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  • ऑपरेशन अयोध्या’: राम मंदिर के मैनेजमेंट की कमान एयर मार्शल जितेंद्र मिश्र को ही क्यों?

    ऑपरेशन अयोध्या’: राम मंदिर के मैनेजमेंट की कमान एयर मार्शल जितेंद्र मिश्र को ही क्यों?


    नई दिल्ली। अयोध्या में रामलला के भव्य मंदिर का दायरा और श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या देखते हुए अब इसके प्रबंधन में सामान्य प्रशासनिक व्यवस्था के बजाय सख्त अनुशासन और स्पष्ट जवाबदेही की जरूरत महसूस की जा रही है। इसी सोच के तहत श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने पूर्व एयर मार्शल जितेंद्र मिश्र को अपना पहला सीईओ नियुक्त किया है। इसे मंदिर प्रबंधन में नए दौर की शुरुआत के तौर पर देखा जा रहा है। हाल के दिनों में चढ़ावा चोरी और वित्तीय अनियमितताओं को लेकर उठे सवालों के बीच मंदिर की व्यवस्था और श्रद्धालुओं के भरोसे को मजबूत करना उनके सामने बड़ी चुनौती होगी।

    उम्मीद है कि उनके नेतृत्व में मंदिर परिसर में स्पष्ट कमांड स्ट्रक्चर, पारदर्शी डिजिटल ऑडिट और कड़े अनुशासन वाली व्यवस्था विकसित की जाएगी। सैन्य पृष्ठभूमि वाले अधिकारी की नियुक्ति से यह भी उम्मीद की जा रही है कि मंदिर प्रबंधन रोजमर्रा की राजनीतिक बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप से अलग पेशेवर तरीके से काम कर सकेगा।

    भव्य मंदिर के साथ बढ़ी प्रबंधन की चुनौती
    अयोध्या में रामलला के भव्य मंदिर के निर्माण के साथ ही यहां देश-विदेश से श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ने लगा। लाखों श्रद्धालुओं की आवाजाही, रोजाना आने वाला भारी चढ़ावा और मंदिर पर देश-दुनिया की निगाहों ने इसके प्रबंधन को बेहद महत्वपूर्ण बना दिया। ऐसे में चढ़ावा चोरी और वित्तीय अनियमितताओं के आरोप सामने आने के बाद मंदिर व्यवस्था को लेकर सवाल भी उठे।

    इन घटनाओं ने ट्रस्ट के सामने यह चुनौती रखी कि मंदिर जैसे बड़े धार्मिक केंद्र का संचालन ऐसी व्यवस्था से हो, जिसमें अनियमितता की गुंजाइश न्यूनतम हो, हर स्तर पर जवाबदेही तय हो और वित्तीय लेन-देन में पूरी पारदर्शिता बनी रहे।

    एयर मार्शल जितेंद्र मिश्र ही पहली पसंद क्यों?
    ट्रस्ट जब अपने पहले सीईओ की तलाश कर रहा था, तब उम्मीदवार के लिए कुछ स्पष्ट मापदंड तय किए गए थे। उम्मीदवार के पास 20 साल से अधिक का प्रशासनिक अनुभव, सनातनी आचरण और रामभक्त होने के साथ उम्र 50 से 70 वर्ष के बीच होना अपेक्षित था। वरिष्ठ नौकरशाहों और प्रशासनिक अधिकारियों के पास इनमें से कई योग्यताएं थीं, लेकिन पेशेवर अनुशासन, ईमानदारी और कठोर निर्णय क्षमता के लिहाज से सैन्य पृष्ठभूमि को प्राथमिकता मिली।

    सेना की कार्यशैली में स्पष्ट जिम्मेदारी, नियमों का पालन और निर्धारित लक्ष्य के लिए जवाबदेही पर विशेष जोर रहता है। यही गुण मंदिर जैसे बड़े संस्थान के संचालन में भी उपयोगी माने जा रहे हैं।

    एयर मार्शल जितेंद्र मिश्र के पक्ष में उनका अयोध्या क्षेत्र से जुड़ाव भी महत्वपूर्ण माना गया। वे अयोध्या के पास स्थित देवरिया जिले के मूल निवासी हैं। इससे स्थानीय भाषा, संस्कृति और सरयू पार के क्षेत्र से उनका पुराना संबंध रहा है। वे ब्राह्मण परिवार से आते हैं और धार्मिक परंपराओं, कर्मकांडों तथा सनातन मर्यादाओं की समझ को भी उनके चयन के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना गया।

    इसके अलावा पिछले साल पहलगाम आतंकी हमले के जवाब में भारतीय सेनाओं के ऑपरेशन सिंदूर के दौरान उन्होंने वायुसेना के वेस्टर्न कमांड का नेतृत्व किया था। इस अभियान में उनके लड़ाकू विमानों ने बहावलपुर और मुरीदके जैसे आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया। साथ ही पाकिस्तान के 300 किलोमीटर भीतर S-400 एयर डिफेंस सिस्टम से पाकिस्तानी विमान को मार गिराने का रिकॉर्ड भी उनके कार्यकाल से जोड़ा गया।

    इन सभी पहलुओं को देखते हुए ट्रस्ट के सामने मौजूद विकल्पों में एयर मार्शल मिश्र का नाम सबसे मजबूत दावेदार के रूप में उभरा। उनसे उम्मीद की जा रही है कि वे मंदिर की प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित और भरोसेमंद बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

    सैन्य प्रबंधन से कैसे बदल सकती है मंदिर की व्यवस्था?
    सैन्य प्रबंधन की खासियत स्पष्ट जिम्मेदारी, तेज निर्णय और कड़े अनुशासन में मानी जाती है। ऐसे में एयर मार्शल जितेंद्र मिश्र के नेतृत्व में मंदिर की मौजूदा व्यवस्था में कई महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल सकते हैं।

    स्पष्ट कमांड स्ट्रक्चर और जवाबदेही
    सैन्य व्यवस्था में हर अधिकारी और कर्मचारी की भूमिका पहले से तय होती है और किसी भी स्तर पर हुई चूक की जिम्मेदारी निर्धारित की जा सकती है। मंदिर प्रबंधन में भी सुरक्षा, साफ-सफाई, पुजारी वर्ग, आईटी सेल और अकाउंट्स जैसे विभागों की जिम्मेदारियां स्पष्ट की जा सकती हैं। इससे किसी चूक की स्थिति में जिम्मेदारी तय करना आसान होगा और विभाग एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालने से बचेंगे। प्रत्येक प्रमुख विभाग की सीधे सीईओ को रिपोर्टिंग व्यवस्था भी बनाई जा सकती है।

    चढ़ावे का डिजिटल रिकॉर्ड और ऑडिट
    चढ़ावा चोरी के मामले के बाद वित्तीय पारदर्शिता सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में शामिल है। सैन्य संस्थानों में इस्तेमाल होने वाले स्टॉक और फंड मैनेजमेंट मॉडल की तर्ज पर मंदिर में भी व्यवस्था मजबूत की जा सकती है।

    दानपेटियों को खोलने से लेकर चढ़ावे की गिनती और उसे जमा करने तक की पूरी प्रक्रिया हाई-रिजॉल्यूशन कैमरों और बायोमेट्रिक निगरानी के दायरे में लाने का सुझाव पहले ही दिया जा चुका है। प्रत्येक दान का रिकॉर्ड डिजिटल सिस्टम में दर्ज होने और नियमित रीयल-टाइम वित्तीय ऑडिट की व्यवस्था से गड़बड़ी की आशंका कम की जा सकती है।

    जीरो टॉलरेंस और सख्त आचार संहिता
    सैन्य अनुशासन में सिफारिश और लापरवाही के लिए सीमित गुंजाइश होती है। इसी तर्ज पर मंदिर में काम करने वाले कर्मचारियों और सुरक्षाकर्मियों के लिए सख्त आचार संहिता लागू की जा सकती है। किसी भी अनैतिक गतिविधि, वित्तीय गड़बड़ी या श्रद्धालुओं के साथ दुर्व्यवहार की स्थिति में त्वरित कार्रवाई की व्यवस्था मंदिर प्रशासन को अधिक प्रभावी बना सकती है।

    चुनौती सीमा की नहीं, व्यवस्था को दुरुस्त करने की
    एयर मार्शल जितेंद्र मिश्र के सामने ‘ऑपरेशन अयोध्या’ के तहत सबसे बड़ी चुनौती मंदिर की विशाल व्यवस्था को अनुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ संचालित करने की होगी। उनका सैन्य अनुभव सुरक्षा और प्रबंधन के साथ-साथ संकट की स्थिति में त्वरित निर्णय लेने में भी मददगार हो सकता है।

    देवरिया से जुड़े इस पूर्व एयर मार्शल के लिए अयोध्या में रामलला के मंदिर की प्रशासनिक कमान संभालना महज एक नई जिम्मेदारी नहीं, बल्कि बड़ी संस्थागत चुनौती है। यहां मुकाबला किसी सीमा पर नहीं, बल्कि व्यवस्था के भीतर मौजूद खामियों, लापरवाही और अनियमितताओं को दूर करने का है।