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  • दीवार से चूना खुरचकर खा रहा है बच्चा तो न करें नजरअंदाज, इस आदत के पीछे छिपी हो सकती है बड़ी वजह

    दीवार से चूना खुरचकर खा रहा है बच्चा तो न करें नजरअंदाज, इस आदत के पीछे छिपी हो सकती है बड़ी वजह


    नई दिल्ली। छोटे बच्चों में कई बार ऐसी आदतें देखने को मिलती हैं जिन्हें देखकर माता पिता हैरान रह जाते हैं। कुछ बच्चे दीवार से चूना खुरचकर खाने लगते हैं तो कुछ मिट्टी चॉक कागज या दूसरी ऐसी चीजें मुंह में डालते हैं जो खाने योग्य नहीं होतीं। शुरुआत में माता पिता इसे बच्चे की शरारत या जिज्ञासा समझकर नजरअंदाज कर सकते हैं लेकिन अगर बच्चा बार बार ऐसी चीजें खाने की कोशिश कर रहा है तो इस आदत पर ध्यान देना जरूरी है। विशेषज्ञों के अनुसार गैर खाद्य चीजों को लगातार खाने की इच्छा Pica जैसी स्थिति से जुड़ी हो सकती है। इसके अलावा शरीर में आयरन की कमी या एनीमिया जैसे पोषण संबंधी कारणों की भी जांच की जरूरत पड़ सकती है।

    बच्चे के चूना खाने के पीछे कई वजहें हो सकती हैं। छोटे बच्चे अक्सर आसपास की चीजों को देखकर और उन्हें छूकर समझने की कोशिश करते हैं इसलिए कभी कभी जिज्ञासा के कारण भी वे दीवार से निकला चूना मुंह में डाल सकते हैं। लेकिन अगर यह व्यवहार लगातार बना हुआ है और बच्चा चूने के अलावा मिट्टी चॉक या अन्य गैर खाद्य वस्तुएं भी खाने लगा है तो इसे सामान्य आदत मानकर छोड़ना ठीक नहीं है। ऐसी स्थिति में बाल रोग विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर होता है ताकि बच्चे की स्थिति और पोषण संबंधी जरूरतों को समझा जा सके।

    चूना खाने से बच्चे के स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल असर पड़ सकता है। चूने के प्रकार और निगली गई मात्रा के आधार पर परेशानी अलग अलग हो सकती है। कुछ मामलों में पेट दर्द उल्टी कब्ज या पाचन तंत्र से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं। अगर बच्चे ने अधिक मात्रा में चूना निगल लिया है या उसके मुंह में जलन दर्द उल्टी अथवा सांस लेने जैसी परेशानी दिखाई दे रही है तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए और तत्काल चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए।

    बच्चे को इस आदत से बचाने के लिए सबसे पहले घर का वातावरण सुरक्षित बनाना जरूरी है। जहां से दीवार का चूना निकल रहा है उसे जल्द ठीक करवाएं और घर में रखा चूना पेंट पुट्टी या ऐसी दूसरी सामग्री बच्चे की पहुंच से दूर रखें। बच्चे को बार बार डांटने या डराने के बजाय प्यार से समझाएं और उसका ध्यान किसी खेल खिलौने या दूसरी गतिविधि की तरफ मोड़ें। इससे धीरे धीरे उसकी आदत को कम करने में मदद मिल सकती है।

    बच्चे के भोजन पर भी ध्यान देना जरूरी है। उसकी उम्र और जरूरत के अनुसार आयरन प्रोटीन और अन्य पोषक तत्वों से भरपूर संतुलित आहार देना चाहिए। हरी सब्जियां दालें चना राजमा अंडा और दूसरे पौष्टिक खाद्य पदार्थ बच्चे की डाइट का हिस्सा बनाए जा सकते हैं। हालांकि केवल चूना खाने की आदत देखकर माता पिता को खुद से आयरन या कोई दूसरा सप्लीमेंट शुरू नहीं करना चाहिए। जरूरत होने पर डॉक्टर जांच के बाद उचित सलाह दे सकते हैं।

    अगर बच्चा लगातार चूना मिट्टी चॉक या अन्य गैर खाद्य चीजें खाता है तो बाल रोग विशेषज्ञ से परामर्श लेना सबसे बेहतर कदम है। समय रहते कारण समझने और सही उपाय अपनाने से इस आदत को नियंत्रित किया जा सकता है। माता पिता का धैर्य बच्चे की सुरक्षा और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह इस समस्या से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

  • मानसून में बच्चों की सेहत का रखें खास ध्यान, सही खानपान और साफ-सफाई से रहें सर्दी-खांसी से सुरक्षित

    मानसून में बच्चों की सेहत का रखें खास ध्यान, सही खानपान और साफ-सफाई से रहें सर्दी-खांसी से सुरक्षित


    नई दिल्ली । बरसात का मौसम जहां गर्मी से राहत लेकर आता है वहीं यह बच्चों की सेहत के लिए कई चुनौतियां भी साथ लाता है। इस मौसम में तापमान और नमी में लगातार बदलाव होने से बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रभावित हो सकती है। यही वजह है कि सर्दी जुकाम खांसी बुखार वायरल संक्रमण और गले की परेशानी जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ने लगती हैं। छोटे बच्चों की इम्यूनिटी पूरी तरह विकसित नहीं होती इसलिए उन्हें विशेष देखभाल और सही दिनचर्या की जरूरत होती है।

    मानसून के दौरान बच्चों को भीगने से बचाना सबसे जरूरी है। यदि बच्चा बारिश में भीग जाए तो घर पहुंचते ही उसके गीले कपड़े बदल दें और शरीर को अच्छी तरह सुखाकर साफ और सूखे कपड़े पहनाएं। लंबे समय तक गीले कपड़ों में रहने से शरीर का तापमान कम हो सकता है जिससे सर्दी और वायरल संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।

    इस मौसम में बच्चों के खानपान पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए। ताजा और घर का बना पौष्टिक भोजन ही खिलाएं। मौसमी फल हरी सब्जियां दाल दूध दही और प्रोटीन से भरपूर आहार बच्चों की इम्यूनिटी मजबूत बनाने में मदद करते हैं। बहुत ज्यादा ठंडी चीजें आइसक्रीम कोल्ड ड्रिंक या बाहर का खुला और तला हुआ भोजन देने से बचें क्योंकि इससे गले में संक्रमण और पेट संबंधी समस्याएं हो सकती हैं।

    बच्चों को पर्याप्त मात्रा में पानी पिलाना भी जरूरी है। कई बार बारिश के मौसम में प्यास कम लगती है लेकिन शरीर को हाइड्रेट रखना बेहद आवश्यक होता है। हमेशा उबला या फिल्टर किया हुआ साफ पानी ही पिलाएं ताकि पानी से फैलने वाली बीमारियों का खतरा कम हो सके।

    साफ सफाई का ध्यान रखना भी उतना ही जरूरी है। बच्चों को बाहर से आने के बाद साबुन से अच्छी तरह हाथ धोने की आदत डालें। खाने से पहले और शौचालय के बाद हाथ धोना संक्रमण से बचाव का सबसे आसान और प्रभावी तरीका है। उनके खिलौनों कपड़ों और आसपास के वातावरण को भी नियमित रूप से साफ रखें।

    यदि मौसम ठंडा हो तो बच्चों को हल्के लेकिन आरामदायक गर्म कपड़े पहनाएं। रात में सोते समय शरीर ढका रहे इसका ध्यान रखें। कमरे में नमी ज्यादा होने पर उचित वेंटिलेशन बनाए रखें ताकि फफूंद और बैक्टीरिया पनपने का खतरा कम हो।

    बच्चों की पर्याप्त नींद भी उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करने में अहम भूमिका निभाती है। समय पर सोना और पर्याप्त आराम करना शरीर को संक्रमण से लड़ने की ताकत देता है। साथ ही हल्की शारीरिक गतिविधियां और घर के अंदर खेलने के अवसर भी बच्चों को सक्रिय और स्वस्थ बनाए रखते हैं।

    अगर बच्चे को लगातार बुखार तेज खांसी सांस लेने में तकलीफ या बार बार उल्टी जैसी परेशानी हो तो घरेलू उपायों पर निर्भर रहने के बजाय तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। समय पर इलाज मिलने से गंभीर संक्रमण का खतरा काफी हद तक कम किया जा सकता है।

    बरसात का मौसम सावधानी और सही देखभाल का मौसम है। यदि माता पिता बच्चों के खानपान साफ सफाई कपड़ों और दिनचर्या पर थोड़ा अतिरिक्त ध्यान दें तो सर्दी जुकाम और वायरल संक्रमण जैसी अधिकांश मौसमी बीमारियों से आसानी से बचाव किया जा सकता है। छोटी छोटी आदतें ही बच्चों को पूरे मानसून में स्वस्थ और ऊर्जावान बनाए रखने का सबसे बड़ा आधार बनती हैं।

  • बढ़ती गर्मी और हीटवेव के कारण बच्चों और बुजुर्गों पर सबसे अधिक खतरा है..

    बढ़ती गर्मी और हीटवेव के कारण बच्चों और बुजुर्गों पर सबसे अधिक खतरा है..


    नई दिल्ली । देश के कई हिस्सों में तापमान लगातार बढ़ रहा है और हीटवेव की स्थिति लोगों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है। ऐसे मौसम में सबसे अधिक जोखिम बच्चों और बुजुर्गों को होता है, क्योंकि उनका शरीर तापमान को सामान्य रूप से नियंत्रित करने में सक्षम नहीं होता। इसके कारण वे जल्दी डिहाइड्रेशन और लू जैसी समस्याओं की चपेट में आ सकते हैं, जो कई बार गंभीर स्थिति भी पैदा कर सकती हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों का शरीर पूरी तरह विकसित नहीं होता और उनकी पसीने की ग्रंथियां भी कम सक्रिय होती हैं, जिससे शरीर से गर्मी बाहर निकलने की प्रक्रिया धीमी हो जाती है। दूसरी ओर, बुजुर्गों में उम्र बढ़ने के साथ शरीर की सहनशीलता कम हो जाती है और कई बार स्वास्थ्य समस्याओं या दवाइयों के प्रभाव के कारण भी शरीर तापमान को संतुलित नहीं कर पाता। यही कारण है कि ये दोनों वर्ग गर्मी के मौसम में अधिक संवेदनशील माने जाते हैं।

    लू लगने की स्थिति में कई शुरुआती संकेत दिखाई देते हैं, जैसे तेज सिरदर्द, चक्कर आना, अत्यधिक पसीना आना, कमजोरी महसूस होना और मतली जैसी समस्या। यदि इन लक्षणों को नजरअंदाज किया जाए तो स्थिति गंभीर हो सकती है, इसलिए समय पर सावधानी और इलाज बेहद जरूरी है।

    इस मौसम में सबसे महत्वपूर्ण उपाय पर्याप्त मात्रा में पानी और तरल पदार्थों का सेवन है। बच्चों और बुजुर्गों को नियमित अंतराल पर पानी पिलाना चाहिए ताकि शरीर में पानी की कमी न हो। इसके अलावा नींबू पानी, छाछ और ओआरएस जैसे पेय भी शरीर को हाइड्रेट रखने में मदद करते हैं।

    धूप से बचाव भी उतना ही जरूरी है। बाहर निकलते समय हल्के और सूती कपड़े पहनने चाहिए, सिर को ढकना चाहिए और आंखों की सुरक्षा के लिए चश्मा पहनना चाहिए। विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि दोपहर के समय, जब धूप सबसे तेज होती है, बच्चों और बुजुर्गों को घर के अंदर ही रखा जाए।

    खानपान पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए। भारी, तैलीय और मसालेदार भोजन से बचना चाहिए और हल्का, पौष्टिक तथा आसानी से पचने वाला भोजन लेना चाहिए। ताजे फल, सब्जियां और दही शरीर को ठंडक देने में मदद करते हैं। साथ ही, अत्यधिक कैफीन और शराब जैसे पेय पदार्थों से दूरी बनाए रखना भी जरूरी है, क्योंकि ये शरीर को और अधिक डिहाइड्रेट कर सकते हैं।

    घर के वातावरण को ठंडा रखना भी महत्वपूर्ण है। पंखे, कूलर या एसी का उपयोग करके कमरे का तापमान नियंत्रित किया जा सकता है। बच्चों और बुजुर्गों की नियमित निगरानी आवश्यक है ताकि किसी भी असामान्य स्थिति में तुरंत कदम उठाया जा सके। यदि किसी को लू लगने का संदेह हो तो उसे तुरंत ठंडी जगह पर ले जाकर शरीर को ठंडा करना चाहिए और चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए।