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  • होर्मुज पर ‘वॉल ऑफ स्टील’ का दावा, ईरान को ट्रंप की खुली चुनौती; सीजफायर पर भी नहीं बनी बात

    होर्मुज पर ‘वॉल ऑफ स्टील’ का दावा, ईरान को ट्रंप की खुली चुनौती; सीजफायर पर भी नहीं बनी बात


    वॉशिंगटन।
    ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कम होने के बजाय बयानबाजी के स्तर पर बढ़ता दिखाई दे रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर बड़ा दावा करते हुए कहा है कि इस रणनीतिक समुद्री मार्ग पर अमेरिका का पूरा नियंत्रण है। उन्होंने अमेरिकी नौसैनिक तैनाती को ‘वॉल ऑफ स्टील’ यानी ‘फौलादी दीवार’ बताया है।

    ट्रंप ने सोशल मीडिया पोस्ट में ईरान पर तीखा हमला बोला और दावा किया कि अमेरिका ने होर्मुज के आसपास अपनी नौसैनिक शक्ति को इस तरह तैनात किया है कि ईरान के लिए इसे भेदना आसान नहीं होगा। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि अमेरिका का नियंत्रण आगे भी कायम रह सकता है।

    क्या है ‘वॉल ऑफ स्टील’?

    ‘वॉल ऑफ स्टील’ से ट्रंप का आशय स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास अमेरिकी नौसैनिक शक्ति की तैनाती से है। फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच स्थित यह समुद्री मार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। दुनिया के तेल कारोबार का एक बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है।

    अमेरिकी नौसेना की मौजूदगी और समुद्री निगरानी को लेकर ट्रंप का दावा ऐसे समय में आया है जब होर्मुज में तनाव का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय तेल आपूर्ति और समुद्री व्यापार पर पड़ सकता है।

    ईरान की सैन्य क्षमता पर ट्रंप का दावा

    ट्रंप ने अपने बयान में ईरान की सैन्य क्षमता को लेकर भी कई दावे किए। उन्होंने कहा कि अमेरिकी कार्रवाई और प्रतिबंधों के कारण ईरान की आर्थिक और सैन्य स्थिति कमजोर हुई है। उन्होंने ईरान की नौसेना और वायुसेना की क्षमता पर सवाल उठाते हुए इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) को भी निशाने पर लिया।

    हालांकि, ट्रंप के इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। ईरान की ओर से भी अमेरिका के आरोपों और दावों पर लगातार तीखी प्रतिक्रिया सामने आती रही है।

    सीजफायर बढ़ाने पर ईरान का इनकार

    इस बीच अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष विराम को आगे बढ़ाने की संभावनाओं को भी झटका लगा है। मीडिया रिपोर्टों में पाकिस्तान की मध्यस्थता से दोनों देशों के बीच अस्थायी सीजफायर बढ़ाने को लेकर बातचीत की बात कही गई थी।

    ईरान ने हालांकि इन दावों को खारिज कर दिया। ईरानी सूत्रों के मुताबिक, अमेरिका के साथ सीजफायर बढ़ाने को लेकर कोई बातचीत नहीं हुई है। तेहरान का आरोप है कि पहले हुए अंतरिम समझौते का अमेरिका ने उल्लंघन किया था।

    होर्मुज पर टिकी दुनिया की नजर

    स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की रणनीतिक अहमियत के कारण अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव पर पूरी दुनिया की नजर है। इस मार्ग में किसी भी तरह का सैन्य टकराव या लंबे समय तक व्यवधान वैश्विक ऊर्जा बाजार, तेल की कीमतों और अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार को प्रभावित कर सकता है।

    फिलहाल ट्रंप के ‘वॉल ऑफ स्टील’ वाले दावे और ईरान के सीजफायर से इनकार के बाद दोनों देशों के बीच तनाव कम होने के संकेत नहीं दिख रहे हैं।

  • रूस ने चली क्रिप्टो वाली चाल, डॉलर के दबदबे को चुनौती; क्या ट्रंप की आर्थिक धमकियों का निकलेगा तोड़?

    रूस ने चली क्रिप्टो वाली चाल, डॉलर के दबदबे को चुनौती; क्या ट्रंप की आर्थिक धमकियों का निकलेगा तोड़?


    नई दिल्ली।
    दुनिया की आर्थिक ताकत सिर्फ हथियारों और सैन्य क्षमता से तय नहीं होती, बल्कि वैश्विक कारोबार में किस मुद्रा का दबदबा है, यह भी किसी देश की ताकत को तय करता है। पिछले कई दशकों से अमेरिकी डॉलर अंतरराष्ट्रीय व्यापार और भुगतान व्यवस्था का सबसे बड़ा आधार रहा है। तेल-गैस की खरीद से लेकर देशों के बीच बड़े कारोबारी लेनदेन तक, डॉलर की भूमिका बेहद अहम रही है। इसी वजह से अमेरिका को आर्थिक प्रतिबंधों के जरिए दूसरे देशों पर दबाव बनाने की ताकत भी मिलती है।

    अब रूस ने इसी व्यवस्था से अपनी निर्भरता कम करने की दिशा में एक और कदम बढ़ाया है। रूस ने विदेशी व्यापार में क्रिप्टोकरेंसी के इस्तेमाल को कानूनी दायरे में लाने का रास्ता खोल दिया है। रूस का यह कदम पश्चिमी प्रतिबंधों और डॉलर आधारित वित्तीय व्यवस्था के विकल्प तलाशने की उसकी लंबे समय से चल रही कोशिश का हिस्सा माना जा रहा है।

    विदेशी व्यापार में क्रिप्टो का रास्ता खुला

    नए प्रावधानों के तहत रूसी कंपनियों को कुछ अंतरराष्ट्रीय लेनदेन में डिजिटल करेंसी के इस्तेमाल की अनुमति मिल सकती है। यानी रूस और किसी दूसरे देश की कंपनी आपसी सहमति से कुछ भुगतान डॉलर के बजाय क्रिप्टो के माध्यम से कर सकती हैं।

    रूस के लिए इसका महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका और यूरोपीय देशों ने उस पर कई तरह के आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं। पश्चिमी बैंकिंग व्यवस्था और डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए रूस लगातार वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों की तलाश करता रहा है।

    डॉलर की ताकत सिर्फ मुद्रा नहीं, पूरा सिस्टम है

    अमेरिका की आर्थिक ताकत केवल डॉलर की वैश्विक मांग से नहीं आती। इसके पीछे अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग और भुगतान व्यवस्था का भी बड़ा योगदान है। यदि किसी देश की इस व्यवस्था तक पहुंच सीमित कर दी जाए तो उसके लिए विदेशों से पैसा भेजना और प्राप्त करना मुश्किल हो सकता है।

    रूस पिछले कुछ वर्षों में इसी चुनौती का सामना कर रहा है। ऐसे में डिजिटल करेंसी उसके लिए एक वैकल्पिक भुगतान माध्यम बन सकती है। क्रिप्टो आधारित लेनदेन में पारंपरिक बैंकिंग चैनलों पर निर्भरता कुछ मामलों में कम हो सकती है।

    क्या इससे अमेरिका के आर्थिक दबदबे को चुनौती मिलेगी?

    अगर आने वाले समय में अधिक देश डॉलर के अलावा स्थानीय मुद्राओं, डिजिटल करेंसी या क्रिप्टो के जरिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार करने लगते हैं तो डॉलर की वैश्विक मांग पर असर पड़ सकता है। रूस के साथ चीन, ईरान और दूसरे देश भी वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे हैं।

    हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि डॉलर का दबदबा तुरंत खत्म हो जाएगा। आज भी वैश्विक व्यापार और वित्तीय व्यवस्था में अमेरिकी मुद्रा की भूमिका बेहद मजबूत है। इसलिए क्रिप्टो या स्थानीय मुद्राओं के बढ़ते इस्तेमाल को डॉलर के लिए तत्काल खतरे के बजाय लंबी अवधि में उभरते विकल्प के तौर पर देखना ज्यादा सही होगा।

    भारत के लिए क्या बदल सकता है?

    भारत भी कई देशों के साथ स्थानीय मुद्राओं में कारोबार बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है। रूस के साथ रुपये और रूबल में व्यापार की व्यवस्था को लेकर भी प्रयास किए गए हैं।

    अगर भविष्य में डिजिटल करेंसी और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ज्यादा स्वीकार्य होती हैं, तो भारत के लिए भी डॉलर पर निर्भरता कम करने के कुछ नए रास्ते खुल सकते हैं। इससे कुछ लेनदेन में मुद्रा बदलने की लागत और भुगतान में लगने वाला समय कम करने की संभावना बन सकती है।

    लेकिन भारत की नीति निजी क्रिप्टोकरेंसी के बजाय अपने सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी यानी ई-रुपये पर ज्यादा केंद्रित है। भारत में क्रिप्टो को आधिकारिक मुद्रा का दर्जा नहीं मिला है और इसके इस्तेमाल पर कड़े टैक्स नियम लागू हैं।

    क्रिप्टो के साथ जोखिम भी कम नहीं

    क्रिप्टोकरेंसी को अंतरराष्ट्रीय व्यापार का बड़ा माध्यम बनाने में सबसे बड़ी चुनौतियों में इसकी कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव भी शामिल है। बिटकॉइन जैसी क्रिप्टोकरेंसी की कीमत कम समय में काफी ऊपर-नीचे हो सकती है। ऐसे में अरबों डॉलर के व्यापार के लिए इसका इस्तेमाल जोखिम भरा हो सकता है।

    इसी वजह से भविष्य में स्टेबलकॉइन या सरकार समर्थित डिजिटल करेंसी ज्यादा व्यावहारिक विकल्प बन सकती हैं। इसके लिए सिर्फ कानूनी मंजूरी पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि अंतरराष्ट्रीय नियम, भरोसा, सुरक्षा और मजबूत तकनीकी ढांचा भी जरूरी होगा।

    दुनिया को रूस का क्या संदेश?

    रूस का कदम वैश्विक अर्थव्यवस्था में बढ़ते बदलाव की ओर इशारा करता है। चीन अपनी मुद्रा युआन के अंतरराष्ट्रीय इस्तेमाल को बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। ब्रिक्स देशों के बीच भी वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों और स्थानीय मुद्राओं में कारोबार को लेकर चर्चा होती रही है।

    ऐसे में क्रिप्टोकरेंसी, डिजिटल करेंसी और नई भुगतान तकनीकें आने वाले वर्षों में वैश्विक आर्थिक राजनीति का अहम हिस्सा बन सकती हैं। हालांकि, सिर्फ क्रिप्टो के इस्तेमाल से अमेरिकी आर्थिक दबदबा खत्म हो जाएगा, यह दावा फिलहाल जल्दबाजी होगा। लेकिन रूस का कदम यह जरूर दिखाता है कि दुनिया एक ऐसी वित्तीय व्यवस्था की ओर बढ़ने की कोशिश कर रही है, जिसमें किसी एक देश की मुद्रा और भुगतान प्रणाली पर निर्भरता कम हो।

  • US के लिए लंबी और महंगी चुनौती साबित हो सकता है ईरान युद्ध… अमेरिकी रणनीतिकार नहीं लगा पाए अंदाजा

    US के लिए लंबी और महंगी चुनौती साबित हो सकता है ईरान युद्ध… अमेरिकी रणनीतिकार नहीं लगा पाए अंदाजा


    तेहरान।
    पश्चिम एशिया (West Asia) में छिड़ा संघर्ष अब ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है, जिसकी कल्पना शायद अमेरिकी युद्ध नीतिकारों (American War Policymakers) ने नहीं की थी। ऑपरेशन एपिक फ्यूरी (Operation Epic Fury) के जरिये खामनेई के खात्मे के बाद यह युद्ध अमेरिका के लिए किसी त्वरित जीत के बजाय एक लंबी और महंगी चुनौती साबित हो सकता है। ईरान की रणनीति अमेरिका को लंबे और थका देने वाले युद्ध की ओर धकेलने की दिख रही है। अमेरिकी अड्डों पर हुए मिसाइल हमलों और कुवैत में कई लड़ाकू विमान गिराए जाने की सूचनाओं ने वाशिंगटन की वॉर गेमिंग पर सवाल खड़े किए हैं। अमेरिका सऊदी अरब के तेल क्षेत्रों और व्यापारिक केंद्रों की सुरक्षा ढाल बनने में नाकाम रहा है। यह अमेरिकी योजना के बिल्कुल विपरीत है।


    ईरान की रणनीति

    ईरान की रणनीति वॉर ऑफ एट्रिशन यानी लंबे और थकाऊ युद्ध की है। अमेरिका और इस्राइल की बेहतर एयरपावर से बचाव के लिए उसने अपने अहम हथियार भूमिगत बंकरों में सुरक्षित कर लिए हैं। उसका इरादा ड्रोन एवं मिसाइलों से अमेरिका के प्रतिष्ठित ठिकानों पर निशाना साधने का है। इससे दुश्मन के अजेय होने की छवि को नुकसान पहुंचेगा और घरेलू मोर्चे पर राजनीतिक दबाव भी बढ़ेगा।

    जमीनी हमला: विशेषज्ञों की राय में ईरान की कोशिश दुश्मन को जमीनी आक्रमण के लिए उकसाने की दिख रही है। युद्ध जमीन पर आने पर ईरान की बड़ी सेना व दुर्गम भौगोलिक परिस्थितयां अमेरिका व इस्राइल के लिए इसे अफगानिस्तान या वियतनाम जैसा अंतहीन युद्ध भी बना सकते हैं।

    अराघची का बयान: ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने बताया कि शीर्ष कमांडरों को खोने के बाद उन्हें फौरन रिप्लेस कर लिया गया है। उन्होंने दावा किया कि इस युद्ध में दूसरे पक्ष के लिए कोई विजय नहीं है। विकेंद्रीकृत कमान के कारण ईरान का मिसाइल नेटवर्क नेतृत्व की कमी के बावजूद सक्रिय है।

    इस्राइल पर प्रभाव: छोटा देश होने के नाते इस्राइल की अर्थव्यवस्था तेज और निर्णायक युद्ध के लिए बनी है, लंबे युद्ध के लिए नहीं। लाखों नागरिक (रिजर्विस्ट) दफ्तर छोड़कर मोर्चे पर तैनात हैं, जिससे हाई-टेक और उत्पादन क्षेत्र प्रभावित रहेगा। ईरान युद्ध को लंबा खींचने में कामयाब रहा तो इस्राइल की अर्थव्यवस्था पतली हो सकती है, इसलिए इस्राइल युद्ध को जल्द खत्म करने के लिए आक्रामक रुख अपनाता है।


    विशेषज्ञ की राय

    रक्षा विशेषज्ञ मेजर जनरल जीडी बख्शी ने कहा कि ट्रंप ने बहुत बड़ी गलती की है। पहली ही स्ट्राइक में ईरान का शीर्ष नेतृत्व साफ कर दिया। अब इस युद्ध पर नियंत्रण नहीं रह गया है। इससे वैश्विक मंदी आ सकती है, जिससे अमेरिका भी अछूता नहीं रहेगा। ईरान ने इनका युद्धपोत हिट किया तो 250 सैनिक मारे जाएंगे। अब यह अपना एयरक्राफ्ट कैरियर लिंकन छुपाते फिर रहे हैं। ट्रंप बुरी तरह फंसने वाले हैं। उनके खिलाफ महाभियोग भी चलाया जाए तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा।

  • अवैध प्रवासन बनी चुनौती.. 5 साल में 81 देशों ने एक लाख से ज्यादा भारतीयों को किया डिपोर्ट

    अवैध प्रवासन बनी चुनौती.. 5 साल में 81 देशों ने एक लाख से ज्यादा भारतीयों को किया डिपोर्ट


    नई दिल्ली।
    अवैध प्रवासन (Illegal Migration) सभी देशों के लिए चुनौती बनी हुई है। कई देशों में यह राजनीतिक मुद्दा भी बना है। विदेश मंत्रालय (Ministry of External Affairs) के आंकड़े बताते हैं कि विदेशों में भारतीयों के अवैध रुप से प्रवासन (Illegal Migration of Indians) के मामले बढ़ रहे हैं। पिछले पांच सालों के दौरान 81 देशों से एक लाख से भी ज्यादा भारतीयों को डिपोर्ट (Deport-वापस भेजना) किया गया है। यह संख्या लगातार बढ़ रही है। मौजूदा समय में औसतन 25 हजार भारतीय हर साल डिपोर्ट होकर आ रहे हैं। जबकि, पांच साल पहले तक यह संख्या 14-15 हजार के बीच होती थी।

    विदेश मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार दुनिया के तमाम छोटे बड़े देशों से भारतीयों को डिपोर्ट किया जा रहा है। यहां तक की बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका, कंबोडिया से भी सैकड़ों भारतीयों को डिपोर्ट किया गया है। 2021-2025 के दौरान करीब 1.05 लाख भारतीय वापस भेजे गए हैं।


    विदेशों से वापस भेजने के दो प्रमुख कारण

    विदेश मंत्रालय के अनुसार दो प्रमुख कारणों से डिपोर्ट किया जाता है। एक वीजा की अवधि खत्म होने के बावजूद अवैध रुप से रहने के कारण। दूसरे, बिना वर्क वीजा के किसी दूसरे देश में रोजगार करना। कुछ मामलों में छोटे-मोटे आपराधिक कृत्यों के कारण भी डिपोर्ट कर दिया जाता है। मंत्रालय के अनुसार पिछले पांच सालों में सबसे ज्यादा 68258 भारतीयों को सऊदी अरब से डिपोर्ट किया गया है। दूसरे नंबर पर अमेरिका से 7824 तथा मलेशिया से 6553 लोगों को डिपोर्ट किया गया।

    कुछ देशों से डिपोर्ट होने वालों की संख्या में भारी इजाफा हुआ है। 2021 में अमेरिका से 808 लोग डिपोर्ट हुए थे लेकिन 2025 में यह संख्या 3812 हो गई। यूएई से तब 358 डिपोर्ट हुए थे लेकिन 2025 में यह 1467 पहुंच गई। इसी प्रकार म्यांमार से डिपोर्ट होने वालों की संख्या 338 से बढ़कर 1591 हो गई। बहरीन से वापस भेजे गए भारतीय 273 से बढ़कर 764 तक हो गए। बांग्लादेश से 64 से 156, थाइलैंड से 256 से 481, मालदीव से 16 से 127, कंबोडिया से 44 से 305, कनाडा से 27 से 188 लोग भारत भेजे गए हैं।


    अमेरिका और खाड़ी देशों से सबसे अधिक भारतीय भेजे गए

    आंकड़े बताते हैं कि अमेरिका, खाड़ी देशों के साथ-साथ यूरोप के छोटे देशों से भी बड़े पैमाने पर लोग डिपोर्ट होकर भारत आ रहे हैं। इनमें जार्जिया से 133, पनामा से 188, पोलेंड से 127, यूके से 578, म्यांमार से 2165, चीन से 1000, बांग्लादेश से 478, श्रीलंका से 1866 भारतीय पिछले पांच सालों में वापस भेजे गए हैं।

    अवैध प्रवासन चुनौती
    हालांकि सभी देश इस प्रकार के आंकड़ों को साझा नहीं करते हैं। विदेश मंत्रालय के ये आंकड़े अपने दूतावासों से मिले हैं। लेकिन डिपोर्ट होने वाले नागरिक चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका सभी के हैं। दरअसल, ज्यादातर मामले रोजगार से जुड़े हैं जिसके चलते में लोग गलत वीजा पर रोजगार करते हैं या वीजा खत्म होने के बाद भी काम करते रहते हैं।


    कैसे होते हैं डिपोर्ट

    यदि कोई भारतीय डिपोर्ट किया जाता है तो संबंधित देश भारत के दूतावास से संपर्क करता है। दूतावास उसकी नागरिकता की पुष्टि होने के बाद उसे भारत भेजने की अनुमति देता है। इसके लिए जरूरी दस्तावेज जारी किया जाता है।

  • SIR को चुनौती…. SC बोला- वोटर लिस्ट में गड़बड़ी पर क्या आंखें मूंद ले चुनाव आयोग?

    SIR को चुनौती…. SC बोला- वोटर लिस्ट में गड़बड़ी पर क्या आंखें मूंद ले चुनाव आयोग?


    नई दिल्ली।
    सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने गुरुवार को कहा कि विशेष गहन पुनरीक्षण (Special in-depth review-SIR) को लेकर जारी अधिसूचना में ‘माइग्रेशन’ शब्द की व्याख्या केवल देश के भीतर के प्रवासन तक सीमित नहीं मानी जा सकती, बल्कि इसमें सीमा पार प्रवासन भी शामिल हो सकता है। अदालत ने यह टिप्पणी उन याचिकाओं की सुनवाई के दौरान की जिनमें बिहार में SIR को चुनौती देते हुए आरोप लगाया गया है कि चुनाव आयोग (Election Commission- ECI) नागरिकता पर संदेह के आधार पर लोगों को मतदाता सूची से हटाकर मताधिकार छीन रहा है।

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि SIR कोई नियमित प्रक्रिया नहीं है और बिहार में यह 2003 के बाद पहली बार किया जा रहा है। कोर्ट ने पूछा, “क्या चुनाव आयोग मतदाता सूची की शुचिता बनाए रखने के लिए किसी ‘शुद्धिकरण और छंटनी’ की प्रक्रिया नहीं अपना सकता? यदि गड़बड़ियां मिलें तो क्या आयोग को आंख मूंद लेनी चाहिए?”

    मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा, “माइग्रेशन ट्रांस-कंट्री भी हो सकता है। यह केवल देश के भीतर का प्रवासन नहीं है। आजीविका और अन्य कारणों से लोग विदेशी सीमाएं पार करते हैं। ‘ब्रेन ड्रेन’ भी प्रवासन ही है।”

    पीठ की यह टिप्पणी वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन के उस तर्क के जवाब में आई, जिसमें उन्होंने कहा था कि यदि चुनाव आयोग नागरिकता की जांच करना चाहता था, तो उसे 24 जून के आदेश में स्पष्ट रूप से उल्लेख करना चाहिए था। आदेश में SIR का आधार केवल “तेजी से शहरीकरण” और “शिक्षा व आजीविका के लिए बार-बार होने वाला जनसंख्या का स्थानांतरण” बताया गया था।


    BLO के संदेह पर नाम हटाना खतरनाक— याचिकाकर्ता

    रामचंद्रन ने दलील दी कि SIR को विदेशी नागरिकों की पहचान से जोड़ना असंवैधानिक है, क्योंकि नागरिकता की जांच के लिए पहले से वैधानिक प्रक्रिया मौजूद है। उन्होंने कहा, “सिर्फ बूथ लेवल ऑफिसर के संदेह पर किसी को मतदाता सूची से हटाना बेहद खतरनाक है।” कोर्ट ने जवाब दिया कि उनकी टिप्पणियां अंतिम निष्कर्ष नहीं हैं बल्कि मुद्दे पर बेहतर तर्कों के लिए एक प्रयास हैं।

    याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि यह प्रक्रिया ‘गलत संदेह’ पर आधारित है और बड़े पैमाने पर मतदाताओं को अयोग्य घोषित करने की कोशिश है। रामचंद्रन ने कहा, “ECI का कर्तव्य मतदाता को सक्षम बनाना है, निष्क्रिय करना नहीं।” उन्होंने यह भी कहा कि बिहार के बाद नौ राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में SIR को लागू करना “कॉपी-पेस्ट” जैसा है, जो चुनाव आयोग की “मस्तिष्क-प्रक्रिया की कमी” दर्शाता है।

    अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 16 दिसंबर के लिए तय की है, जब चुनाव आयोग अपनी विस्तृत प्रतिक्रिया देगा। अगले सप्ताह उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, केरल, पुदुचेरी और पश्चिम बंगाल में SIR को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर भी सुनवाई होगी।