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  • चुनौतियों से जूझ रहा भारतीय इक्विटी बाजार, घबराएं नहीं… योजना बनाकर करें निवेश!

    चुनौतियों से जूझ रहा भारतीय इक्विटी बाजार, घबराएं नहीं… योजना बनाकर करें निवेश!


    नई दिल्ली।
    नोएडा (Noida) में रहने वाले आलोक ने कुछ साल पहले म्यूचुअल फंड्स (Mutual Funds) में एसआईपी (SIP) शुरू की थी। शुरुआत में पोर्टफोलियो (Portfolio) संतुलित था। लेकिन इक्विटी स्कीमों के शानदार रिटर्न की वजह से संतुलित पोर्टफोलियो देखते-देखते 90% इक्विटी-हेवी हो गया। अब जब बाजार बेचैन है, निफ्टी गोते खा रहा है। पोर्टफोलियो लाल देखकर आलोक की सांसें अटक गईं।

    तुरंत दोस्त को फोन लगाया और पूछा- क्या मुझे एसआईपी बंद कर देनी चाहिए? क्या म्यूचुअल फंड रिडीम कर लेने चाहिए? क्या मुझे सब कुछ फिक्स्ड डिपॉजिट में ट्रांसफर कर देना चाहिए? ये सवाल स्वाभाविक हैं। लेकिन बाजार के हर उतार-चढ़ाव पर प्रतिक्रिया देना ज्यादा नुकसान पहुंचा सकता है। इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल यह है: क्या आपका पोर्टफोलियो उतना जोखिम भरा हो गया है, जितना आपने सोचा भी नहीं था? यदि इसका उत्तर हां है, तो इसका समाधान बाजार छोड़कर जाना नहीं हो सकता। इसका समाधान है अपने पोर्टफोलियो को फिर से संतुलित करना।


    बाजार असहज है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि निवेशक घबरा जाएं

    भारतीय इक्विटी बाजार (Indian Equity Market) वर्तमान में कई चुनौतियों से जूझ रहा है। सितंबर में निफ्टी-50 में भारी गिरावट देखी गई, जबकि विदेशी निवेशक लगातार बेच कर बाहर जा रहे हैं। ऊंचे क्रूड ऑयल के दाम, भू-राजनीतिक तनाव, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेजी और रुपये पर दबाव ने अनिश्चितता और बढ़ा दी है। यह सिक्के का सिर्फ एक पहलू है।

    भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था लचीलापन दिखाना जारी रखे हुए है, अप्रैल-जून 2026 की विकास दर लगभग 8% दर्ज की गई। घरेलू निवेशक भी एसआईपी के जरिये म्यूचुअल फंड में लगातार पैसे लगा रहे हैं। एम्फी के अनुसार, अगस्त 2026 में एसआईपी का कुल योगदान 32,297 करोड़ रुपये रहा। इससे पता चलता है कि निवेशक चिंतित जरूर हैं, लेकिन उन्होंने निवेश करना बंद नहीं किया है। और शायद ऐसा करना भी नहीं चाहिए- बशर्ते उनके निवेश उनके लक्ष्यों और जोखिम उठाने की क्षमता के अनुकूल हों।

    असली बीमारी बाजार की गिरावट नहीं, पोर्टफोलियो ड्रिफ्ट है। आलोक की तरह ज्यादातर निवेशक तब तक जोखिम के बारे में नहीं सोचते, जब तक बाजार ऊपर चढ़ रहा होता है। जब अनजाने में आपका 90% पैसा सिर्फ इक्विटी में फंस जाए, इसे पोर्टफोलियो ड्रिफ्ट कहा जाता है। इसलिए, समस्या बाजार गिरना नहीं है। समस्या यह है कि पोर्टफोलियो को कभी ऐसे डिजाइन ही नहीं किया गया था कि वह ऐसी गिरावट को झेल सके।


    पोर्टफोलियो कैसा दिखना चाहिए?

    – ऐसा कोई जादुई प्रतिशत नहीं है, जो हर किसी के लिए काम करे।
    – अधिक जोखिम उठाने की क्षमता और लंबे समय का नजरिया रखने वाला व्यक्ति अधिक इक्विटी चुन सकता है।
    – रिटायरमेंट के करीब पहुंच रहे या किसी अन्य बड़े वित्तीय लक्ष्य वाले निवेशक को काफी कम इक्विटी की आवश्यकता हो सकती है।


    भावनाएं नहीं, पोर्टफोलियो को रोटेट करें

    सबसे पहले सारी इक्विटी होल्डिंग्स को अचानक बेचने की जरूरत नहीं है। अब अपनी नई एसआईपी के योगदान को डेट या अन्य कम हिस्सेदारी वाली एसेट क्लास की तरफ मोड़ें।


    बाजार से भागें नहीं, योजना सुधारें

    सिर्फ इसलिए एसआईपी या निवेश बंद न करें, क्योंकि बाजार में उतार-चढ़ाव है। अपने फंड्स की जांच करें कि वे एक ही तरह के शेयरों में तो पैसा नहीं लगा रहे हैं। अपने निवेश के फैसले बाजार के मूड के बजाय अपने वित्तीय लक्ष्यों और जोखिम उठाने की क्षमता के आधार पर लें। …सिद्धार्थ शर्मा, को-फाउंडर, मनीट्री पार्टनर्स


    किस कैटेगरी से पैसा निकालकर कहां लगाएं?

    यदि छोटे शेयरों ने आपके पोर्टफोलियो का बड़ा हिस्सा हथिया लिया है, तो मुनाफे का कुछ हिस्सा निकालकर बड़े-कैप या फ्लेक्सी-कैप फंड्स में शिफ्ट किया जा सकता है।
    यदि पोर्टफोलियो में इक्विटी के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं है, तो संकट के समय स्थिरता के लिए डेट फंड या सोने को जगह दें।
    यदि कोई वित्तीय लक्ष्य पास आ रहा है, तो जोखिम भरे इक्विटी से पैसा निकालकर सुरक्षित और अधिक तरल विकल्पों में लगाना चाहिए।

  • ‘आप लड़िए, हम उम्मीदवार नहीं उतारेंगे’: नंदीग्राम से ममता बनर्जी को TMC के बागी गुट की खुली चुनौती

    ‘आप लड़िए, हम उम्मीदवार नहीं उतारेंगे’: नंदीग्राम से ममता बनर्जी को TMC के बागी गुट की खुली चुनौती


    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर चल रही सियासी लड़ाई अब नंदीग्राम उपचुनाव तक पहुंच गई है। टीएमसी के बागी खेमे ने बुधवार को पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी को नंदीग्राम से चुनाव लड़ने की खुली चुनौती दी। बागी गुट का कहना है कि यदि ममता बनर्जी इस सीट से मैदान में उतरती हैं तो वह उनके खिलाफ अपना कोई उम्मीदवार नहीं उतारेगा।

    पश्चिम बंगाल विधानसभा के बाहर बागी टीएमसी के प्रवक्ता रिजु दत्ता ने कहा कि उनका गुट चाहता है कि ममता बनर्जी नंदीग्राम से चुनाव लड़ें, जीतें और विधानसभा में वापस लौटें। उन्होंने स्पष्ट किया कि ममता के सामने उनका गुट प्रत्याशी नहीं उतारेगा।

    ‘भाजपा विरोधी वोट नहीं बंटने देंगे’

    बागी टीएमसी विधायक मदन मित्रा ने कहा कि ममता बनर्जी के खिलाफ उम्मीदवार नहीं उतारने का फैसला भाजपा विरोधी वोटों को विभाजित होने से रोकने के लिए लिया गया है।

    मदन मित्रा ने कहा कि अगर उनका गुट भाजपा की ‘बी टीम’ होता तो विपक्षी वोटों को बांटने के लिए दो के बजाय तीन या चार उम्मीदवार मैदान में उतार सकता था। उनके मुताबिक नंदीग्राम में ममता को वॉकओवर देने का फैसला यह दिखाएगा कि उनका गुट भाजपा के इशारे पर काम नहीं कर रहा है।

    नंदीग्राम में पहले हार चुकी हैं ममता

    नंदीग्राम ममता बनर्जी के राजनीतिक सफर में बेहद महत्वपूर्ण सीट रही है। 2021 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने अपने तत्कालीन करीबी सहयोगी और भाजपा उम्मीदवार शुभेंदु अधिकारी के खिलाफ यहां से चुनाव लड़ा था। हालांकि, उन्हें हार का सामना करना पड़ा था।

    2026 के विधानसभा चुनाव में भी शुभेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम से जीत हासिल की। उन्होंने ममता बनर्जी को उनके गृह क्षेत्र भवानीपुर में भी हराया। इस चुनाव के बाद शुभेंदु अधिकारी ने भवानीपुर सीट अपने पास रखी और नंदीग्राम विधानसभा सीट खाली कर दी। इसी वजह से अब नंदीग्राम में उपचुनाव कराया जा रहा है।

    पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह पर भी घमासान

    बागी गुट का यह ऐलान ऐसे समय हुआ है, जब टीएमसी के दोनों धड़ों के बीच पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह पर अधिकार को लेकर विवाद चल रहा है। चुनाव आयोग ने अभी फैसला नहीं किया है कि आधिकारिक नाम और चुनाव चिन्ह किस गुट को मिलेगा।

    रितब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाला बागी गुट पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह पर अपना दावा कर रहा है। उसका कहना है कि अगर नामांकन की अंतिम तारीख से पहले चुनाव आयोग उसके पक्ष में फैसला नहीं करता है तो वह निर्दलीय उम्मीदवारों के तौर पर चुनाव लड़ने की तैयारी भी कर रहा है।

    6 अक्टूबर को नंदीग्राम में वोटिंग

    नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर 6 अक्टूबर को उपचुनाव होना है। बुधवार से नामांकन प्रक्रिया शुरू हो गई है। नामांकन दाखिल करने की अंतिम तारीख 16 सितंबर है। 17 सितंबर को नामांकन पत्रों की जांच होगी, जबकि 19 सितंबर तक उम्मीदवार नाम वापस ले सकेंगे। मतगणना 9 अक्टूबर को होगी।

  • 29 जुलाई को उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में शुक्र का गोचर, 4 राशियों के लिए बढ़ सकती हैं चुनौतियां, जाने उपाय

    29 जुलाई को उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में शुक्र का गोचर, 4 राशियों के लिए बढ़ सकती हैं चुनौतियां, जाने उपाय


    नई दिल्ली। वैदिक ज्योतिष में शुक्र ग्रह को सुख, वैभव, समृद्धि, प्रेम और भौतिक सुविधाओं का कारक माना जाता है। शुक्र की चाल या नक्षत्र परिवर्तन का प्रभाव सभी 12 राशियों पर पड़ता है। द्रिक पंचांग के अनुसार, 29 जुलाई 2026 को शुक्र ग्रह सूर्य के स्वामित्व वाले उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में प्रवेश करेंगे। इस परिवर्तन का कुछ राशियों पर सकारात्मक असर रहेगा, जबकि कुछ जातकों को आर्थिक, पारिवारिक और पेशेवर जीवन में सतर्क रहने की जरूरत होगी।

    मेष राशि
    मेष राशि के लोगों के लिए यह गोचर खर्चों में बढ़ोतरी का संकेत दे सकता है। बजट बिगड़ने की आशंका रहेगी और अनावश्यक खर्च बढ़ सकते हैं। कार्यस्थल पर सहकर्मियों के साथ विवाद से बचें और किसी भी वित्तीय लेन-देन में पूरी सावधानी बरतें।

    मिथुन राशि
    मिथुन राशि के जातकों को इस दौरान स्वास्थ्य और पारिवारिक रिश्तों पर विशेष ध्यान देना होगा। घर-परिवार में मतभेद या तनाव की स्थिति बन सकती है। वाणी पर संयम रखें और किसी भी बड़े निवेश से पहले अनुभवी व्यक्ति की सलाह अवश्य लें।

    सिंह राशि
    उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र के स्वामी सूर्य हैं, इसलिए इसका प्रभाव सिंह राशि पर अधिक देखने को मिल सकता है। अहंकार या अत्यधिक आत्मविश्वास के कारण काम प्रभावित हो सकते हैं। कार्यस्थल पर वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बेहतर तालमेल बनाए रखें। प्रेम संबंधों में गलतफहमियों से बचने के लिए संवाद बनाए रखना जरूरी होगा।

    वृश्चिक राशि
    वृश्चिक राशि के लोगों को करियर और कारोबार में उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ सकता है। साझेदारी में काम करने वालों को विशेष सतर्कता बरतनी होगी। धन संबंधी मामलों में लिखित दस्तावेजों का ध्यान रखें। कामकाज के सिलसिले में अनावश्यक यात्राएं होने से थकान और आर्थिक नुकसान की संभावना भी रहेगी।

    अशुभ प्रभाव कम करने के उपाय
    – प्रत्येक शुक्रवार मां लक्ष्मी की विधि-विधान से पूजा करें और सफेद मिठाई या खीर का भोग लगाएं।
    – “ॐ शुं शुक्राय नमः” मंत्र का नियमित जाप करें।
    – शुक्रवार को जरूरतमंद लोगों को चावल, दूध, चीनी जैसी सफेद वस्तुओं का दान करें।

  • सुनेत्रा पवार के NCP अध्यक्ष पद पर उठे सवाल, पार्टी नेता ने चुनाव प्रक्रिया को दी चुनौती

    सुनेत्रा पवार के NCP अध्यक्ष पद पर उठे सवाल, पार्टी नेता ने चुनाव प्रक्रिया को दी चुनौती


    मुंबई। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) में एक बार फिर आंतरिक विवाद सामने आता दिखाई दे रहा है। महाराष्ट्र की उपमुख्यमंत्री और NCP अध्यक्ष सुनेत्रा पवार के नेतृत्व को लेकर पार्टी के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया है कि अध्यक्ष पद के लिए कराया गया चुनाव पार्टी संविधान के नियमों के अनुसार नहीं हुआ।

    पार्टी नेता की ओर से सुनेत्रा पवार के अध्यक्ष पद के चुनाव को चुनौती देते हुए कानूनी नोटिस जारी किया गया है। हालांकि, इस मामले पर अभी तक उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

    26 फरवरी के चुनाव पर उठाई गई आपत्ति
    दिल्ली स्थित विधि फर्म एआरएस एसोसिएट्स ने NCP के राष्ट्रीय सचिव सच्चिदानंद सिंह की ओर से 9 जुलाई को यह कानूनी नोटिस जारी किया। इसमें दावा किया गया है कि 26 फरवरी को हुआ पार्टी अध्यक्ष का चुनाव असंवैधानिक था और इसे अमान्य घोषित किया जाना चाहिए। यह नोटिस सुनेत्रा पवार, NCP के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष प्रफुल्ल पटेल और महासचिव बृजमोहन श्रीवास्तव को भेजा गया है।

    चुनाव प्रक्रिया में नियमों के उल्लंघन का आरोप
    नोटिस में आरोप लगाया गया है कि चुनाव प्रक्रिया शुरू करने से पहले पार्टी संविधान में तय अनिवार्य नियमों का पालन नहीं किया गया। इसमें दावा किया गया कि पार्टी प्रतिनिधियों और पदाधिकारियों को चुनाव की जानकारी भी विधिवत नहीं दी गई।

    नोटिस के अनुसार, तत्कालीन NCP अध्यक्ष अजित पवार के 28 जनवरी को निधन के बाद पार्टी ने निर्वाचन आयोग को जानकारी दी थी कि नए अध्यक्ष के चुनाव तक प्रफुल्ल पटेल कार्यवाहक राष्ट्रीय अध्यक्ष की भूमिका निभाएंगे। आरोप है कि इसके बावजूद महासचिव बृजमोहन श्रीवास्तव ने बिना संवैधानिक अधिकार के राष्ट्रीय अधिवेशन बुलाया और चुनाव प्रक्रिया शुरू कर दी।

    नामांकन और मतदान प्रक्रिया पर भी सवाल
    सच्चिदानंद सिंह की ओर से जारी नोटिस में दावा किया गया है कि पार्टी संविधान के मुताबिक न तो केंद्रीय चुनाव प्राधिकरण का गठन किया गया, न ही निर्वाचन अधिकारी नियुक्त किया गया और न ही चुनाव कार्यक्रम घोषित किया गया। नोटिस में यह भी आरोप लगाया गया है कि प्रतिनिधियों को उम्मीदवारों के नामांकन, चुनाव लड़ने और मतदान करने का उचित अवसर नहीं दिया गया।

    चुनाव आयोग को भेजे पत्र वापस लेने की मांग
    सिंह ने निर्वाचन आयोग को भेजे गए 28 फरवरी, 10 मार्च और 29 अप्रैल के पार्टी पत्रों को वापस लेने की मांग की है। इन पत्रों में चुनाव और पार्टी पदाधिकारियों से जुड़ी जानकारी दर्ज की गई थी।

    उन्होंने स्वतंत्र चुनाव प्राधिकरण की निगरानी में नए सिरे से संगठनात्मक चुनाव कराने की मांग की है। नोटिस में पार्टी नेतृत्व को मांगों पर कार्रवाई के लिए 15 दिन का समय दिया गया है। ऐसा नहीं होने पर आगे कानूनी कार्रवाई करने का अधिकार सुरक्षित रखने की बात कही गई है।

    NCP ने आरोपों को बताया गलत
    वहीं, NCP प्रवक्ता सूरज चव्हाण ने इन आरोपों को खारिज किया है। उन्होंने कहा कि सच्चिदानंद सिंह 26 फरवरी को आयोजित राष्ट्रीय अधिवेशन में मौजूद थे और उन्होंने हाथ उठाकर सुनेत्रा पवार के पक्ष में मतदान किया था। चव्हाण ने दावा किया कि सुनेत्रा पवार का चुनाव सभी नियमों और प्रक्रियाओं का पालन करते हुए कराया गया था। फिलहाल NCP में अध्यक्ष पद को लेकर उठे इस विवाद पर आगे की स्थिति कानूनी प्रक्रिया और पार्टी के रुख पर निर्भर करेगी।

  • रद्द हो सकती है सोनम रघुवंशी की जमानत…. मेघालय सरकार ने HC में दी चुनौती

    रद्द हो सकती है सोनम रघुवंशी की जमानत…. मेघालय सरकार ने HC में दी चुनौती


    इंदौर।
    राजा रघुवंशी (Raja Raghuvanshi) की हत्या की मुख्य आरोपी सोनम रघुवंशी (Main accused Sonam Raghuvanshi) की जमानत अब कानूनी मुश्किलों में फंसती नजर आ रही है। मेघालय सरकार (Government of Meghalaya) ने इस जमानत को हाई कोर्ट (High Court) में चुनौती देते हुए इसे रद्द करने की मांग की है। राज्य सरकार का तर्क है कि मामला अत्यंत गंभीर है और सेशंस कोर्ट का फैसला न्याय प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है। इससे पहले, निचली अदालत ने गिरफ्तारी प्रक्रिया में तकनीकी खामियों और दस्तावेजों में स्पष्टता की कमी के आधार पर सोनम रघुवंशी को जमानत दी थी। अब मेघालय हाईकोर्ट ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए सोनम रघुवंशी को नोटिस जारी किया है।


    सरकार बोली- सख्त रुख अपनाए कोर्ट

    मेघालय सरकार ने अपनी अर्जी में कहा है कि ईस्ट खासी हिल्स की सेशंस कोर्ट ने जो जमानत दी है। वह जुर्म की प्रकृति के हिसाब से सही नहीं है। इससे इंसाफ मिलने में दिक्कत आ सकती है। मेघालय सरकार का मानना है कि आरोप बहुत ही संगीन हैं और ऐसे मामलों में अदालत को सख्त रुख अपनाना चाहिए।

    गिरफ्तारी की प्रक्रिया में कुछ गलतियां
    27 अप्रैल को शिलॉन्ग में एडिशनल डिप्टी कमिश्नर (ज्यूडिशियल) ने सोनम रघुवंशी को जमानत दे दी क्योंकि उनकी गिरफ्तारी की प्रक्रिया में कुछ गलतियां थीं। लगभग एक साल बाद मिली इस जमानत के दौरान अदालत ने यह पाया कि गिरफ्तारी से जुड़े कागजों में जरूरी नियमों का पालन नहीं किया गया था।


    नहीं भरे गए थे चेक बॉक्स

    दस्तावेजों में चेकबॉक्स तक नहीं भरे गए थे और भारतीय न्याय संहिता की धाराओं के बारे में भी साफ तौर पर कुछ नहीं लिखा गया था। अदालत ने यह भी कहा था कि आरोपी को यह स्पष्ट रूप से अवगत नहीं कराया गया कि उसे किस गंभीर धारा में गिरफ्तार किया जा रहा है।


    सोनम रघुवंशी को नोटिस

    इसके अलावा, प्रारंभिक पेशी के दौरान विधिक सहायता की उपलब्धता को लेकर भी रिकॉर्ड में स्पष्ट जानकारी नहीं मिली। मेघालय हाई कोर्ट ने मंगलवार को इस मामले में सोनम रघुवंशी को नोटिस जारी किया है। राज्य सरकार की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई के लिए अगली तारीख निर्धारित की गई है।

    तकनीकी आधार पर दी गई बेल को बरकरार रखना उचित नहीं
    मेघालय सरकार का पक्ष है कि आरोपी को गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी थी और संबंधित दस्तावेज अदालत में प्रस्तुत किए जा चुके हैं। ऐसे में केवल तकनीकी आधार पर दी गई जमानत को बरकरार रखना उचित नहीं होगा।

  • Kerala Elections : आसान नहीं राह… संगठन स्तर पर इन चुनौतियों से जूझ रही कांग्रेस

    Kerala Elections : आसान नहीं राह… संगठन स्तर पर इन चुनौतियों से जूझ रही कांग्रेस

    Congress

    चेन्नई। केरल विधानसभा चुनाव (Kerala Assembly Elections) प्रचार के रफ्तार पकड़ने के साथ कांग्रेस (Congress) की चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं। पार्टी में जहां अंदरूनी झगड़े बढ़ रहे हैं, वहीं वह संगठन के स्तर पर भी कई मुश्किलों का सामना कर रही है। केरल में नौ अप्रैल को वोट डाले जाएंगे। कांग्रेस (Congress) लगातार दस वर्षों से प्रदेश में सत्ता से बाहर है। केरल में हर पांच वर्षों में सरकार बदलती रही है, पर वर्ष 2021 में वामपंथी दलों (Leftist parties) की अगुआई वाले एलडीएफ ने लगातार दूसरी बार जीत दर्ज की। ऐसे में यह चुनाव बेहद अहम है।

    कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती एकता है। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के बीच तालमेल का आभाव है और वरिष्ठ नेता मुख्यमंत्री पद की दावेदारी के लिए ताल ठोंक रहे हैं। ऐसे में पार्टी के लिए चुनाव के वक्त जमीनी स्तर पर तालमेल आसान नहीं है। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने सभी नेताओं को सामूहिक नेतृत्व में चुनाव लड़ने की हिदायत की है, पर प्रदेश कांग्रेस नेताओं का मानना है कि जीत की स्थिति में दिल्ली से किसी नेता को भेजा जा सकता है। इसलिए, वह सिर्फ अपनी सीट तक सीमित हैं।


    संगठनात्मक स्तर पर राज्य में पार्टी कमजोर

    देश कांग्रेस नेताओं का कहना है, वामपंथी दल कैडर आधारित पार्टियां हैं। हर विधानसभा में उनके पास कार्यकर्ता हैं। वहीं, यूडीएफ के घटकदल के तौर पर 95 सीट पर चुनाव लड़ रही कांग्रेस संगठनात्मक स्तर पर बहुत ज्यादा मजबूत नहीं है। इसके साथ प्रमुख नेताओं के चुनाव मैदान में उतरने से कांग्रेस संगठनात्मक स्तर पर कमी से जूझ रही है। प्रदेश अध्यक्ष, तीन में से दो कार्यकारी अध्यक्ष, राज्य संगठनात्मक महासचिव और आठ जिला कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव में किस्मत आजमा रहे हैं। पार्टी के तमाम बड़े नेताओं के चुनाव लड़ने की वजह से निर्णायक निर्णय लेने के लिए संगठन में एक शून्य पैदा हो गया है।


    कांग्रेस के सामने 4 मुश्किलें

    1. मजबूत एलडीएफ सरकार: सत्ताधारी एलडीएफ ने कल्याणकारी योजनाओं व सुशासन के जरिए मजबूत आधार तैयार किया है। यूडीएफ के लिए इसका मुकाबला करना आसान नहीं।
    2.अंदरूनी कलह: कांग्रेस को वरिष्ठ नेताओं के बीच अंदरूनी गुटबाजी का सामना करना पड़ रहा है। गुटबाजी रोकने का लगातार प्रयास हो रहा है, पर प्रदेश नेता दावेदारी कर रहे हैं।
    3. सामाजिक और जातीय समीकरण : केरल की राजनीति सामुदायिक संगठनों और जातीय समीकरणों से प्रभावित होती है। कांग्रेस को धर्मनिरपेक्ष छवि और जमीनी हकीकत के बीच संतुलन बनाना होगा।
    4. भाजपा की बढ़ती मौजूदगी: केरल में भाजपा बहुत मजबूत नहीं है, पर पार्टी लगातार जनाधार बढ़ाने का प्रयास कर रही है। वर्ष 2021 में भाजपा को 11% वोट मिला था।

  • शनि साढ़ेसाती 2026-27: जिम्मेदारी और अनुशासन सिखाने वाला समय मेष कुंभ और मीन राशि के जातकों के लिए

    शनि साढ़ेसाती 2026-27: जिम्मेदारी और अनुशासन सिखाने वाला समय मेष कुंभ और मीन राशि के जातकों के लिए


    नई दिल्ली।वर्ष 2026-27 में शनि की साढ़ेसाती मेष कुंभ और मीन राशि पर अपना प्रभाव जारी रखेगी। ज्योतिष विशेषज्ञों के अनुसार यह समय इन राशियों के जातकों के लिए परीक्षा और परिपक्वता का दौर साबित हो सकता है। शनि की साढ़ेसाती जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में दबाव विलंब और अतिरिक्त परिश्रम की मांग करती है।

    साढ़ेसाती तब होती है जब शनि जन्म राशि से 12वें उसी और दूसरे भाव में गोचर करता है। वर्तमान में शनि की स्थिति मेष कुंभ और मीन राशि वालों पर प्रभाव डाल रही है और यह स्थिति वर्ष 2027 तक जारी रहने की संभावना है।

    मेष राशि वालों के लिए यह समय धैर्य की परीक्षा लेने वाला है। कार्यक्षेत्र में निर्णय लेने से पहले अनुभवी लोगों की सलाह लेना जरूरी है। अनियोजित खर्च और जल्दबाजी आर्थिक असंतुलन पैदा कर सकती है। पारिवारिक और व्यक्तिगत रिश्तों में खटास देखने को मिल सकती है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि शॉर्टकट से बचें और नियमित मेहनत पर भरोसा रखें।

    कुंभ राशि के जातकों को स्वास्थ्य संबंधी उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ सकता है। विदेश यात्रा निवेश और व्यापार से जुड़े फैसलों में अतिरिक्त सतर्कता बरतने की आवश्यकता है। पारिवारिक गलतफहमियां और प्रेम संबंधों में बाधाएं मानसिक दबाव बढ़ा सकती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जल्दबाजी से बचें और योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़ें।

    मीन राशि वालों के लिए यह दौर चुनौतियों भरा रह सकता है। नए लोगों पर भरोसा करने से पहले सावधानी बरतने की जरूरत है। आर्थिक तंगी वाहन या संपत्ति से जुड़े फैसलों में देरी और सरकारी कार्यों में रुकावटें सामने आ सकती हैं। कोर्ट-कचहरी से जुड़े मामलों में भी मानसिक तनाव बढ़ने की आशंका जताई गई है।

    ज्योतिषियों के अनुसार साढ़ेसाती केवल कष्ट का काल नहीं बल्कि आत्ममंथन अनुशासन और जिम्मेदारी सिखाने का समय है। यह दौर व्यक्ति को जिम्मेदार बनाता है और लंबे समय में स्थायी परिणाम देता है। प्रभाव को संतुलित करने के लिए नियमित पूजा दान और संयमित जीवनशैली अपनाने की सलाह दी जाती है। शनिवार के दिन शनि से जुड़े उपाय मानसिक संतुलन और नकारात्मक प्रभाव को कम करने में सहायक हो सकते हैं।