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  • नवरात्रि का अंतिम दिन: मां सिद्धिदात्री की महिमा और कथा से मिलेगा सुख समृद्धि और सफलता का आशीर्वाद

    नवरात्रि का अंतिम दिन: मां सिद्धिदात्री की महिमा और कथा से मिलेगा सुख समृद्धि और सफलता का आशीर्वाद


    नई दिल्ली। चैत्र नवरात्रि के अंतिम दिन महानवमी पर मां सिद्धिदात्री पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। यह दिन मां दुर्गा के नौवें और पूर्ण स्वरूप की आराधना का होता है, जिसे सिद्धियों की दात्री कहा गया है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन विधिवत पूजा के बाद उनकी कथा का पाठ करने से साधक की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और जीवन में सुख समृद्धि तथा आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।

    धर्म शास्त्रों के अनुसार मां सिद्धिदात्री सभी प्रकार की सिद्धियां प्रदान करने वाली देवी हैं। कहा जाता है कि शिवने भी मां की कठोर तपस्या की थी, जिससे प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें अष्टसिद्धियां प्रदान कीं। यही कारण है कि भगवान शिव का एक रूप अर्धनारीश्वर कहलाता है, जिसमें वे आधे शिव और आधी शक्ति के रूप में विराजमान हैं।

    पौराणिक कथा के अनुसार जब असुरों का अत्याचार बढ़ गया और देवता परेशान हो उठे, तब सभी देवताओं ने विष्णुऔर भगवान शिव से सहायता की प्रार्थना की। इसके बाद सभी देवताओं के तेज से एक दिव्य शक्ति प्रकट हुई, जिसे मां सिद्धिदात्री कहा गया। यह स्वरूप अत्यंत शक्तिशाली और कल्याणकारी माना जाता है, जो भक्तों के जीवन से भय और बाधाओं को दूर करता है।

    ऐसी मान्यता है कि मां सिद्धिदात्री की आराधना के बिना किसी भी देवी-देवता की पूजा पूर्ण नहीं मानी जाती। देवी हिमालय के शिखर पर विराजमान होकर समस्त सिद्धियों की रक्षा करती हैं और अपने भक्तों को ज्ञान, बुद्धि, स्वास्थ्य और धन का आशीर्वाद प्रदान करती हैं।

    महानवमी के दिन भक्त पूरे श्रद्धा भाव से मां की पूजा करते हैं, कथा सुनते और पढ़ते हैं तथा अंत में आरती कर भोग अर्पित करते हैं। पूजा के समापन पर मां से क्षमा याचना करना भी अत्यंत आवश्यक माना गया है। भक्त विनम्र भाव से प्रार्थना करते हैं कि पूजा में हुई किसी भी त्रुटि को मां क्षमा करें और अपने आशीर्वाद से जीवन को सुखमय बनाएं।

    यह पावन दिन हमें यह संदेश देता है कि सच्ची श्रद्धा, भक्ति और समर्पण से जीवन की हर बाधा दूर की जा सकती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। महानवमी पर मां सिद्धिदात्री की कथा और पूजा से न केवल आध्यात्मिक बल मिलता है बल्कि जीवन में सफलता और संतुलन भी प्राप्त होता है।

  • नवरात्रि तृतीया पर मां चंद्रघंटा की आराधना से मिलेगा साहस और शांति, अपनाएं सही पूजा विधि

    नवरात्रि तृतीया पर मां चंद्रघंटा की आराधना से मिलेगा साहस और शांति, अपनाएं सही पूजा विधि


    नई दिल्ली:चैत्र नवरात्रि के तीसरे दिन मां दुर्गा के तीसरे स्वरूप मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। यह स्वरूप साहस, शांति और शक्ति का अद्भुत प्रतीक माना जाता है। मां के मस्तक पर अर्धचंद्र सुशोभित होता है, जो उन्हें चंद्रघंटा नाम देता है। सिंह पर सवार और दस भुजाओं वाली मां का यह रूप भक्तों के सभी भय और कष्टों को दूर करने वाला माना जाता है।

    मां चंद्रघंटा का स्वरूप जहां एक ओर उग्रता और वीरता का प्रतीक है, वहीं दूसरी ओर यह शांति और संतुलन का संदेश भी देता है। मान्यता है कि इस दिन उनकी पूजा करने से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और आत्मविश्वास, बुद्धि तथा मानसिक शांति में वृद्धि होती है।

    पूजा की शुरुआत ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करके की जाती है। स्वच्छ वस्त्र पहनकर पूजा स्थल पर लाल या सफेद कपड़ा बिछाएं और मां की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। इसके बाद कलश स्थापना करें जिसमें जल, सुपारी, सिक्का और अक्षत डालें। घी का दीपक जलाकर मां को लाल फूल, चंदन, रोली और फल अर्पित करें। नैवेद्य में खीर या हलवा चढ़ाना शुभ माना जाता है। पूजा के दौरान मंत्रों का जाप विशेष महत्व रखता है।

    मां चंद्रघंटा का महामंत्र इस प्रकार है
    या देवी सर्वभूतेषु मां चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः

    बीज मंत्र
    ऐं श्रीं ह्रीं क्लीं चंद्रघंटायै नमः
    या
    ऐं श्रीं शक्तये नमः

    इन मंत्रों का कम से कम 108 बार जाप करने से मन को शांति मिलती है और मां की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

    इसके अलावा चंद्रघंटा स्तोत्र और उपासना मंत्र का पाठ भी अत्यंत फलदायी माना गया है। नियमित रूप से इनका जाप करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

    पूजा करते समय कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना चाहिए। हमेशा पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके पूजा करें। मन को शांत और एकाग्र रखें और किसी भी प्रकार के नकारात्मक विचार से दूर रहें। मां को सफेद या लाल फूल अर्पित करें और सात्विक भोजन का ही सेवन करें।

    माना जाता है कि सच्चे मन से की गई मां चंद्रघंटा की भक्ति से व्यक्ति को निर्भीकता, सफलता और आंतरिक शांति प्राप्त होती है। नवरात्रि का यह तीसरा दिन आत्मबल बढ़ाने और जीवन में स्थिरता लाने का विशेष अवसर माना जाता है।

  • मैहर शारदा मंदिर में चैत्र नवरात्रि पर उमड़ा आस्था का सैलाब, त्रिकूट पर्वत गूंजा जय माता दी से

    मैहर शारदा मंदिर में चैत्र नवरात्रि पर उमड़ा आस्था का सैलाब, त्रिकूट पर्वत गूंजा जय माता दी से


    मैहर। मध्यप्रदेश के मैहर में चैत्र नवरात्रि के पहले दिन आस्था का रंग देखने लायक था। लगभग 600 फीट ऊंचे त्रिकूट पर्वत पर स्थित मां शारदा देवी मंदिर में देशभर से श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ा और हर ओर “जय माता दी” के जयकारे गूंज रहे थे। श्रद्धालु 1060 सीढ़ियों और रोपवे से दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं और भक्ति व उत्साह का माहौल पूरे धाम में छाया रहा।

    मंदिर का पौराणिक महत्व

    माना जाता है कि मां शारदा देवी मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है। पौराणिक कथा के अनुसार माता सती का हार तांडव के दौरान यहीं गिरा था इसी कारण इस स्थान का नाम मैहर पड़ा। मंदिर के प्रधान पुजारी पवन पाण्डेय ने बताया कि मां शारदा “मैं” को हरने वाली हैं अर्थात् हमारे अंदर जो अहंकार और अज्ञान होता है उसे हरने वाली माता हैं।

    आल्हा की परंपरा और पूजा विधि

    लोककथाओं के अनुसार वीर योद्धा आल्हा आज भी ब्रह्ममुहूर्त में माता की प्रथम पूजा करते हैं। कई बार ऐसे प्रमाण मिले हैं जब सुबह मंदिर के पट खोलने पर बत्ती जलती पाई गई या आसपास कभी दिखाई न देने वाले फूल मंदिर में पाए गए। पुजारी पवन पाण्डेय ने बताया कि मां शारदा को नौ दिनों में अलग-अलग रूपों में पूजा जाता है। जो भक्त मंदिर दर्शन के लिए नहीं आ पाते वे मां शारदा के नाम का जप करें और व्रत रखें मां की कृपा बनी रहेगी।

    सुरक्षा और सुविधाएं

    नवरात्रि मेले में भारी भीड़ को देखते हुए प्रशासन ने कड़े सुरक्षा इंतजाम किए हैं। 600 से ज्यादा जवान जिनमें 40 महिला पुलिसकर्मी शामिल हैं 24 घंटे तैयार रहेंगे। इसके अलावा बम स्कॉट की टीमें सिविल ड्रेस में भी लगातार गश्त कर रही हैं। प्रशासन ने सीसीटीवी कैमरे और ड्रोन से निगरानी रखी है जबकि श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए पेयजल स्वास्थ्य और भोजन की व्यवस्था भी सुनिश्चित की गई है। इस प्रकार मैहर में चैत्र नवरात्रि के पहले दिन श्रद्धालुओं ने माता शारदा देवी के दर्शन कर आस्था और भक्ति के साथ नव संवत्सर का स्वागत किया।

  • भक्ति और सात्विकता बनाए रखें, नवरात्रि में इन वस्तुओं से रहें दूर….

    भक्ति और सात्विकता बनाए रखें, नवरात्रि में इन वस्तुओं से रहें दूर….


    नई दिल्ली: चैत्र नवरात्रि 2026 का पर्व न केवल भक्ति और श्रद्धा का प्रतीक है, बल्कि यह आध्यात्मिक अनुशासन और सात्विक जीवनशैली को अपनाने का अवसर भी है। इन नौ दिनों के दौरान देवी मां दुर्गा की पूजा और आराधना के साथ-साथ जीवन में पवित्रता बनाए रखना अनिवार्य माना गया है। धार्मिक शास्त्रों और प्राचीन मान्यताओं के अनुसार नवरात्रि के दौरान कुछ विशेष वस्तुओं की खरीदारी वर्जित होती है, क्योंकि इन्हें अशुभता या नकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है।

    सबसे पहले चमड़े के सामान की बात करें तो नवरात्रि के दौरान बेल्ट, वॉलेट, बैग या जूते जैसी चीज़ें खरीदना अशुभ माना जाता है। चूंकि ये उत्पाद जानवरों की खाल से बनते हैं, इसलिए यह त्योहार उनके उपयोग या खरीदारी के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता। यह पर्व भक्ति, करुणा और आत्म-शुद्धि पर केंद्रित है, और चमड़े की वस्तुएं इस पवित्रता के सिद्धांत के विपरीत मानी जाती हैं।

    इसके अलावा शराब का सेवन या खरीदारी पूरी तरह वर्जित है। नवरात्रि का त्योहार आत्म-अनुशासन, भक्ति और आध्यात्मिक शुद्धि का प्रतीक है, इसलिए शराब जैसी चीज़ें घर के पवित्र माहौल को बिगाड़ सकती हैं। मांसाहारी भोजन, मछली या अंडे जैसी वस्तुओं से भी परहेज़ किया जाता है। इसके बजाय सात्विक और हल्का भोजन प्राथमिकता में रहता है, जो उपवास और प्रार्थना के दौरान शरीर को विषमुक्त करता है।

    काले रंग के कपड़े खरीदने से भी बचा जाता है, क्योंकि काला रंग नकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। नवरात्रि के दौरान लाल, पीला, सफेद जैसे चमकीले और शुभ रंग पहनने की परंपरा है। इसी तरह, धारदार वस्तुएं जैसे चाकू, कैंची या अन्य तेज़ सामान खरीदने से भी बचा जाता है। शास्त्रों के अनुसार ये संघर्ष और नकारात्मकता का प्रतीक होती हैं, जो त्योहार के शांतिपूर्ण और आध्यात्मिक माहौल को प्रभावित कर सकती हैं।

    लोहे की वस्तुएं भी नवरात्रि के दौरान खरीदने योग्य नहीं मानी जातीं। कुछ सांस्कृतिक मान्यताओं के अनुसार लोहे की चीज़ों में भारी और कठोर ऊर्जा होती है, जो भक्ति और शुद्धि के माहौल के विपरीत होती हैं।

    प्याज और लहसुन से भी परहेज़ किया जाता है, क्योंकि इन्हें तामसिक भोजन की श्रेणी में रखा गया है। सात्विक सामग्री का सेवन न केवल स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होता है, बल्कि यह पूजा और प्रार्थना के दौरान मानसिक और आध्यात्मिक शांति भी प्रदान करता है।

    आख़िर में, तंबाकू, सिगरेट, गुटखा या तंबाकू युक्त पान जैसी चीज़ें भी नवरात्रि में वर्जित मानी जाती हैं। यह त्योहार शरीर और मन की शुद्धि, आत्म-अनुशासन और भक्ति की भावना को बढ़ावा देता है, और इन चीज़ों की खरीदारी इसे प्रभावित कर सकती है।

    इसलिए, चैत्र नवरात्रि के नौ पवित्र दिनों में इन वस्तुओं से दूर रहकर आप न केवल मां दुर्गा की कृपा प्राप्त कर सकते हैं, बल्कि अपने जीवन में सात्विकता और आध्यात्मिक शांति भी बनाए रख सकते हैं।

  • चैत्र नवरात्र 2026: डोली में आएंगी मां दुर्गा, हाथी पर होगा प्रस्थान; 72 साल बाद बन रहा विशेष संयोग

    चैत्र नवरात्र 2026: डोली में आएंगी मां दुर्गा, हाथी पर होगा प्रस्थान; 72 साल बाद बन रहा विशेष संयोग

    नई दिल्ली । शक्ति उपासना का महान पर्व चैत्र नवरात्र इस वर्ष 19 मार्च से प्रारंभ होकर 27 मार्च तक मनाया जाएगा। नौ दिनों तक चलने वाले इस पावन पर्व में भक्त मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं। इस बार नवरात्र की शुरुआत गुरुवार से हो रही है जिसके कारण शास्त्रीय मान्यता के अनुसार मां दुर्गा का आगमन डोली पर माना जा रहा है। धार्मिक ग्रंथों में डोली में माता के आगमन को महामारी संघर्ष या प्राकृतिक चुनौतियों का संकेत माना गया है जो समाज को सावधान और सतर्क रहने का संदेश देता है। हालांकि इस बार माता रानी का प्रस्थान हाथी पर होगा जिसे अत्यंत शुभ माना जाता है। हाथी पर माता का गमन अच्छी वर्षा समृद्ध कृषि आर्थिक उन्नति और सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।

    ज्योतिषाचार्यों के अनुसार इस वर्ष चैत्र नवरात्रि कई विशेष ज्योतिषीय संयोगों के कारण और भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। बताया जा रहा है कि लगभग 72 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद ऐसा दुर्लभ योग बन रहा है जब अमावस्या तिथि के साये में ही कलश स्थापना की जाएगी। सामान्यतः प्रतिपदा तिथि में घट स्थापना का विधान होता है लेकिन इस बार सूर्योदय अमावस्या तिथि में होने के कारण शास्त्रों के अनुसार उसी समय विधि-विधान से कलश स्थापना की जाएगी। ज्योतिषाचार्य भोला पंडित के अनुसार यह दुर्लभ संयोग आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत फलदायी माना जाता है।

    हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि 19 मार्च को सुबह 6 बजकर 52 मिनट से प्रारंभ होगी। हालांकि उस समय सूर्योदय अमावस्या तिथि में रहेगा इसलिए शास्त्र सम्मत नियमों के अनुसार उसी अवधि में कलश स्थापना करना शुभ माना जाएगा। इस दिन शुक्ल योग ब्रह्म योग और सर्वार्थ सिद्धि योग का त्रिवेणी संगम भी बन रहा है। ज्योतिषीय दृष्टि से यह महासंयोग भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करने वाला माना जाता है। गुरुवार से पर्व शुरू होने के कारण मां दुर्गा का आगमन डोली पर होगा जिसे चुनौतियों का संकेत माना गया है लेकिन श्रद्धा और विधि-विधान से की गई पूजा जीवन में सुख शांति और समृद्धि के द्वार खोल सकती है।

    नवरात्रि के पहले दिन यानी 19 मार्च को कलश स्थापना के लिए दो विशेष शुभ मुहूर्त बताए गए हैं। पहला श्रेष्ठ मुहूर्त सुबह 6 बजकर 2 मिनट से 8 बजकर 40 मिनट तक रहेगा जबकि दूसरा शुभ समय सुबह 9 बजकर 16 मिनट से 10 बजकर 56 मिनट तक रहेगा। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार इन स्थिर लग्नों में घट स्थापना करने से मां दुर्गा की विशेष कृपा प्राप्त होती है और घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

    नवरात्र पर्व को लेकर धार्मिक स्थलों और मंदिरों में भी तैयारियां शुरू हो गई हैं। हर वर्ष की तरह इस बार भी अंजोरा से लेकर डोंगरगढ़ तक भक्तों की सुविधा के लिए सेवा पंडाल लगाए जाएंगे। मंदिर समितियों और सेवादारों द्वारा व्यवस्थाएं की जा रही हैं ताकि दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो। वहीं जिला प्रशासन ने भी बैठक कर सुरक्षा यातायात और अन्य आवश्यक व्यवस्थाओं को लेकर तैयारियां शुरू कर दी हैं।

    इस तरह चैत्र नवरात्र का यह पावन पर्व न केवल आस्था और भक्ति का प्रतीक है बल्कि विशेष ज्योतिषीय संयोगों के कारण इस वर्ष इसे और भी अधिक महत्वपूर्ण और फलदायी माना जा रहा है।

  • चैत्र नवरात्रि का 3 शुभ योगों में होगा शुभारंभ, जानें तारीख और घटस्थापना का समय

    चैत्र नवरात्रि का 3 शुभ योगों में होगा शुभारंभ, जानें तारीख और घटस्थापना का समय


    नई दिल्ली। चैत्र नवरात्रि हर साल चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से शुरू होती है। ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार, यह नवरात्रि मार्च या अप्रैल में आती है। इस साल चैत्र नवरात्रि मार्च में पड़ रही है, इसलिए इसे लोग “मार्च की नवरात्रि” कह रहे हैं। होली के समापन के बाद यह बड़ा धार्मिक पर्व आता है, जिसमें कलश स्थापना और मां दुर्गा के 9 स्वरूपों की पूजा होती है। पहले दिन माता शैलपुत्री की पूजा की जाती है।

    चैत्र नवरात्रि 2026 की शुरुआत
    हिंदू पंचांग के अनुसार, इस साल चैत्र नवरात्रि 19 मार्च, गुरुवार को सुबह 6:52 बजे से शुरू हो रही है। यह प्रतिपदा तिथि अगले दिन 20 मार्च, शुक्रवार को सुबह 4:52 बजे तक रहेगी। व्रत के लिए इस तिथि की उदयातिथि को शुभ माना गया है। 19 मार्च को कलश स्थापना के साथ पहला व्रत रखा जाएगा।

    3 शुभ योग बन रहे हैं
    चैत्र नवरात्रि 2026 पर तीन शुभ योग शुक्ल, ब्रह्म और सर्वार्थ सिद्धि बन रहे हैं। ये सभी योग विशेष रूप से फलदायी माने जाते हैं।

    कलश स्थापना के लिए शुभ मुहूर्त
    ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, 19 मार्च को कलश स्थापना के लिए दो शुभ मुहूर्त हैं:
    सुबह का मुहूर्त: 6:52 बजे से 7:43 बजे तक (50 मिनट)
    दोपहर का मुहूर्त: 12:05 बजे से 12:53 बजे तक (48 मिनट)

    सुबह के मुहूर्त में कलश स्थापना करना उत्तम माना जाता है। यदि सुबह यह समय न मिले तो दोपहर के अभिजीत मुहूर्त का उपयोग कर सकते हैं।

    पहले दिन के अन्य शुभ मुहूर्त

    ब्रह्म मुहूर्त: 4:51 बजे – 5:39 बजे
    प्रातः संध्या मुहूर्त: 5:15 बजे – 6:26 बजे
    विजय मुहूर्त: 2:30 बजे दोपहर – 3:18 बजे
    गोधूलि मुहूर्त: 6:29 बजे शाम – 6:53 बजे शाम
    सायाह्न संध्या: 6:32 बजे – 7:43 बजे
    अमृत काल: 11:32 बजे रात – 1:03 बजे
    निशिता मुहूर्त: 12:05 बजे रात – 12:52 बजे

    इस प्रकार, इस साल चैत्र नवरात्रि 2026 का शुभारंभ अत्यंत शुभ समय में हो रहा है और कलश स्थापना के लिए सुबह या दोपहर दोनों समय उपयोगी हैं।