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  • दिल की बीमारी अब महिलाओं के लिए भी बड़ा खतरा, हल्के संकेतों को न करें नजरअंदाज

    दिल की बीमारी अब महिलाओं के लिए भी बड़ा खतरा, हल्के संकेतों को न करें नजरअंदाज

    नई दिल्ली।
    दिल की बीमारी को लंबे समय तक पुरुषों से जुड़ी समस्या माना जाता रहा है, लेकिन बदलती जीवनशैली और स्वास्थ्य पैटर्न ने इस धारणा को पूरी तरह बदल दिया है। आज यह बीमारी महिलाओं के लिए भी उतनी ही गंभीर बन चुकी है, जितनी पुरुषों के लिए होती है। चिंता की बात यह है कि महिलाओं में इसके लक्षण कई बार अलग और कम स्पष्ट होते हैं, जिसके कारण बीमारी की पहचान देर से होती है और इलाज में देरी जानलेवा साबित हो सकती है।

    चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार महिलाओं में हार्ट डिजीज के संकेत अक्सर सामान्य थकान, गैस, तनाव या शरीर दर्द समझकर नजरअंदाज कर दिए जाते हैं। सांस फूलना, असामान्य थकान, मतली, पीठ या जबड़े में दर्द जैसे लक्षण कई बार गंभीर हृदय समस्या का संकेत होते हैं, लेकिन इन्हें आम परेशानी मान लिया जाता है। यही कारण है कि महिलाओं में हार्ट अटैक या अन्य जटिलताओं का खतरा बढ़ जाता है।

    एक बड़ी वजह यह भी है कि अब तक हृदय रोगों पर हुए अधिकांश शोध पुरुषों पर केंद्रित रहे हैं, जिससे महिलाओं के लक्षणों और उनके अलग पैटर्न को उतनी गहराई से नहीं समझा गया। परिणामस्वरूप, डायग्नोसिस और उपचार की प्रक्रिया में कई बार असमानता देखने को मिलती है।

    विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि महिलाओं और पुरुषों के हृदय की कार्यप्रणाली में कुछ जैविक अंतर हो सकते हैं, जो लक्षणों और जोखिम को प्रभावित करते हैं। हालांकि इस क्षेत्र में शोध अभी जारी है, लेकिन यह स्पष्ट है कि हर व्यक्ति के लिए एक जैसा इलाज या एक जैसा डायग्नोस्टिक तरीका हमेशा प्रभावी नहीं होता।

    आज की तेज रफ्तार और तनावपूर्ण जीवनशैली भी हृदय रोगों के बढ़ते मामलों का एक बड़ा कारण बन रही है। अनियमित खानपान, कम शारीरिक गतिविधि, धूम्रपान, नींद की कमी और लगातार तनाव दिल की सेहत पर सीधा असर डालते हैं। महिलाओं में घरेलू और पेशेवर जिम्मेदारियों के बीच बढ़ता तनाव भी जोखिम को और बढ़ा देता है।

    कुछ विशेष परिस्थितियां जैसे गर्भावस्था से जुड़ी जटिलताएं या ऑटोइम्यून बीमारियां भी महिलाओं में हृदय रोग का खतरा बढ़ा सकती हैं, लेकिन अक्सर इन स्थितियों के बाद हृदय स्वास्थ्य की नियमित जांच को नजरअंदाज कर दिया जाता है।

    डॉक्टरों का कहना है कि इस बीमारी से बचाव संभव है, लेकिन इसके लिए जीवनशैली में बदलाव बेहद जरूरी है। संतुलित आहार जिसमें फल, सब्जियां और साबुत अनाज शामिल हों, हृदय को स्वस्थ रखने में मदद करता है। इसके साथ ही नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद और तनाव नियंत्रण भी बेहद महत्वपूर्ण हैं।

    सबसे जरूरी बात यह है कि महिलाओं को अपने शरीर के संकेतों को गंभीरता से समझना चाहिए। छोटे-छोटे लक्षणों को नजरअंदाज करने के बजाय समय पर जांच कराना जीवन बचा सकता है। नियमित स्वास्थ्य जांच से बीमारी का शुरुआती चरण में पता लगाया जा सकता है और गंभीर स्थिति से बचाव संभव है।

  • कोलेस्ट्रॉल 2026: नई गाइडलाइन, LDL टारगेट और जरूरी लाइफस्टाइल बदलाव

    कोलेस्ट्रॉल 2026: नई गाइडलाइन, LDL टारगेट और जरूरी लाइफस्टाइल बदलाव


    नई दिल्ली । अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन और अमेरिकन कॉलेज ऑफ कार्डियोलॉजी ने कोलेस्ट्रॉल पर नई गाइडलाइन जारी की है यह अपडेट इसलिए बेहद अहम है क्योंकि इसने पिछले आठ साल के पुराने पैरामीटर्स को पूरी तरह बदल दिया है वर्ल्ड हेल्थ फेडरेशन (WHF) के मुताबिक दुनियाभर में हर साल सबसे ज्यादा मौतें कार्डियोवस्कुलर डिजीज (CVD) के कारण होती हैं और 2 करोड़ से ज्यादा लोग हर साल इसी वजह से जीवन गंवा देते हैं

    कोलेस्ट्रॉल एक प्रकार का फैट यानी लिपिड है जो ब्लड में पाया जाता है यह दो तरह का होता है LDL जिसे बैड कोलेस्ट्रॉल कहा जाता है और HDL जिसे गुड कोलेस्ट्रॉल कहा जाता है यह शरीर के लिए जरूरी है क्योंकि यह बॉडी सेल्स की वॉल्स बनाने में मदद करता है कुछ हॉर्मोन्स बनाने और विटामिन D उत्पादन में सहायक होता है साथ ही बाइल जूस बनाने में भी मदद करता है HDL हार्ट को हेल्दी रखने में अहम भूमिका निभाता है

    नई गाइडलाइन में स्क्रीनिंग, रिस्क एसेसमेंट और लाइफस्टाइल पर जोर दिया गया है पुरानी गाइडलाइन में LDL 130 mg/dL से कम रखने की सलाह दी जाती थी लेकिन अब इसे पर्सनलाइज्ड करके तीन कैटेगरी में बांट दिया गया है जिनको हार्ट डिजीज का हाई रिस्क है उनके लिए LDL 55 mg/dL से कम, मीडियम रिस्क वालों के लिए 70 mg/dL से कम और जो लोग हार्ट डिजीज से प्रभावित नहीं हैं उनके लिए 100 mg/dL से कम रखने की सलाह दी गई है इसका मतलब है कि अब ‘नॉर्मल’ की कोई तय सीमा नहीं है बल्कि यह व्यक्ति के रिस्क लेवल पर निर्भर करता है

    नई गाइडलाइन में रिस्क कैलकुलेशन भी व्यापक बना दिया गया है क्योंकि अब कम उम्र में भी हाई कोलेस्ट्रॉल का खतरा बढ़ रहा है इसके पीछे फैमिली हिस्ट्री और खराब लाइफस्टाइल मुख्य कारण हैं फैमिलियल हाइपरकोलेस्ट्रोलेमिया जैसी जेनेटिक कंडीशन के कारण बचपन से LDL बढ़ सकता है वहीं जंकफूड, कम एक्सरसाइज और मोटापा भी इसे बढ़ाते हैं इसलिए अब बच्चों की स्क्रीनिंग 9 साल की उम्र से करने की सलाह दी गई है

    हाई कोलेस्ट्रॉल हार्ट, ब्रेन और किडनी पर गंभीर असर डालता है यह आर्टरीज में प्लाक बनाकर ब्लड फ्लो कम करता है जिससे हार्ट अटैक का खतरा बढ़ता है ब्लड क्लॉट्स ब्रेन में स्ट्रोक और मेमोरी इम्पेयरमेंट का कारण बन सकते हैं वहीं किडनी की ब्लड वेसल्स को नुकसान पहुंचाकर क्रॉनिक किडनी डिजीज का रिस्क बढ़ाते हैं

    लाइफस्टाइल फैक्टर्स में अनहेल्दी डाइट, ट्रांस और सैचुरेटेड फैट, सिडेंटरी लाइफ, मोटापा, स्मोकिंग, पर्याप्त नींद न लेना, देर रात खाने की आदत और स्ट्रेस शामिल हैं ये सभी LDL बढ़ाने में मदद करते हैं

    अगर कोलेस्ट्रॉल ज्यादा आए तो सबसे पहले डॉक्टर से सलाह लें LDL लेवल के हिसाब से टारगेट तय करें और हार्ट-हेल्दी डाइट, नियमित कार्डियो एक्सरसाइज, वेट कंट्रोल, शराब-सिगरेट से परहेज, पर्याप्त नींद और स्ट्रेस मैनेजमेंट अपनाएं जरूरत पड़ने पर स्टेटिन जैसी दवाइयां लें और फॉलो-अप टेस्ट समय-समय पर करवाएं

    नई गाइडलाइन के अनुसार बैलेंस्ड डाइट, एक्टिव लाइफ और अच्छी आदतें HDL और LDL को संतुलित करके हृदय, ब्रेन और किडनी की सुरक्षा करती हैं इसलिए कोलेस्ट्रॉल पर ध्यान रखना अब हर उम्र में जरूरी हो गया है