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  • ‘दिमागी नक्सल’ बयान पर बीजेपी का चिदंबरम पर हमला, सुधांशु त्रिवेदी ने कांग्रेस से नक्सलवाद पर रुख स्पष्ट करने को कहा

    ‘दिमागी नक्सल’ बयान पर बीजेपी का चिदंबरम पर हमला, सुधांशु त्रिवेदी ने कांग्रेस से नक्सलवाद पर रुख स्पष्ट करने को कहा

    नई दिल्ली । ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को लेकर बीजेपी और कांग्रेस के बीच राजनीतिक विवाद लगातार तेज होता जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर दिए गए संबोधन में नक्सली हिंसा के साथ नक्सली विचारधारा को बढ़ावा देने वाली सोच से सावधान रहने की बात कहे जाने के बाद इस मुद्दे पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम की टिप्पणी के बाद बीजेपी ने कांग्रेस पर सीधा हमला बोला है।

    पी. चिदंबरम ने प्रधानमंत्री के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यदि उन्हें ‘दिमागी नक्सली’ कहा जाता है तो उन्हें इस संबोधन पर गर्व है। उनके इस बयान को बीजेपी ने नक्सलवाद के मुद्दे पर कांग्रेस की सोच से जोड़ते हुए सवाल खड़े किए हैं। बीजेपी नेता सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि प्रधानमंत्री की टिप्पणी के कुछ ही समय बाद चिदंबरम का खुद को ‘दिमागी नक्सल’ बताना राजनीतिक बहस को नया मोड़ देता है।

    सुधांशु त्रिवेदी ने कांग्रेस से सवाल किया कि पार्टी नक्सलवाद के मुद्दे पर किस रुख के साथ खड़ी है। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के उस पुराने बयान का भी उल्लेख किया, जिसमें नक्सलवाद को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बताया गया था। बीजेपी का तर्क है कि कांग्रेस को यह स्पष्ट करना चाहिए कि वह मनमोहन सिंह के पुराने रुख का समर्थन करती है या चिदंबरम की मौजूदा टिप्पणी को सही मानती है।

    बीजेपी ने इस बहस को देश में नक्सली हिंसा के पुराने हालात से भी जोड़ा है। पार्टी नेताओं के अनुसार, एक समय देश के कई हिस्सों में नक्सली गतिविधियों का व्यापक प्रभाव था और बड़ी संख्या में जिले प्रभावित बताए जाते थे। हिंसा के कारण सुरक्षाबलों और आम नागरिकों की जान जाने की घटनाएं भी सामने आती रही हैं।

    सुधांशु त्रिवेदी ने दावा किया कि केंद्र सरकार की सुरक्षा और विकास संबंधी कोशिशों के बाद नक्सली हिंसा में उल्लेखनीय कमी आई है। उन्होंने बताया कि सरकारी आंकड़ों के अनुसार 31 मई 2026 तक नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या घटकर शून्य हो गई थी। बीजेपी इसे नक्सलवाद के खिलाफ लंबे समय से चलाए जा रहे अभियान की बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है।

    इस दौरान बस्तर का उदाहरण भी राजनीतिक चर्चा का हिस्सा बना। कभी नक्सली हिंसा के लिए चर्चा में रहने वाले बस्तर में अब खेल और अन्य सामाजिक गतिविधियों के विस्तार का उल्लेख करते हुए बीजेपी ने इसे बदले हुए माहौल का संकेत बताया। त्रिवेदी ने बस्तर ओलंपिक जैसी गतिविधियों का हवाला देकर कहा कि क्षेत्र में सामान्य स्थिति और विकास की दिशा में बदलाव दिखाई दे रहा है।

    विवाद की मूल शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 15 अगस्त के भाषण से हुई थी। उन्होंने कहा था कि हथियार उठाने वाले नक्सलवाद का प्रभाव लगभग समाप्त हो चुका है, लेकिन ऐसी विचारधारा और सोच से सतर्क रहने की आवश्यकता है जो नक्सली विचारों को बढ़ावा देती हो। इसके बाद ‘दिमागी नक्सल’ शब्द राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया।

    अब चिदंबरम की टिप्पणी और बीजेपी की प्रतिक्रिया के बाद यह मुद्दा कांग्रेस और बीजेपी के बीच वैचारिक तथा राजनीतिक टकराव का नया विषय बन गया है। आने वाले दिनों में दोनों दलों के बीच इस बयान को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और तेज होने की संभावना है।

  • दिमागी नक्सल बयान पर सियासी घमासान, चिदंबरम ने कहा गर्व है, विपक्ष ने पीएम मोदी की टिप्पणी पर उठाए सवाल

    दिमागी नक्सल बयान पर सियासी घमासान, चिदंबरम ने कहा गर्व है, विपक्ष ने पीएम मोदी की टिप्पणी पर उठाए सवाल


    नई दिल्ली । 
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले की प्राचीर से दिए गए संबोधन में दिमागी नक्सल शब्द के इस्तेमाल को लेकर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में समाज को गलत दिशा में ले जाने वाले तत्वों को पहचानने की जरूरत पर जोर दिया था। उनके इस बयान के बाद कांग्रेस और वाम दलों के नेताओं ने इसे लेकर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है।

    कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम ने प्रधानमंत्री की टिप्पणी पर पलटवार करते हुए कहा कि उन्हें दिमागी नक्सल होने पर गर्व है। चिदंबरम की इस प्रतिक्रिया के बाद राजनीतिक बहस और तेज हो गई। कांग्रेस नेताओं ने प्रधानमंत्री के बयान को विपक्ष और सरकार से असहमति रखने वाले लोगों के संदर्भ में देखा और इस तरह की शब्दावली के इस्तेमाल पर सवाल उठाए।

    कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने भी प्रधानमंत्री की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए अर्बन नक्सल शब्द के पुराने इस्तेमाल का मुद्दा उठाया। उन्होंने दावा किया कि कुछ वर्ष पहले प्रधानमंत्री की ओर से अर्बन नक्सल शब्द का इस्तेमाल किया जाता था, लेकिन संसद में इसकी परिभाषा को लेकर सवाल पूछे जाने पर स्पष्ट परिभाषा सामने नहीं आई थी।

    जयराम रमेश ने जाति जनगणना के मुद्दे का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि कुछ समय पहले तक जाति जनगणना की मांग को अर्बन नक्सल सोच से जोड़कर देखा जाता था, जबकि बाद में सरकार ने जाति जनगणना कराने का निर्णय लिया। उनके अनुसार, सरकार की ओर से पहले किसी मांग या विचार को एक विशेष राजनीतिक शब्दावली से जोड़ना और बाद में उसी दिशा में कदम उठाना सवाल खड़े करता है।

    कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे समेत पार्टी के अन्य नेताओं ने भी प्रधानमंत्री के बयान पर आपत्ति जताई। विपक्षी नेताओं का कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने या उनसे असहमति जताने वालों को इस तरह के विशेषणों से संबोधित करना उचित नहीं है।

    वाम दलों ने भी प्रधानमंत्री की टिप्पणी को गंभीरता से लिया है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव डी राजा और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी के महासचिव एमए बेबी ने प्रधानमंत्री के बयान पर प्रतिक्रिया व्यक्त की। वाम नेताओं ने दिमागी नक्सल जैसे शब्द के इस्तेमाल को लेकर सवाल उठाते हुए इसे राजनीतिक विमर्श के लिए गंभीर विषय बताया।

    इस पूरे विवाद की शुरुआत प्रधानमंत्री मोदी के स्वतंत्रता दिवस संबोधन से हुई। लाल किले से राष्ट्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने देश के सामने मौजूद चुनौतियों और समाज को प्रभावित करने वाली विचारधाराओं का उल्लेख किया। इसी दौरान उन्होंने दिमागी नक्सल शब्द का इस्तेमाल किया और ऐसे तत्वों को पहचानने की आवश्यकता बताई, जो उनके अनुसार समाज को गलत दिशा में ले जाने का प्रयास करते हैं।

    प्रधानमंत्री की टिप्पणी को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच राजनीतिक मतभेद अब सार्वजनिक बहस का रूप ले चुके हैं। कांग्रेस और वाम दल जहां इस शब्दावली को लेकर सरकार पर सवाल उठा रहे हैं, वहीं प्रधानमंत्री के बयान का संदर्भ सामाजिक और वैचारिक चुनौतियों से जुड़ा बताया जा रहा है।

    दिमागी नक्सल शब्द पर शुरू हुआ यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब राजनीतिक दल स्वतंत्रता दिवस के संदेशों और देश की दिशा से जुड़े मुद्दों पर अपनी-अपनी विचारधारा के आधार पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं। चिदंबरम की टिप्पणी और विपक्षी नेताओं की आपत्तियों ने इस मुद्दे को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। आने वाले दिनों में संसद और सार्वजनिक मंचों पर इस शब्द को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच और बयानबाजी देखने को मिल सकती है।