव कैंसर का जोखिम बढ़ाते हैं। इसके अलावा प्रतिरक्षा प्रणाली भी पहले की तुलना में कमजोर होने लगती है जिससे शरीर असामान्य कोशिकाओं को प्रभावी तरीके से खत्म नहीं कर पाता। यही कारण है कि 70 वर्ष या उससे अधिक आयु के लोगों में कैंसर के मामले अपेक्षाकृत ज्यादा देखने को मिलते हैं।

    हाल में प्रकाशित एक बड़े अध्ययन में लाखों बुजुर्ग मरीजों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इसमें पाया गया कि बड़ी संख्या में लोगों को कैंसर का पता तब चला जब उन्हें गंभीर स्थिति में अस्पताल के इमरजेंसी विभाग में भर्ती कराना पड़ा। ऐसे मरीजों में जीवित रहने की संभावना उन लोगों की तुलना में काफी कम पाई गई जिनमें बीमारी की पहचान शुरुआती चरण में हो गई थी। इससे यह स्पष्ट होता है कि समय पर जांच और सही निदान जीवन बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

    रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि फेफड़े लिवर पेट कोलन ओवरी और पैंक्रियाज जैसे कैंसर के मामलों में देर से पहचान होने की संभावना अधिक रहती है। वहीं स्तन और प्रोस्टेट कैंसर जैसे कुछ प्रकारों में नियमित जांच के कारण शुरुआती चरण में बीमारी पकड़ में आने की संभावना बेहतर होती है। इसलिए डॉक्टर उम्र के अनुसार समय समय पर हेल्थ चेकअप और स्क्रीनिंग कराने की सलाह देते हैं।

    विशेषज्ञ बताते हैं कि बुजुर्गों में अचानक वजन कम होना लगातार थकान भूख में कमी लंबे समय तक खांसी मल या पेशाब की आदतों में बदलाव शरीर के किसी हिस्से में असामान्य गांठ बार बार खून आना या बिना कारण दर्द बने रहना जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यदि ये संकेत लगातार बने रहें तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।

    रिपोर्ट में यह भी चिंता जताई गई कि कई बार अधिक उम्र होने के कारण मरीजों को आवश्यक इलाज कम मिल पाता है जबकि उनकी शारीरिक स्थिति उपचार के लिए उपयुक्त हो सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि इलाज का निर्णय केवल उम्र के आधार पर नहीं बल्कि मरीज की संपूर्ण स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।

    स्वस्थ जीवनशैली नियमित व्यायाम संतुलित आहार धूम्रपान और शराब से दूरी पर्याप्त नींद तथा समय समय पर स्वास्थ्य जांच कैंसर के जोखिम को कम करने में मदद कर सकते हैं। परिवार के सदस्यों की भी जिम्मेदारी है कि वे बुजुर्गों के स्वास्थ्य पर लगातार नजर रखें और किसी भी असामान्य बदलाव को हल्के में न लें। समय पर पहचान और सही उपचार ही कैंसर के खिलाफ सबसे प्रभावी हथियार साबित हो सकता है।

  • किडनी कैंसर पर जागरूकता जरूरी शराब और धूम्रपान बढ़ाते हैं जोखिम, समय पर पहचान से बच सकती है जान

    किडनी कैंसर पर जागरूकता जरूरी शराब और धूम्रपान बढ़ाते हैं जोखिम, समय पर पहचान से बच सकती है जान


    नई द‍िल्‍ली । किडनी कैंसर दुनिया भर में तेजी से बढ़ती एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या बन चुका है। यह वैश्विक स्तर पर 14वां सबसे आम कैंसर माना जाता है, जिसमें हर साल लाखों नए मामले सामने आते हैं और बड़ी संख्या में लोगों की मौत भी होती है। पुरुषों, बुजुर्गों और विकसित देशों में इसके मामले अधिक देखे जाते हैं, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह बीमारी केवल इन्हीं वर्गों तक सीमित नहीं है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, अगर किडनी कैंसर का समय पर पता चल जाए तो सर्जरी, थेरेपी और अन्य आधुनिक उपचारों के माध्यम से मरीज की जान बचाई जा सकती है। समस्या यह है कि अधिकतर मामलों में इसका पता तब चलता है जब बीमारी काफी आगे बढ़ चुकी होती है, जिससे इलाज कठिन हो जाता है।

    किडनी कैंसर को लेकर समाज में कई तरह की गलतफहमियां फैली हुई हैं, जो इसके समय पर निदान और उपचार में बाधा बन सकती हैं। एक आम धारणा यह है कि यह बीमारी केवल बुजुर्गों को होती है, लेकिन डॉक्टरों के अनुसार यह पूरी तरह सही नहीं है। हालांकि उम्र बढ़ने के साथ इसका जोखिम बढ़ जाता है, लेकिन युवाओं में भी इसके मामले देखे जा रहे हैं। शोध बताते हैं कि 50 वर्ष से कम उम्र के लगभग एक तिहाई मामलों में यह बीमारी पाई जा सकती है। खराब जीवनशैली, धूम्रपान, शराब का सेवन, आनुवांशिक कारण और पहले से मौजूद किडनी संबंधी बीमारियां इसके प्रमुख कारण हो सकते हैं।

    एक और आम मिथक यह है कि पेशाब में खून आना हमेशा किडनी कैंसर का संकेत होता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह लक्षण कई अन्य बीमारियों में भी दिख सकता है, जैसे यूटीआई या संक्रमण। हालांकि यदि कई दिनों तक पेशाब का रंग लाल, बरगंडी या गहरा दिखाई दे तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए और तुरंत चिकित्सकीय जांच करानी चाहिए।

    लिंग को लेकर भी एक गलत धारणा है कि महिलाओं में किडनी कैंसर का खतरा अधिक होता है, जबकि वास्तविकता इसके विपरीत है। पुरुषों में इसका जोखिम महिलाओं की तुलना में लगभग दोगुना पाया गया है। इसका एक कारण धूम्रपान और कार्यस्थल पर हानिकारक रसायनों के संपर्क में आना भी माना जाता है। हालांकि बार-बार होने वाले यूटीआई या संक्रमण से ग्रस्त महिलाओं को भी नियमित स्वास्थ्य जांच कराते रहना चाहिए।

    इसके अलावा यह भी एक मिथक है कि शराब का सेवन केवल लिवर को नुकसान पहुंचाता है, किडनी को नहीं। डॉक्टरों के अनुसार शराब और धूम्रपान दोनों ही किडनी कैंसर के प्रमुख जोखिम कारकों में शामिल हैं। ये आदतें शरीर की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाकर कैंसर के विकास की संभावना को बढ़ा देती हैं। अनुमान के अनुसार, इन आदतों के कारण पुरुषों में लगभग 30 प्रतिशत और महिलाओं में लगभग 25 प्रतिशत किडनी कैंसर के मामले जुड़े हो सकते हैं।

    विशेषज्ञों का कहना है कि किडनी कैंसर से बचाव के लिए जागरूकता सबसे महत्वपूर्ण कदम है। स्वस्थ जीवनशैली, धूम्रपान और शराब से दूरी, नियमित स्वास्थ्य जांच और शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज न करना इस बीमारी के जोखिम को काफी हद तक कम कर सकता है। सही समय पर पहचान और इलाज से इस गंभीर बीमारी पर नियंत्रण पाया जा सकता है।