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  • कब मनाई जाएगी गुरु पूर्णिमा? जानें तिथि, मुहूर्त और इसका धार्मिक महत्व

    कब मनाई जाएगी गुरु पूर्णिमा? जानें तिथि, मुहूर्त और इसका धार्मिक महत्व


    नई दिल्ली। हिंदू धर्म में गुरु पूर्णिमा का विशेष महत्व माना गया है। यह पर्व गुरु, शिक्षक और जीवन में मार्गदर्शन देने वाले सभी व्यक्तियों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता प्रकट करने के लिए मनाया जाता है। यह पावन अवसर हर वर्ष आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को आता है। शास्त्रों में इसे आषाढ़ पूर्णिमा, व्यास पूर्णिमा और वेद व्यास जयंती के नाम से भी जाना जाता है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी तिथि पर महर्षि वेद व्यास का जन्म हुआ था। उन्होंने चारों वेदों का संकलन और वर्गीकरण कर मानव समाज को ज्ञान की अमूल्य धरोहर दी। इसके अलावा महाभारत और श्रीमद्भागवत जैसे महान ग्रंथों की रचना भी उनके द्वारा की गई मानी जाती है। इसी कारण उन्हें आदि गुरु के रूप में सम्मान दिया जाता है और उनके प्रति आस्था व्यक्त करते हुए गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है।

    गुरु पूर्णिमा 2026 की तिथि
    पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में पूर्णिमा तिथि की शुरुआत 28 जुलाई को शाम 6 बजकर 18 मिनट पर होगी।
    पूर्णिमा तिथि का समापन 29 जुलाई 2026 को रात 8 बजकर 5 मिनट पर होगा।
    उदया तिथि के आधार पर गुरु पूर्णिमा का पर्व 29 जुलाई 2026 (बुधवार) को मनाया जाएगा।

    गुरु पूर्णिमा का महत्व
    गुरु पूर्णिमा केवल धार्मिक पर्व ही नहीं, बल्कि जीवन में ज्ञान और अनुशासन के महत्व को समझने का अवसर भी है। इस दिन शिष्य अपने गुरु का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।

    मान्यता है कि इस दिन गुरु की पूजा करने से जीवन में ज्ञान, विवेक और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह दिन आध्यात्मिक साधना और आत्मचिंतन के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

    गुरु पूर्णिमा के दिन क्या करें
    – अपने गुरु या मार्गदर्शक का सम्मान करें और उनका आशीर्वाद लें
    – गुरु पूजन कर उन्हें श्रद्धा अनुसार दक्षिणा या उपहार अर्पित करें
    – जरूरतमंद लोगों को अन्न, वस्त्र या अन्य आवश्यक वस्तुओं का दान करें
    – श्रीमद्भागवत, रामचरितमानस या अन्य धार्मिक ग्रंथों का पाठ करें
    – भगवान विष्णु की आराधना और स्मरण करें
    – ध्यान, जप और सत्संग के माध्यम से मानसिक शांति प्राप्त करें
    – जीवन में ज्ञान, विनम्रता और सदाचार अपनाने का संकल्प लें

    नोट : यह जानकारी पंचांग, धार्मिक मान्यताओं और पारंपरिक स्रोतों पर आधारित है।

  • देशभर में आज शनि जयंती की धूम… जानिए साढ़ेसाती-ढैय्या से मुक्ति के उपाय

    देशभर में आज शनि जयंती की धूम… जानिए साढ़ेसाती-ढैय्या से मुक्ति के उपाय


    नई दिल्ली।
    आज ज्येष्ठ मास (Jyeshtha month) की अमावस्या (Amavasya) है और आज के ही दिन शनि जयंती भी है। देशभर में आज शनि जयंती (Shani Jayanti 2026) धूमधाम से मनाई जा रही है। इस अवसर पर शनि मंदिरों में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ रही है। सुबह से ही मंदिर परिसर में यज्ञ अनुष्ठान का आयोजन किया गया, जिसमें श्रद्धालुओं ने वैदिक मंत्रोच्चार के साथ आहुतियां डालीं। भक्तों ने न्याय के देवता शनि देव को सरसों का तेल और काले तिल चढ़ाकर पूजा-अर्चना की। इसी के साथ, बट सावित्री पर्व भी पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया जा रहा है।

    हिंदू धर्म में शनि देव (Shani Dev) को कर्मफल दाता और न्याय का देवता माना जाता है. मान्यता है कि आज ही के दिन सूर्य पुत्र शनि देव का जन्म हुआ था. आज शनिवार का दिन होने के कारण इस जयंती का महत्व अनंत गुना बढ़ गया है, क्योंकि शनिवार स्वयं शनि देव को समर्पित है.


    1. आज का शुभ मुहूर्त (Shani Jayanti 2026 Muhurat)

    आज 16 मई को पूजा के लिए कई शुभ संयोग बन रहे हैं. ज्योतिष गणना के अनुसार अमावस्या तिथि का विवरण इस प्रकार है:
    – अमावस्या तिथि का आरंभ: 15 मई 2026 को दोपहर से.
    – अमावस्या तिथि का समापन: आज 16 मई 2026 को शाम 05:40 बजे तक.
    – अमृत काल (पूजा के लिए श्रेष्ठ): सुबह 09:15 से 10:45 तक.
    – संध्या काल पूजा: शाम 06:30 से रात 08:30 तक (शनि देव की पूजा सूर्यास्त के बाद विशेष फलदायी होती है.


    2. शनि जयंती पूजा विधि

    आज के दिन शनि देव की कृपा पाने के लिए भक्त इन चरणों का पालन करें.
    – ब्रह्म मुहूर्त में स्नान: आज सुबह जल्दी उठकर पवित्र नदी या घर के पानी में गंगाजल डालकर स्नान करें.
    – संकल्प: हाथ में जल लेकर शनि देव के व्रत या विशेष पूजा का संकल्प लें.
    – मंदिर दर्शन: पास के शनि मंदिर जाएं. यदि मंदिर जाना संभव न हो, तो घर के पश्चिम कोने में एक चौकी पर काला कपड़ा बिछाकर शनि देव की यंत्र या प्रतिमा स्थापित करें.
    – तैल अभिषेक: शनि देव की शिला या प्रतिमा पर सरसों का तेल अर्पित करें. ध्यान रहे कि तेल चढ़ाते समय उनकी आंखों में न देखें, बल्कि चरणों की ओर दृष्टि रखें.
    – नैवेद्य: उन्हें नीले फूल, काले तिल, अक्षत और भोग में इमरती या काली उड़द की खिचड़ी अर्पित करें.
    – मंत्र जाप: आज कम से कम 108 बार “ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः” इस मंत्र का जाप करें.


    3. शनि दोष से मुक्ति के अचूक उपाय (Effective Remedies)

    अगर आपकी कुंडली में शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या या शनि दोष है, तो आज 16 मई को ये उपाय जरूर करें.
    – पीपल के पेड़ की पूजा: आज शाम पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का चौमुखी दीपक जलाएं और सात बार परिक्रमा करें.
    – छाया दान: एक कटोरी में सरसों का तेल लें, उसमें अपना चेहरा देखें, फिर उस तेल को दान कर दें या मंदिर में रख आएं.
    – हनुमान जी की भक्ति: शनि देव ने हनुमान जी को वचन दिया था कि वह उनके भक्तों को परेशान नहीं करेंगे. इसलिए आज हनुमान चालीसा या बजरंग बाण का पाठ अवश्य करें.


    4. क्या दान करें? (Donation Guide)

    आज के दिन दान का फल कई जन्मों तक मिलता है. इन वस्तुओं का दान करना शुभ है.
    – काले वस्त्र और छाता.
    – लोहे के बर्तन या जूते-चप्पल.
    – काली उड़द की दाल और काले तिल.
    – जरूरतमंदों और कुष्ठ रोगियों को भोजन कराना.


    5. राशि अनुसार विशेष लाभ (Zodiac Insights)

    आज का दिन विशेष रूप से कुंभ, मकर और मीन राशि (साढ़ेसाती के प्रभाव वाली), कर्क और वृश्चिक राशि (ढैय्या के प्रभाव वाली) के जातकों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है. इन राशियों के जातकों को आज सुंदरकांड का पाठ करना चाहिए ताकि शनि देव के प्रतिकूल प्रभाव कम हो सकें.

  • देशभर में आज ईद-उल-फितर की धूम…. समाजन एक दूसरे को दे रहे मुबारकबाद

    देशभर में आज ईद-उल-फितर की धूम…. समाजन एक दूसरे को दे रहे मुबारकबाद


    नई दिल्ली।
    आज पूरे देश में ईद-उल-फितर (Eid Ul Fitr 2026) का त्योहार पूरे उत्साह और भाईचारे के साथ मनाया जा रहा है। एक महीने के रोज़ों (Roza) के बाद मुस्लिम समाज (Muslim Brotherhood) में खुशी का माहौल है और ईदगाहों व मस्जिदों (Eidgahs and Mosques) में विशेष नमाज़ अदा की जा रही है। सभी जगह ईद का खास उत्साह देखने को मिल रहा है. सुबह फज्र की नमाज़ के साथ कार्यक्रमों की शुरुआत हुई।

    ईद-उल-फितर (Eid Ul Fitr 2026) इस्लाम धर्म का बेहद खास त्योहार माना जाता है. पूरे महीने रोजे रखने के बाद जब नया चांद दिखाई देता है, तब शव्वाल महीने की शुरुआत होती है और उसी के पहले दिन ईद मनाई जाती है. इस दिन सुबह लोग ईद की नमाज अदा करते हैं और इसके साथ ही रोजों का सिलसिला समाप्त हो जाता है. यह त्योहार खुशियां बांटने और आपसी भाईचारे को बढ़ाने का संदेश देता है।


    ईद-उल-फितर का महत्व (Eid ul Fitr 2026 significance)

    इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार, रमजान का महीना बहुत पवित्र माना जाता है, क्योंकि इसी दौरान पहली बार कुरान शरीफ आई थी. माना जाता है कि इसी दिन से पैगंबर हजरत मुहम्मद के मक्का से मदीना आने के बाद ईद-उल-फितर मनाने की परंपरा शुरू हुई थी. तभी से यह दिन खुशियों के त्योहार के रूप में मनाया जाने लगा।

    ईद के मौके पर घरों में तरह-तरह के मीठे पकवान बनाए जाते हैं, खासकर सेवइयां. मेहमानों का स्वागत मिठाई से किया जाता है और बच्चों व अपनों को ईदी दी जाती है. लोग एक-दूसरे को गले लगाकर ईद की बधाई देते हैं. इस दिन दान का भी खास महत्व होता है, इसलिए जरूरतमंदों की मदद करना बेहद शुभ माना जाता है.


    ईद-उल-फितर क्यों मनाई जाती है?

    इस्लाम धर्म में ईद-उल-फितर का खास महत्व होता है. रमजान के पूरे महीने रोजे रखने के बाद लोग अल्लाह का शुक्रिया अदा करते हैं कि उन्होंने उन्हें इबादत करने की ताकत दी. मान्यता है कि सच्चे मन से रखे गए रोजों से अल्लाह खुश होते हैं और अपनी रहमत बरसाते हैं. इसी खुशी और आशीर्वाद को ईद-उल-फितर के रूप में मनाया जाता है.


    ईद-उल-फितर कैसे मनाई जाती है?

    ईद के दिन लोग सुबह जल्दी उठकर साफ-सुथरे और नए कपड़े पहनते हैं और मस्जिद या ईदगाह में जाकर नमाज अदा करते हैं. इसके बाद परिवार, दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ मिलकर खुशियां बांटते हैं. घरों में सेवइयां और शीर खुरमा जैसे स्वादिष्ट पकवान बनाए जाते हैं और एक-दूसरे को मिठाई व तोहफे देकर ईद की मुबारकबाद दी जाती है. यह त्योहार प्यार, भाईचारे और खुशी का संदेश देता है।

  • जेएलएन स्टेडियम में ‘ओडिशा पर्व’ की धूम, मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता हुईं शामिल

    जेएलएन स्टेडियम में ‘ओडिशा पर्व’ की धूम, मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता हुईं शामिल


    नई दिल्ली।
    दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता शनिवार को केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री अन्नपूर्णा देवी के साथ जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम परिसर में आयोजित ‘ओडिशा पर्व-2026’ में शामिल हुईं। इस अवसर पर उन्होंने कार्यक्रम में उपस्थित लोगों को संबोधित किया और दिल्ली में रहने वाले उड़िया समुदाय को इस सांस्कृतिक उत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं दीं। मुख्यमंत्री ने इस आयोजन को ओडिशा की समृद्ध संस्कृति, परंपराओं और आस्था का जीवंत उत्सव बताते हुए इसकी सराहना की।

    मुख्यमंत्री ने कहा कि यह अत्यंत गर्व और खुशी की बात है कि राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में ओडिशा की संस्कृति, कला, संगीत, नृत्य और परंपराओं को इतने भव्य रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। दिल्ली में रहने वाला हर उड़िया परिवार आज भी अपनी जड़ों, अपनी सांस्कृतिक विरासत और अपनी मातृभूमि ओडिशा से गहराई से जुड़ा हुआ है।

    मुख्यमंत्री ने इस भव्य आयोजन के लिए आयोजकों को बधाई देते हुए कहा कि वर्ष 2017 से लगातार आयोजित हो रहा ‘ओडिशा पर्व’ आज लगभग एक दशक की गौरवपूर्ण यात्रा पूरी कर चुका है। दिल्ली में रहने वाला हर उड़िया परिवार पूरे वर्ष इस पर्व का उत्सुकता से इंतजार करता है क्योंकि यह उत्सव न केवल संस्कृति का उत्सव है बल्कि यह लोगों को अपनी परंपराओं और पहचान से जोड़ने का एक महत्वपूर्ण माध्यम भी है।

    मुख्यमंत्री ने कहा कि उनके लिए यह अत्यंत सौभाग्य की बात है कि उन्हें इस मंच से दिल्ली में बसे अपने उड़िया परिवार को अपने विस्तारित परिवार की तरह संबोधित करने का अवसर मिला है। ऐसे सांस्कृतिक आयोजन भारत की विविधता और एकता की भावना को और अधिक सुदृढ़ करते हैं।

    मुख्यमंत्री ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि उन्हें यह विशेष सौभाग्य प्राप्त हुआ कि जब उन्हें दिल्ली की मुख्यमंत्री के रूप में सेवा करने की जिम्मेदारी मिली तो वह सबसे पहले ओडिशा जाकर प्रभु जगन्नाथ के दर्शन करने गई। दिल्ली में आयोजित भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा में भी उन्होंने श्रद्धापूर्वक भाग लिया और उस यात्रा की परंपराओं का पालन करते हुए ‘छेरा पहरा’ की पवित्र रीति में भी सहभागिता की।

    मुख्यमंत्री ने कहा कि दिल्ली में लगभग 15 लाख लोग ओडिशा से जुड़े हुए हैं और यही इस महानगर की विशेषता है कि यहां देश के हर राज्य और हर संस्कृति के लोग मिलकर रहते हैं। दिल्ली सभी को खुले दिल से अपनाती है और हर नागरिक को यह विश्वास दिलाती है कि यह शहर उनका अपना है। उन्होंने ओडिशा में रहने वाले लोगों को भी आश्वस्त करते हुए कहा कि दिल्ली में रहने वाले उनके परिवार जन सुरक्षित हैं और दिल्ली सरकार उनकी हर आवश्यकता और चिंता का पूरा ध्यान रखती है। उन्होंने यह भी बताया कि दिल्ली सरकार ने पहली बार उत्कल दिवस को सरकारी स्तर पर भव्य रूप से आयोजित कर समाज के लोगों का सम्मान किया।

    मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रभु जगन्नाथ केवल ओडिशा के लोगों की आस्था का केंद्र नहीं हैं, बल्कि दिल्ली में भी विभिन्न समुदायों के लोग अत्यंत श्रद्धा और भक्ति भाव से उनकी पूजा-अर्चना करते हैं और रथ यात्राओं का आयोजन करते हैं। उन्होंने उन सभी लोगों का भी अभिनंदन किया जो इस परंपरा को आगे बढ़ाने में योगदान दे रहे हैं। उन्होंने ओडिशा की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, कला, साहित्य और इतिहास की सराहना करते हुए कहा कि यह प्रदेश अपनी विविध परंपराओं, लोकनृत्यों, गीतों और साहित्य के माध्यम से भारत की सांस्कृतिक एकता को मजबूत करता है।

  • छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में आजादी के बाद 41 गांवों में पहली बार मनाया जा रहा गणतंत्र दिवस

    छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में आजादी के बाद 41 गांवों में पहली बार मनाया जा रहा गणतंत्र दिवस

    रायपुर। यह खबर वाकई चौंकाने वाली है। छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में माओवादी प्रभाव से मुक्त हुए 41 गांवों में गणतंत्र दिवस के अवसर पर पहली बार तिरंगा फहराया जाएगा। यह कदम ‘लाल आतंक’ के अंत की लड़ाई में मिली सफलता को साफ तौर पर दर्शाती है। साथ ही यह खबर शांति एवं विकास का संकेत भी देती है।
    पुलिस महानिरीक्षक (आईजी), बस्तर रेंज, सुंदरराज पी ने बताया कि इन 41 गांवों में से 13 गांव बीजापुर जिले में, 18 नारायणपुर में और 10 सुकमा में हैं।
    गणतंत्र दिवस पूरे जोश से मनाने की तैयारी

    उन्होंने कहा, ‘‘बस्तर मंडल के 41 गांवों में पहली बार 77वां गणतंत्र दिवस पूरे जोश और उत्साह के साथ मनाया जाएगा। ये गांव दशकों से इस तरह के राष्ट्रीय समारोहों से दूर रहे थे, लेकिन अब देश की लोकतांत्रिक और संवैधानिक भावना में वे एक्टिव होकर भाग ले रहे हैं।’’ उन्होंने कहा कि पिछले कुछ महीनों में इन जगहों पर सुरक्षा शिविरों की स्थापना ने स्थानीय आबादी के बीच विश्वास, सुशासन और अपनेपन की भावना जगाने में अहम भूमिका निभाई है।

    धीरे-धीरे स्थापित हो रही है शांति

    आईडी सुंदरराज पी ने कहा, ‘‘सुरक्षा बलों के निरंतर प्रयासों और स्थानीय समुदायों के सहयोग से यह सकारात्मक परिवर्तन संभव हो पाया है। पिछले वर्ष 13 गांवों में 15 अगस्त को पहली बार राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया था। अब, इन 13 गांवों सहित कुल 54 गांव पहली बार गणतंत्र दिवस मनाएंगे।” सुंदरराज ने कहा कि अबूझमाड़, राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र आदि में बसवराजु, के रामचंद्र रेड्डी, सुधाकर, कट्टा सत्यनारायण रेड्डी और अन्य माओवादी कैडर को निष्क्रिय करने से क्षेत्र में चरमपंथी प्रभाव काफी कमजोर हो गया है। नक्सलियों की ताकत और उनके प्रभाव कमजोर होने से भय और धमकी की जगह धीरे-धीरे शांति, विकास और प्रशासनिक संपर्क स्थापित हो रहे हैं।
    रायपुर में राज्यपाल फहराएंगे तिरंगा

    इस बीच, एक सरकारी अधिकारी ने बताया कि राज्य भर में गणतंत्र दिवस समारोह की सभी तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। उन्होंने बताया कि राज्यपाल रमन डेका सोमवार सुबह रायपुर के पुलिस परेड ग्राउंड में राष्ट्रीय ध्वज फहराएंगे और विभिन्न सुरक्षा इकाइयों से ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ (सलामी गारद) लेंगे, जबकि मुख्यमंत्री विष्णु देव साई बिलासपुर जिले में तिरंगा फहराएंगे।

  • Lohri 2026: 13 जनवरी को मनाई जाएगी लोहड़ी, पढ़ें इस दिन का महत्व और खास बातें

    Lohri 2026: 13 जनवरी को मनाई जाएगी लोहड़ी, पढ़ें इस दिन का महत्व और खास बातें

    नई दिल्ली। कई स्थानों पर लोहड़ी (Lohri 2026) को लाल लोई भी कहा जाता है, जो मकर संक्रांति से एक दिन पहले मनाया जाता है। इस दिन अलाव जलाकर उसमें नए गेहूं और जौ की बालियां अर्पित की जाती है। साथ ही पारंपरिक गीत गाए जाते हैं व नृत्य किया जाता है। लोग एक-दूसरे को लोहड़ी की बधाई देते हैं और ईश्वर को अच्छी फसल के लिए आभार प्रकट करते हैं।

    लोहड़ी संक्रांति का क्षण (Lohri Sankranti Moment)
    लोहड़ी (Lohri 2026) पर संक्रांति का क्षण बुधवार 14 जनवरी प्रातः 3 बजकर 13 मिनट तक रहने वाला है। ऐसे में मकर संक्रांति 14 जनवरी को मनाई जाएगी।

    लोहड़ी पर्व का महत्व (Lohri Significance)
    लोहड़ी का त्योहार पर्व केवल फसलों से संबंधित नहीं है, बल्कि यह दिन लंबे होने की शुरुआत का भी प्रतीक होता है। यह वह समय है, जब किसान अपनी अच्छी फसल के लिए प्रकृति को धन्यवाद देते हैं और जश्न मनाते हैं। इस पर्व के साथ ही आने वाले साल में खुशहाली के लिए प्रार्थना भी की जाती है।
    लोहड़ी के विशेष अवसर पर लोग आंगन या खुले चौक में पारंपरिक रूप से अलाव जलाते हैं और भांगड़ा व गिद्दा जैसे पारंपरिक नृत्य करते हैं। आभार के प्रतीक के रूप में आग में अनाज, मिठाइयां, मूंगफली, पॉपकॉर्न जैसी चीजें चढ़ाई जाती हैं। इस दिन सरसों का साग, मक्के के आटे की रोटी, गजक और रेवड़ी जैसे पारंपरिक पकवानों का आनंद लिया जाता है।
    लोहड़ी से जुड़ी कहानी
    लोहड़ी को लेकर अपनी बहादुरी के लिए मशहूर लोक नायक दुल्ला भट्टी (Dulla Bhatti) की कहानी प्रसिद्ध है। लोहड़ी के पारम्परिक गीतों दुल्ला भट्टी का जिक्र भी आता है। इस कहानी के अनुसार, एक समय में मुगल राजा अकबर के काल में दुल्ला भट्टी नामक एक लुटेरा पंजाब में रहता था। वह धनी लोगों को लूटकर उसने मिले सभी धन को गरीब की मदद में लगा देता था। दुल्ला भट्टी पंजाब के रॉबिन हुड नाम से भी प्रसिद्ध है।