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  • CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ INDIA गठबंधन का आंदोलन तेज, सोमवार को मुख्य न्यायाधीश से मुलाकात और दिल्ली में विरोध मार्च का ऐलान

    CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ INDIA गठबंधन का आंदोलन तेज, सोमवार को मुख्य न्यायाधीश से मुलाकात और दिल्ली में विरोध मार्च का ऐलान

    नई दिल्ली ।मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जारी राजनीतिक विवाद के बीच INDIA गठबंधन ने अपने विरोध को आगे बढ़ाने की घोषणा की है। विपक्षी दलों ने सोमवार को देश के मुख्य न्यायाधीश से मुलाकात करने और दिल्ली में विरोध मार्च निकालने की योजना बनाई है। इस दौरान चुनाव आयोग के फैसलों, मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर और लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़े मुद्दे उठाए जाने की बात कही गई है। मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर चल रहा विवाद अब राजनीतिक विरोध के साथ न्यायपालिका तक पहुंचाने की तैयारी में है।

    राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात कर ज्ञापन सौंपने के बाद विपक्ष ने मुख्य न्यायाधीश से मिलने का फैसला किया है। इसके लिए विपक्षी दलों का एक प्रतिनिधिमंडल उनसे मुलाकात करेगा। इस बैठक में चुनाव आयोग के हालिया फैसलों, प्रशासनिक पाबंदियों और नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों से संबंधित चिंताओं को सामने रखने की योजना है। गठबंधन का उद्देश्य इन मुद्दों को न्यायपालिका के समक्ष प्रस्तुत करना है। हालांकि, प्रस्तावित मुलाकात के दौरान किन बिंदुओं पर चर्चा होगी, इसकी विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई है।

    विपक्षी गठबंधन ने सोमवार को दिल्ली में बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन और मार्च निकालने का भी ऐलान किया है। यह आंदोलन मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ जारी विरोध और चुनावी प्रक्रिया को लेकर उठाए जा रहे सवालों के बीच आयोजित किया जाएगा। विपक्षी दल चुनावी पारदर्शिता, निष्पक्षता और संविधान की रक्षा से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाना चाहते हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इस प्रदर्शन में विभिन्न विपक्षी नेता और युवा भी शामिल हो सकते हैं। राजधानी में प्रस्तावित मार्च को लेकर सुरक्षा व्यवस्था के बीच राजनीतिक गतिविधियां तेज होने की संभावना है।

    इससे पहले INDIA गठबंधन के सांसदों और नेताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की मांग के साथ संसद भवन से निर्वाचन आयोग के मुख्यालय तक मार्च निकाला था। इस विरोध प्रदर्शन में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाद्रा समेत कई नेता शामिल हुए थे। मार्च के दौरान पुलिस ने बैरिकेडिंग की थी और कुछ नेताओं को हिरासत में लिया गया था। इसके बाद विपक्षी नेताओं ने महात्मा गांधी की समाधि राजघाट पर धरना दिया। विपक्ष ने इस दौरान चुनावी व्यवस्था से संबंधित अपनी मांगों को लेकर विरोध दर्ज कराया था।

    इसके बाद विपक्षी प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात कर मामले में हस्तक्षेप की मांग की थी। अब मुख्य न्यायाधीश से प्रस्तावित मुलाकात को इसी राजनीतिक अभियान के अगले कदम के तौर पर देखा जा रहा है। गठबंधन चुनाव आयोग के फैसलों और मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर अपनी आपत्तियां सामने रखना चाहता है। मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग भी इस विरोध का प्रमुख हिस्सा बनी हुई है।

    कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने इस मुद्दे पर सरकार और चुनाव आयोग के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है। उनका कहना है कि यह संघर्ष केवल किसी एक पद या व्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि संविधान और लोकतंत्र की रक्षा से जुड़ा है। उन्होंने कहा है कि प्रशासनिक दबाव या पुलिस कार्रवाई से विपक्ष की आवाज को दबाया नहीं जा सकता। राहुल गांधी ने चुनावी व्यवस्था में पारदर्शिता बहाल होने तक संघर्ष जारी रखने की बात कही है। सोमवार को प्रस्तावित मुलाकात और मार्च के जरिए INDIA गठबंधन इस मुद्दे पर अपना विरोध आगे बढ़ाने की तैयारी में है।

  • CEC विवाद पर NDA नेताओं का विपक्ष पर हमला, बोले आंदोलन लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन अराजकता फैलाने की अनुमति किसी को नहीं

    CEC विवाद पर NDA नेताओं का विपक्ष पर हमला, बोले आंदोलन लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन अराजकता फैलाने की अनुमति किसी को नहीं

    नई दिल्ली ।मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) से जुड़े विवाद और विपक्षी गठबंधन इंडिया तथा CJP के विरोध प्रदर्शन को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के नेताओं ने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि लोकतंत्र में आंदोलन करना सभी का अधिकार है, लेकिन इसके नाम पर अराजकता फैलाना उचित नहीं है। नेताओं ने चुनाव आयोग पर लगाए जा रहे आरोपों के समर्थन में साक्ष्य प्रस्तुत करने की जरूरत पर भी जोर दिया। इस मुद्दे पर भाजपा, जनता दल यूनाइटेड और बिहार सरकार के नेताओं ने अलग-अलग बयान देते हुए विपक्ष की रणनीति पर सवाल उठाए।

    भाजपा नेता मृत्युंजय तिवारी ने कहा कि भारतीय संविधान सभी को आंदोलन करने का अधिकार देता है, लेकिन किसी को भी अराजक स्थिति पैदा करने की अनुमति नहीं है। उन्होंने कहा कि आंदोलन का अर्थ अराजकता नहीं हो सकता। उन्होंने छात्रों से अपील की कि वे किसी के दबाव में न आएं और न ही किसी के बहकावे में आकर कदम उठाएं। तिवारी ने विपक्ष पर आरोप लगाया कि पेपर लीक की घटनाओं के बाद दो से तीन महीने के भीतर उसने नया राजनीतिक एजेंडा सामने रख दिया और अब चुनाव आयोग पर सवाल उठा रहा है। उनके अनुसार, इस तरह के आरोप लोकतंत्र और संविधान को बदनाम करने का प्रयास हैं।

    मृत्युंजय तिवारी ने विपक्ष के विरोध प्रदर्शन को लेकर यह आरोप भी लगाया कि कुछ राजनीतिक समूह विदेशी शक्तियों के इशारे पर काम कर रहे हैं। उन्होंने विपक्ष की गतिविधियों और उसके राजनीतिक उद्देश्यों पर सवाल उठाए। उनके बयान में आंदोलन के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के बीच अंतर पर जोर दिया गया। NDA नेताओं का कहना है कि विरोध प्रदर्शन शांतिपूर्ण तरीके से होना चाहिए और उसके जरिए अव्यवस्था पैदा करने की कोशिश नहीं की जानी चाहिए।

    जनता दल यूनाइटेड के नेता श्याम रजक ने कहा कि लोकतंत्र में आंदोलन करना गलत नहीं है। यदि किसी व्यक्ति या संगठन को विरोध दर्ज कराना है, तो वह लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन कर सकता है। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी आंदोलन के अधिकार का समर्थन करती है, लेकिन प्रशासन की भी जिम्मेदारी है कि प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा व्यवस्था बनी रहे। रजक के मुताबिक, सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए प्रशासन को कई तरह के फैसले लेने पड़ते हैं और दिल्ली में उठाए गए कदमों को इसी प्रशासनिक दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए।

    राष्ट्रपति के समक्ष इंडिया गठबंधन की ओर से मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग के बारे में रजक ने कहा कि राष्ट्रपति ने साक्ष्य मांगे हैं और सुप्रीम कोर्ट भी प्रमाणों की अपेक्षा कर रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष के पास अपने दावों के समर्थन में पर्याप्त साक्ष्य नहीं हैं और वह बिना प्रमाण के बातें कर रहा है। रजक ने कहा कि केवल आरोप लगाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें साबित करने के लिए साक्ष्य प्रस्तुत करना जरूरी है। उन्होंने विपक्ष पर जनता को भ्रमित करके सत्ता हासिल करने और परिवारवाद तथा भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने की कोशिश करने का आरोप भी लगाया। उनके अनुसार, जनता ऐसे राजनीतिक प्रयासों को पहले ही खारिज कर चुकी है।

    बिहार सरकार के मंत्री श्रवण कुमार ने राहुल गांधी के उस बयान पर प्रतिक्रिया दी, जिसमें उन्होंने वोट चोरी से जुड़े सबूत जमा करने की बात कही थी। श्रवण कुमार ने कहा कि राहुल गांधी कोई कागज जमा नहीं करेंगे। उन्होंने आरोप लगाया कि राहुल गांधी चुनाव से पहले बिहार सहित देश के विभिन्न हिस्सों में इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक अभियान चलाते हैं। मंत्री ने कहा कि जहां विपक्ष की सरकार बनती है, वहां वह वोट चोरी का आरोप नहीं लगाता, जबकि बिहार में NDA की सरकार बनने पर ऐसे आरोप लगाए जाते हैं। उन्होंने विपक्ष के इस रुख पर सवाल उठाते हुए चुनाव संबंधी दावों के समर्थन में प्रमाण पेश करने की जरूरत दोहराई। इस तरह CEC विवाद को लेकर NDA और विपक्ष के बीच राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं।

  • राष्ट्रपति से मुलाकात के लिए INDIA गठबंधन ने दो बार भेजा पत्र, 7 से 9 अक्टूबर का समय मांगा, अब तक जवाब नहीं

    राष्ट्रपति से मुलाकात के लिए INDIA गठबंधन ने दो बार भेजा पत्र, 7 से 9 अक्टूबर का समय मांगा, अब तक जवाब नहीं

    नई दिल्ली । INDIA गठबंधन के नेताओं ने भारत के राष्ट्रपति से मुलाकात करने का अनुरोध किया है। कांग्रेस के मुताबिक, इस संबंध में पहला अनुरोध पत्र 2 अक्टूबर को भेजा गया था। इसके बाद राष्ट्रपति कार्यालय की ओर से मुलाकात में शामिल होने वाले नेताओं के नाम मांगे गए थे। कांग्रेस का कहना है कि उसने 5 अक्टूबर को नेताओं के नाम के साथ दोबारा अनुरोध भेजा और 7, 8 या 9 अक्टूबर को मुलाकात के लिए समय मांगा, लेकिन अब तक कोई जवाब नहीं मिला है।

    कांग्रेस की ओर से कहा गया है कि विपक्षी नेता राष्ट्रपति से मुलाकात करना चाहते हैं और इस संबंध में आवश्यक प्रक्रिया पूरी की जा चुकी है। पार्टी के अनुसार, पहले पत्र के बाद राष्ट्रपति कार्यालय ने मुलाकात में शामिल होने वाले नेताओं की जानकारी मांगी थी। इसके बाद कांग्रेस ने 5 अक्टूबर को दोबारा पत्र भेजकर संबंधित नेताओं के नाम दिए और मुलाकात के लिए तीन तारीखों का विकल्प भी रखा।

    कांग्रेस का कहना है कि 7, 8 या 9 अक्टूबर में से किसी दिन मुलाकात का समय देने का अनुरोध किया गया था। हालांकि, 8 अक्टूबर तक राष्ट्रपति कार्यालय की ओर से कोई जवाब नहीं मिलने की बात कांग्रेस ने कही है। पार्टी की ओर से यह भी कहा गया है कि वह अगले दिन तक जवाब का इंतजार करेगी। ऐसे में INDIA गठबंधन के नेताओं की राष्ट्रपति से मुलाकात कब होगी, यह अभी स्पष्ट नहीं है।

    इसी बीच कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने विपक्षी सांसदों की दूसरी लंच बैठक बुलाई। यह बैठक कनॉट प्लेस में दोपहर करीब पौने दो बजे आयोजित हुई। बैठक में विपक्षी सांसदों के शामिल होने की जानकारी सामने आई है। इसके बाद सभी नेताओं के बस से राजघाट पहुंचने की संभावना भी जताई गई।

    बैठक के दौरान कांग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल ने केंद्र की बीजेपी सरकार, केंद्रीय मंत्री और चुनाव आयोग पर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि अराजकता कौन फैला रहा है, यह सवाल है। वेणुगोपाल ने आरोप लगाया कि भाजपा, अमित शाह, नरेंद्र मोदी और ज्ञानेश कुमार लोकतंत्र में अराजकता फैला रहे हैं। उन्होंने कहा कि विपक्ष यहां लोकतंत्र की रक्षा के लिए है और वही काम कर रहा है।

    केसी वेणुगोपाल ने इस लड़ाई को विपक्ष के लिए ‘करो या मरो’ की लड़ाई बताया। उन्होंने कहा कि उनका सीधा मकसद देश के आम लोगों और मतदाताओं की रक्षा करना है। उनके मुताबिक, विपक्ष इसी उद्देश्य के साथ काम कर रहा है और उसे लोकतंत्र की रक्षा के लिए अपनी कोशिश जारी रखनी है।

    इसी मामले से जुड़े घटनाक्रम के बीच नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया के कार्यकर्ता जनपथ पर जमा हुए। वहीं मल्लिकार्जुन खड़गे ने विपक्षी सांसदों की दूसरी लंच बैठक आयोजित की। विपक्षी नेताओं की गतिविधियों के बीच राष्ट्रपति से मुलाकात का मुद्दा भी सामने है। INDIA गठबंधन के नेताओं ने मुलाकात के लिए दो बार अनुरोध भेजा है, लेकिन कांग्रेस के मुताबिक अभी तक जवाब नहीं आया है।

    कांग्रेस की ओर से राष्ट्रपति से मुलाकात के लिए 7, 8 और 9 अक्टूबर की तारीखों में समय मांगा गया था। 8 अक्टूबर को भी जवाब नहीं मिलने के बाद अब विपक्षी नेता अगले दिन तक इंतजार करने की बात कह रहे हैं। ऐसे में राष्ट्रपति कार्यालय की ओर से मुलाकात के लिए कब समय दिया जाता है और INDIA गठबंधन के नेताओं की राष्ट्रपति से मुलाकात कब होती है, इस पर अब नजर बनी हुई है।

  • CEC विवाद पर विपक्ष का चुनाव आयोग तक मार्च, राहुल-प्रियंका ने पेड़ के नीचे दिया धरना, अखिलेश यादव समेत कई नेता हिरासत में

    CEC विवाद पर विपक्ष का चुनाव आयोग तक मार्च, राहुल-प्रियंका ने पेड़ के नीचे दिया धरना, अखिलेश यादव समेत कई नेता हिरासत में

    नई दिल्ली ।लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और INDIA ब्लॉक के सांसदों ने चुनाव आयोग तक विरोध मार्च निकाला। मार्च के दौरान विपक्षी सांसदों ने “वोट चोर, गद्दी छोड़” के नारे लगाए। प्रदर्शन के दौरान चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर विपक्षी नेताओं ने कई आरोप लगाए। मार्च शुरू होने से पहले विपक्षी सांसद संसद के मकर द्वार पर एकत्र हुए थे।

    कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने मार्च के दौरान कहा कि विपक्ष का यह प्रदर्शन अन्याय के खिलाफ लड़ाई है। उन्होंने सरकार, चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त पर आरोप लगाते हुए कहा कि सरकार आजादी के बाद मिले वयस्क मताधिकार को खत्म करने की कोशिश कर रही है। खड़गे ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को सरकार की कठपुतली बताया और आरोप लगाया कि वह वही करते हैं जो नरेंद्र मोदी और अमित शाह कहते हैं। उन्होंने कहा कि विपक्ष अपनी लड़ाई जारी रखेगा।

    मार्च के दौरान कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी, NCP-SP सांसद सुप्रिया सुले और INDIA ब्लॉक के कई अन्य सांसद भी मौजूद रहे। विपक्षी सांसद चुनाव आयोग तक पहुंचकर अपनी आपत्तियां दर्ज कराना चाहते थे। हालांकि पुलिस ने मार्च को रोक दिया। इसके बाद राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने सड़क पर एक पेड़ के नीचे ही धरना शुरू कर दिया।

    प्रदर्शन के दौरान समाजवादी पार्टी के सांसद अखिलेश यादव ने चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि 2017, 2019, 2022 और 2024 में बेईमानी की गई और पश्चिम बंगाल में “पूरा का पूरा खुला खेल” हुआ। उन्होंने चंडीगढ़ की घटना का भी जिक्र करते हुए कहा कि उसे कौन भूल सकता है। उनके इस बयान में चुनाव प्रक्रिया को लेकर विपक्ष की ओर से लगाए जा रहे आरोपों को दोहराया गया।

    इस बीच पुलिस ने अखिलेश यादव समेत कई विपक्षी नेताओं को हिरासत में लिया। समाजवादी पार्टी के सांसद धर्मेंद्र यादव ने भी प्रदर्शन के दौरान भाजपा पर निशाना साधा। उन्होंने सवाल उठाया कि जब 150 सांसदों को निलंबित किया जाता है और कई कानून पारित किए जाते हैं, तो भाजपा संविधान की बात कैसे कर सकती है। उन्होंने चुनाव आयोग का बचाव करने को लेकर भी सवाल उठाया।

    कांग्रेस सांसद राजीव राय ने कहा कि भाजपा के खिलाफ लोगों में सड़कों पर आक्रोश है। उन्होंने आरोप लगाया कि संवैधानिक संस्थाओं और लोकतंत्र का गला घोंटा गया है तथा लोकतंत्र को बचाने के लिए लोग सड़कों पर उतर आए हैं। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को भरोसे के लायक नहीं बताया।

    कांग्रेस नेता राजीव शुक्ला ने कहा कि ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा लिया जाना तय है और चुनाव आयोग से लोगों का भरोसा खत्म हो गया है। कांग्रेस नेता इमरान प्रतापगढ़ी ने कहा कि जब तक ज्ञानेश कुमार इस्तीफा नहीं देंगे, तब तक विपक्ष पीछे नहीं हटेगा।

    कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत ने कहा कि यदि लोगों का मताधिकार छीना जाएगा तो विपक्ष मूकदर्शक बनकर नहीं रहेगा। इस तरह चुनाव प्रक्रिया को लेकर विपक्षी दलों के आरोपों और विरोध के बीच चुनाव आयोग तक मार्च करने की कोशिश की गई, जिसे पुलिस ने रोक दिया और कई नेताओं को हिरासत में लिया गया।

  • CEC ज्ञानेश कुमार से जुड़े 2006 के आत्महत्या मामले में विजिलेंस जांच के आदेश, बाहरी दबाव के आरोपों की होगी पड़ताल

    CEC ज्ञानेश कुमार से जुड़े 2006 के आत्महत्या मामले में विजिलेंस जांच के आदेश, बाहरी दबाव के आरोपों की होगी पड़ताल


    नई दिल्ली।
    मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार से जुड़े वर्ष 2006 के एक मामले में केरलम सरकार ने विजिलेंस जांच के आदेश दिए हैं। यह मामला उनके राज्य के लोक निर्माण विभाग (PWD) के सचिव के रूप में कार्यकाल के दौरान कथित अनियमितताओं के आरोपों से जुड़ा है। केरलम के गृह मंत्री रमेश चेन्निथला ने विजिलेंस निदेशक को मामले में बाहरी हस्तक्षेप के आरोपों की गहन जांच करने और निष्कर्षों के आधार पर उचित कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं।

    मलेशियाई इंजीनियर की आत्महत्या से जुड़ा मामला

    यह मामला मलेशियाई सिविल इंजीनियर ली सी बीन की आत्महत्या से संबंधित है। वह केरल राज्य परिवहन परियोजना के तहत एमसी रोड के उन्नयन कार्य में शामिल PATI-BEL कंसोर्टियम से जुड़े थे। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, बीन के सुसाइड नोट में ज्ञानेश कुमार का नाम दर्ज था।

    अब जांच के केंद्र में वे आरोप हैं, जिनमें कहा गया है कि मामले में बाहरी दबाव डाला गया और शुरुआती जांच को प्रभावित किया गया था। गृह मंत्री के कार्यालय के अनुसार, चेन्निथला ने विजिलेंस निदेशक को निर्देश दिया है कि पूरे मामले और कथित बाहरी प्रभाव की जांच की जाए तथा सामने आने वाले तथ्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाए।

    विजिलेंस और एंटी-करप्शन ब्यूरो करेगा जांच

    समाचार एजेंसी के मुताबिक, आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि विजिलेंस एंड एंटी-करप्शन ब्यूरो (VACB) इन आरोपों की पड़ताल करेगा। जांच का उद्देश्य कथित अनियमितताओं और शुरुआती जांच में हस्तक्षेप के आरोपों की सच्चाई का पता लगाना है।

    फिलहाल, जांच के आदेश दिए जाने का अर्थ आरोपों की पुष्टि होना नहीं है। मामले में आरोपों की वास्तविकता जांच के निष्कर्षों से ही स्पष्ट होगी।

    SIR को लेकर भी बढ़ा है विवाद

    यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर राजनीतिक दबाव बढ़ रहा है। शुक्रवार को दिल्ली और मुंबई में विपक्षी दलों, छात्र संगठनों और युवा समूहों ने प्रदर्शन कर उनके इस्तीफे की मांग की। प्रदर्शनकारियों ने मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं और बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए जाने के आरोप लगाए।

    विवाद उस समय और बढ़ गया, जब मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों के दौरान SIR प्रक्रिया और चुनाव से जुड़े अन्य मामलों के फैसलों तथा प्रक्रियाओं पर कम से कम 14 बार आपत्ति जताई थी।

    इस तरह, ज्ञानेश कुमार से जुड़े पुराने मामले में विजिलेंस जांच के आदेश और SIR को लेकर जारी राजनीतिक विरोध ने चुनाव आयोग के कामकाज तथा उससे जुड़े विवादों को फिर चर्चा में ला दिया है।

  • अनुप्रिया पटेल ने CEC पर विपक्ष के आरोपों का किया बचाव, बोलीं- संवैधानिक पदों पर व्यक्तिगत हमला आदत

    अनुप्रिया पटेल ने CEC पर विपक्ष के आरोपों का किया बचाव, बोलीं- संवैधानिक पदों पर व्यक्तिगत हमला आदत

    नई दिल्ली । केंद्रीय मंत्री और अपना दल की नेता अनुप्रिया पटेल ने मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयोग को लेकर विपक्ष की ओर से लगाए जा रहे आरोपों पर प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों पर व्यक्तिगत हमला करना विपक्ष की आदत बन गई है। अनुप्रिया पटेल की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो रही हैं और चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है।

    अनुप्रिया पटेल ने विपक्ष के आरोपों को लेकर कहा कि आने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में विपक्ष को अपनी हार का अंदाजा पहले से ही हो गया है। उनके अनुसार, इसी वजह से विपक्ष चुनाव से पहले ही हार के लिए कारण तलाश रहा है और भविष्य में अपनी हार का ठीकरा चुनाव आयोग के सिर पर डालने की तैयारी कर रहा है।

    उन्होंने कहा कि संवैधानिक संस्थाओं और उनके पदाधिकारियों पर व्यक्तिगत टिप्पणियां करना उचित नहीं है। उनके मुताबिक, चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त जैसे संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का हिस्सा बनाने के बजाय संस्थागत प्रक्रिया पर चर्चा होनी चाहिए।

    केंद्रीय मंत्री ने एनडीए और विपक्ष के बीच चुनावी मुकाबले का भी जिक्र किया। उन्होंने दावा किया कि पिछले चुनावों में एनडीए गठबंधन के सामने विपक्ष को लगातार पराजय का सामना करना पड़ा है। उनका कहना था कि आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर भी विपक्ष की ओर से अभी से अलग-अलग मुद्दे उठाए जा रहे हैं।

    उत्तर प्रदेश में वर्ष 2027 में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए राजनीतिक दलों ने संगठनात्मक और चुनावी तैयारियां तेज कर दी हैं। अनुप्रिया पटेल ने अपनी पार्टी की तैयारियों को लेकर कहा कि अपना दल आगामी चुनाव के लिए पूरी मुस्तैदी के साथ तैयार है।

    उन्होंने कहा कि वर्ष 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में एनडीए गठबंधन की जीत सुनिश्चित करने में अपना दल ने योगदान दिया था। पार्टी ने दोनों चुनावों में गठबंधन के साथ मिलकर राजनीतिक गतिविधियों में भागीदारी की थी। अनुप्रिया पटेल ने कहा कि आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव में भी उनकी पार्टी पूरी ताकत के साथ गठबंधन के साथ मैदान में उतरेगी।

    अनुप्रिया पटेल ने यह भी दावा किया कि आगामी चुनाव में एनडीए गठबंधन रिकॉर्ड जीत दर्ज करेगा। हालांकि, चुनाव अभी दूर है और राजनीतिक दलों की तैयारियां जारी हैं। ऐसे में उनके बयान को आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर गठबंधन की रणनीति और राजनीतिक संदेश के तौर पर देखा जा रहा है।

    उत्तर प्रदेश में चुनाव आयोग को लेकर विपक्ष की ओर से उठाए जा रहे सवालों के बीच अनुप्रिया पटेल का बयान राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गया है। विपक्ष जहां चुनाव प्रक्रिया और आयोग की भूमिका को लेकर अपनी आपत्तियां सामने रख रहा है, वहीं अनुप्रिया पटेल ने इन आरोपों का बचाव करते हुए विपक्ष की मंशा पर सवाल उठाया है। उन्होंने संवैधानिक पदों पर व्यक्तिगत हमलों को लेकर अपनी आपत्ति दर्ज कराई और आगामी चुनाव में एनडीए की तैयारियों को लेकर विश्वास जताया।

  • चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर दो जजों की राय अलग, बड़ी बेंच करेगी मामले पर फैसला

    चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर दो जजों की राय अलग, बड़ी बेंच करेगी मामले पर फैसला

    नई दिल्ली । मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट में 23 सितंबर को महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। 2023 में बनाए गए कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही दो सदस्यीय पीठ के दोनों न्यायाधीशों की राय अलग-अलग रही। इसके बाद मामले को बड़ी पीठ के सामने भेजने का आदेश दिया गया।

    मामले में मुख्य चुनाव आयुक्त और दो अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में भारत के मुख्य न्यायाधीश को शामिल करने की मांग की गई है। याचिकाओं में 2023 के उस कानून को चुनौती दी गई है, जिसके तहत चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए नई चयन व्यवस्था निर्धारित की गई है।

    सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति एससी शर्मा की राय में अंतर सामने आया। दोनों न्यायाधीशों के बीच मतभेद के कारण यह तय किया गया कि मामले से जुड़े महत्वपूर्ण संवैधानिक और कानूनी सवालों पर बड़ी पीठ विचार करेगी।

    कार्यवाही के दौरान सॉलिसिटर जनरल की ओर से नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर एक दलील दी गई, जिसमें इस व्यवस्था की तुलना जजों द्वारा जजों की नियुक्ति से की गई। इस तर्क पर न्यायमूर्ति दत्ता ने असहमति जताई। उन्होंने कहा कि इस तरह की दलील को स्पष्ट रूप से खारिज किया जाना जरूरी है।

    न्यायमूर्ति दत्ता ने कहा कि याचिकाओं पर पांच दिनों से अधिक समय तक सुनवाई हुई। उन्होंने यह भी कहा कि यदि दोनों न्यायाधीश एकमत होकर फैसला देते तो संस्थागत एकता को मजबूती मिलती, लेकिन इस मामले में दोनों की राय अलग रही। उन्होंने संवैधानिक व्यवस्था के उस सिद्धांत का भी उल्लेख किया, जिसके अनुसार शासन कानून के अधीन होता है और कानून से ऊपर नहीं।

    वहीं, न्यायमूर्ति शर्मा ने न्यायमूर्ति दत्ता की बातों से असहमति जताई। उन्होंने कहा कि इस मामले में कानून से जुड़ा एक महत्वपूर्ण प्रश्न मौजूद है और इसका निर्णय बड़ी पीठ द्वारा किया जाना चाहिए। दोनों न्यायाधीशों की अलग राय सामने आने के बाद मामले को मुख्य न्यायाधीश के पास भेजने का आदेश दिया गया।

    मामले की पृष्ठभूमि 2023 में बनाए गए चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति संबंधी कानून से जुड़ी है। इससे पहले चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा सरकार की सिफारिश पर की जाती थी। अगस्त 2023 में नई व्यवस्था से संबंधित विधेयक पेश किया गया। इसमें नियुक्ति से जुड़ी समिति की संरचना में बदलाव किया गया और भारत के मुख्य न्यायाधीश की जगह एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल करने का प्रावधान किया गया।

    दिसंबर 2023 में यह विधेयक संसद के दोनों सदनों से पारित हुआ और उसी महीने इसे राष्ट्रपति की मंजूरी भी मिल गई। इसके बाद जनवरी 2024 में जया ठाकुर ने नए कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। उस समय अदालत ने कानून पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था।

    मार्च 2024 में चुनाव आयुक्तों की नई नियुक्तियों को रोकने की मांग भी अदालत के सामने रखी गई थी, लेकिन उस मांग को स्वीकार नहीं किया गया। इसी प्रक्रिया के दौरान ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू को नए चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया था।

    अब दो न्यायाधीशों की अलग-अलग राय के बाद इस मामले का अगला चरण बड़ी पीठ के सामने होगा। बड़ी पीठ चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े कानून और उसके संवैधानिक पहलुओं पर आगे विचार करेगी।

  • चुनाव आयुक्त चयन पैनल विवाद में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी, पारदर्शिता और न्याय के सिद्धांत पर जोर

    चुनाव आयुक्त चयन पैनल विवाद में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी, पारदर्शिता और न्याय के सिद्धांत पर जोर

    नई दिल्ली । मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार और अदालत के बीच महत्वपूर्ण बहस हुई। केंद्र सरकार ने चयन प्रक्रिया में प्रधानमंत्री की भूमिका का बचाव करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री और सरकार के प्रतिनिधियों पर विश्वास किया जाना चाहिए। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह मामला किसी व्यक्ति विशेष पर भरोसे या अविश्वास का नहीं, बल्कि संवैधानिक संस्थाओं की नियुक्ति प्रक्रिया में न्याय, पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने का है।

    केंद्र सरकार की ओर से दलील दी गई कि चयन समिति में प्रधानमंत्री और केंद्रीय मंत्री की मौजूदगी को लेकर संदेह करना उचित नहीं है। सरकार ने कहा कि यह मान लेना गलत होगा कि प्रधानमंत्री या उनके मंत्रिमंडल के सदस्य किसी गलत उद्देश्य से काम करेंगे। केंद्र का तर्क था कि चयन प्रक्रिया पर सवाल उठाना संसद की समझ और उसके बनाए कानून पर भी सवाल खड़ा करता है।

    सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालत का उद्देश्य किसी व्यक्ति की नीयत पर सवाल उठाना नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों पर नियुक्ति की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए, जिससे जनता के बीच निष्पक्षता और स्वतंत्रता का भरोसा कायम रहे। कोर्ट ने कहा कि चर्चा किसी व्यक्ति विशेष के विश्वास की नहीं, बल्कि संस्थागत व्यवस्था में निष्पक्षता दिखाई देने की है।

    केंद्र सरकार ने मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए बनाए गए चयन पैनल में भारत के मुख्य न्यायाधीश को शामिल किए जाने के तर्क पर भी सवाल उठाया। सरकार ने कहा कि यदि प्रधानमंत्री के निर्णय पर भरोसा नहीं किया जा सकता, तो फिर अन्य संवैधानिक नियुक्तियों में भी बाहरी व्यक्तियों या पूर्व न्यायाधीशों को शामिल करने की मांग उठ सकती है।

    वहीं याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि वर्ष 2023 में बनाए गए कानून ने सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के पुराने फैसले के प्रभाव को बदल दिया है। संविधान पीठ ने अपने एक फैसले में मुख्य निर्वाचन आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश वाली समिति की व्यवस्था सुझाई थी।

    इसके बाद संसद ने नया कानून पारित किया, जिसमें चयन समिति में मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री को शामिल करने का प्रावधान किया गया। याचिकाओं में इसी बदलाव को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि चुनाव आयोग जैसी स्वतंत्र संवैधानिक संस्था की नियुक्ति प्रक्रिया में संतुलन और निष्पक्षता बनाए रखना जरूरी है।

    चुनाव आयोग देश में चुनावी प्रक्रिया की निगरानी करने वाली महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था है। ऐसे में उसके प्रमुख अधिकारियों की नियुक्ति को लेकर होने वाली बहस का संबंध केवल कानूनी प्रावधानों से नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और जनता के विश्वास से भी जुड़ा है।

    सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने अपने-अपने तर्क रखे। अब आगे की सुनवाई में अदालत यह तय करेगी कि वर्तमान नियुक्ति प्रक्रिया संवैधानिक सिद्धांतों और निष्पक्ष व्यवस्था के अनुरूप है या नहीं। इस मामले के फैसले का असर भविष्य में चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया और संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता से जुड़े मामलों पर पड़ सकता है।

  • ‘उंगली नीचे करो’ TMC सांसदों ने चुनाव आयोग से की तीखी बहस SIR और वोटर लिस्ट में गड़बड़ी के आरोप

    ‘उंगली नीचे करो’ TMC सांसदों ने चुनाव आयोग से की तीखी बहस SIR और वोटर लिस्ट में गड़बड़ी के आरोप




    नई दिल्ली।
    तृणमूल कांग्रेस (TMC) के राष्ट्रीय महासचिव और राज्यसभा सांसद अभिषेक बनर्जी ने चुनाव आयोग (ECI) के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से SIR (सर्विलांस इन्टरव्यू रिकॉर्ड) और वोटर लिस्ट में कथित गड़बड़ियों को लेकर करीब ढाई घंटे तक बैठक की। बैठक के दौरान उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने उनसे उंगली उठाकर बात करने की कोशिश की, जिस पर बनर्जी ने कहा, “उंगली नीचे करके बात करें।
    आप मनोनीत हैं, हम निर्वाचित हैं। हम किसी के दास नहीं हैं।”

    अभिषेक बनर्जी ने कहा कि देश में अब ईवीएम से वोट चोरी नहीं हो रही, बल्कि सॉफ्टवेयर और एल्गोरिदम के जरिए वोटर लिस्ट में हेरफेर किया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि TMC के 10 सांसदों और पश्चिम बंगाल सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों ने आयोग से सवाल किए, लेकिन आयोग ने कोई ठोस जवाब नहीं दिया।

    साथ ही उन्होंने आयोग पर 28 नवंबर को पूछे गए सवालों का जवाब न देने और चयनित मीडिया को जानकारी देने का भी आरोप लगाया।

    TMC नेता ने दावा किया कि SIR के तहत 1.36 करोड़ मामलों में लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी बताई जा रही है, लेकिन आयोग ने अभी तक सूची सार्वजनिक नहीं की। उन्होंने आरोप लगाया कि ECI ऐप में गड़बड़ी है, दस्तावेज जमा होने के बावजूद नोटिस जारी नहीं हो रहे और नाम सॉफ्टवेयर के जरिए हटाए जा रहे हैं।

    उन्होंने यह भी कहा कि 60 साल से अधिक उम्र के बुजुर्गों, दिव्यांग और गंभीर बीमार लोगों को घंटों वेरिफिकेशन के लिए बैठाना अमानवीय है।

    अभिषेक बनर्जी ने बंगाल को बदनाम करने की कोशिश पर सवाल उठाया और कहा, रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों के नाम पर झूठा प्रचार किया जा रहा है। अगर अवैध प्रवासी हैं तो उन्हें बाहर करने का हम समर्थन करेंगे, लेकिन झूठा प्रचार बर्दाश्त नहीं करेंगे। उन्होंने यह भी बताया कि अन्य 11 राज्यों में SIR चल रहा है, लेकिन बंगाल में सबसे कम डिलीशन होने के बावजूद सबसे ज्यादा सख्ती की जा रही है।

    अभिषेक बनर्जी ने विपक्षी दलों को चेताया कि वोट चोरी ईवीएम से नहीं, वोटर लिस्ट और सॉफ्टवेयर के जरिए हो रही है। उन्होंने दावा किया कि बीजेपी इसी तरीके से महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली और बिहार में जीत हासिल कर रही है। अंत में उन्होंने कहा, “पहले मतदाता तय करते थे कि सरकार कौन बनाएगा, अब सरकार तय कर रही है कि वोट डालने कौन जाएगा। लेकिन संविधान हमेशा रहेगा और 2026 में बंगाल की जनता फिर बीजेपी को हराएगी।