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  • जाति जनगणना पर कांग्रेस के सामने नई चुनौती, सिद्धारमैया ने कर्नाटक में 75% आरक्षण लागू करने की मांग उठाई

    जाति जनगणना पर कांग्रेस के सामने नई चुनौती, सिद्धारमैया ने कर्नाटक में 75% आरक्षण लागू करने की मांग उठाई


    नई दिल्ली ।
    कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने राज्य के जातिगत सर्वे के निष्कर्ष लागू करने की मांग की है। साथ ही उन्होंने दलितों, पिछड़े समुदायों और अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण बढ़ाकर 75 प्रतिशत करने की बात कही है। उनकी इस मांग ने कर्नाटक की कांग्रेस सरकार के सामने नई राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है।

    कांग्रेस देशभर में जातिगत जनगणना के मुद्दे को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साध रही है। पार्टी का तर्क है कि प्रतिनिधित्व, आरक्षण और संसाधनों के बंटवारे से जुड़े फैसलों के लिए अलग-अलग समुदायों की वास्तविक संख्या का पता होना जरूरी है।

    लेकिन कर्नाटक में कांग्रेस के सामने एक अलग ही सवाल खड़ा हो गया है। राज्य में जातिगत सर्वे पहले ही हो चुका है और उसकी नई रिपोर्ट नवंबर 2025 से तैयार है। ऐसे में सिद्धारमैया अब अपनी ही पार्टी की सरकार पर इस रिपोर्ट को लागू करने का दबाव बना रहे हैं।

    बेंगलुरु में 6 सितंबर को कर्नाटक स्टेट बैकवर्ड कास्ट्स फेडरेशन के सिल्वर जुबली कार्यक्रम में सिद्धारमैया ने जातिगत सर्वे लागू करने की मांग की। उन्होंने कहा कि अगर सभी को सामाजिक न्याय देना है तो कम से कम 75 प्रतिशत आरक्षण होना चाहिए।

    सिद्धारमैया का कहना है कि आरक्षण अलग-अलग समुदायों की आबादी के अनुपात में होना चाहिए। उन्होंने केवल सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण की बात नहीं की। उनका तर्क है कि सामाजिक और राजनीतिक समानता के लिए लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में भी प्रतिनिधित्व जाति और आबादी के अनुरूप होना चाहिए।

    कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर जातिगत जनगणना को सामाजिक न्याय और समानुपातिक प्रतिनिधित्व से जोड़ रही है। पार्टी का कहना है कि विश्वसनीय जातिगत आंकड़ों के बिना सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व से जुड़े दावे अनुमानों पर आधारित रहेंगे। लेकिन कर्नाटक में स्थिति अलग है। यहां कांग्रेस सरकार के पास पहले से ही जातिगत सर्वे की रिपोर्ट मौजूद है।

    यही वजह है कि सिद्धारमैया की मांग कांग्रेस के लिए असहज स्थिति पैदा कर रही है। अगर जातिगत आंकड़े सामने आने के बाद आरक्षण और प्रतिनिधित्व में बदलाव की मांग उठती है, तो राज्य में मौजूदा सामाजिक और राजनीतिक समीकरण प्रभावित हो सकते हैं।

    कर्नाटक में जातिगत सर्वे की शुरुआत सिद्धारमैया के मुख्यमंत्री रहते उनके पिछले कार्यकाल में हुई थी। 2015 में एच. कंठराज के नेतृत्व में यह सर्वे कराया गया और 2017 तक पूरा हो गया था। हालांकि, इसकी रिपोर्ट कभी राजनीतिक रूप से लागू नहीं हो सकी। राज्य के प्रभावशाली लिंगायत और वोक्कालिगा समुदायों की ओर से आपत्तियां सामने आई थीं।

    इसके बाद जेडीएस-कांग्रेस और बीजेपी की सरकारों ने भी इसे बड़े नीतिगत फैसले के आधार के तौर पर आगे बढ़ाने से परहेज किया। 2023 में सिद्धारमैया के दोबारा मुख्यमंत्री बनने के बाद यह मुद्दा फिर चर्चा में आया। 2025 में उनकी सरकार ने पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट को स्वीकार करने की दिशा में कदम बढ़ाया, लेकिन इसके साथ आंकड़ों की विश्वसनीयता और उनकी पुरानापन को लेकर सवाल भी उठे।

    इसके बाद सिद्धारमैया ने नए सिरे से जातिगत सर्वे का आदेश दिया। नई कवायद का उद्देश्य ज्यादा मौजूदा आंकड़े तैयार करना और व्यापक राजनीतिक सहमति बनाने के तौर पर भी देखा गया।

    मई में मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद सिद्धारमैया ने चुनावी राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा की है। इसके बावजूद जातिगत जनगणना और समानुपातिक आरक्षण का मुद्दा उठाकर उन्होंने कर्नाटक की मौजूदा कांग्रेस सरकार पर दबाव बढ़ा दिया है। डीके शिवकुमार के नेतृत्व वाली सरकार के लिए सिद्धारमैया की मांग को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। ऐसा करने पर कांग्रेस पर यह सवाल उठ सकता है कि वह बीजेपी के खिलाफ जातिगत न्याय की बात तो करती है, लेकिन अपने शासन वाले राज्य में उसी सिद्धांत को लागू करने से पीछे क्यों हट रही है।

    दूसरी ओर, सर्वे के निष्कर्ष लागू करने की अपनी राजनीतिक कीमत भी हो सकती है। कर्नाटक में कई प्रभावशाली समुदाय आरक्षण, प्रतिनिधित्व और राज्य के संसाधनों को लेकर अलग-अलग दावे रखते हैं। ऐसे में जातिगत आंकड़ों के आधार पर बदलाव करने से कुछ समुदायों को फायदा और कुछ को नुकसान हो सकता है।

    कांग्रेस 2027 की जनगणना में जातियों की गणना को लेकर केंद्र सरकार पर लगातार सवाल उठा रही है। पार्टी ने ओबीसी की संख्या दर्ज किए जाने को लेकर भी केंद्र पर निशाना साधा है और जनगणना के प्रश्नपत्र में ओबीसी श्रेणी को कथित तौर पर शामिल नहीं किए जाने को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं।

    2027 की जनगणना में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अलावा अन्य जातियों की भी राष्ट्रीय स्तर पर गणना की जाएगी। आजादी के बाद यह पहली बार होगा जब इस तरह जातियों की गणना राष्ट्रीय स्तर पर की जाएगी। लेकिन कर्नाटक में कांग्रेस के सामने 2027 तक इंतजार करने की जरूरत नहीं है। राज्य में पहले ही जातिगत सर्वे हो चुका है और नई रिपोर्ट भी तैयार है। यही स्थिति कांग्रेस के लिए असली परीक्षा बन गई है।

  • जनगणना 2027 में जाति के सवाल पर गिरिराज सिंह का राहुल गांधी पर हमला, बोले अपनी जाति बतानी पड़ेगी

    जनगणना 2027 में जाति के सवाल पर गिरिराज सिंह का राहुल गांधी पर हमला, बोले अपनी जाति बतानी पड़ेगी

    नई दिल्ली । केंद्र सरकार ने आगामी जनगणना 2027 के लिए सवालों की सूची जारी कर दी है। इस बार जनगणना में जाति से जुड़ी जानकारी भी दर्ज की जाएगी। इसी मुद्दे को लेकर केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा कि अब उन्हें भी अपनी जाति बतानी पड़ेगी। उनके इस बयान के बाद जाति जनगणना का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है।

    गिरिराज सिंह ने कहा कि जनगणना में जब जाति से संबंधित जानकारी मांगी जाएगी तो राहुल गांधी को भी अपनी जाति बतानी होगी। उन्होंने राहुल गांधी पर राजनीतिक टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि उन्हें अपनी जाति के बारे में जवाब देना पड़ा तो उनके लिए स्थिति अलग हो सकती है। केंद्रीय मंत्री ने इस दौरान राहुल गांधी के राजनीतिक रुख पर भी सवाल उठाए।

    जनगणना 2027 के लिए जारी किए गए प्रश्नों में जाति से संबंधित सवाल को विशेष रूप से शामिल किया गया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार जाति संबंधी प्रश्न सूची में 10वें स्थान पर है। इसमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के साथ जाति की जानकारी का विकल्प भी जोड़ा गया है। यह बदलाव सामाजिक संरचना से जुड़ा विस्तृत आंकड़ा तैयार करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    आजादी के बाद होने वाली जनगणनाओं के संदर्भ में यह प्रक्रिया इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इस बार सभी समुदायों की जाति संबंधी जानकारी दर्ज किए जाने की व्यवस्था की गई है। वर्ष 2011 की जनगणना के फॉर्म में जाति से जुड़े सवाल के तहत मुख्य रूप से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से संबंधित जानकारी दर्ज की जाती थी।

    नई जनगणना में केवल जाति तक सीमित जानकारी नहीं ली जाएगी। व्यक्ति का नाम, परिवार के मुखिया से संबंध, वैवाहिक स्थिति, विवाह के समय उम्र, पति या पत्नी का नाम, राष्ट्रीयता और धर्म जैसे विषयों से संबंधित जानकारी भी दर्ज की जाएगी। इसके साथ माता-पिता से जुड़ी जानकारी भी जनगणना प्रक्रिया का हिस्सा होगी।

    शिक्षा और डिजिटल साक्षरता को लेकर भी सवाल पूछे जाने हैं। व्यक्ति किसी शैक्षणिक संस्थान में पढ़ रहा है या नहीं, उसकी उच्चतम शैक्षणिक योग्यता क्या है और संबंधित अध्ययन क्षेत्र कौन सा है, जैसी जानकारियां दर्ज की जाएंगी। इससे देश की शिक्षा व्यवस्था और मानव संसाधन से जुड़े आंकड़ों को बेहतर तरीके से समझने में मदद मिल सकती है।

    जनगणना में लोगों की आर्थिक गतिविधियों से जुड़ी जानकारी भी जुटाई जाएगी। व्यक्ति ने पिछले एक वर्ष में काम किया है या नहीं, उसका व्यवसाय क्या है और वह किस क्षेत्र में कार्य करता है, जैसे प्रश्न शामिल किए गए हैं। कामगार की श्रेणी और काम से जुड़ी अन्य गतिविधियों के बारे में भी जानकारी ली जाएगी।

    इसके अलावा काम की तलाश, काम करने की उपलब्धता और कार्यस्थल तक आने जाने से जुड़े विवरण भी दर्ज किए जाएंगे। जनगणना के दौरान मोबाइल नंबर, आधार, मतदाता पहचान पत्र और बैंक खाते से संबंधित सवालों को भी शामिल किए जाने की जानकारी सामने आई है।

    जाति जनगणना को लेकर केंद्र और विपक्ष के बीच पहले से राजनीतिक मतभेद रहे हैं। कांग्रेस समेत कई विपक्षी दल लंबे समय से जातिगत आंकड़े सार्वजनिक करने की मांग करते रहे हैं। ऐसे में जनगणना 2027 में जाति संबंधी जानकारी शामिल किए जाने का निर्णय राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

  • जनगणना 2027 में जाति और कोविड टीकाकरण की जानकारी भी होगी दर्ज, डिजिटल प्रक्रिया के तहत जुटाए जाएंगे 40 सवालों के जवाब

    जनगणना 2027 में जाति और कोविड टीकाकरण की जानकारी भी होगी दर्ज, डिजिटल प्रक्रिया के तहत जुटाए जाएंगे 40 सवालों के जवाब

    नई दिल्ली । देश में जनगणना 2027 की प्रक्रिया का दूसरा चरण 17 अगस्त से शुरू होने जा रहा है। इस चरण में पहली बार आजादी के बाद देशव्यापी स्तर पर जातिगत आंकड़े जुटाए जाएंगे। केंद्र सरकार ने जनगणना के लिए पूछे जाने वाले 40 सवालों की सूची अधिसूचित कर दी है। नागरिकों से उनकी सामाजिक, जनसांख्यिकीय और आर्थिक स्थिति से जुड़ी विभिन्न जानकारियां दर्ज की जाएंगी।

    जनगणना 2027 देश की 16वीं जनगणना होगी, जबकि स्वतंत्रता के बाद यह आठवीं जनगणना के रूप में आयोजित की जा रही है। इस बार की जनगणना कई मायनों में महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि इसमें जाति से संबंधित जानकारी भी आधिकारिक तौर पर दर्ज की जाएगी। इससे देश में विभिन्न सामाजिक समूहों की जनसंख्या से जुड़े आंकड़े सामने आने की संभावना है।

    निर्धारित 40 सवालों में नागरिकों से जाति, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से संबंधित जानकारी मांगी जाएगी। इसके अलावा कोविड-19 टीकाकरण से जुड़ी जानकारी भी दर्ज की जाएगी। जनगणना के दौरान प्रत्येक परिवार और व्यक्ति से निर्धारित प्रश्नों के आधार पर जानकारी एकत्र की जाएगी।

    जनगणना दो चरणों में पूरी की जा रही है। पहले चरण में मकानों और आवास से संबंधित विवरण जुटाने की प्रक्रिया रखी गई है। दूसरे चरण में प्रत्येक नागरिक की जनसांख्यिकीय और सामाजिक-आर्थिक जानकारी दर्ज की जाएगी। इसी दूसरे चरण में जातिगत आंकड़ों को भी शामिल किया गया है।

    इस बार जनगणना को डिजिटल तरीके से संचालित किया जा रहा है। मोबाइल उपकरणों के माध्यम से आंकड़े दर्ज करने के साथ नागरिकों को स्वयं अपनी जानकारी ऑनलाइन उपलब्ध कराने की सुविधा भी दी गई है। इससे कागजी प्रक्रिया पर निर्भरता कम करने और आंकड़ों को डिजिटल रूप में संग्रहित करने में मदद मिलेगी।

    पर्वतीय और दुर्गम क्षेत्रों के लिए जनगणना का कार्यक्रम अलग रखा गया है। जम्मू-कश्मीर, लद्दाख तथा हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के बर्फीले एवं असमान क्षेत्रों में जनगणना का दूसरा चरण 1 सितंबर से 30 सितंबर तक चलेगा। इन क्षेत्रों में मौसम और भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए समयसीमा अलग निर्धारित की गई है।

    इन क्षेत्रों में रहने वाले नागरिकों को 17 अगस्त से 31 अगस्त तक स्वयं ऑनलाइन जानकारी दर्ज करने की सुविधा उपलब्ध रहेगी। वहीं देश के अन्य हिस्सों में जनसंख्या की गणना फरवरी 2027 में की जाएगी। इस तरह अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप जनगणना का कार्यक्रम निर्धारित किया गया है।

    जनगणना 2027 की प्रक्रिया में जातिगत जानकारी शामिल किए जाने को सामाजिक और प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इससे सरकार के पास विभिन्न सामाजिक वर्गों की जनसंख्या से संबंधित अधिक विस्तृत आधिकारिक आंकड़े उपलब्ध हो सकेंगे। इन आंकड़ों का उपयोग भविष्य में नीतियों और योजनाओं के निर्माण में किया जा सकता है।

    यह जनगणना मूल रूप से वर्ष 2021 में प्रस्तावित थी, लेकिन कोविड-19 महामारी के कारण इसकी प्रक्रिया निर्धारित समय पर शुरू नहीं हो सकी। अब कई वर्षों की देरी के बाद जनगणना की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। डिजिटल व्यवस्था, ऑनलाइन स्व-पंजीकरण और पहली बार जातिगत आंकड़ों का समावेश इस जनगणना को पिछली जनगणनाओं से अलग बनाता है।

  • जनगणना 2027 का दूसरा चरण 17 अगस्त से….. जाति के साथ देनी होगी ये जानकारियां

    जनगणना 2027 का दूसरा चरण 17 अगस्त से….. जाति के साथ देनी होगी ये जानकारियां


    नई दिल्ली।
    साल 2027 की जनगणना (Census) का दूसरा चरण (Second phase) 17 अगस्त (August 17) से शुरू होगा। इस जनगणना (Census) में 1931 के बाद पहली बार लोगों की जाति भी दर्ज की जाएगी। इसके अलावा, इसकी भी संभावना है कि लोगों के माता-पिता की जन्म तिथि (Parents’ date of birth) और जन्म स्थान की जानकारी भी दर्ज की जाए। जनगणना के दौरान जिन लोगों के पास पासपोर्ट होगा, उनका पासपोर्ट नंबर भी लिया जा सकता है। आधार नंबर केवल स्वेच्छा से दिया जा जा सकेगा।


    कहां और कब से शुरू होगा दूसरा चरण?

    गृह मंत्रालय ने सोमवार को एक अधिसूचना जारी की। इसमें मंत्रालय ने बताया कि लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के बर्फीले इलाके में जनगणना का दूसरा चरण 1 सितंबर से 30 सितंबर तक चलेगा। इससे पहले 17 अगस्त से 30 अगस्त तक लोग खुद भी अपनी जानकारी ऑनलाइन भर सकेंगे। इसका मतलब है कि जनगणना के दूसरे चरण की प्रश्नावली भी जल्द जारी की जाएगी।


    जाति कैसे दर्ज की जाएगी?

    सूत्रों के अनुसार, जाति वही दर्ज की जाएगी जो व्यक्ति खुद बताएगा। अनुसूचित जाति (एसटी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए सूची (ड्रॉप-डाउन मेन्यू) होगी, जबकि ‘जाति’ वाला अलग कॉलम केवल उन लोगों के लिए होगा जो एससी या एसटी श्रेणी में नहीं आते।


    क्या जाति का प्रमाण पत्र दिखाना होगा?

    ड्रॉप-डाउन मेन्यू में केवल उसी राज्य की एससी और एसटी की सूची दिखाई जाएगी, जहां व्यक्ति को जनगणना हो रही होगी। व्यक्ति अपनी जाति का जो नाम बताएगा, उसे उसी तरह लिखा जाएगा। अपनी एससी, एसटी या अन्य जाति साबित करने के लिए किसी भी तरह का दस्तावेज या जाति प्रमाण पत्र दिखाने की जरूरत नहीं होगी।


    45 हजार जातियों का डाटा कैसे संभाला जाएगा?

    एक अधिकारी ने बताया कि 2011 की सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना में लोगों ने खुद अपनी जाति बताई थी। इससे 45 हजार से अधिक अलग-अलग जातियों के नाम सामने आए थे। इतने बड़े आंकड़ों का सही उपयोग करना मुश्किल हो गया था। लेकिन इस बार डिजिटल तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की मदद से इन आंकड़ों को व्यवस्थित करना और अलग-अलग श्रेणियों में बांटना आसान होगा।


    माता-पिता के जन्म की जानकारी क्यों ली जाएगी?

    दूसरे चरण में पहली बार लोगों के माता-पिता की जन्म तिथि और जन्म स्थान की जानकारी भी ली जाएगी। ये दोनों बातें नागरिकता तय करने में अहम मानी जाती हैं। 2011 की जनगणना के साथ राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) का काम भी किया गया था। इसे 2021 की जनगणना के साथ फिर से किया जाना था, लेकिन बाद में इसे टाल दिया गया। अब इसे 2027 की जनगणना से अलग कर दिया गया है। वर्ष 2010 में एनपीआर के दौरान लोगों से उनकी राष्ट्रीयता के बारे में भी जानकारी ली गई थी। लेकिन यह भी साफ कहा गया था कि इससे किसी को नागरिकता का अधिकार नहीं मिलेगा।


    क्या कोई दस्तावेज देना होगा?

    सूत्रों के अनुसार, लोगों से उनके माता-पिता की जन्म तिथि या जन्म स्थान का कोई प्रमाण नहीं मांगा जाएगा। जो जानकारी व्यक्ति को जितनी सही पता होगी, उसी के आधार पर दर्ज की जाएगी। अगर किसी को अपने माता-पिता की पूरी जन्म तिथि नहीं पता है और केवल जन्म का साल पता है, तो उस साल की 1 जनवरी को जन्म तिथि मानकर दर्ज किया जाएगा।