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  • देशभर में आज रक्षाबंधन की धूम…. जानें कब तक रहेगा राखी बांधने का शुभ मुहूर्त

    देशभर में आज रक्षाबंधन की धूम…. जानें कब तक रहेगा राखी बांधने का शुभ मुहूर्त


    नई दिल्ली।
    आज देशभर में रक्षाबंधन (Raksha Bandhan 2026) का पावन पर्व मनाया जा रहा है और इसी के साथ आज साल का आखिरी चंद्र ग्रहण (Lunar Eclipse) भी लग रहा है. राहत की बात तो यह है कि यह चंद्रग्रहण भारत में दृश्यमान नहीं होगा, इसी कारण भारत में आज रक्षाबंधन का पर्व पूरी धूमधाम के साथ मनाया जा रहा है।

    रक्षाबंधन के इस खास दिन पर बहनें अपने भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधकर उनकी लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और खुशहाल जीवन की कामना करती हैं. वहीं, भाई भी अपनी बहनों की जीवनभर रक्षा करने और हर सुख-दुख में उनका साथ देने का वचन देते हैं. इस बार रक्षाबंधन पर भद्रा का साया नहीं रहेगा, ऐसे में पूरे दिन राखी बांधना शुभ माना जा रहा है. बहनें सुबह से ही अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांध सकेंगी. आइए जानते हैं कि आज राखी बांधने का शुभ मुहूर्त (Shubh Muhurat) कब से कब तक है और इस दिन कौन-कौन से शुभ संयोग बन रहे हैं।


    रक्षाबंधन 2026 की तिथि (Raksha Bandhan 2026 Date)

    पंचांग के मुताबिक, हर साल रक्षाबंधन का पर्व श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है. हिंदू पंचांग के अनुसार, इस बार सावन पूर्णिमा की तिथि 27 अगस्त यानी कल सुबह 9 बजकर 8 मिनट पर शुरू हो चुकी है और तिथि का समापन 28 अगस्त यानी आज सुबह 9 बजकर 48 मिनट पर होगा।


    रक्षाबंधन 2026 भद्रा काल का समय (Raksha Bandhan 2026 Bhadra kaal Timing)

    शास्त्रों के मुताबिक, भद्रा के दौरान राखी बांधना बहुत ही अशुभ होता है. हालांकि, इस बार रक्षाबंधन पर भद्रा का साया नहीं रहेगा. सावन पूर्णिमा पर भद्रा 27 अगस्त यानी कल सुबह 9 बजकर 8 मिनट से शुरू होकर कल रात 9 बजकर 32 मिनट पर समाप्त हो चुकी है. यानी रक्षाबंधन का मुहूर्त शुरू होने से पहले ही भद्रा काल समाप्त हो चुका है.


    रक्षाबंधन पर राखी बांधने का शुभ मुहूर्त (Raksha Bandhan 2026 Shubh muhurat)

    रक्षाबंधन पर भाई को राखी बांधने का सबसे पहला शुभ मुहूर्त आज सुबह 05 बजकर 57 मिनट से लेकर सुबह 9 बजकर 48 मिनट तक रहेगा. यानी भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधने के लिए बहनों को करीब 3 घंटे 51 मिनट का समय मिलने वाला है.

    इसके अलावा, अगर आप किसी कारणवश इस मुहूर्त में राखी बांध पाएं तो अभिजीत मुहूर्त भी रहेगा. जिसका समय आज सुबह 11 बजकर 56 मिनट से लेकर 12 बजकर 48 मिनट तक रहेगा।

    राखी बांधने के कुछ अन्य मुहूर्त भी हैं जैसे-
    शुभ चौघड़िया: दोपहर 12:28 बजे से 2:03 बजे तक
    अपराह्न काल: दोपहर 1:44 बजे से शाम 4:16 बजे तक
    चर चौघड़िया: शाम 5:13 बजे से 6:48 बजे तक

    रक्षाबंधन पर बन रहे कई शुभ योग (Raksha Bandhan 2026 Shubh Yog)
    रक्षाबंधन पर आज करीब 11 शुभ योगों का संयोग बन रहा है. शतभिषा नक्षत्र के साथ अतिगंड, शोभन, शिव और विजय जैसे योग बनने की बात कही जा रही है. इसके अलावा चंद्रादि, बुधादित्य, विमल, विपरीत राजयोग, धन, उभयचरी, शकट और सुनफा योग का भी संयोग बताया जा रहा है।

    ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार ऐसे शुभ योगों में पूजा-पाठ, दान और भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधने जैसे धार्मिक कार्यों को विशेष फलदायी माना जाता है. रक्षाबंधन के दिन ग्रहों की स्थिति भी महत्वपूर्ण बताई जा रही है. सूर्य सिंह राशि में रहेंगे, जबकि गुरु कर्क राशि में स्थित होंगे. ज्योतिष में सूर्य को आत्मबल, प्रतिष्ठा और ऊर्जा का कारक माना जाता है, वहीं गुरु को ज्ञान, शिक्षा, बुद्धि और समृद्धि से जोड़ा जाता है. चंद्रमा कुंभ राशि में रहेंगे. ऐसे में ग्रहों और नक्षत्रों का यह संयोग रक्षाबंधन को धार्मिक और ज्योतिषीय दोनों दृष्टि से खास बना रहा है।


    इस अशुभ मुहूर्त में ना बांधें राखी? (Raksha Bandhan 2026 Rahu kaal Timing)

    हिंदू पंचांग के अनुसार, रक्षाबंधन पर जिस तरह भद्रा काल का ध्यान रखा जाता है उसी तरह राहु काल का ध्यान रखना चाहिए. राहु काल कल सुबह 10 बजकर 46 मिनट से शुरू होकर दोपहर 12 बजकर 22 मिनट तक रहेगा. वहीं, यमगंड दोपहर 3 बजकर 35 मिनट से लेकर शाम 5 बजकर 11 मिनट तक रहेगा. ऐसे में, ज्योतिषविदों की सलाह है कि रक्षाबंधन पर राहु काल लगने से पहले या बाद में भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधें।


    कैसे मनाएं रक्षाबंधन? (Raksha Bandhan 2026 Rituals)

    रक्षाबंधन के दिन सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और अपने इष्टदेव का स्मरण करें. इसके बाद पूजा की थाली सजाएं, जिसमें रोली, चंदन, अक्षत, दही, राखी, मिठाई और घी का दीपक रखें. सबसे पहले भगवान की विधिवत पूजा करें. इसके बाद भाई को पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठाएं. राखी बांधते समय इस बात का ध्यान रखें कि भाई और बहन दोनों का सिर ढका होना चाहिए. बहन सिर पर चुनरी रखें और भाई साफ रुमाल या किसी स्वच्छ वस्त्र से अपना सिर ढकें।

    अब भाई के माथे पर रोली या चंदन का तिलक लगाएं और उस पर अक्षत रखें. भाई की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करें. इसके बाद भाई की कलाई पर राखी बांधें, आरती उतारें और मिठाई खिलाकर उसके मंगलमय जीवन की प्रार्थना करें. राखी बांधने के बाद माता-पिता और घर के बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद जरूर लें. वहीं, भाई अपनी सामर्थ्य के अनुसार बहन को उपहार या आशीर्वाद दें और जीवनभर उसकी रक्षा व सहयोग का संकल्प लें।


    आखिर कहां से शुरू हुई राखी की परंपरा

    एक समय की बात है कि राजपूत मुस्लिमों के खिलाफ लड़ रहे थे. अपने पति राणा सांगा की मृत्यु के बाद मेवाड़ की कमान रानी कर्णावती के हाथों में थी. उस समय गुजरात के बहादुर शाह ने मेवाड़ पर दूसरी बार आक्रमण किया था. कर्णावती ने तब हुमायूं से मदद मांगने के लिए उसे राखी भेजी. हुमायूं उस समय एक युद्ध के बीच में था, मगर रानी के इस कदम ने उसे भीतर से छू लिया. हुमायूं ने अपनी फौज फौरन मेवाड़ के लिए भेज दी. दुर्भाग्‍यवश, उसके सैनिक समय पर नहीं पहुंच पाए और चित्‍तौड़ में राजपूत सेना की हार हुई. रानी ने अपने सम्मान की रक्षा के लिए जौहर (खुद को आग लगा ली) कर लिया. लेकिन हुमायूं की सेना ने चित्‍तौड़ से शाह को खदेड़ कर रानी के पुत्र विक्रमजीत को गद्दी सौंप दी और अपनी राखी का मान रखा।


    देवराज इंद्र और इंद्राणी की राखी

    माना जाता है कि एक बार दैत्‍य वृत्रासुर ने इंद्र का सिंहासन हासिल करने के लिए स्‍वर्ग पर चढ़ाई कर दी. वृत्रासुर बहुत ताकतवर था और उसे हराना आसान नहीं था. युद्ध में देवराज इंद्र की रक्षा के लिए उनकी बहन इंद्राणी ने अपने तपोबल से एक रक्षासूत्र तैयार किया और इंद्र की कलाई पर बांध दिया. इस रक्षासूत्र ने इंद्र की रक्षा की और वह युद्ध में विजयी हुए. तभी से बहनें अपने भाइयों की रक्षा के लिए उनकी कलाई पर राखी बांधने लगीं।

  • जैकी भगनानी ने भांजी दिवियाना के जन्मदिन पर लिखा भावुक संदेश, बोले- जिंदगी के हर कदम पर हमेशा साथ खड़ा रहूंगा

    जैकी भगनानी ने भांजी दिवियाना के जन्मदिन पर लिखा भावुक संदेश, बोले- जिंदगी के हर कदम पर हमेशा साथ खड़ा रहूंगा


    नई दिल्ली ।
    अभिनेता से निर्माता बने जैकी भगनानी ने अपनी भांजी दिवियाना के जन्मदिन के मौके पर एक भावुक और खास संदेश साझा किया है। जैकी ने सोशल मीडिया पर दिवियाना के साथ बिताए खूबसूरत पलों का वीडियो कोलाज पोस्ट करते हुए उसके उज्ज्वल भविष्य की कामना की। उन्होंने कहा कि जीवन में दिवियाना जो भी कदम उठाएगी, वह हर समय उसके साथ खड़े रहेंगे और उसका हाथ थामे रहेंगे।

    जैकी भगनानी द्वारा साझा किए गए वीडियो में दिवियाना के बचपन से लेकर अब तक के कई यादगार पल शामिल थे। तस्वीरों और छोटी-छोटी वीडियो क्लिप्स में दिवियाना को परिवार के साथ हंसते, खेलते और खुशहाल पलों को जीते हुए देखा गया। इस खास वीडियो के जरिए जैकी ने अपने और दिवियाना के बीच के मजबूत पारिवारिक रिश्ते को जाहिर किया।

    दिवियाना जैकी भगनानी की बहन दीपशिखा देशमुख की बेटी हैं। दीपशिखा देशमुख की शादी अभिनेता रितेश देशमुख के भाई धीरज देशमुख से हुई है। फिल्मी परिवार से ताल्लुक रखने वाली दिवियाना अक्सर पारिवारिक आयोजनों और खास मौकों पर नजर आती हैं। जैकी ने अपने संदेश के जरिए परिवार के बीच मौजूद प्यार और अपनापन दिखाया।

    अपने पोस्ट में जैकी ने दिवियाना को जन्मदिन की शुभकामनाएं देते हुए लिखा कि वह जीवन में जो भी रास्ता चुनेगी, वह हर परिस्थिति में उसका साथ देंगे। उन्होंने कहा कि उसकी खुशियों को मनाना और उसे एक बेहतर इंसान बनते देखना उनके जीवन की सबसे बड़ी खुशियों में से एक है।

    जैकी ने अपने संदेश में यह भी कहा कि दिवियाना को कभी अकेले आगे नहीं बढ़ना पड़ेगा, क्योंकि उसके मामा हमेशा उसके साथ मौजूद रहेंगे। उन्होंने अपने प्यार और आशीर्वाद के साथ दिवियाना के उज्ज्वल भविष्य की कामना की। जैकी का यह संदेश सोशल मीडिया पर परिवार और प्रशंसकों के बीच चर्चा का विषय बना।

    जैकी भगनानी फिल्म जगत में अभिनेता और निर्माता दोनों भूमिकाओं के लिए पहचाने जाते हैं। उन्होंने साल 2009 में फिल्म ‘कल किसने देखा’ से अपने अभिनय करियर की शुरुआत की थी। इसके बाद वह ‘फालतू’, ‘अजब गजब लव’, ‘रंगरेज’, ‘यंगिस्तान’ और ‘वेलकम टू कराची’ जैसी फिल्मों में नजर आए।

    अभिनय के अलावा जैकी ने निर्माण के क्षेत्र में भी अपनी पहचान बनाई। उन्होंने अपनी बहन दीपशिखा देशमुख के साथ मिलकर कई फिल्मों का निर्माण किया। साल 2016 में आई फिल्म ‘सरबजीत’ उनके प्रोडक्शन सफर की महत्वपूर्ण फिल्मों में शामिल रही। इस फिल्म को दर्शकों और समीक्षकों से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली थी।

    अभिनेता के तौर पर जैकी भगनानी आखिरी बार साल 2018 में रिलीज हुई फिल्म ‘मित्रों’ में दिखाई दिए थे। इसके बाद उन्होंने फिल्म निर्माण और मनोरंजन क्षेत्र से जुड़े अन्य कामों पर ज्यादा ध्यान केंद्रित किया। वर्तमान में भी वह फिल्म इंडस्ट्री में निर्माता के रूप में सक्रिय हैं और नए प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे हैं।

    दिवियाना के जन्मदिन पर जैकी का यह संदेश परिवार के प्रति उनके लगाव और जिम्मेदारी को दर्शाता है। सोशल मीडिया पर साझा की गई इस पोस्ट के जरिए उन्होंने यह संदेश दिया कि जीवन में सफलता के साथ-साथ रिश्तों को मजबूत बनाए रखना भी बेहद जरूरी है।

  • CJP के वायरल जश्न वीडियो पर सोनम वांगचुक की नसीहत, सफलता के साथ जिम्मेदारी निभाने की दी सलाह

    CJP के वायरल जश्न वीडियो पर सोनम वांगचुक की नसीहत, सफलता के साथ जिम्मेदारी निभाने की दी सलाह

    नई दिल्ली । केंद्रीय शिक्षा मंत्री पद से धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के कुछ सदस्यों द्वारा मनाए गए जश्न का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया। इस वीडियो को लेकर शुरू हुई बहस के बीच सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि किसी भी उपलब्धि या सफलता का उत्सव मनाना स्वाभाविक है, लेकिन उसके साथ विनम्रता, जिम्मेदारी और गरिमा बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक होता है। उन्होंने समर्थकों से आग्रह किया कि किसी भी आंदोलन की सफलता को ऐसे तरीके से मनाया जाए जिससे उसके मूल उद्देश्य और सामाजिक संदेश की गंभीरता बनी रहे।

    वांगचुक का यह बयान ऐसे समय में सामने आया है, जब सोशल मीडिया पर CJP के कुछ नेताओं और कार्यकर्ताओं के जश्न मनाने वाले वीडियो व्यापक रूप से साझा किए जा रहे हैं। वायरल वीडियो में पार्टी से जुड़े कुछ लोग धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद खुशी जाहिर करते और उत्सव मनाते दिखाई दे रहे हैं। इन दृश्यों को लेकर अलग-अलग वर्गों में विभिन्न प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं और इसे लेकर सार्वजनिक चर्चा तेज हो गई है।

    सोनम वांगचुक ने कहा कि किसी भी संघर्ष का उद्देश्य केवल लक्ष्य प्राप्त करना नहीं होता, बल्कि उस पूरी प्रक्रिया में सामाजिक मूल्यों और नैतिक जिम्मेदारियों को भी बनाए रखना जरूरी है। उनके अनुसार जीत तभी सार्थक मानी जाएगी जब उसमें विनम्रता और दूसरों के प्रति सम्मान भी दिखाई दे। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि किसी भी जन आंदोलन की विश्वसनीयता उसके समर्थकों के आचरण से भी तय होती है।

    हाल के दिनों में वांगचुक CJP के नेतृत्व में चल रहे छात्र आंदोलन से जुड़े प्रमुख चेहरों में शामिल रहे हैं। उन्होंने छात्रों की मांगों के समर्थन में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की थी। बाद में उन्हें स्वास्थ्य कारणों से पुलिस द्वारा अस्पताल ले जाया गया। उन्होंने 23 जुलाई को अपनी 26 दिन लंबी भूख हड़ताल समाप्त की थी। यह निर्णय उस आश्वासन के बाद लिया गया, जिसमें प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई नहीं करने और NEET पेपर लीक प्रकरण के बाद आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को उचित सहायता देने की बात कही गई थी।

    धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद सामने आए जश्न के वीडियो पर सोशल मीडिया पर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कुछ लोगों ने इसे आंदोलन की सफलता पर युवाओं की स्वाभाविक खुशी बताया, जबकि कई अन्य लोगों ने इसे अनुचित समय पर किया गया उत्सव करार दिया। आलोचकों का कहना था कि आंदोलन की पृष्ठभूमि छात्रों की समस्याओं और परीक्षा प्रणाली से जुड़े गंभीर मुद्दों पर आधारित थी, इसलिए जश्न का स्वरूप अधिक संयमित होना चाहिए था।

    इस बीच CJP की ओर से भी पूरे विवाद पर प्रतिक्रिया दी गई। पार्टी के प्रवक्ता सौरव दास ने कहा कि वायरल वीडियो में युवाओं का उत्साह और उनकी अभिव्यक्ति का तरीका दिखाई देता है। उनके अनुसार नई पीढ़ी अपने विचार अलग-अलग माध्यमों से व्यक्त करती है और लोकतांत्रिक आंदोलनों में भागीदारी के तरीके समय के साथ बदलते रहते हैं। उन्होंने कहा कि युवा सड़क पर बैठकर, सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से या अन्य रचनात्मक तरीकों से भी अपनी बात समाज के सामने रख सकते हैं।

    धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद शुरू हुई इस बहस ने आंदोलन की शैली, सार्वजनिक व्यवहार और सामाजिक जिम्मेदारी जैसे विषयों को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। एक ओर आंदोलन की उपलब्धियों पर समर्थकों में उत्साह दिखाई दे रहा है, वहीं दूसरी ओर कई लोग यह भी मान रहे हैं कि किसी भी लोकतांत्रिक सफलता का उत्सव संवेदनशीलता, संतुलन और सामाजिक जिम्मेदारी के साथ मनाया जाना चाहिए।

  • फिजूलखर्ची छोड़ सेवा का संदेश युवा समाजसेवी ने वृद्धजनों के साथ मनाया जन्मदिन

    फिजूलखर्ची छोड़ सेवा का संदेश युवा समाजसेवी ने वृद्धजनों के साथ मनाया जन्मदिन


    चित्रकूट। आज के दौर में जहां जन्मदिन के मौके पर भव्य पार्टियों और दिखावे का चलन तेजी से बढ़ रहा है वहीं चित्रकूट के युवा समाजसेवी बीपी पटेल ने समाज को प्रेरित करने वाली मिसाल पेश की। उन्होंने अपना जन्मदिन परिवार और दोस्तों के साथ किसी होटल या समारोह स्थल पर मनाने के बजाय गणेश बाग के समीप स्थित विनायकपुर वृद्धाश्रम में बुजुर्गों के बीच मनाया।

    इस अवसर पर बीपी पटेल ने वृद्धाश्रम में रह रहे सभी बुजुर्गों को मिठाई समोसा और फल वितरित किए तथा उनके साथ समय बिताकर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया। बुजुर्गों ने भी स्नेहपूर्वक उन्हें और जानकी पटेल को स्वस्थ जीवन तथा दीर्घायु का आशीर्वाद देते हुए उनके इस सामाजिक कार्य की सराहना की।

    समाजसेवी बीपी पटेल ने कहा कि जन्मदिन केवल उत्सव मनाने का अवसर नहीं बल्कि समाज के जरूरतमंद और उपेक्षित लोगों के साथ खुशियां बांटने का भी दिन होना चाहिए। उन्होंने युवाओं से भी अपील की कि वे अपने विशेष अवसरों को सेवा और समाजहित के कार्यों से जोड़ें ताकि ऐसे आयोजन जरूरतमंद लोगों के चेहरे पर मुस्कान ला सकें।

    इस मौके पर सभासद शंकर प्रसाद यादव धर्मेंद्र कुमार ओझा सुरेंद्र यादव हरिशरण जानकी पटेल जगपालक सिंह यादव आशीष श्रीवास्तव एडवोकेट प्रखर सिंह प्रदोष सिंह पटेल वृद्धाश्रम के प्रबंधक कामता प्रसाद समाजसेविका दिव्यांगना मिश्रा अनुराग सिंह पटेल अशोक पटेल और ओंकार सिंह चंदेल सहित अनेक लोग मौजूद रहे।

    जन्मदिन समारोह से पहले बीपी पटेल ने पंपापुर देवांगना हनुमानगढ़ी आश्रम पहुंचकर सिद्ध संत तपशाली प्रेमदास जी महाराज का आशीर्वाद लिया और गुफा में विराजमान हनुमान जी के दर्शन कर अपने सामाजिक जीवन में सेवा और मानवता के मार्ग पर आगे बढ़ने का संकल्प दोहराया।

    बीपी पटेल की यह पहल न केवल बुजुर्गों के प्रति सम्मान का संदेश देती है बल्कि यह भी बताती है कि जीवन के खास अवसरों को समाज सेवा से जोड़कर उन्हें अधिक सार्थक और प्रेरणादायक बनाया जा सकता है।

  • बॉलीवुड की 'ड्रीम गर्ल' हेमा मालिनी के डायमंड जुबली कॉन्सर्ट में उमड़ा सिनेमाई सितारों का मेला, विशेष डॉक्यूमेंट्री और पुस्तक लॉन्च के साथ पुरानी यादें हुईं ताजा

    बॉलीवुड की 'ड्रीम गर्ल' हेमा मालिनी के डायमंड जुबली कॉन्सर्ट में उमड़ा सिनेमाई सितारों का मेला, विशेष डॉक्यूमेंट्री और पुस्तक लॉन्च के साथ पुरानी यादें हुईं ताजा

    नई दिल्ली। भारतीय सिनेमा की सदाबहार अभिनेत्री और ‘ड्रीम गर्ल’ के नाम से विख्यात हेमा मालिनी ने अपने कलात्मक जीवन और सांस्कृतिक सफर को समर्पित एक भव्य ‘लाइव इन कॉन्सर्ट’ का आयोजन किया। यह विशेष आयोजन हेमा मालिनी के डायमंड जुबली सेलिब्रेशन का हिस्सा था, जिसने मुंबई के कला जगत और प्रशंसकों को एक बार फिर बॉलीवुड के सुनहरे दौर की याद दिला दी। अपने तरह के इस पहले और अनूठे लाइव कॉन्सर्ट में मनोरंजन जगत की कई जानी-मानी हस्तियों ने शिरकत की, जिससे यह शाम पूरी तरह से ऐतिहासिक और यादगार बन गई।

    इस भव्य उत्सव के दौरान सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें हेमा मालिनी के साथ अपने जमाने की मशहूर और दिग्गज अभिनेत्रियां पद्मिनी कोल्हापुरे, पूनम ढिल्लों और विजयता पंडित एक साथ नजर आ रही हैं। हिंदी सिनेमा के इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान रखने वाली ये सभी दिग्गज अदाकाराएं हेमा मालिनी के इस विशेष लाइव इन कॉन्सर्ट में उन्हें बधाई देने और इस ऐतिहासिक पल का हिस्सा बनने पहुंची थीं। मंच और मंच के पीछे इन वरिष्ठ कलाकारों की आपसी बॉन्डिंग और गर्मजोशी को देखकर प्रशंसक सोशल मीडिया पर लगातार अपना प्यार और सम्मान जता रहे हैं।

    यह डायमंड जुबली जश्न केवल एक म्यूजिकल कॉन्सर्ट या शाम की महफिल तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि इसे हेमा मालिनी की कलात्मक यात्रा के एक दस्तावेज के रूप में प्रस्तुत किया गया। इस ऐतिहासिक अवसर पर एक विशेष किताब का भी विमोचन किया गया, जिसे स्वयं हेमा मालिनी और जाने-माने आरजे अनिरुद्ध चावला ने संयुक्त रूप से लिखा है। इसके साथ ही समारोह में अनिरुद्ध चावला द्वारा निर्देशित एक विशेष डॉक्यूमेंट्री फिल्म भी प्रदर्शित की गई। यह डॉक्यूमेंट्री मुख्य रूप से हेमा मालिनी के एक पारंपरिक नृत्यांगना से लेकर बॉलीवुड की शीर्ष अभिनेत्री और अंततः एक सांस्कृतिक आइकन बनने तक के शानदार और प्रेरणादायक सफर को बेहद संजीदगी से दिखाती है।

    यह पूरा आयोजन केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि का उत्सव नहीं था, बल्कि यह हेमा मालिनी की शानदार सांस्कृतिक विरासत, भारतीय सिनेमा के गौरवशाली अतीत और कलाकारों का उनके दर्शकों के साथ पीढ़ियों से चले आ रहे अटूट रिश्ते का एक अनूठा संगम था। इस कॉन्सर्ट के माध्यम से न केवल बीते दौर के संगीत और अभिनय की कला को याद किया गया, बल्कि भारतीय शास्त्रीय नृत्य और सिनेमा के प्रति हेमा मालिनी के समर्पण को भी सम्मानित किया गया। इस भव्य कार्यक्रम ने यह साबित कर दिया कि वक्त बदलने के बाद भी सिनेमा के इन सितारों की चमक और उनका प्रभाव आज भी दर्शकों के दिलों में पूरी तरह बरकरार है।

  • सपनों को उड़ान और मां की नम आंखें: बच्चों की बड़ी कामयाबी पर भावुक हुईं फराह खान

    सपनों को उड़ान और मां की नम आंखें: बच्चों की बड़ी कामयाबी पर भावुक हुईं फराह खान


    नई दिल्ली। जिंदगी में कुछ पल ऐसे होते हैं, जो केवल खुशियां नहीं लाते बल्कि भावनाओं का समंदर भी साथ लेकर आते हैं। खासतौर पर माता-पिता के लिए बच्चों की सफलता से बड़ा कोई जश्न नहीं होता। ऐसा ही एक बेहद खास और भावुक पल उस समय देखने को मिला जब एक मां ने अपने बच्चों को जिंदगी के एक महत्वपूर्ण पड़ाव को पार करते देखा। खुशी, गर्व और भावनाओं से भरे इस पल ने हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।

    बच्चों की पढ़ाई और उनके भविष्य को लेकर माता-पिता हमेशा कई सपने संजोते हैं। जब वे बच्चे अपनी मेहनत और लगन से किसी बड़ी उपलब्धि तक पहुंचते हैं तो वह पल पूरे परिवार के लिए बेहद यादगार बन जाता है। हाल ही में ऐसा ही एक अवसर सामने आया, जहां परिवार के लिए जश्न और भावनाओं का अनोखा संगम देखने को मिला। हाई स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद बच्चों के चेहरे पर खुशी दिखाई दी, वहीं एक मां की आंखों में गर्व के साथ भावनाएं भी साफ नजर आईं।

    समारोह के दौरान परिवार के कई खूबसूरत पल कैमरे में कैद हुए। तस्वीरों और वीडियो में खुशी का माहौल साफ दिखाई दे रहा था। बच्चों की उपलब्धि पर पूरे परिवार की मुस्कान इस बात की गवाही दे रही थी कि यह दिन उनके लिए कितना खास था। पढ़ाई पूरी करना केवल एक शैक्षणिक उपलब्धि नहीं बल्कि जीवन की नई शुरुआत का संकेत भी माना जाता है। यही कारण है कि इस तरह के अवसर परिवारों के लिए बेहद भावनात्मक बन जाते हैं।

    इस खास अवसर पर एक भावुक संदेश ने भी लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा। उस संदेश में एक मां के मन की भावनाएं साफ दिखाई दीं। बच्चों को बड़ा करना, उन्हें सही दिशा देना और फिर उन्हें अपने सपनों की उड़ान भरने के लिए तैयार करना किसी भी माता-पिता के लिए आसान नहीं होता। एक तरफ बच्चों की सफलता की खुशी होती है तो दूसरी तरफ उनसे जुड़ी यादें मन को भावुक भी कर देती हैं। यही भावनाएं उस संदेश में साफ तौर पर महसूस की गईं।

    माता-पिता और बच्चों का रिश्ता हमेशा बेहद खास माना जाता है। बच्चे जैसे-जैसे बड़े होते हैं, उनके सपने भी आकार लेने लगते हैं। एक समय ऐसा आता है जब माता-पिता उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होते देखते हैं और गर्व महसूस करते हैं। लेकिन इसी के साथ यह एहसास भी जुड़ा होता है कि अब बच्चे अपनी जिंदगी की नई दिशा की ओर आगे बढ़ रहे हैं। यही बदलाव भावनाओं को और गहरा बना देता है।

    आज की तेज रफ्तार जिंदगी में ऐसे पारिवारिक पल लोगों को रिश्तों की अहमियत का एहसास कराते हैं। सफलता केवल डिग्री या उपलब्धियों से नहीं मापी जाती, बल्कि उन भावनाओं से भी जुड़ी होती है जो उसके साथ चलती हैं। यह पल केवल एक ग्रेजुएशन समारोह नहीं बल्कि एक मां के सपनों, संघर्ष और गर्व की खूबसूरत कहानी बन गया, जिसने लोगों के दिलों को छू लिया।

  • आज तीन पर्वों का संगम: गुड़ी पड़वा, नवरात्रि और उगादी से शुभारंभ होगा हिंदू नववर्ष

    आज तीन पर्वों का संगम: गुड़ी पड़वा, नवरात्रि और उगादी से शुभारंभ होगा हिंदू नववर्ष


    नई दिल्ली । आज हिंदू धर्म के लिए बेहद खास दिन है क्योंकि तीन महत्वपूर्ण पर्व गुड़ी पड़वा नवरात्रि और उगादी एक साथ मनाए जा रहे हैं। उत्तर भारत में यह दिन चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के रूप में नववर्ष की शुरुआत का प्रतीक है जबकि दक्षिण भारत में आंध्र प्रदेश तेलंगाना और कर्नाटक में इसे उगादी के रूप में मनाया जाता है। महाराष्ट्र में यह दिन गुड़ी पड़वा के रूप में नववर्ष की शुरुआत का पर्व है।

    उगादी का महत्व

    उगादी का अर्थ है युग की शुरुआत और इसे प्रकृति के श्रृंगार और नए जीवन का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना प्रारंभ की थी और समय की गणना भी इसी दिन से शुरू हुई थी। यह पर्व नए अवसर समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक है।

    शुभ मुहूर्त

    चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि आज यानी 19 मार्च को सुबह 6:52 से शुरू होकर कल 20 मार्च को शाम 5:52 तक रहेगी। नवरात्रि के पहले दिन घट स्थापना का विशेष महत्व है। घटस्थापना का शुभ मुहूर्त सुबह 6:52 से 8:08 बजे तक है जबकि अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12:22 से 1:11 बजे तक रहेगा।

    गुड़ी बांधने का समय

    महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा के अवसर पर गुड़ी बांधने और ध्वज फहराने का शुभ मुहूर्त सुबह 5:15 से 7:57 बजे तक है। इस दिन लोग अपने घरों को सजाते हैं रंगोली बनाते हैं और विशेष पकवान तैयार करते हैं। गुड़ी पड़वा नई शुरुआत समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक माना जाता है। आज का दिन तीनों पर्वों के संगम और नववर्ष की शुरुआत का प्रतीक है जो पूरे देश में उल्लास और उत्साह के साथ मनाया जाएगा।

  • उज्जैन के सांदीपनि आश्रम में फाग उत्सव:महिलाओं और युवतियों ने फूलों-गुलाल से खेली होली

    उज्जैन के सांदीपनि आश्रम में फाग उत्सव:महिलाओं और युवतियों ने फूलों-गुलाल से खेली होली

    उज्जैन। उज्जैन के सांदीपनि आश्रम में होली के दूसरे दिन फाग उत्सव बड़े भक्तिभाव के साथ मनाया गया। इस दौरान बड़ी संख्या में महिलाओं और युवतियों ने भजन-कीर्तन के बीच फूलों और गुलाल से होली खेली। भगवान श्रीकृष्ण-बलराम की शिक्षा स्थली पर श्रद्धालुओं ने नाचते-गाते हुए उत्सव का आनंद लिया।

    आश्रम परिसर में भजन-कीर्तन की मधुर धुनें गूंजती रहीं। “रंग मत डाले रे कान्हा”, “जुल्म कर डारयो सितम कर डारयो” और “आज ब्रज में होली रे रसिया” जैसे भजनों पर महिलाएं झूमती और नाचती नजर आईं। भक्ति संगीत के बीच पूरा आश्रम परिसर उत्सवमय हो गया और श्रद्धालु भगवान की भक्ति में सराबोर दिखाई दिए।

    उज्जैन को महाकाल की नगरी और भक्ति भाव की नगरी कहा जाता है। यहां अनेक प्राचीन मंदिर और धार्मिक परंपराएं हैं, जिनमें होली का पर्व भी विशेष तरीके से मनाया जाता है। सांदीपनि आश्रम में आयोजित यह फाग उत्सव इन्हीं प्राचीन परंपराओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

    कीर्ति व्यास ने बताया कि होली का पर्व रंगपंचमी तक पांच दिनों तक मनाया जाता है। इसी परंपरा के तहत दूज के दिन भगवान श्रीकृष्ण और बलराम के साथ फूलों और गुलाल से होली खेली जाती है। उन्होंने यह भी बताया कि इस अवसर पर देश-विदेश से श्रद्धालु भी आश्रम पहुंचते हैं और भजन-कीर्तन के बीच फाग उत्सव का आनंद लेते हैं।

    कमला देवी व्यास ने आगे कहा कि सांदीपनि आश्रम में हर साल फाग उत्सव बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। श्रद्धालु भक्ति के रंग में रंगकर इस आयोजन में शामिल होते हैं। यह उत्सव प्रतिवर्ष बड़े आनंद और उल्लास के साथ मनाया जाता है।

  • होलिका दहन पर वामपंथी कलुष

    होलिका दहन पर वामपंथी कलुष


    – कैलाश चन्द्र
    भारत की सांस्कृतिक स्मृति पर जितने हमले बाहरी आक्रांताओं ने नहीं किए, उससे कहीं अधिक गहरे और कहीं अधिक धूर्त हमले आज के वैचारिक उपनिवेशवादियों ने किए हैं। यह हमला तलवारों का नहीं, शब्दों का है। यह आक्रमण सीमाओं का नहीं, स्मृति का है।

    वस्‍तुत: आज जो लोग होली, होलिका दहन और प्रह्लाद की कथा को “ब्राह्मणवाद द्वारा एक दलित नारी को जलाए जाने” की घटना बताकर प्रस्तुत करते हैं, वे न परंपरा जानते हैं और न कथा समझते हैं। वे सिर्फ भारत की सांस्कृतिक संचेतना को उसकी अपनी कहानी से काट देना चाहते हैं।

    होलिका की वास्तविक कथा

    होलिका की कथा जितनी सरल है, उतनी ही गहन भी। कश्यप ऋषि और दिति की पुत्री तथा दिति की संतानों को स्वभाव वैचित्र्य के कारण दैत्य कहा गया है। सम्पूर्ण कथा श्रीमद्भागवत पुराण में बहुत विस्तार से कही गई है। भारतवर्ष में होने वाली अधिकांश भागवत कथाओं में भागवताचार्य अपनी कथा का प्रारम्भ यहीं से करते हैं। इस आधार पर होलिका दैत्यकुल की राजकुमारी व प्रिचिति की पत्नी और स्वरभानु की माता थी। वह एक संपूर्ण दैत्यवंशी, राक्षसी चरित्र है। उसका भाई हिरण्यकश्यप न केवल राजा था बल्कि अत्याचारी, अहंकारी और असुर प्रवृत्ति वाला शासक भी था।

    उसके सामने किसी “शोषित समुदाय” की कथा गढ़ना या उसे “दलित नारी उत्पीड़न” में बदल देना केवल अज्ञान नहीं एक सुनियोजित बौद्धिक छल है, जो भारतीय मिथकीय चेतना को वर्गीय, जातीय और जेंडरवादी चश्मे से दूषित करना चाहता है।

    धर्म और अधर्म का स्पष्ट संदेश

    यहां सत्य सरल है। होलिका किसी “अबला स्त्री” की कथा नहीं है। वह वरदान से सशक्त, छल से प्रेरित और अधर्म की सहायक थी। ब्रह्मा ने उसे अग्नि प्रतिरोध का वरदान दिया था, किन्तु वह वरदान धर्म विरोधी कर्मों के लिए नहीं था। जब वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठती है तो उसका जलना कर्मफल है। यह अन्याय के अंत, अधर्म की पराजय और सत्य की विजय का प्रतीक है।

    यही पुराणों का स्वर है और यही भारतीय संस्कृति की जीवंतता का मूलाधार भी है। पर आज इस कथा को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करने वाले “कल्चरल मार्क्सिज्म” के प्रशिक्षित कार्यकर्ता इसे “ब्राह्मणों द्वारा स्त्री दहन” का उदाहरण बताते हैं। ये उनकी चाल पुरानी है। हर परंपरा को उत्पीडन का प्रमाण बनाओ। हर कथा को वर्ग संघर्ष के ढांचे में फिट करो। हर मूल्य को अपराधबोध में बदलो।

    वे राक्षसी को पीड़‍िता बना देते हैं, दैत्यकुल को जाति समूह कह देते हैं और धर्म-अधर्म की अनंत कथा को सत्ता विरोध के रंग में विकृत कर देते हैं। यही मानसिकता श्रीराम को साम्राज्यवादी, श्रीकृष्ण को चालबाज, माता दुर्गा को पीड़ित स्त्री और श्रीगणेश को उपहास का पात्र बना देती है।

    होलिका दहन का सांस्कृतिक अर्थ

    होलिका दहन का अर्थ किसी व्यक्ति, कुल या जाति का दमन नहीं है। यह जीवन की नकारात्मकता के दहन का संदेश है। यह नव वसंत, नवहर्ष, नई शुरुआत और सत्य के धारण एवं संरक्षण का पर्व है। इसमें प्रह्लाद की विजय, भक्ति की शक्ति और अधर्म के अंत का संदेश निहित है। इसे महिला विरोध, समाज विरोध या सत्ता विरोध की कहानी में बदलना हमारी परंपरा का नहीं बल्कि हमारी स्मृति का अपमान है।

    इतिहास के नाम पर फैलाया गया भ्रम

    भारतीय समाज को बांटने के लिए आज एक विचित्र वैचारिक नाटक रचा जा रहा है। यह कहा जा रहा है कि ‘हिरण्यकश्यप’ शूद्र था, शूद्र तप नहीं कर सकते और गुरुकुल नहीं जा सकते। यह इतिहास नहीं बल्कि वैचारिक क्षुद्रता का प्रमाण है। जिन लोगों ने न शास्त्र पढ़े और न पुराण समझे, वे आज सोशल मीडिया की अधूरी जानकारी के आधार पर एक संपूर्ण सभ्यता को अपराधी सिद्ध करने में लगे हैं।

    भारतीय चेतना का मूल सत्य

    वास्तविकता यह है कि होलिका और हिरण्यकश्यप भारतीय चेतना में सदियों से अहंकार और अधर्म के प्रतीक रहे हैं। गुरुकुलों की शिक्षा में शस्त्र और शास्त्र का अध्ययन करने के बाद अहंकार के कारण वे अधर्म के मार्ग पर चले और भक्त प्रह्लाद सत्य के प्रतीक बने। जो लोग इस सरल सत्य को भी “सामाजिक न्याय” के चश्मे से विकृत करते हैं, वे न्याय के पक्षधर नहीं बल्कि भारतीय समाज को भीतर से तोड़ने वाले मानसिक उपनिवेशवाद के वाहक हैं।

    स्मृति और परंपरा की पुनर्स्थापना

    आज आवश्यकता किसी प्रतिक्रिया या प्रतिशोध की नहीं है। आवश्यकता है तथ्यों की पुनर्स्थापना की। हमें अपनी चेतना में सांस्कृतिक स्मृति को पुनः प्रखर करना होगा। परंपरा को आधुनिक राजनीतिक सिद्धांतों के ढांचे में कैद करने के स्थान पर उसके कालातीत संदेश को समझना होगा। यह संघर्ष एक कथा का न होकर भारतीय तत्वज्ञान, वांग्मय, दर्शन और वैचारिक संप्रभुता का है। इसलिए यह समझना सभी के लिए समान रूप से आवश्‍यक है कि ‘होलिका’ का जलना किसी स्त्री का दहन नहीं है। यह अत्याचार, असहिष्णुता, अधर्म, अनीति और असत्य के दहन का प्रतीक है। उसका अंत किसी समाज पर अत्याचार का नहीं बल्कि अधर्म की पराजय का उत्सव है।

    आज भारत की सभ्यता इस वैचारिक आक्रमण को पहचान चुकी है। वह जानती है कि हमारी परंपराएं हिंसा की नहीं बल्कि समरसता की उपज हैं। होलिका दहन उसी समरसता का उत्सव है, अहंकार के अंत और सत्य के आरंभ का पर्व। अत: हमेशा ही अपने समय में वर्तमान काल की हमारी जिम्मेदारी है कि हम इस वैचारिक धुंध में भी स्पष्ट देख सकें और यह कह सकें कि भारतीय संस्कृति को समझने के लिए भारतीयता चाहिए, न कि वह वैचारिक चश्मा जो हर कथा को संघर्ष, हर पात्र को पीड़‍ित और हर पर्व को अपराध में बदल देता है।

    अंत में यही कि होलिका दहन पर कलुष केवल परंपरा का नहीं बल्कि विवेक का अपमान है। इसे समझना और इस भ्रम को तोड़ना आज केवल सांस्कृतिक कर्तव्य नहीं यह हम सभी की राष्ट्रीय आवश्यकता है।

    (लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता एवं वरिष्‍ठ स्‍तम्‍भकार हैं)