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  • चैत्र शुक्ल नवमी 2026: राम जन्मोत्सव की पूजा का सही समय और विधि

    चैत्र शुक्ल नवमी 2026: राम जन्मोत्सव की पूजा का सही समय और विधि


    नई दिल्ली । भारत के हर कोने में मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम के जन्मोत्सव यानी राम नवमी का पर्व बड़े श्रद्धा भाव से मनाया जाता है। साल 2026 में यह तिथि दो दिनों तक रहने के कारण लोगों में व्रत और पूजन की सही तारीख को लेकर भ्रम उत्पन्न हो गया है।

    हिंदू पंचांग के अनुसार नवमी तिथि इस बार 26 मार्च को सुबह 11:48 बजे से शुरू होकर 27 मार्च को सुबह 10:06 बजे तक रहेगी। लेकिन सूर्योदय के समय नवमी तिथि विद्यमान रहने के कारण 27 मार्च को राम नवमी मनाना अधिक शुभ माना जा रहा है। पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 11:13 बजे से दोपहर 1:41 बजे तक निर्धारित किया गया है। इस समय में भगवान राम का पूजन और व्रत विधिपूर्वक संपन्न किया जा सकता है।

    पौराणिक मान्यताओं के अनुसार त्रेतायुग में पृथ्वी पर अत्याचार बढ़ने पर देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने अयोध्या के राजा दशरथ के घर जन्म लेने का निर्णय लिया। राजा दशरथ ने संतान प्राप्ति के लिए पुत्रकामेष्टि यज्ञ कराया। यज्ञ से प्राप्त खीर को कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा ने ग्रहण किया, और इस प्रकार चैत्र शुक्ल नवमी को भगवान श्रीराम का जन्म हुआ। वाल्मीकि रामायण के अनुसार जन्म के समय पांच ग्रह अपनी उच्च राशि में स्थित थे, जो उनके दिव्य स्वरूप और प्रभाव को दर्शाता है।

    साथ ही, चैत्र नवरात्रि के अवसर पर मां दुर्गा की आराधना का विशेष महत्व है। नवरात्रि में श्रद्धालु मां को सोलह श्रृंगार अर्पित करते हैं। इसमें लाल चुनरी, चूड़ी, इत्र, सिंदूर, बिछिया, महावर, मेहंदी, काजल, गजरा, कुमकुम, बिंदी, माला या मंगलसूत्र, पायल, नथ, कान की बाली और फूलों की वेणी शामिल हैं। ये श्रृंगार माता के सौभाग्य, सुंदरता और भक्त के समर्पण का प्रतीक हैं।

    अर्पित की जाने वाली वस्तुओं का भी विशेष महत्व है। अक्षत चावल, अखंडता और समृद्धि का प्रतीक है, लाल पुष्प शक्ति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं, चुनरी श्रद्धा और सम्मान दर्शाती है, सिक्का दान और त्याग का संकेत देता है, जबकि ऋतु फल प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का संदेश देते हैं।

    सच्ची श्रद्धा और विश्वास के साथ की गई पूजा ही जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लाती है। इस साल 2026 में राम नवमी और चैत्र नवरात्रि का संगम भक्तों के लिए विशेष धार्मिक महत्त्व रखता है, इसलिए तय मुहूर्त और विधि के अनुसार पूजन और व्रत करना अत्यंत शुभ माना गया है।

  • चैत्र नवरात्रि के पांचवें दिन मां स्कंदमाता की पूजा और कथा का महत्व

    चैत्र नवरात्रि के पांचवें दिन मां स्कंदमाता की पूजा और कथा का महत्व

    नई दिल्ली । चैत्र नवरात्रि के पावन पर्व का पांचवां दिन मां दुर्गा के दिव्य स्वरूप, मां स्कंदमाता की पूजा के लिए समर्पित है। नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ अलग-अलग रूपों की आराधना की जाती है और प्रत्येक दिन का विशेष आध्यात्मिक महत्व और फल माना जाता है। पांचवे दिन मां स्कंदमाता की पूजा का विशेष महत्व है, जो मातृत्व, करुणा और शक्ति का प्रतीक हैं।

    धार्मिक मान्यता है कि मां स्कंदमाता की पूजा के समय व्रत कथा का पाठ अवश्य करना चाहिए। ऐसा करने से माता प्रसन्न होती हैं और जीवन को सुख-समृद्धि और आनंद से भर देती हैं। मान्यता है कि निःसंतान दंपत्तियों को संतान सुख की प्राप्ति भी होती है। इसी लिए आज मां की पूजा करते समय इस पौराणिक कथा का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है।

    पौराणिक कथा के अनुसार, तारकासुर नामक एक शक्तिशाली असुर था। उसने कठोर तपस्या कर भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न किया और वरदान स्वरूप प्राप्त किया कि उसकी मृत्यु केवल भगवान शिव के पुत्र के हाथों ही संभव होगी। उस समय भगवान शिव गहन तपस्या में लीन थे और माता सती का पुनर्जन्म नहीं हुआ था। इस कारण तारकासुर को विश्वास हो गया कि वह लगभग अमर है।

    वरदान के अहंकार में आकर तारकासुर ने देवताओं और मनुष्यों पर अत्याचार शुरू कर दिया। उसके अत्याचार से परेशान होकर सभी देवता भगवान शिव के पास पहुंचे और उन्हें तपस्या से जगाने का प्रयास किया। इसी बीच माता सती का पुनर्जन्म हुआ और उन्होंने हिमालयराज के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया। माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तप किया।

    देवताओं के प्रयास और माता पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनसे विवाह किया। इसके बाद माता पार्वती ने स्वयं अपने पुत्र भगवान कार्तिकेय (स्कंद) को जन्म दिया और उन्हें युद्ध कौशल और ज्ञान की शिक्षा दी। भगवान कार्तिकेय ने बाद में तारकासुर का वध कर देवताओं को उसके आतंक से मुक्त कराया।

    धार्मिक मान्यता है कि मां स्कंदमाता की श्रद्धा और भक्ति से पूजा करने पर संतान से जुड़ी समस्याएं दूर होती हैं। मां का आशीर्वाद प्राप्त करने से जीवन में सुख-समृद्धि, शांति और संतुलन भी आता है। इसलिए पांचवे दिन माता की पूजा करते समय कथा का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है।

    आज मां स्कंदमाता की पूजा करते समय भक्त कमल पुष्प, फल और मिठाइयों का भोग अर्पित करते हैं। घर और मंदिरों में भजन-कीर्तन और कथा का आयोजन किया जाता है। यह दिन केवल पूजा का अवसर नहीं है, बल्कि आस्था, भक्ति और आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक भी है। व्रत कथा पढ़ने और ध्यानपूर्वक पूजा करने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और सुख-समृद्धि का संचार होता है।

    इसलिए आज के दिन माता स्कंदमाता की पूजा और कथा का पाठ अवश्य करें। इससे न केवल संतान सुख की प्राप्ति होती है, बल्कि जीवन में समृद्धि, आनंद और संतुलन भी आता है। भक्तों के लिए यह अवसर अपने परिवार के लिए सुख और समृद्धि सुनिश्चित करने का भी संदेश है।

  • लक्ष्मी पंचमी 2026: आज करें लक्ष्मी चालीसा का पाठ, घर में आएगी धन धान्य और समृद्धि

    लक्ष्मी पंचमी 2026: आज करें लक्ष्मी चालीसा का पाठ, घर में आएगी धन धान्य और समृद्धि


    नई दिल्ली । चैत्र नवरात्र का पावन पर्व देशभर में भक्ति और आस्था के रंग में रंगा हुआ है। इस दौरान आने वाला एक विशेष दिन है लक्ष्मी पंचमी, जिसे इस साल 23 मार्च 2026 को मनाया जाएगा। इस दिन मां लक्ष्मी की पूजा का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन किए गए पूजन और लक्ष्मी चालीसा के पाठ से घर में धन धान्य, सुख समृद्धि और वैभव का वास होता है।

    लक्ष्मी पंचमी का यह पर्व चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को पड़ता है। इस दिन मां स्कंदमाता के साथ साथ मां लक्ष्मी की विशेष पूजा का विधान है। मान्यता है कि मां लक्ष्मी, जो समृद्धि, धन और सुख समृद्धि की देवी हैं, इस दिन अपने भक्तों पर विशेष कृपा बरसाती हैं। देवी की कृपा से व्यक्ति न केवल भौतिक संपन्नता पाता है, बल्कि ज्ञान, बुद्धि और विवेक की भी प्राप्ति होती है।

    इस अवसर पर व्रतियों और श्रद्धालुओं की परंपरा होती है कि वे सफेद या पीले रंग के वस्त्र पहनकर पूजा अर्चना करें। घर में या मंदिर में कमल पुष्प, फल और मिठाइयों का भोग अर्पित किया जाता है। साथ ही, लक्ष्मी चालीसा का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है। लक्ष्मी चालीसा के पाठ से मनोकामनाओं की पूर्ति होती है और घर में धन संपत्ति और सुख समृद्धि बनी रहती है।

    लक्ष्मी चालीसा का पाठ भक्तों के हृदय में विश्वास और भक्ति का संचार करता है। इसमें माता लक्ष्मी के गुणों और उनके दिव्य रूप का वर्णन है। चालीसा के माध्यम से यह विश्वास प्रकट होता है कि जो व्यक्ति सच्चे मन से इसका पाठ करता है, उसे सभी प्रकार की विपत्तियों और दुखों से मुक्ति मिलती है। इसके साथ ही पुत्र, धन और संतान संपत्ति की प्राप्ति भी होती है।

    धार्मिक ग्रंथों में वर्णित है कि लक्ष्मी चालीसा का पाठ करने वाले को माता लक्ष्मी की विशेष कृपा मिलती है। वे अपने भक्तों के घर में सुख शांति, स्वास्थ्य, वैभव और समृद्धि का वास करती हैं। इसके साथ ही, यह पाठ मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा भी प्रदान करता है। भक्त चालीसा का ध्यानपूर्वक पाठ करें और इसे दूसरों को सुनाने की परंपरा अपनाएं, जिससे शुभ प्रभाव और भी बढ़ जाता है।

    लक्ष्मी पंचमी और लक्ष्मी चालीसा का यह पर्व केवल पूजा का अवसर नहीं है, बल्कि यह भक्ति, श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक भी है। इस दिन घर और मंदिरों में भक्तगण एकत्र होते हैं, भजन कीर्तन करते हैं, और मां लक्ष्मी की कृपा के लिए प्रार्थना करते हैं। इस दिन किए गए उपाय और पाठ से वर्षभर सुख समृद्धि बनी रहती है और घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

    इसलिए आज के दिन लक्ष्मी चालीसा का पाठ करना न केवल धन वैभव और सुख की प्राप्ति का साधन है, बल्कि यह मानसिक शांति और आध्यात्मिक लाभ भी प्रदान करता है। भक्तगण इस दिन माता लक्ष्मी का स्मरण करते हुए पूरे श्रद्धा भाव से पाठ करें और अपने परिवार के लिए समृद्धि और सुख की कामना करें।

  • मां स्कंदमाता के दिव्य रूप के दर्शन से भक्तों में उमड़ी भक्ति और आस्था की लहर

    मां स्कंदमाता के दिव्य रूप के दर्शन से भक्तों में उमड़ी भक्ति और आस्था की लहर


    नई दिल्ली । चैत्र नवरात्र का पावन पर्व देशभर में भक्ति और आस्था के रंग में रंगा नजर आता है। नवरात्र के पांचवे दिन मां दुर्गा के पांचवें स्वरूप मां स्कंदमाता की पूजा का विशेष आयोजन किया जाता है। इस दिन मंदिरों और घरों में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है जो पूरे विश्वास और श्रद्धा के साथ मां का स्मरण करते हैं।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मां स्कंदमाता भगवान कार्तिकेय की माता हैं जिन्हें स्कंद भी कहा जाता है। इसी कारण उन्हें स्कंदमाता के नाम से जाना जाता है। उनका स्वरूप अत्यंत दिव्य और मनमोहक माना जाता है। मां सिंह पर विराजमान रहती हैं और उनके चार भुजाओं से उनका सौंदर्य और शक्ति झलकती है। उनकी एक भुजा में बाल रूप में भगवान कार्तिकेय विराजमान रहते हैं जबकि अन्य हाथों में कमल पुष्प और वरमुद्रा होती है। यह स्वरूप मातृत्व शक्ति और करुणा का अद्भुत संगम दर्शाता है।

    मां स्कंदमाता को कमल के आसन पर विराजमान होने के कारण पद्मासना देवी भी कहा जाता है। धार्मिक ग्रंथों और लोकमान्यताओं के अनुसार उनके सच्चे मन से पूजन करने पर संतान से जुड़ी समस्याएं दूर होती हैं। नि:संतान दंपतियों को संतान प्राप्ति का आशीर्वाद मिलता है। इसके साथ ही माता की कृपा से संतान की उन्नति और सुख समृद्धि की कामना भी पूरी होती है।

    नवरात्र के इस दिन मां स्कंदमाता की पूजा से भक्तों को ज्ञान बुद्धि और विवेक की प्राप्ति होती है। यह आशीर्वाद जीवन में सकारात्मकता और संतुलन बनाए रखने में सहायक होता है। इसलिए पांचवे दिन भक्त विशेष रूप से पीले या सफेद रंग के वस्त्र धारण करते हैं और मां के लिए कमल पुष्प फल और मिठाइयों का भोग अर्पित करते हैं। कई भक्त दुर्गा सप्तशती का पाठ भी करते हैं और भजन कीर्तन के माध्यम से मां की स्तुति करते हैं।

    मंदिरों में इस दिन विशेष आयोजन होते हैं। भजन कीर्तन धार्मिक कार्यक्रम और कथा सरिता के माध्यम से भक्तों का मन आध्यात्मिक अनुभव से भर जाता है। इस अवसर पर लोग अपने परिवार और मित्रों के साथ मां स्कंदमाता की कृपा की कामना करते हैं और एक दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं।

    मां स्कंदमाता की भक्ति से जीवन में सुख शांति और समृद्धि का संचार होता है। माता के आशीर्वाद से मानसिक शक्ति विवेक और ज्ञान की वृद्धि होती है जिससे जीवन में हर क्षेत्र में संतुलन और सफलता मिलती है। इस दिन की पूजा से भक्त यह भी विश्वास रखते हैं कि मां की कृपा से उनकी मनोकामनाएं पूर्ण होंगी और संतान से जुड़ी हर चिंता दूर होगी।

    चैत्र नवरात्र के पांचवे दिन का यह पर्व न केवल धार्मिक महत्व रखता है बल्कि यह आस्था विश्वास और समाजिक एकता का भी प्रतीक है। मां स्कंदमाता के पूजन से हर भक्त अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव की आशा रखता है और मां की दिव्य कृपा को अनुभव करता है। इस पावन अवसर पर श्रद्धालु हर वर्ष की तरह इस साल भी पूरे मनोयोग और विश्वास के साथ मां स्कंदमाता के पूजन में शामिल हुए।

  • चैत्र नवरात्रि पर शिवसिटी में निकली एक किलोमीटर लंबी भव्य चुनरी यात्रा, विशाल भंडारे का भी आयोजन

    चैत्र नवरात्रि पर शिवसिटी में निकली एक किलोमीटर लंबी भव्य चुनरी यात्रा, विशाल भंडारे का भी आयोजन

    भोपाल। राजधानी भोपाल के अरहेड़ी रोड स्थित शिवसिटी कॉलोनी में रविवार को चैत्र नवरात्रि के अवसर पर खेड़ापति हनुमान मंदिर से भव्य चुनरी यात्रा निकाली गई। यात्रा में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया, जिससे पूरे क्षेत्र में धार्मिक उल्लास का माहौल बना रहा।

    जानकारी के अनुसार, अयोध्या नगर से लगे अरहेड़ी रोड की शिवसिटी कॉलोनी से शुरू हुई करीब एक किलोमीटर लंबी इस यात्रा में श्रद्धालु डीजे, ढोल-नगाड़ों और भजन-कीर्तन के साथ आगे बढ़ते रहे। दो दिवसीय धार्मिक कार्यक्रम के तहत भगवान शनिदेव की स्थापना भी की गई। इसके बाद चुनरी यात्रा निकाली गई और श्रद्धालुओं के लिए विशाल भंडारे का आयोजन किया गया।

    इस आयोजन में शिवसिटी के साथ ही शिवालय कॉलोनी और शिवधाम कॉलोनी के नागरिकों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। भक्तिमय वातावरण में संपन्न कार्यक्रम के दौरान हजारों श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया और धार्मिक उत्सव का आनंद लिया।

  • चैत्र नवरात्रि अष्टमी कब है? जानें कन्या पूजन की सारी जानकारी

    चैत्र नवरात्रि अष्टमी कब है? जानें कन्या पूजन की सारी जानकारी


    नई दिल्ली। चैत्र नवरात्रि (Chaitra Navratri) हिन्दू धार्मिक कैलेंडर के अनुसार नौ दिनों तक चलने वाला पावन त्योहार है, जिसमें मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है। इस नौ दिवसीय पूजा में अष्टमी का दिन यानी आठवां दिन और भी ज्यादा महत्पूर्ण माना जाता है। इस दिन लोग माता के आठवें रूप की पूजा करते हैं साथ ही कन्या पूजन भी करते हैं। लेकिन इस नवरात्रि अष्टमी कब पड़ेगी चलिए उसके बारे में जानते हैं।

    चैत्र अष्ठमी कब?
    चैत्र नवरात्रि की अष्टमी 26 मार्च 2026 को पड़ रही है। इस दिन को दुर्गा अष्टमी के नाम से भी जाना जाता है और इसे विशेष रूप से शुभ माना जाता है। अष्टमी के दिन भक्त खास पूजा, कन्या पूजन और सांधी पूजा जैसे धार्मिक अनुष्ठान करते हैं तथा मां दुर्गा से अपने घर-परिवार में सुख, समृद्धि और रक्षा की कामना करते हैं।

    अच्छा मुहूर्त
    25 मार्च को दोपहर में 1 बजकर 51 मिनट पर होगा और 26 तारीख को अष्टमी तिथि सुबह में 11 बजकर 49 मिनट तक रहेगी।11 बजकर 49 मिनट के बाद से ही नवमी तिथि का आरंभ हो जाएगा और 27 मार्च को सुबह में 10 बजकर 8 मिनट पर समाप्त होगी। वहीं, नवरात्रि दशमी तिथि 28 मार्च को सुबह में 8 बजकर 46 मिनट पर समाप्त होगी। इस दिन नवरात्रि व्रत पारण भी किया जाएगा।


    जानें पूजा विधि

    इस दिन सुबह स्नान करके सफेद या लाल वस्त्र पहनें।घर या मंदिर में मां दुर्गा की मूर्ति स्थापित करें।
    दीपक जलाएं और माँ को लाल चावल, फूल, मिठाई, फल आदि अर्पित करें।दुर्गा सप्तशती के अष्टम अध्याय का पाठ या देवी मंत्र का जाप करें।पूजा के अंत में प्रसाद और फूल कन्याओं को अर्पित करें।इसके बाद उन्हें भोजन कराएं और उनका आशीर्वाद लें। माता रानी प्रसन्न होकर अपनी कृपा आप पर बनाएं रखती हैं।

  • Chaitra Navratri 2026: उज्जैन के महाकाल वन क्षेत्र में मां हरसिद्धि मंदिर माता सती की कोहनी से लेकर 51 शक्तिपीठों की महिमा तक

    Chaitra Navratri 2026: उज्जैन के महाकाल वन क्षेत्र में मां हरसिद्धि मंदिर माता सती की कोहनी से लेकर 51 शक्तिपीठों की महिमा तक


    उज्जैन। सप्तपुरियों में स्थित प्राचीन धर्म नगरी उज्जैन में मां हरसिद्धि मंदिर देश के 51 शक्तिपीठों में से एक है। कहा जाता है कि इसी स्थल पर देवी सती का दाहिना हाथ  कोहनी का अंश गिरा था, जिससे यह स्थान अत्यंत पवित्र माना जाता है।

    मंदिर का स्थान और विशेषताएँ

    स्थान: महाकाल वन क्षेत्र, रुद्रसागर के किनारे मुख्य आकर्षण: 51 फीट ऊँचे दो दीप स्तंभ, जिन पर प्रतिदिन संध्या समय दीप प्रज्वलित होते हैं धार्मिक महत्व: यह स्थल तंत्र साधना और महालक्ष्मी-महासरस्वती के संयुक्त स्वरूप के लिए प्रसिद्ध है

    सम्राट विक्रमादित्य और माता हरसिद्धि सम्राट विक्रमादित्य माता हरसिद्धि के अनन्य भक्त थे। उन्होंने अपनी कृपा प्राप्त करने हेतु 11 बार अपने मस्तक की बलि दी, जो हर बार पुनः जुड़ गया। 12वीं बार जब सिर नहीं जुड़ा, माना गया कि उनका शासन सम्पूर्ण हुआ। इस स्थान को परमार वंशीय राजाओं की कुलदेवी का स्थान भी कहा जाता है। मंदिर के पीछे सिरसिन्दूर चढ़े हुए रखे हैं, जिन्हें विक्रमादित्य के सिर के रूप में जाना जाता है।

    देवी हरसिद्धि का नामकरण और दैत्य वध

    कीवदंति अनुसार, उज्जैन की रक्षा के लिए कई देवीयाँ तैनात हैं, जिनमें हरसिद्धि देवी प्रमुख हैं।  पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार, दैत्य चण्ड और मुण्ड कैलाश पर कब्जा करने आए। शिवजी के आदेश पर देवी चंडी ने उनका वध किया। शंकरजी ने प्रसन्न होकर कहा कि आपने दुष्टों का वध किया, इसलिए आपका नाम हरसिद्धि से प्रसिद्ध होगा।

    शक्तिपीठ का महत्व

    उज्जैन स्थित माता हरसिद्धि शक्तिपीठ में माता सती की दाहिनी कोहनी गिरने के कारण यह स्थान प्रमुख माना जाता है।यह शक्तिपीठ भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से खंडित सती से संबंधित है और श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत पवित्र है।

  • चैत्र नवरात्रि में उज्जैन का हरसिद्धि मंदिर बनता है आस्था का महापर्व स्थल जहां पूरी होती हैं मन की हर मुराद

    चैत्र नवरात्रि में उज्जैन का हरसिद्धि मंदिर बनता है आस्था का महापर्व स्थल जहां पूरी होती हैं मन की हर मुराद

    मध्य प्रदेश के धार्मिक और ऐतिहासिक नगर उज्जैन में स्थित हरसिद्धि माता मंदिर न केवल आस्था का केंद्र है बल्कि यह आध्यात्मिक ऊर्जा और विश्वास का एक अद्भुत संगम भी माना जाता है चैत्र नवरात्रि के अवसर पर यहां भक्तों की अपार भीड़ उमड़ती है और पूरा वातावरण भक्ति और श्रद्धा से भर जाता है इस मंदिर को 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है और इसका संबंध सम्राट विक्रमादित्य की आस्था और भक्ति से भी जुड़ा हुआ है

    हरसिद्धि माता मंदिर विश्व प्रसिद्ध महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग से कुछ ही दूरी पर स्थित है और इसकी ऐतिहासिकता हजारों वर्षों पुरानी बताई जाती है मान्यता है कि माता सती की दाहिनी कोहनी यहां गिरी थी जिसके कारण यह स्थान अत्यंत पवित्र माना जाता है और इसे मंगल चंडी शक्ति स्थल के रूप में जाना जाता है यहां माता को विशेष सिद्धि प्रदान करने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है

    चैत्र नवरात्रि के दौरान मंदिर में विशेष पूजा अर्चना का आयोजन होता है पहले दिन प्रातःकाल मंदिर के पट खोले जाते हैं और विधिवत पूजा की शुरुआत होती है शैलपुत्री माता की आराधना के साथ घट स्थापना की जाती है और इसके बाद नौ दिनों तक क्रमशः सभी नौ देवियों की पूजा की जाती है इस दौरान मंदिर का वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो जाता है और दूर दूर से श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं

    हरसिद्धि मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहां की विशाल दीपमाला है जिसे सम्राट विक्रमादित्य द्वारा स्थापित किया गया माना जाता है इस दीपमाला में लगभग 51 फीट ऊंचे दो दीप स्तंभ हैं जिनमें एक साथ 1011 दीपक प्रज्वलित किए जाते हैं दीपों की यह ज्योति न केवल दृश्य रूप से आकर्षक होती है बल्कि इसे अत्यंत शुभ और पवित्र भी माना जाता है पहले यह दीपमाला केवल नवरात्रि के दौरान ही प्रज्वलित की जाती थी लेकिन अब श्रद्धालुओं की आस्था और बुकिंग के चलते इसे नियमित रूप से जलाया जाने लगा है

    भक्तों की मान्यता है कि संध्या आरती के समय जब दीपमाला प्रज्वलित होती है और भक्त माता के सामने अपनी मनोकामना रखते हैं तो वह अवश्य पूर्ण होती है इसी विश्वास के कारण नवरात्रि के दिनों में मंदिर में भारी भीड़ रहती है और श्रद्धालु विशेष रूप से दीप जलाने के लिए पहुंचते हैं

    सम्राट विक्रमादित्य को इस मंदिर का प्रमुख भक्त और संरक्षक माना जाता है कहा जाता है कि उन्होंने यहां माता की कठोर तपस्या की और माता ने उन्हें विशेष कृपा प्रदान की जिसके बाद वे महान और न्यायप्रिय शासक बने यह कथा आज भी लोगों को प्रेरित करती है और उनकी आस्था को और भी मजबूत बनाती है

    नवरात्रि के नौ दिनों में मंदिर का हर कोना भक्ति के रंग में रंगा रहता है भजन कीर्तन और मंत्रोच्चार से वातावरण गूंजता रहता है और श्रद्धालु माता की कृपा पाने के लिए पूरे मन से पूजा अर्चना करते हैं हरसिद्धि माता का यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं बल्कि आस्था विश्वास और आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक है जहां हर भक्त अपनी मनोकामना लेकर आता है और उसे पूर्ण होने की आशा के साथ लौटता है

  • चैत्र नवरात्रि: वैष्णो देवी यात्रा में उमड़ेगी भीड़…श्राइन बोर्ड ने कसी कमर, ID के बिना No एंट्री

    चैत्र नवरात्रि: वैष्णो देवी यात्रा में उमड़ेगी भीड़…श्राइन बोर्ड ने कसी कमर, ID के बिना No एंट्री


    कटड़ा।
    आगामी 19 मार्च से शुरू होने जा रहे चैत्र नवरात्र (Chaitra Navratri) के दौरान वैष्णो देवी (Vaishno Devi ) आने वाले श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड (Shri Mata Vaishno Devi Shrine Board) ने कमर कस ली है। उपराज्यपाल के निर्देशों के बाद सीईओ सचिन कुमार वैश्य की अध्यक्षता में हुई उच्च स्तरीय बैठक में सुरक्षा, भीड़ नियंत्रण और आपदा प्रबंधन की समीक्षा की गई।

    सोमवार को बैठक में निर्णय लिया गया कि यात्रा मार्ग पर आरएफआईडी कार्ड प्रणाली का सख्ती से पालन किया जाएगा। केवल वैध कार्ड धारकों को ही भवन की ओर जाने की अनुमति मिलेगी। प्रमुख चौकियों पर अतिरिक्त सुरक्षा कर्मियों की तैनाती होगी ताकि भीड़ को नियंत्रित किया जा सके। रियासी पुलिस, सीआरपीएफ और सेना के समन्वय से मजबूत सुरक्षा ग्रिड तैयार किया गया है, जिसमें त्वरित प्रतिक्रिया दल (क्यूआरटी) भी शामिल होगा।

    इस बार तीर्थस्थल की सजावट में प्राकृतिक सामग्रियों के उपयोग पर जोर दिया गया है ताकि आग के खतरे को कम किया जा सके। अग्निशमन विभाग को पूरे ट्रैक का फायर ऑडिट करने और रणनीतिक स्थानों पर दमकल वाहनों की तैनाती सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।


    भीड़ प्रबंधन पर वैकल्पिक व्यवस्था

    अधिक भीड़ होने की स्थिति में श्रद्धालुओं को वैकल्पिक मार्गों पर भेजा जाएगा। शहर में यातायात सुचारू रखने के लिए अवैध रूप से पार्क किए गए वाहनों को हटाने के लिए विशेष अभियान चलाया जाएगा। एकीकृत कमान एवं नियंत्रण केंद्र के माध्यम से आधुनिक वायरलेस उपकरणों द्वारा पूरे मार्ग की रियल टाइम निगरानी की जाएगी।


    सेवा प्रदाताओं का होगा सत्यापन

    श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए यात्रा मार्ग पर चलने वाले पिठू,पालकी और पोनीवालों का सत्यापन किया जाएगा। फर्जीवाड़े को रोकने के लिए दस्तावेजों की नियमित जांच होगी, ताकि केवल अधिकृत व्यक्ति ही सेवा दे सकें। सीईओ ने कहा कि हमारा लक्ष्य श्रद्धालुओं को सुरक्षित और आध्यात्मिक वातावरण प्रदान करना है। सभी विभाग आपसी समन्वय के साथ काम कर रहे हैं ताकि नवरात्र के दौरान यात्रा निर्बाध रूप से चले।


    देसी-विदेशी फूलों से महकेगा भवन, स्वर्ग सा दिखेगा नजारा

    आगामी 19 मार्च से शुरू होने वाले पावन चैत्र नवरात्रके लिए विश्व प्रसिद्ध श्री माता वैष्णो देवी भवन को अलौकिक रूप दिया जा रहा है। श्राइन बोर्ड के मार्गदर्शन में पूरे भवन परिसर, प्राचीन गुफा और अटका स्थल की सजावट का काम युद्धस्तर पर जारी है। इस बार की सजावट में करीब 30 से 40 ट्रक देसी-विदेशी फूलों और 4 से 5 ट्रक फलों का उपयोग किया जा रहा है, जिसे 300 से अधिक विशेष कारीगर अंतिम रूप दे रहे हैं। इस बार की सजावट केवल फूलों तक सीमित नहीं है। यात्रियों के लिए भव्य पंडाल और झांकियां सजाई जा रही हैं, जिनमें शिव परिवार, राम दरबार, मां वैष्णो देवी के नौ रूप और विष्णु-लक्ष्मी के पंडाल शामिल हैं। अयोध्या के रामलला के दर्शन की झलक भी आकर्षित करेगी। माता की स्वर्ण जड़ित प्राचीन गुफा और अटका स्थल को विशेष रोशनी और सुगंधित पुष्पों से सजाया जा रहा है।

    नवरात्र के दौरान यज्ञशाला में विशाल शतचंडी महायज्ञ का आयोजन होगा। पद्मश्री डॉ. विश्वमूर्ति शास्त्री के सानिध्य में 51 पंडित मंत्रोच्चारण के साथ हवन करेंगे। ऐसा ही धार्मिक अनुष्ठान अर्धकुंवारी मंदिर प्रांगण में भी आयोजित किया जाएगा।

    सुरक्षा के लिए पांच जोन और कंट्रोल सेंटर से निगरानी
    सुरक्षा की दृष्टि से कटड़ा से लेकर भवन तक इलाके को पांच जोन (कटड़ा, बाणगंगा, अर्धकुंवारी, ताराकोट-सांझीछत और भवन) में बांटा गया है। चप्पे-चप्पे पर सुरक्षा बलों और पुलिस की गश्त बढ़ा दी गई है। इंटीग्रेटेड कंट्रोल सेंटर के माध्यम से पूरी यात्रा मार्ग पर 24 घंटे नजर रखी जा रही है। श्राइन बोर्ड के सभी भोजनालयों में श्रद्धालुओं के लिए विशेष फलाहार की व्यवस्था रहेगी।


    ऑनलाइन बुकिंग फुल, चार लाख भक्तों की उम्मीद

    नवरात्र के लिए उत्साह ऐसा है कि हेलीकॉप्टर, बैटरी कार, रोपवे और भवन पर रुकने की ऑनलाइन बुकिंग अभी से फुल हो चुकी है। श्राइन बोर्ड को इस बार तीन से चार लाख श्रद्धालुओं के आने की उम्मीद है। दिव्यांग और बुजुर्ग यात्रियों के लिए निहारीका परिसर में विशेष सहायता केंद्र स्थापित किए गए हैं। सीईओ सचिन कुमार वैश्य ने बताया कि श्राइन बोर्ड श्रद्धालुओं की सेवा के लिए पूरी तरह तत्पर है। भक्त बिना किसी परेशानी के मां के दरबार आएं, सभी उचित इंतजाम सुनिश्चित किए गए हैं।

  • गुड़ी पड़वा 2026: 19 मार्च को मनाया जाएगा हिंदू नववर्ष, जानिए गुड़ी स्थापना और तेल स्नान का महत्व

    गुड़ी पड़वा 2026: 19 मार्च को मनाया जाएगा हिंदू नववर्ष, जानिए गुड़ी स्थापना और तेल स्नान का महत्व


    नई दिल्ली । हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को गुड़ी पड़वा का पर्व मनाया जाता है। वर्ष 2026 में यह पर्व 19 मार्च को मनाया जाएगा। इसी दिन से हिंदू नववर्ष नवसंवत्सर 2083 की शुरुआत मानी जाती है और चैत्र नवरात्रि का भी आरंभ होता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी तिथि पर सृष्टि की रचना भगवान Brahma ने की थी इसलिए इसे नए साल की शुरुआत के रूप में मनाया जाता है। महाराष्ट्र में इस पर्व को विशेष उत्साह के साथ मनाया जाता है जहां इसे गुड़ी पड़वा कहा जाता है। वहीं कर्नाटक में इसे युगादी और आंध्र प्रदेश तथा तेलंगाना में उगादी के नाम से जाना जाता है।

    गुड़ी स्थापना की परंपरा

    गुड़ी पड़वा के दिन घरों में गुड़ी स्थापित करने की परंपरा है। गुड़ी को विजय समृद्धि और नए वर्ष के स्वागत का प्रतीक माना जाता है। इसे घर के मुख्य द्वार छत या किसी ऊंचे स्थान पर लगाया जाता है ताकि वह दूर से दिखाई दे सके। गुड़ी बनाने के लिए बांस के डंडे पर सुंदर कपड़ा बांधा जाता है और उस पर आम तथा नीम की पत्तियां फूल और ऊपर उल्टा चांदी तांबे या पीतल का कलश लगाया जाता है।

    तेल स्नान का महत्व
    गुड़ी पड़वा की सुबह जल्दी उठकर सुगंधित तेल से स्नान करने की परंपरा भी प्रचलित है। माना जाता है कि इससे शरीर की अशुद्धियां दूर होती हैं रक्त संचार बेहतर होता है और व्यक्ति सकारात्मक ऊर्जा के साथ नए वर्ष की शुरुआत करता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन तेल स्नान करने से Lakshmi की कृपा प्राप्त होती है और घर में सुख-समृद्धि आती है।

    पारंपरिक व्यंजनों से होता है नए साल का स्वागत

    गुड़ी पड़वा के अवसर पर महाराष्ट्र में श्रीखंड पुरण पोली राइस चकली और भाकरवड़ी जैसे पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं। परिवार और रिश्तेदारों के साथ इन पकवानों का आनंद लेते हुए लोग नए साल का स्वागत करते हैं और एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं।