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  • बच्चे का वजन उम्र के हिसाब से तेजी से बढ़ रहा है तो सावधान माता-पिता की ये 5 गलतियां पड़ सकती हैं भारी

    बच्चे का वजन उम्र के हिसाब से तेजी से बढ़ रहा है तो सावधान माता-पिता की ये 5 गलतियां पड़ सकती हैं भारी


    नई दिल्ली। बच्चों में बढ़ता मोटापा आज कई माता-पिता के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है। अक्सर बच्चे का वजन बढ़ने पर परिवार इसे अच्छी सेहत या ज्यादा खाने का संकेत मान लेता है लेकिन अगर वजन उम्र और लंबाई के अनुपात में तेजी से बढ़ रहा है तो इसे नजरअंदाज करना ठीक नहीं है। बचपन का मोटापा आगे चलकर डायबिटीज हाई ब्लड प्रेशर नींद से जुड़ी परेशानियों और दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं का जोखिम बढ़ा सकता है। बच्चों की खानपान और दिनचर्या की आदतें बनाने में माता-पिता की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में कुछ ऐसी गलतियां हैं जिन्हें अनजाने में माता-पिता रोजाना दोहराते हैं और उनका असर बच्चे के वजन पर पड़ सकता है।

    सबसे पहली गलती है बच्चे को मोबाइल टीवी टैबलेट या वीडियो गेम में लंबे समय तक व्यस्त रखना। स्क्रीन के सामने ज्यादा समय बिताने से बच्चों की शारीरिक गतिविधि कम हो सकती है। खेलना दौड़ना चलना और बाहर की गतिविधियों में समय देने के बजाय अगर बच्चा ज्यादातर समय स्क्रीन पर बिताता है तो उसकी रोजाना की सक्रियता प्रभावित होती है। माता-पिता को बच्चों की उम्र के अनुसार खेलकूद और शारीरिक गतिविधियों के लिए पर्याप्त समय तय करना चाहिए।

    दूसरी बड़ी समस्या बार बार पैकेज्ड और जंक फूड देना है। चिप्स बिस्किट पिज्जा बर्गर इंस्टेंट नूडल्स मिठाइयां और मीठे पेय बच्चों को स्वादिष्ट लगते हैं लेकिन इनका लगातार सेवन उनकी कुल कैलोरी बढ़ा सकता है। घर में पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने के साथ फल सब्जियां दालें साबुत अनाज और अन्य संतुलित विकल्पों को बच्चों की नियमित डाइट का हिस्सा बनाना जरूरी है। जंक फूड को रोजाना की आदत बनाने के बजाय कभी कभी सीमित मात्रा में देना बेहतर तरीका हो सकता है।

    तीसरी गलती बच्चे को उसकी इच्छा से ज्यादा खाने के लिए मजबूर करना है। कई माता-पिता प्लेट पूरी कराने के लिए बच्चे पर दबाव डालते हैं। इससे बच्चा अपनी भूख और पेट भरने के प्राकृतिक संकेतों को समझने में कठिनाई महसूस कर सकता है। खाने को इनाम या सजा के तौर पर इस्तेमाल करने से भी बचना चाहिए। बच्चों को संतुलित भोजन उपलब्ध कराने के साथ उनकी भूख के संकेतों का सम्मान करना जरूरी है।

    चौथी गलती नींद की अनदेखी करना है। देर रात तक मोबाइल चलाना टीवी देखना या रोज अलग समय पर सोने की आदत बच्चों की नींद को प्रभावित कर सकती है। पर्याप्त और नियमित नींद बच्चों के स्वस्थ विकास के लिए जरूरी है और कम या अनियमित नींद वजन बढ़ने समेत कई स्वास्थ्य समस्याओं से जुड़ी हो सकती है। इसलिए बच्चों के लिए उम्र के अनुसार नियमित सोने और जागने का समय तय करना चाहिए।

    पांचवीं और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बच्चे वही आदतें जल्दी सीखते हैं जो उन्हें अपने घर में दिखाई देती हैं। अगर माता-पिता खुद लगातार जंक फूड खाते हैं कम सक्रिय रहते हैं या देर रात तक जागते हैं तो बच्चे भी ऐसी दिनचर्या अपना सकते हैं। इसलिए बच्चे का वजन नियंत्रित करने के लिए केवल उसे नियम बताना पर्याप्त नहीं है बल्कि पूरे परिवार को स्वस्थ जीवनशैली अपनाने की कोशिश करनी चाहिए। यदि बच्चे का वजन लगातार तेजी से बढ़ रहा है तो डॉक्टर या बाल रोग विशेषज्ञ से सलाह लेना भी उचित रहेगा।

  • मासूमों पर कहर बन रहा Chandipura Virus समय रहते पहचान और बचाव ही है सबसे बड़ा हथियार

    मासूमों पर कहर बन रहा Chandipura Virus समय रहते पहचान और बचाव ही है सबसे बड़ा हथियार


    नई दिल्ली। बरसात के मौसम में वायरल संक्रमण और मच्छरों से फैलने वाली बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ जाता है। ऐसे समय में Chandipura Virus ने एक बार फिर स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। देश के कुछ राज्यों में इस वायरस के मामले सामने आने के बाद खासतौर पर छोटे बच्चों को लेकर सतर्क रहने की सलाह दी जा रही है। डॉक्टरों का कहना है कि यह वायरस सामान्य संक्रमण की तुलना में कहीं अधिक खतरनाक हो सकता है क्योंकि यह सीधे दिमाग और नर्वस सिस्टम पर असर डालता है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार Chandipura Virus किसी खास उम्र के बच्चों को चुनकर हमला नहीं करता लेकिन पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों का शरीर और उनका नर्वस सिस्टम पूरी तरह विकसित नहीं होता। यही वजह है कि उनका शरीर इस संक्रमण से होने वाले नुकसान का प्रभावी ढंग से मुकाबला नहीं कर पाता। इस उम्र में दिमाग की सुरक्षा करने वाली ब्लड ब्रेन बैरियर नामक परत भी पूरी तरह मजबूत नहीं होती। ऐसे में वायरस आसानी से दिमाग तक पहुंच सकता है और वहां सूजन पैदा कर गंभीर स्थिति उत्पन्न कर सकता है।

    डॉक्टर बताते हैं कि बचपन के शुरुआती वर्षों में मस्तिष्क का विकास बहुत तेजी से होता है। यदि इसी दौरान कोई गंभीर संक्रमण दिमाग को प्रभावित कर दे तो बच्चे के बोलने चलने सीखने और मानसिक विकास पर स्थायी असर पड़ सकता है। यही कारण है कि Chandipura Virus को बच्चों के लिए बेहद खतरनाक माना जाता है और इसके लक्षण दिखते ही तुरंत चिकित्सा सहायता लेना जरूरी होता है।

    इस वायरस के शुरुआती लक्षण सामान्य वायरल बुखार जैसे दिखाई देते हैं। तेज बुखार सिरदर्द उल्टी शरीर में कमजोरी और बेचैनी इसके शुरुआती संकेत हो सकते हैं। कई मामलों में कुछ ही घंटों के भीतर बच्चे को दौरे पड़ना बेहोशी आना या मानसिक भ्रम जैसी गंभीर समस्याएं भी हो सकती हैं। यदि समय पर इलाज न मिले तो स्थिति तेजी से गंभीर हो सकती है।

    विशेषज्ञों के अनुसार Chandipura Virus मुख्य रूप से संक्रमित सैंड फ्लाई और कुछ अन्य कीटों के काटने से फैलता है। बरसात के मौसम में इन कीटों की संख्या बढ़ने से संक्रमण का खतरा भी अधिक हो जाता है। इसलिए बच्चों को साफ और सुरक्षित वातावरण में रखना बेहद जरूरी है।

    बचाव के लिए घर और आसपास साफ सफाई बनाए रखना सबसे जरूरी कदम माना जाता है। बच्चों को पूरे बाजू के कपड़े पहनाना मच्छरदानी का उपयोग करना और कीटों से बचाव के लिए आवश्यक उपाय अपनाना संक्रमण के खतरे को कम कर सकता है। घर के आसपास पानी जमा नहीं होने देना और स्वच्छ वातावरण बनाए रखना भी महत्वपूर्ण है।

    फिलहाल इस वायरस का कोई विशेष एंटीवायरल इलाज उपलब्ध नहीं है। ऐसे में समय पर पहचान और अस्पताल में उचित उपचार ही मरीज की जान बचाने का सबसे प्रभावी तरीका है। यदि किसी बच्चे को तेज बुखार के साथ उल्टी बेहोशी दौरे या असामान्य व्यवहार जैसे लक्षण दिखाई दें तो बिना देरी किए तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि जागरूकता और समय पर उपचार से इस वायरस से होने वाले गंभीर नुकसान को काफी हद तक रोका जा सकता है। इसलिए बरसात के मौसम में बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर विशेष सतर्कता बरतना बेहद आवश्यक है।

  • बच्चों में दस्त बन सकता है गंभीर खतरा, समय पर इलाज और देखभाल से बचाई जा सकती है जान

    बच्चों में दस्त बन सकता है गंभीर खतरा, समय पर इलाज और देखभाल से बचाई जा सकती है जान


    नई दिल्ली। बच्चों में होने वाली सबसे आम लेकिन बेहद गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं में से एक है दस्त, जिसे चिकित्सा भाषा में Diarrhea कहा जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार यह समस्या जितनी सामान्य लगती है, उतनी ही खतरनाक भी हो सकती है, यदि समय पर ध्यान न दिया जाए। विशेषकर छोटे बच्चों में दस्त के कारण शरीर में पानी और आवश्यक पोषक तत्वों की तेजी से कमी हो जाती है, जिससे निर्जलीकरण (Dehydration), कमजोरी और कई जटिलताएं पैदा हो सकती हैं।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञ और नेशनल हेल्थ मिशन के दिशा-निर्देशों के अनुसार National Health Mission लगातार लोगों को जागरूक कर रहा है कि बच्चों में दस्त को हल्के में लेना गंभीर भूल साबित हो सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि शुरुआती लक्षणों की पहचान और तुरंत उपचार ही बच्चे की जान बचाने में सबसे अहम भूमिका निभाते हैं।

    विशेषज्ञ बताते हैं कि दस्त से बचाव के लिए सबसे पहला और महत्वपूर्ण कदम है शिशु को शुरुआती छह महीनों तक केवल मां का दूध देना। स्तनपान बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाता है और कई संक्रमणों से सुरक्षा प्रदान करता है। यह प्राकृतिक रूप से बच्चे के शरीर को मजबूत आधार देता है।

    दूसरा महत्वपूर्ण उपाय है स्वच्छता का पालन। गंदगी और अस्वच्छ वातावरण दस्त फैलाने वाले प्रमुख कारणों में से एक है। इसलिए बच्चों के आसपास साफ-सफाई रखना, हाथों को नियमित धोना और सुरक्षित पेयजल का उपयोग करना बेहद जरूरी माना गया है। इसके साथ ही रोटावायरस और खसरा जैसी बीमारियों के खिलाफ समय पर टीकाकरण भी बच्चों की सुरक्षा के लिए अनिवार्य है।

    तीसरा और सबसे जरूरी कदम है—यदि बच्चे को दस्त हो जाए तो तुरंत उपचार शुरू करना। डॉक्टरों के अनुसार हर बार दस्त होने पर बच्चे को Oral Rehydration Solution (ओआरएस) देना चाहिए ताकि शरीर में पानी और नमक की कमी पूरी हो सके। इसके साथ ही चिकित्सक की सलाह पर जिंक की गोली 14 दिनों तक देना भी लाभकारी माना जाता है, जो दस्त की अवधि और गंभीरता को कम करने में मदद करता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि माता-पिता समय पर इन उपायों को अपनाएं तो बच्चों को गंभीर स्थिति में पहुंचने से बचाया जा सकता है। दस्त के दौरान सबसे बड़ी चुनौती शरीर में तेजी से होने वाला पानी का नुकसान होता है, जिसे समय रहते रोका जाए तो स्थिति सामान्य की जा सकती है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि बच्चों को हल्का, सुपाच्य और पौष्टिक आहार दिया जाए तथा किसी भी तरह की लापरवाही न बरती जाए। दस्त के लक्षण दिखते ही डॉक्टर से संपर्क करना सबसे सुरक्षित विकल्प है।

    कुल मिलाकर, जागरूकता, स्वच्छता और सही उपचार ही बच्चों को इस खतरनाक लेकिन नियंत्रित की जा सकने वाली बीमारी से सुरक्षित रखने की सबसे बड़ी कुंजी है।

  • मोबाइल-टीवी की लत बना रही बच्चों का बचपन कैद: सेहत और दिमाग पर पड़ रहा गहरा असर

    मोबाइल-टीवी की लत बना रही बच्चों का बचपन कैद: सेहत और दिमाग पर पड़ रहा गहरा असर

    नई दिल्ली । आज के डिजिटल युग में जहां तकनीक ने जीवन को आसान बनाया है, वहीं इसका एक चिंताजनक पहलू भी तेजी से सामने आ रहा है—बच्चों में बढ़ती स्क्रीन की लत। घरों में अक्सर यह नजारा आम हो गया है कि बच्चे मैदान में खेलने के बजाय घंटों मोबाइल या टीवी स्क्रीन के सामने बैठे रहते हैं। शुरुआत में यह माता-पिता के लिए सुविधा का जरिया लगता है, लेकिन धीरे-धीरे यही आदत बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए खतरा बन जाती है।

    व्यस्त जीवनशैली के चलते कई पेरेंट्स बच्चों को शांत रखने या खाना खिलाने के लिए उनके हाथ में मोबाइल दे देते हैं। यह तरीका भले ही तुरंत काम कर जाए, लेकिन लंबे समय में यह एक तरह की डिजिटल निर्भरता पैदा कर देता है। जब बच्चा स्क्रीन की दुनिया में खो जाता है, तो उसका वास्तविक दुनिया से जुड़ाव कम होने लगता है, जिससे उसके सामाजिक कौशल प्रभावित होते हैं। दोस्तों के साथ खेलना, बातचीत करना और भावनाओं को समझना—ये सभी क्षमताएं धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगती हैं।

    स्क्रीन टाइम का असर बच्चों की सेहत पर भी साफ नजर आने लगा है। जहां पहले बच्चे घंटों बाहर खेलते थे, वहीं अब उनका समय वीडियो गेम और कार्टून में बीतता है। इस बदलाव के कारण मोटापा, आंखों में जलन, सूखापन और कम उम्र में चश्मा लगने जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। लंबे समय तक एक ही जगह बैठने से रीढ़ की हड्डी पर भी असर पड़ता है। इसके अलावा स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट बच्चों की नींद को प्रभावित करती है, जिससे उनकी दिनचर्या बिगड़ जाती है और वे चिड़चिड़े व थके हुए महसूस करते हैं।

    मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, अत्यधिक स्क्रीन टाइम बच्चों के दिमागी विकास पर भी असर डालता है। उनकी ध्यान केंद्रित करने की क्षमता घटने लगती है और वे जल्दी बोर या अधीर हो जाते हैं। डिजिटल कंटेंट की तेज गति उन्हें तुरंत परिणाम की आदत डाल देती है, जिससे धैर्य और एकाग्रता कमजोर हो जाती है। इसके साथ ही, वर्चुअल दुनिया में ज्यादा समय बिताने से बच्चों में सहानुभूति और सामाजिक समझ भी कम होने लगती है।

    हालांकि यह भी सच है कि आज के दौर में बच्चों को तकनीक से पूरी तरह दूर रखना संभव नहीं है। ऑनलाइन पढ़ाई, शैक्षणिक ऐप्स और जानकारी से भरपूर वीडियो उनके विकास के लिए जरूरी हैं। लेकिन असली चुनौती जरूरत और लत के बीच संतुलन बनाए रखने की है। तकनीक का उपयोग एक साधन के रूप में होना चाहिए, न कि आदत या निर्भरता के रूप में।

    इस समस्या से बचाव के लिए माता-पिता को सक्रिय भूमिका निभानी होगी। बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम की एक निश्चित सीमा तय करना जरूरी है। इसके साथ ही उन्हें आउटडोर खेल, किताबें पढ़ने, पेंटिंग, संगीत या अन्य रचनात्मक गतिविधियों की ओर प्रोत्साहित करना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बच्चे अपने बड़ों से सीखते हैं, इसलिए माता-पिता को खुद भी मोबाइल और स्क्रीन का सीमित उपयोग करना चाहिए।

    अगर समय रहते इस आदत पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो यह बच्चों के भविष्य के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है। इसलिए जरूरी है कि डिजिटल दुनिया और वास्तविक जीवन के बीच संतुलन बनाकर ही बच्चों का स्वस्थ और खुशहाल बचपन सुनिश्चित किया जाए।

  • बच्चों की सेहत को लेकर अलर्ट रहें पेट दर्द और पाचन समस्या के संकेतों को समझें समय रहते इलाज करें

    बच्चों की सेहत को लेकर अलर्ट रहें पेट दर्द और पाचन समस्या के संकेतों को समझें समय रहते इलाज करें


    नई दिल्ली । बच्चों की सेहत और उनका सही विकास पूरी तरह उनके पोषण और पाचन तंत्र की स्थिति पर निर्भर करता है। आज की व्यस्त जीवनशैली में माता-पिता अक्सर बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़े छोटे संकेतों को नजरअंदाज कर देते हैं, जो आगे चलकर गंभीर समस्या का रूप ले सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों के पाचन स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देना बेहद जरूरी है क्योंकि उनका पाचन तंत्र अभी पूरी तरह विकसित नहीं होता।

    राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अनुसार बच्चों में पाचन संबंधी समस्याएं आम हैं, लेकिन शुरुआती लक्षणों को समझकर समय पर इलाज किया जाए तो बड़ी परेशानियों से बचा जा सकता है। बच्चों में कब्ज, दस्त, पेट दर्द और एसिडिटी जैसी समस्याएं सबसे ज्यादा देखने को मिलती हैं, जिन्हें अक्सर सामान्य समझकर नजरअंदाज कर दिया जाता है।

    कब्ज एक आम समस्या है जिसमें बच्चा कठोर मल त्याग करता है या शौच के समय रोने लगता है। कई बार बच्चा शौच करने से डरने लगता है, जो आगे चलकर आदत बन सकती है। वहीं दस्त की स्थिति में बच्चे को बार बार पतला मल आता है जिससे शरीर में पानी की कमी होने का खतरा बढ़ जाता है और बच्चा सुस्त और कमजोर दिखाई देने लगता है।

    इसके अलावा पेट में जलन और एसिडिटी भी बच्चों में पाचन समस्या का बड़ा संकेत है। इस स्थिति में बच्चा पेट में जलन की शिकायत करता है, खट्टी डकारें आती हैं और कभी कभी उल्टी जैसी समस्या भी हो सकती है। भोजन असहजता या फूड इनटॉलरेंस भी एक महत्वपूर्ण संकेत है, जिसमें दूध, गेहूं या कुछ विशेष खाद्य पदार्थों से पेट फूलना, दर्द या एलर्जी जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।

    कृमि संक्रमण भी बच्चों में एक आम लेकिन गंभीर समस्या है जो साफ सफाई की कमी के कारण होती है। इसमें बच्चा बार बार पेट दर्द की शिकायत करता है, भूख कम हो जाती है, वजन नहीं बढ़ता और कई बार नींद में दांत पीसने की आदत भी देखी जाती है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि माता पिता को बच्चों के व्यवहार और स्वास्थ्य में होने वाले छोटे बदलावों पर भी नजर रखनी चाहिए। अगर बच्चा लगातार पेट दर्द, उल्टी, दस्त या कब्ज जैसी समस्याओं से जूझ रहा हो तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। घरेलू उपायों से आराम न मिलने पर तुरंत बाल रोग विशेषज्ञ से संपर्क करना जरूरी है।

    साथ ही बच्चों को स्वच्छता की आदतें सिखाना, उबला या साफ पानी देना और संतुलित आहार उपलब्ध कराना बेहद आवश्यक है। नियमित रूप से हाथ धोने की आदत भी उन्हें कई संक्रमणों से बचा सकती है। समय पर ध्यान और सही देखभाल से बच्चों को स्वस्थ और मजबूत बनाया जा सकता है।