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  • आखिरी दिन बदली पदक तालिका, जानिए भारत ने कितने पदक जीतकर आखिर कौन-सा स्थान अपने नाम किया

    आखिरी दिन बदली पदक तालिका, जानिए भारत ने कितने पदक जीतकर आखिर कौन-सा स्थान अपने नाम किया

    नई दिल्ली । अंतरराष्ट्रीय खेल पटल पर भारतीय एथलीटों ने एक बार फिर अपनी कार्यकुशलता और उत्कृष्ट खेल भावना का लोहा मनवाया है। ग्लास्गो में 11 दिनों तक चले वैश्विक खेल आयोजन के समापन के साथ ही पदक तालिका की अंतिम तस्वीर पूरी तरह साफ हो चुकी है। मुख्य प्रतियोगिताओं और पारंपरिक विषयों की अनुपस्थिति के बावजूद भारतीय दल ने 39 पदकों के साथ चौथा स्थान हासिल कर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है।

    इस बार प्रतियोगिता का दायरा कुछ सीमित रखा गया था, जिसके तहत वे खेल शामिल नहीं थे जिनमें भारत आमतौर पर सर्वाधिक पदक जीतता रहा है। इसके बावजूद भारतीय खिलाड़ियों ने उपलब्ध अवसरों का पूरा लाभ उठाया। भारत के 38 खिलाड़ियों ने सामूहिक प्रयासों के बल पर 13 स्वर्ण, 17 रजत और 9 कांस्य पदक देश की झोली में डाले, जो विपरीत परिस्थितियों में भी खिलाड़ियों की मानसिक सुदृढ़ता को दर्शाता है।

    वैश्विक पदक तालिका में ऑस्ट्रेलिया ने एक बार फिर शीर्ष स्थान हासिल करते हुए अपनी सर्वोच्चता सिद्ध की। ऑस्ट्रेलियाई दल ने 70 स्वर्ण, 45 रजत और 56 कांस्य सहित कुल 171 पदकों पर अपना कब्जा जमाया। वहीं 29 स्वर्ण के साथ कुल 110 पदक जीतकर इंग्लैंड दूसरे स्थान पर रहा, जबकि कनाडा ने 19 स्वर्ण और कुल 62 पदकों के साथ तालिका में तीसरा स्थान हासिल किया।

    मेजबान देश और भारत के बीच अंतिम रैंकिंग को लेकर बेहद रोचक स्थिति देखने को मिली। भारत और स्कॉटलैंड दोनों ही देशों ने कुल 39-39 पदक अपने नाम किए और दोनों के पास 13-13 स्वर्ण पदक भी थे। हालांकि भारत द्वारा जीते गए 17 रजत पदकों की संख्या स्कॉटलैंड के 9 रजत पदकों से अधिक थी, जिसके आधार पर भारत को तालिका में चौथा और मेजबान स्कॉटलैंड को पांचवां स्थान प्रदान किया गया।

    भारतीय अभियान की सफलता में मुक्केबाजी प्रतियोगिता का योगदान सबसे महत्वपूर्ण रहा। मुक्केबाजों ने शानदार प्रदर्शन करते हुए सात स्वर्ण और तीन रजत सहित कुल 10 पदक हासिल किए। इसके अतिरिक्त भारोत्तोलन, एथलेटिक्स, जूडो और पैरा खेल स्पर्धाओं में भी एथलीटों ने अपनी छाप छोड़ी। मध्य प्रदेश सहित देश के विभिन्न राज्यों से आए युवा खिलाड़ियों के योगदान ने राष्ट्रीय स्तर पर खेल प्रतिभाओं के विस्तार को रेखांकित किया है।

    निशानेबाजी, बैडमिंटन, कुश्ती, हॉकी और टेबल टेनिस जैसे खेलों को इस बार आयोजन से बाहर रखा गया था। खेल विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ये खेल प्रतियोगिता का हिस्सा होते, तो भारत की पदक तालिका और अधिक भव्य हो सकती थी। इसके बावजूद उपलब्ध स्पर्धाओं में खिलाड़ियों का प्रदर्शन यह दर्शाता है कि भारतीय खेल प्रणाली अब बहुआयामी दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है।

    प्रतियोगिता के दौरान कुछ प्रशासनिक और नियम संबंधी चुनौतियां भी सामने आईं, जब जूडो वर्ग में एक एथलीट को प्रक्रियात्मक चूक के कारण अंतिम समय में प्रतिस्पर्धा से बाहर होना पड़ा। इस प्रकार के घटनाक्रमों के बावजूद भारतीय दल ने अपने ध्यान को केंद्रित रखा और अंतिम दिन तक पदकों की दौड़ में बने रहकर देश का गौरव बढ़ाया।

    ग्लास्गो में मिली इस ऐतिहासिक सफलता के बाद अब पूरे खेल जगत की निगाहें 2030 में आयोजित होने वाले अगले राष्ट्रमंडल खेलों पर टिक गई हैं। भारत के अहमदाबाद शहर में इन खेलों का आयोजन प्रस्तावित है, जिसे लेकर अभी से रणनीतिक तैयारियां और ढांचागत विकास की योजनाएं तैयार की जाने लगी हैं।

  • ग्लास्गो राष्ट्रमंडल खेल 2026 में भारतीय भारोत्तोलकों का शानदार दबदबा, मीराबाई चानू की ऐतिहासिक स्वर्ण हैट्रिक

    ग्लास्गो राष्ट्रमंडल खेल 2026 में भारतीय भारोत्तोलकों का शानदार दबदबा, मीराबाई चानू की ऐतिहासिक स्वर्ण हैट्रिक

    नई दिल्ली । ग्लास्गो में आयोजित हो रहे राष्ट्रमंडल खेल 2026 के चौथे दिन भारतीय एथलीटों ने अपने शानदार प्रदर्शन से देश को गौरवान्वित किया है। खेल प्रतियोगिता के चौथे दिन भारतीय दल ने कुल तीन पदक अपने नाम किए और ये तीनों ही सफलताएं भारोत्तोलन स्पर्धा में हासिल हुईं। स्टार भारोत्तोलक मीराबाई चानू ने एक बार फिर अपनी अंतरराष्ट्रीय बादशाहत साबित करते हुए स्वर्ण पदक पर कब्जा जमाया, जबकि पुरुषों के वर्ग में ऋषिकांता सिंह और आर मुथुपांडी ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाते हुए देश के लिए रजत पदक जीते। इन सफलताओं के साथ ही प्रतियोगिता में भारत के कुल पदकों की संख्या में अभूतपूर्व बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

    महिलाओं के 48 किलोग्राम भारवर्ग में प्रतिस्पर्धा करते हुए ओलंपिक पदक विजेता मीराबाई चानू ने राष्ट्रमंडल खेलों में लगातार तीसरा स्वर्ण पदक जीतकर एक नया कीर्तिमान स्थापित कर दिया। उन्होंने कुल 190 किलोग्राम वजन उठाकर अपने वर्ग में शीर्ष स्थान हासिल किया। शुरुआती प्रयासों में मिली असफलता से बिना विचलित हुए उन्होंने स्नैच और क्लीन एंड जर्क दोनों चरणों में जबरदस्त वापसी की और अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी को भारी अंतर से पछाड़ते हुए रिकॉर्ड कायम किया। यह मौजूदा खेलों में भारत के लिए पहला स्वर्ण पदक भी साबित हुआ।

    पुरुषों के भारोत्तोलन मुकाबलों में मणिपुर के युवा भारोत्तोलक ऋषिकांता सिंह ने अपनी शारीरिक चोटों की परवाह न करते हुए ऐतिहासिक प्रदर्शन किया। 60 किलोग्राम वर्ग में भाग लेते हुए उन्होंने स्नैच स्पर्धा में राष्ट्रमंडल खेलों के रिकॉर्ड की बराबरी की। हालांकि घुटने की तकलीफ के चलते क्लीन एंड जर्क के अंतिम प्रयासों में उन्हें संघर्ष करना पड़ा, इसके बावजूद उन्होंने कुल 264 किलोग्राम वजन उठाकर रजत पदक अपनी झोली में डाला। इसी स्पर्धा के एक अन्य मुकाबले में आर मुथुपांडी ने भी अपनी क्षमता का प्रदर्शन करते हुए कुल 286 किलोग्राम भार उठाया और भारत के लिए एक और रजत पदक सुनिश्चित किया।

    मुक्केबाजी रिंग से भी भारतीय दल के लिए सकारात्मक खबरें सामने आईं, जहां महिला और पुरुष मुक्केबाजों ने अपने-अपने मुकाबलों में दबदबा बनाया। महिला 54 किलोग्राम वर्ग में मुक्केबाज प्रीति ने शानदार खेल दिखाते हुए विपक्षी खिलाड़ी को दूसरे ही दौर में परास्त कर दिया और क्वार्टर फाइनल में प्रवेश कर लिया। पुरुष 55 किलोग्राम वर्ग के एक बेहद रोमांचक और एकतरफा मुकाबले में जादूमणि सिंह ने अपने प्रतिद्वंद्वी को सर्वसम्मत फैसले से हराकर अंतिम आठ में अपनी जगह पक्की की। हालांकि 65 किलोग्राम वर्ग में आदित्य प्रताप यादव को कड़े संघर्ष के बाद अंकों के आधार पर हार का सामना करना पड़ा।

    अन्य खेल स्पर्धाओं में भारत का दिन मिला-जुला रहा। तैराकी के पुरुषों की 4×200 मीटर फ्रीस्टाइल रिले वर्ग में भारतीय टीम ने फाइनल तक का सफर तय किया, लेकिन अंतिम दौर में कड़े मुकाबले के बीच वे छठे स्थान पर रहे और पदक से चूक गए। इसके अलावा लॉन बॉल्स, जिम्नास्टिक और व्हीलचेयर बास्केटबॉल की स्पर्धाओं में भारतीय खिलाड़ियों ने अपनी ओर से कड़ी चुनौती पेश की, हालांकि वे अंतिम चरण तक पहुंचने में असफल रहे। तपन मोहंती ने आर्टिस्टिक जिम्नास्टिक के फाइनल में संघर्ष किया, पर वे पदक तालिका में स्थान बनाने से थोड़ा पीछे रह गए।

  • राजा भैया ने शूटिंग में दिखाया दम, यूपी स्टेट चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतकर दर्ज कराई नई उपलब्धि

    राजा भैया ने शूटिंग में दिखाया दम, यूपी स्टेट चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतकर दर्ज कराई नई उपलब्धि

    नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी अलग पहचान रखने वाले कुंडा विधायक रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया ने इस बार राजनीतिक गतिविधियों से अलग खेल के क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया है। उन्होंने 49वीं यूपी स्टेट शूटिंग चैंपियनशिप में शानदार निशानेबाजी करते हुए कांस्य पदक हासिल किया है। प्रतियोगिता में उनके प्रदर्शन ने यह साबित किया कि वह केवल राजनीति ही नहीं, बल्कि खेलों में भी अपनी रुचि और क्षमता के लिए पहचाने जाते हैं।

    राजा भैया ने नई दिल्ली स्थित डॉ. करणी सिंह शूटिंग रेंज में आयोजित प्रतियोगिता में हिस्सा लिया था। यह प्रतियोगिता 21 से 30 जून तक आयोजित की गई थी, जिसमें उन्होंने प्रतियोगी संख्या 71 के रूप में भाग लिया। एस-25 क्ले पिजन ट्रैप शूटिंग (एनआर) स्पर्धा में उन्होंने 25 पॉइंट का स्कोर हासिल किया और इसी प्रदर्शन के आधार पर कांस्य पदक अपने नाम किया। प्रतियोगिता के परिणाम बुधवार को घोषित किए गए।

    निशानेबाजी के प्रति राजा भैया की रुचि काफी पुरानी रही है। वह लंबे समय से शूटिंग खेल से जुड़े हुए हैं और हथियारों तथा निशानेबाजी में उनकी दिलचस्पी सार्वजनिक रूप से भी चर्चा में रही है। वह नेशनल राइफल एसोसिएशन ऑफ इंडिया के लाइफटाइम सदस्य भी हैं। निशानेबाजी के क्षेत्र में उनकी रुचि के पीछे पारिवारिक प्रेरणा भी बताई जाती है।

    राजा भैया ने पहले भी बताया था कि उनके पिता उदय प्रताप सिंह स्वयं शूटर रहे हैं और उन्हीं से प्रेरित होकर उन्होंने निशानेबाजी की शुरुआत की थी। परिवार से मिली इस प्रेरणा ने उन्हें इस खेल से लंबे समय तक जोड़े रखा। समय के साथ उन्होंने अभ्यास जारी रखा और अब राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में पदक जीतकर अपनी खेल प्रतिभा का प्रदर्शन किया है।

    शूटिंग के अलावा राजा भैया अपने पारंपरिक शस्त्रों के प्रति लगाव को लेकर भी कई बार चर्चा में रहे हैं। हर वर्ष दशहरे के अवसर पर वह अपने शस्त्रागार में रखे हथियारों की पूजा करते हैं। उनके शस्त्र संग्रह को लेकर भी समय-समय पर चर्चाएं होती रही हैं। हालांकि, कुछ मौकों पर इससे जुड़े विवाद भी सामने आए हैं, जिनका संबंध पारिवारिक और कानूनी मामलों से रहा है।

    राजनीतिक जीवन की बात करें तो रघुराज प्रताप सिंह प्रतापगढ़ जिले की कुंडा विधानसभा सीट से लगातार सातवीं बार विधायक हैं। वह जनसत्ता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं और उत्तर प्रदेश की राजनीति में लंबे समय से सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। उनकी छवि एक प्रभावशाली क्षेत्रीय नेता के रूप में रही है।

    शूटिंग प्रतियोगिता में पदक जीतने के बाद उनके समर्थकों में उत्साह देखा जा रहा है। समर्थक इसे उनके व्यक्तित्व के एक अलग पहलू के रूप में देख रहे हैं, जहां उन्होंने राजनीति के साथ-साथ खेल के क्षेत्र में भी अपनी पहचान बनाई है। राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में हासिल किया गया यह पदक उनके लिए खेल उपलब्धियों की दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है।

  • दूसरे टेस्ट में श्रीलंका की मजबूत पकड़, मेंडिस और सोनल की शानदार पारियों से वेस्टइंडीज पर बनाया दबाव

    दूसरे टेस्ट में श्रीलंका की मजबूत पकड़, मेंडिस और सोनल की शानदार पारियों से वेस्टइंडीज पर बनाया दबाव


    नई दिल्ली। एंटीगुआ में खेले जा रहे वेस्टइंडीज और श्रीलंका के बीच दूसरे टेस्ट मैच में दूसरे दिन का खेल पूरी तरह श्रीलंका के नाम रहा। मेहमान टीम ने शानदार बल्लेबाजी करते हुए अपनी पहली पारी 9 विकेट पर 549 रन बनाकर घोषित कर दी। इसके जवाब में वेस्टइंडीज ने दिन का खेल समाप्त होने तक एक विकेट के नुकसान पर 58 रन बनाए। मेजबान टीम अभी भी श्रीलंका के विशाल स्कोर से 491 रन पीछे है और मुकाबले में वापसी के लिए उसे बड़ी साझेदारियों की जरूरत होगी।

    दूसरे दिन श्रीलंका की बल्लेबाजी की कमान कुशल मेंडिस और सोनल दिनुशा ने संभाली। दोनों बल्लेबाजों ने छठे विकेट के लिए 143 रन की महत्वपूर्ण साझेदारी कर टीम को बेहद मजबूत स्थिति में पहुंचा दिया। कुशल मेंडिस ने 115 गेंदों पर 69 रन की उपयोगी पारी खेली जिसमें आठ चौके और तीन शानदार छक्के शामिल रहे।

    दूसरी ओर सोनल दिनुशा अपने पहले टेस्ट शतक के बेहद करीब पहुंचकर चूक गए। उन्होंने 92 रन की शानदार पारी खेली और इस दौरान 12 चौके लगाए। उनकी संयमित और आक्रामक बल्लेबाजी ने श्रीलंका को बड़े स्कोर तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई।

    निचले क्रम में मिलन रत्नायके ने 15 रन का योगदान दिया जबकि प्रभात जयसूर्या 17 रन बनाकर नाबाद लौटे। टेस्ट क्रिकेट में पदार्पण कर रहे इसिथा विजेसुंदरा ने भी 14 रन जोड़कर टीम के स्कोर को मजबूती दी।

    वेस्टइंडीज की ओर से जेडन सील्स और शेमार जोसेफ सबसे सफल गेंदबाज रहे जिन्होंने दो-दो विकेट हासिल किए। अल्जारी जोसेफ जस्टिन ग्रीव्स और रोस्टन चेज को एक-एक सफलता मिली लेकिन कोई भी गेंदबाज श्रीलंकाई बल्लेबाजों पर लगातार दबाव नहीं बना सका।

    विशाल लक्ष्य के जवाब में वेस्टइंडीज की शुरुआत अच्छी नहीं रही। ब्रैंडन किंग 17 रन बनाकर आउट हो गए। हालांकि जॉन कैंपबेल ने एक छोर संभाले रखा और दिन का खेल समाप्त होने तक 31 रन बनाकर नाबाद रहे। उनके साथ केवम हॉज छह रन बनाकर क्रीज पर मौजूद हैं।

    पहले टेस्ट में मिली करारी हार के बाद श्रीलंका ने इस मुकाबले के लिए टीम में तीन बदलाव किए थे। प्रभात जयसूर्या लाहिरू उदारा और इसिथा विजेसुंदरा को अंतिम एकादश में शामिल किया गया। पथुम निसांका और लाहिरू कुमारा चोट के कारण बाहर रहे जबकि कसुन रजिथा को खराब प्रदर्शन के चलते टीम में जगह नहीं मिली।

    पहले टेस्ट में वेस्टइंडीज ने श्रीलंका को एक पारी और 217 रन से हराया था लेकिन दूसरे टेस्ट में श्रीलंका ने शानदार वापसी करते हुए मुकाबले पर अपनी मजबूत पकड़ बना ली है। अब तीसरे दिन वेस्टइंडीज की बल्लेबाजी यह तय करेगी कि मैच किस दिशा में आगे बढ़ेगा।

  • चार घंटे से अधिक चले रोमांचक संघर्ष में ज्वेरेव ने कोबोली को दी शिकस्त, रचा ऐतिहासिक कीर्तिमान

    चार घंटे से अधिक चले रोमांचक संघर्ष में ज्वेरेव ने कोबोली को दी शिकस्त, रचा ऐतिहासिक कीर्तिमान

    नई दिल्ली । विश्व टेनिस परिदृश्य पर जर्मनी के स्टार खिलाड़ी अलेक्जेंडर ज्वेरेव ने आखिरकार अपने करियर का सबसे बड़ा मील का पत्थर हासिल करते हुए इतिहास के पन्नों में अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज करा लिया है। पेरिस के प्रतिष्ठित क्ले कोर्ट पर खेले गए फ्रेंच ओपन 2026 के पुरुष एकल वर्ग के खिताबी मुकाबले में विश्व नंबर-3 ज्वेरेव ने अपनी खेल क्षमता और मानसिक दृढ़ता का उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। उन्होंने पांच सेट तक खिंचे बेहद कड़े और सांस रोक देने वाले फाइनल मैच में इटली के उभरते हुए खिलाड़ी फ्लेवियो कोबोली की चुनौती को ध्वस्त करते हुए अपने जीवन का पहला ग्रैंड स्लैम खिताब जीत लिया।

    अंतरराष्ट्रीय टेनिस कैलेंडर के इस बेहद महत्वपूर्ण खिताबी मुकाबले में दोनों खिलाड़ियों के बीच करीब चार घंटे और 20 मिनट तक मैराथन संघर्ष देखा गया। अलेक्जेंडर ज्वेरेव ने अंततः कोबोली को 6-1, 4-6, 6-4, 6-7(5), 6-1 से मात देकर रोलां गैरो की चमचमाती ट्रॉफी पर कब्जा जमाया। मैच का अंतिम और निर्णायक अंक जीतते ही जर्मन खिलाड़ी कोर्ट पर ही बेहद भावुक नजर आए। उनके लिए यह जीत इसलिए भी ऐतिहासिक है क्योंकि इससे पहले वे तीन बड़े ग्रैंड स्लैम फाइनल मुकाबलों में पहुंचकर भी उपविजेता बनकर रह गए थे, जिसमें 2020 का यूएस ओपन, 2024 का फ्रेंच ओपन और 2025 का ऑस्ट्रेलियन ओपन शामिल है।

    मैच की तकनीकी समीक्षा की जाए तो ज्वेरेव ने मुकाबले की आक्रामक शुरुआत करते हुए पहले सेट में पूरी तरह अपना दबदबा कायम किया और महज 34 मिनट के भीतर इसे 6-1 से अपने पक्ष में कर लिया। इसके बाद अपना पहला ग्रैंड स्लैम फाइनल खेल रहे इटली के फ्लेवियो कोबोली ने दूसरे सेट में शानदार वापसी की। कोबोली ने अपने बेहतरीन ड्रॉप शॉट्स और आक्रामक ग्राउंडस्ट्रोक्स के दम पर ज्वेरेव की सर्विस ब्रेक की और दूसरा सेट 6-4 से जीतकर मैच में रोमांच वापस ला दिया। तीसरे सेट में भी दोनों के बीच कांटे की टक्कर रही, लेकिन कोबोली की कुछ अप्रत्याशित गलतियों का लाभ उठाकर ज्वेरेव ने इसे 6-4 से जीत लिया।

    चौथे सेट में दोनों खिलाड़ियों का जज्बा चरम पर था जहां इतालवी खिलाड़ी कोबोली ने टाई-ब्रेकर में शानदार फोरहैंड विनर लगाते हुए खेल को निर्णायक पांचवें सेट में धकेल दिया। हालांकि, अंतिम सेट में ज्वेरेव ने एक सच्चे चैंपियन की तरह वापसी की और अपनी सर्विस पर 83 प्रतिशत अंक हासिल करते हुए कोबोली पर मानसिक दबाव बना दिया। ज्वेरेव ने शुरुआती गेम में ही विरोधी की सर्विस ब्रेक की और पीछे मुड़कर नहीं देखा तथा अंतिम सेट 6-1 से जीतकर खिताब अपने नाम कर लिया।

    इस ऐतिहासिक विजय के साथ ही अलेक्जेंडर ज्वेरेव ने जर्मन टेनिस के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। वह साल 1937 में हेनर हेन्केल के बाद फ्रेंच ओपन का पुरुष एकल खिताब जीतने वाले पहले जर्मन खिलाड़ी बन गए हैं। इसके अतिरिक्त, वर्ष 1996 के ऑस्ट्रेलियन ओपन में बोरिस बेकर की ऐतिहासिक जीत के बाद वे किसी भी ग्रैंड स्लैम इवेंट में पुरुष एकल का खिताब जीतने वाले पहले जर्मन पुरुष खिलाड़ी बने हैं। दूसरी ओर, उपविजेता रहे कोबोली भले ही खिताब से चूक गए हों, लेकिन इस टूर्नामेंट में उनके शानदार प्रदर्शन के दम पर वे विश्व रैंकिंग में शीर्ष-10 के बेहद करीब पहुंच गए हैं।

  • विश्व नंबर वन मैग्नस कार्लसन को दो बार चटाई धूल, 20 वर्षीय ग्रैंडमास्टर प्रज्ञानंद बने नॉर्वे शतरंज जीतने वाले पहले भारतीय

    विश्व नंबर वन मैग्नस कार्लसन को दो बार चटाई धूल, 20 वर्षीय ग्रैंडमास्टर प्रज्ञानंद बने नॉर्वे शतरंज जीतने वाले पहले भारतीय


    नई दिल्ली ।
    वैश्विक शतरंज के मानचित्र पर भारत के युवा ग्रैंडमास्टर रमेशबाबू प्रज्ञानंद ने एक नया और स्वर्णिम अध्याय जोड़ दिया है। ओस्लो में आयोजित अत्यंत प्रतिष्ठित और दुनिया के सबसे कठिन शतरंज आयोजनों में से एक ‘नॉर्वे शतरंज टूर्नामेंट’ का खिताब जीतकर प्रज्ञानंद ने इतिहास रच दिया है। इस अभूतपूर्व सफलता के साथ ही वह इस अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता को जीतने वाले देश के पहले भारतीय शतरंज खिलाड़ी बन गए हैं। भारत के महानतम खिलाड़ी और पूर्व विश्व चैंपियन विश्वनाथन आनंद भी अपने करियर में इस प्रतिष्ठित खिताब को हासिल नहीं कर सके थे, जिससे इस 20 वर्षीय युवा खिलाड़ी की उपलब्धि का महत्व और अधिक बढ़ जाता है।

    प्रतियोगिता का अंतिम और निर्णायक दौर बेहद रोमांचक और अत्यधिक दबाव वाला रहा। अंतिम दिन की शुरुआत से पहले प्रज्ञानंद कुल 15 अंकों के साथ तालिका में तीसरे स्थान पर चल रहे थे और खिताब की रेस में पिछड़ते दिख रहे थे। हालांकि, उन्होंने अंतिम राउंड में जर्मनी के मजबूत ग्रैंडमास्टर विंसेंट कीमर के खिलाफ उत्कृष्ट मानसिक सुदृढ़ता और रणनीतिक कौशल का प्रदर्शन किया। क्लासिकल मुकाबले में उन्होंने बेहद सधी हुई चालें चलते हुए कीमर को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। इस शानदार क्लासिकल जीत की बदौलत प्रज्ञानंद को पूरे 3 अंक मिले, जिससे उनका कुल स्कोर 18 अंकों पर पहुंच गया और उन्होंने अंक तालिका में शीर्ष स्थान पर कब्जा जमा लिया।

    इस टूर्नामेंट के परिणाम को प्रभावित करने में अन्य वैश्विक मुकाबलों की भी बड़ी भूमिका रही। अमेरिका के दिग्गज ग्रैंडमास्टर वेसली सो अंतिम दिन अपनी बढ़त को बरकरार रखने में नाकाम रहे और उनका मुकाबला ड्रॉ पर समाप्त हुआ, जिसके बाद वे आर्मागेडन टाई-ब्रेक के फेर में फंस गए। वेसली सो की इस रणनीतिक चूक ने भारतीय ग्रैंडमास्टर के लिए खिताबी जीत के द्वार पूरी तरह खोल दिए। प्रज्ञानंद ने इस सुनहरे अवसर को हाथ से जाने नहीं दिया और आक्रामक खेल दिखाते हुए अंक तालिका में निर्णायक बढ़त हासिल कर ली, जिसने उनकी खिताबी जीत पर मुहर लगा दी।

    इस पूरे टूर्नामेंट के दौरान प्रज्ञानंद की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक उपलब्धि विश्व के नंबर एक खिलाड़ी और पांच बार के विश्व चैंपियन मैग्नस कार्लसन के खिलाफ रही। भारतीय युवा खिलाड़ी ने कार्लसन को उनके ही घरेलू मैदान पर एक नहीं बल्कि दो बार क्लासिकल मुकाबलों में शिकस्त देकर पूरी दुनिया को स्तब्ध कर दिया। विश्व नंबर वन खिलाड़ी को इस तरह लगातार दबाव में लाना प्रज्ञानंद की वैश्विक स्तर पर बढ़ती ताकत को दर्शाता है। इसके अतिरिक्त, इस टूर्नामेंट में भारत के नवनियुक्त विश्व चैंपियन डी गुकेश भी अपनी चुनौती पेश कर रहे थे, लेकिन उतार-चढ़ाव भरे प्रदर्शन के कारण वे खिताब की दौड़ से बाहर हो गए, जबकि प्रज्ञानंद ने भारतीय उम्मीदों को मजबूती से संभाला।

    प्रज्ञानंद के लिए इस महासमर की शुरुआत बेहद धीमी और औसत रही थी, जहां शुरुआती दौर में वे लय हासिल करने के लिए संघर्ष करते दिखे थे। इसके बावजूद, टूर्नामेंट के दूसरे हाफ में उन्होंने जिस तरह की ऐतिहासिक और अदम्य वापसी की, उसने खेल समीक्षकों को बेहद प्रभावित किया है। उनकी यह जीत केवल उनकी खेल प्रतिभा का नहीं, बल्कि विपरीत परिस्थितियों में शांत रहकर सटीक निर्णय लेने की उनकी अद्वितीय मानसिक क्षमता का जीवंत प्रमाण है। इस खिताबी जीत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि प्रज्ञानंद आने वाले समय में विश्व शतरंज पटल पर लंबे समय तक अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।

  • भारत की युवा एथलेटिक्स शक्ति का जलवा, अंडर-20 चैंपियनशिप में 19 पदकों के साथ शानदार प्रदर्शन

    भारत की युवा एथलेटिक्स शक्ति का जलवा, अंडर-20 चैंपियनशिप में 19 पदकों के साथ शानदार प्रदर्शन



    नई दिल्ली। 22वीं एशियन अंडर-20 एथलेटिक्स चैंपियनशिप 2026 में भारतीय युवा खिलाड़ियों ने शानदार प्रदर्शन करते हुए कुल 19 पदक (10 स्वर्ण, 5 रजत और 4 कांस्य) जीतकर देश का नाम रोशन किया। इस प्रदर्शन की देशभर में सराहना हो रही है और इसे भारत की उभरती खेल प्रतिभा का मजबूत संकेत माना जा रहा है।

    भारत के प्रदर्शन पर केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah ने भी खिलाड़ियों को बधाई दी और इसे देश की “अदम्य खेल क्षमता का प्रतीक” बताया। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि यह उपलब्धि आने वाले समय में हजारों युवा एथलीटों को प्रेरित करेगी। प्रधानमंत्री Narendra Modi ने भी भारतीय दल की सराहना करते हुए कहा कि यह प्रदर्शन खिलाड़ियों के दृढ़ संकल्प और उत्कृष्टता का प्रमाण है।

    आखिरी दिन भारत का दमदार प्रदर्शन
    प्रतियोगिता के अंतिम दिन भारत ने तीन स्वर्ण पदक जीतकर अपने अभियान का शानदार समापन किया।
    मुस्कान ने 5000 मीटर दौड़ में 16:53.08 के समय के साथ स्वर्ण पदक जीता
    मोगली वेंकटराम रेड्डी ने 800 मीटर दौड़ में 1:48.27 का समय निकालकर गोल्ड हासिल किया
    नीरू पाठक की भूमिका से 4×400 मीटर रिले टीम ने भी स्वर्ण पदक अपने नाम किया
    रिले इवेंट में रिकॉर्ड प्रदर्शन

    भारतीय महिला 4×400 मीटर रिले टीम ने 3:38.07 सेकंड का समय निकालकर नया मीट रिकॉर्ड बनाया। वहीं पुरुषों की 4×400 मीटर रिले टीम ने भी पुराने रिकॉर्ड को पीछे छोड़ते हुए मजबूत प्रदर्शन किया, हालांकि उन्हें कांस्य पदक से संतोष करना पड़ा। महिला 4×100 मीटर रिले टीम ने भी शानदार प्रदर्शन करते हुए रजत पदक जीता।

    भारत की बढ़ती एथलेटिक्स ताकत
    विशेषज्ञों के अनुसार, यह प्रदर्शन भारत में युवा एथलेटिक्स की बढ़ती गहराई और बेहतर प्रशिक्षण प्रणाली का संकेत है। खासकर ट्रैक और फील्ड इवेंट्स में भारत की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता पहले की तुलना में काफी मजबूत हुई है।