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  • पुशी पेरेंटिंग से बचें बच्चों की सफलता नहीं बल्कि आत्मविश्वास भी छीन सकता है जरूरत से ज्यादा दबाव

    पुशी पेरेंटिंग से बचें बच्चों की सफलता नहीं बल्कि आत्मविश्वास भी छीन सकता है जरूरत से ज्यादा दबाव


    नई दिल्ली । आज के प्रतिस्पर्धी दौर में लगभग हर माता पिता अपने बच्चों को जीवन के हर क्षेत्र में सफल देखना चाहते हैं। अच्छी पढ़ाई बेहतर करियर और हर गतिविधि में उत्कृष्ट प्रदर्शन की इच्छा स्वाभाविक है लेकिन जब यही अपेक्षाएं बच्चों पर दबाव बनकर थोप दी जाती हैं तब यह उनके मानसिक और भावनात्मक विकास के लिए गंभीर खतरा बन सकती हैं। मनोविज्ञान में इस व्यवहार को पुशी पेरेंटिंग कहा जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह पालन पोषण का ऐसा तरीका है जिसमें बच्चों से हमेशा सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन की उम्मीद की जाती है और उनकी व्यक्तिगत रुचियों भावनाओं तथा सीमाओं को नजरअंदाज कर दिया जाता है।

    मनोवैज्ञानिकों के अनुसार पुशी पेरेंटिंग में माता पिता अक्सर अपने अधूरे सपनों और महत्वाकांक्षाओं को बच्चों के माध्यम से पूरा करने की कोशिश करते हैं। बच्चे पर हमेशा बेहतर अंक लाने हर प्रतियोगिता में जीतने और हर क्षेत्र में सबसे आगे रहने का दबाव बनाया जाता है। बाहर से यह अनुशासन और सफलता की तैयारी जैसा दिखाई देता है लेकिन भीतर ही भीतर बच्चा लगातार तनाव और असुरक्षा की भावना से जूझता रहता है। वह पढ़ाई और गतिविधियों का आनंद लेने के बजाय केवल प्रदर्शन और परिणामों के बारे में सोचने लगता है।

    ऐसे माहौल में यदि बच्चा अच्छे अंक भी हासिल कर ले लेकिन प्रथम स्थान न ला पाए तो उसकी उपलब्धि की सराहना करने के बजाय उसे डांट या निराशा का सामना करना पड़ता है। धीरे धीरे उसके मन में यह भावना घर करने लगती है कि उसकी मेहनत की कोई अहमियत नहीं है और उसे तभी स्वीकार किया जाएगा जब वह दूसरों की अपेक्षाओं पर पूरी तरह खरा उतरे। इससे बच्चों में असफलता का डर बढ़ता है और उनका आत्मविश्वास कमजोर होने लगता है।

    पुशी पेरेंटिंग का एक और बड़ा नुकसान यह है कि बच्चों की अपनी पसंद और रुचियों को महत्व नहीं दिया जाता। कई बच्चों की रुचि खेल संगीत चित्रकला या अन्य रचनात्मक क्षेत्रों में होती है लेकिन माता पिता उन्हें अपनी पसंद के विषय या करियर की ओर धकेल देते हैं। लगातार ऐसा होने पर बच्चा अपनी इच्छाओं को दबा देता है और केवल दूसरों को खुश करने के लिए जीवन जीने लगता है। इससे उसकी रचनात्मकता और आत्मसंतुष्टि दोनों प्रभावित होती हैं।

    विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि बच्चों की लगातार दूसरों से तुलना करना उनके मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर डालता है। जब बार बार किसी दूसरे बच्चे की उपलब्धियों का उदाहरण दिया जाता है तो बच्चा खुद को कमतर समझने लगता है। उसके भीतर हीन भावना पैदा होती है और धीरे धीरे वह अपनी क्षमताओं पर भरोसा खोने लगता है। यह स्थिति आगे चलकर चिंता अवसाद और आत्मविश्वास की कमी जैसी समस्याओं का कारण बन सकती है।

    कई परिवारों में माता पिता बच्चों के हर छोटे बड़े फैसले स्वयं लेने लगते हैं। क्या पहनना है क्या खाना है किससे दोस्ती करनी है या भविष्य में कौन सा विषय चुनना है जैसे निर्णय भी बच्चों को लेने का अवसर नहीं मिलता। इससे बच्चे में निर्णय लेने की क्षमता विकसित नहीं हो पाती और वह बड़े होने के बाद भी हर बात के लिए दूसरों पर निर्भर रहने लगता है।

    मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि बच्चों को सही दिशा देना और अनुशासन सिखाना जरूरी है लेकिन उनकी भावनाओं इच्छाओं और क्षमताओं का सम्मान करना भी उतना ही आवश्यक है। बच्चों को अपनी गलतियों से सीखने का अवसर देना चाहिए और उनकी सफलता के साथ साथ उनके प्रयासों की भी सराहना करनी चाहिए। सकारात्मक प्रोत्साहन और भरोसे का माहौल ही बच्चों के आत्मविश्वास मानसिक संतुलन और स्वस्थ व्यक्तित्व के विकास की मजबूत नींव बनता है।

  • क्या आपका बच्चा खाने की समस्या से जूझ रहा है? जानें ईटिंग डिसऑर्डर के संकेत और समाधान

    क्या आपका बच्चा खाने की समस्या से जूझ रहा है? जानें ईटिंग डिसऑर्डर के संकेत और समाधान

    नई दिल्ली ।आज की तेज रफ्तार जीवनशैली और डिजिटल दुनिया के बढ़ते प्रभाव ने बच्चों और किशोरों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डाला है। इन्हीं समस्याओं में से एक गंभीर स्थिति ईटिंग डिसऑर्डर यानी खाने से जुड़ी अनियमितता है, जो धीरे-धीरे बच्चे के शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ उसके मानसिक संतुलन को भी प्रभावित कर सकती है। इस समस्या में बच्चा खाने, वजन और शरीर की छवि को लेकर असामान्य सोच विकसित करने लगता है और अक्सर अपनी आत्म-छवि को केवल शरीर के आकार या वजन से जोड़ने लगता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार यह समस्या किसी एक कारण से नहीं होती, बल्कि इसके पीछे कई मानसिक, सामाजिक और पारिवारिक कारक जिम्मेदार हो सकते हैं। बच्चों में बढ़ता तनाव, चिंता और अवसाद जैसी स्थितियां इस समस्या को जन्म दे सकती हैं। इसके अलावा आनुवंशिक प्रभाव, परिवार में पहले से किसी सदस्य को ऐसी समस्या होना और सोशल मीडिया पर दिखाए जाने वाले अवास्तविक सुंदरता के मानक भी बच्चों के सोचने के तरीके को प्रभावित करते हैं। इससे बच्चा अक्सर खुद को दूसरों से कमतर समझने लगता है और खाने-पीने के व्यवहार में बदलाव आने लगता है।

    ईटिंग डिसऑर्डर के शुरुआती संकेतों को समझना बेहद जरूरी है ताकि समय रहते स्थिति को नियंत्रित किया जा सके। इसमें बच्चा खाने के समय घबराहट या बेचैनी महसूस कर सकता है, कुछ विशेष खाद्य पदार्थों से दूरी बनाने लगता है, बार-बार कैलोरी गिनने या वजन को लेकर अत्यधिक चिंता करने लगता है। कई मामलों में बच्चा खाना छिपाकर खाने या खाने के बारे में झूठ बोलने जैसी आदतें भी विकसित कर सकता है। इसके साथ ही अत्यधिक व्यायाम करना और अपने शरीर या दिखावट को लेकर लगातार असंतोष जताना भी इसके संकेतों में शामिल हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह समस्या किसी भी उम्र, लिंग या शारीरिक संरचना वाले बच्चे को प्रभावित कर सकती है। इसलिए माता-पिता और परिवार के सदस्यों की भूमिका इसमें सबसे महत्वपूर्ण होती है। बच्चों से बातचीत करते समय उन्हें डराने या दोष देने की बजाय समझ और सहानुभूति के साथ पेश आना चाहिए। उन्हें यह एहसास दिलाना जरूरी है कि स्वस्थ भोजन और संतुलित जीवनशैली आत्म-देखभाल का हिस्सा है, न कि कोई सजा या दबाव।

    घर के वातावरण में छोटे-छोटे बदलाव भी बड़े प्रभाव डाल सकते हैं। भोजन को ‘अच्छा’ या ‘बुरा’ कहने की बजाय संतुलित और पौष्टिक आहार पर जोर देना चाहिए। बच्चों को अपने शरीर की जरूरतों को समझना सिखाना चाहिए, जैसे भूख लगने पर खाना और पेट भरने पर रुक जाना। माता-पिता को खुद भी स्वस्थ खान-पान और संतुलित जीवनशैली अपनाकर उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए, क्योंकि बच्चे अक्सर अपने आसपास के व्यवहार को ही सीखते हैं।

    इसके अलावा परिवार के साथ समय बिताना, साथ मिलकर खाना बनाना और खाना खाने की प्रक्रिया को सकारात्मक अनुभव बनाना भी मददगार साबित हो सकता है। शारीरिक गतिविधियों को दबाव की बजाय खेल और मनोरंजन के रूप में अपनाना बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को मजबूत करता है। साथ ही डिजिटल माध्यमों पर नजर रखना भी जरूरी है, ताकि बच्चे ऐसे कंटेंट से दूर रहें जो उन्हें अवास्तविक शरीर छवि और अस्वस्थ तुलना की ओर प्रेरित करता हो।

    यदि स्थिति गंभीर लगे तो देर न करते हुए विशेषज्ञ डॉक्टर या मनोवैज्ञानिक की मदद लेना सबसे सही कदम होता है। सही समय पर पहचान, सही संवाद और उचित मार्गदर्शन से ईटिंग डिसऑर्डर जैसी समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है और बच्चे को एक स्वस्थ व संतुलित जीवन की ओर आगे बढ़ाया जा सकता है।