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  • दिल्ली आ रहे चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग… भारत के साथ हो सकती है दुर्लभ खनिजों की आपूर्ति पर बड़ी डील

    दिल्ली आ रहे चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग… भारत के साथ हो सकती है दुर्लभ खनिजों की आपूर्ति पर बड़ी डील


    नई दिल्ली।
    देश की राजधानी दिल्ली (Delhi) में इस सप्ताह ब्रिक्स शिखर सम्मेलन (BRICS Summit) में हिस्सा लेने के लिए चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग (Chinese President Xi Jinping) भारत (India) आ रहे हैं। इस दौरे पर पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हैं। जिनपिंग अपने साथ तोहफा भी ला रहे हैं।

    दुर्लभ खनिजों (Rare Minerals) की आपूर्ति को लेकर भारत और चीन के बीच द्विपक्षीय समझौते के आसार हैं। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की संभावित भारत यात्रा के मद्देनजर इस समझौते की रूपरेखा को अंतिम रूप दिया जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच 12 सितंबर की शाम को द्विपक्षीय वार्ता होगी। वहीं रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन के साथ 11 को द्विपक्षीय वार्ता होगी।

    गौरतलब है कि पूर्व में चीन के साथ हुई बातचीत में वह भारत को दुर्लभ खनिजों की आपूर्ति का भरोसा दिला चुका है। अब सूत्रों का कहना है कि ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान चीन के राष्ट्रपति के साथ द्विपक्षीय वार्ता में इस समझौते पर हस्ताक्षर हो सकते हैं।


    भारत तीसरे स्थान पर

    इससे पहले भारत में दुनिया के करीब छह फीसदी दुर्लभ खनिज होने का अनुमान है। इस मामले में भारत तीसरे स्थान पर है। हालांकि अभी तक इनका पर्याप्त दोहन नहीं हो पाया है। कुछ समय पहले भारत ने नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन शुरू किया है, जिसका मकसद ऐसे दुलर्भ खनिजों की खोजना है। सरकार ने बताया था कि भूगर्भ सर्वेक्षण विभाग ने आंध्र प्रदेश, ओडिशा, तमिलनाडु, केरल, पश्चिम बंगाल, झारखंड, राजस्थान, गुजरात,महाराष्ट्र में 7.23 मिलियन टन दुर्लभ खनिजों की मौजूदगी का पता लगाया है।


    क्या है दुर्लभ खनिज?

    दुर्लभ खनिजों की श्रेणी में कुल 17 तत्व हैं, जिनमें से सात चीन में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। इनमें स्कैडियम, सैमरियम, डिस्प्रोसियम, टेरबियम, इट्रियम, गैडोलिनियम और ल्यूटेनियम शामिल हैं। दुनिया में इन दुर्लभ खनिजों की उपलब्धता का करीब 80 फीसदी हिस्सा अकेले चीन में है। ऐसे में कई देश इनकी आपूर्ति के लिए चीन पर निर्भर हैं। यदि भारत के साथ यह समझौता होता है तो भारत को भी इन खनिजों की आपूर्ति सुनिश्चित हो सकेगी।

    रूस सहयोग को तैयार

    इस बीच, रूस ने भी कहा है कि वह भारत को दुर्लभ खनिजों की खोज में मदद करने के लिए तैयार है। यह एक बेहद जटिल कार्य है और रूस की कंपनियों के पास इस क्षेत्र में विशेषज्ञता है। क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा कि रूस इस संबंध में भारत को सहयोग देने के लिए तैयार है। पुतिन की भारत यात्रा के दौरान द्विपक्षीय वार्ता में इस मुद्दे पर भी चर्चा होने की संभावना है।

  • BRICS Summit: चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग पूरे लाव-लश्कर के साथ आएंगे दिल्ली….

    BRICS Summit: चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग पूरे लाव-लश्कर के साथ आएंगे दिल्ली….


    नई दिल्ली।
    भारत (India) की अध्यक्षता में 12-13 सितंबर को हो रहे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन (BRICS Summit) में हिस्सा लेने के लिए चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग (Chinese President Xi Jinping) दिल्ली आएंगे। सूत्रों के अनुसार, राष्ट्रपति जिनपिंग की यात्रा का आधिकारिक कार्यक्रम अभी नहीं आया है लेकिन उनके दौरे को अंतिम रूप दिया जा रहा है। वे एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल के साथ भारत आ रहे हैं।

    जिनपिंग की भारत यात्रा करीब सात सालों के बाद हो रही है। इससे पहले वे अक्तूबर 2019 में द्विपक्षीय वार्ता के लिए भारत आए थे। सूत्रों ने कहा कि जिनपिंग की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों में द्विपक्षीय वार्ता भी होगी जिसमें सीमा से संबंधित मुद्दों पर भी चर्चा होगी। ब्रिक्स में प्रमुख हस्तियों में जिनपिंग के अलावा रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन होंगे। चुनाव के चलते ब्राजील के राष्ट्रपति लूला हिस्सा नहीं लेंगे। उसके भी विदेश मंत्री आएंगे। जबकि ईरान, इंडोनेशिया के राष्ट्रपति के हिस्सा लेने की संभावना है।


    बांग्लादेशी पीएम के आने की संभावना नहीं

    बिम्स्टेक के अध्यक्ष के रूप में ब्रिक्स में आमंत्रित बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान के सम्मेलन में आने के आसार नही हैं। संभावना है कि विदेश मंत्री बांग्लादेश का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं। आपको बता दें कि बांग्लादेश शेख हसीना को वापस भेजने की मांग कर रहा है। इस वजह से दोनों देशों के बीच कूटनीतिक स्तर पर तनाव बढ़ा है।

    तारिक रहमान की यात्रा को लेकर राष्ट्रपति भवन ने एक बार बयान भी जारी कर दिया था जिसे बाद में वापस लेना पड़ा। बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने कहा था कि तारिक रहमान की यात्रा के लिए अनुकूल माहौल बनाने की जरूरत है। इस दौरे के रद्द होने के बाद कहा जा रहा था कि रहमान ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान भारत आ सकते हैं।हालांकि वह ब्रिक्स शिखऱ सम्मेलन में हिस्सा लेने भी नहीं आ रहे हैं।


    ब्रिक्स प्रधान न्यायाधीशों की बैठक शुरू

    ब्रिक्स प्रधान न्यायाधीश मंच की बैठक को संबोधित करते हुए न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने वाणिज्यिक विवादों को सुलझाने के लिए मध्यस्थता एवं सुलह के लिए एक साझा मंच बनाने का प्रस्ताव भी रखा। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को यहां ब्रिक्स प्रधान न्यायाधीश मंच की बैठक का आयोजन किया। इसमें ब्रिक्स के सदस्य देशों और सहयोगी देशों के प्रधान न्यायाधीश, शीर्ष अदालतों के प्रमुख और वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी शामिल हुए।

    ब्रिक्स प्रधान न्यायाधीश मंच की बैठक के उद्घाटन के दिन प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने न्यायिक प्रतिनिधिमंडलों के प्रमुखों के साथ कई द्विपक्षीय बैठकें कीं।सीजेआई ने तीन दिवसीय सम्मेलन के पहले दिन रूस, चीन, मिस्र, इंडोनेशिया, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), बेलारूस, कजाकिस्तान, दक्षिण अफ्रीका, ईरान और उज्बेकिस्तान के न्यायिक प्रमुखों से मुलाकात की।

  • डॉलर के प्रभुत्व का समय समाप्त …. चीनी राष्ट्रपति ने किया युआन को वैश्विक करेंसी बनाने का आह्वान! भड़के ट्रंप

    डॉलर के प्रभुत्व का समय समाप्त …. चीनी राष्ट्रपति ने किया युआन को वैश्विक करेंसी बनाने का आह्वान! भड़के ट्रंप


    बीजिंग।
    चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग (Chinese President Xi Jinping) ने हाल ही में अमेरिका (America) को एक स्पष्ट और बड़ा संदेश दिया है, जब उन्होंने अपने एक भाषण में कहा कि डॉलर के प्रभुत्व का समय अब समाप्त हो चुका है। जिनपिंग के अनुसार, दुनिया को एक ऐसी करेंसी की आवश्यकता है, जिसपर वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भी विश्वास किया जा सके। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि चीन अपने युआन (Yuan.) को वैश्विक रिजर्व करेंसी बनाने (Creating Global Reserve Currency) की दिशा में तेजी से काम कर रहा है।

    अपने संबोधन में शी ने यह भी कहा कि एक सशक्त आर्थिक महाशक्ति बनने के लिए एक मजबूत आर्थिक आधार, विश्वस्तरीय तकनीकी और आर्थिक क्षमता, और एक ऐसी करेंसी की आवश्यकता है, जिस पर पूरे विश्व का भरोसा हो और जिसका वैश्विक उपयोग हो। इसके साथ ही, उन्होंने यह भी बताया कि इसके लिए एक प्रभावी केंद्रीय बैंक की आवश्यकता होगी, जो सही ढंग से मौद्रिक नीति और मैक्रो प्रूडेंशियल प्रबंधन को लागू कर सके। इसके अलावा, चीन को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी वित्तीय संस्थान और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय केंद्रों की जरूरत होगी, जो दुनियाभर से पूंजी आकर्षित कर सकें और वैश्विक कीमतों पर प्रभाव डाल सकें।


    संगीन है वक्त की बात

    यह भाषण चीनी मैगजीन ‘चिउशी’ में शनिवार को प्रकाशित हुआ था। खास बात यह है कि शी जिनपिंग ने यह भाषण 2024 में ही दिया था, और इस समय इसे प्रकाशित करने की टाइमिंग पर बहुत ध्यान दिया जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, इसका मकसद स्पष्ट रूप से अमेरिका, खासकर पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को चुनौती देना हो सकता है, जो डॉलर के वर्चस्व को लेकर पहले भी कई बार आलोचना कर चुके हैं।


    ब्रिक्स पर ट्रंप का गुस्सा

    पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप ने पहले कई बार डॉलर के प्रभुत्व को चुनौती देने वाले देशों को चेतावनी दी थी। उन्होंने भारत, चीन और रूस के नेतृत्व वाले ब्रिक्स समूह के उन प्रयासों का विरोध किया था, जिनमें डॉलर के विकल्प के रूप में एक नई वैश्विक करेंसी या भुगतान प्रणाली की खोज की जा रही थी। उन्होंने तो यह भी धमकी दी थी कि यदि ब्रिक्स देशों ने ऐसा प्रयास किया तो वे 100 फीसदी टैरिफ लगा देंगे।

    लेकिन वैश्विक आर्थिक अस्थिरता और बढ़ते अनिश्चितताओं के बीच, भारत और अन्य ब्रिक्स सदस्य देशों ने डॉलर का विकल्प तलाशने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। सूत्रों के अनुसार, ब्रिक्स देशों ने एक साझा डिजिटल पेमेंट सिस्टम बनाने की योजना बनाई है, जिससे वे डॉलर पर निर्भरता कम कर सकें और अपने-अपने देशों में वित्तीय लेन-देन को सुविधाजनक बना सकें।

    शी जिनपिंग का यह आह्वान और उनके द्वारा किया गया प्रस्ताव, अमेरिकी वित्तीय प्रभुत्व को चुनौती देने के तौर पर देखा जा सकता है। यदि युआन को वैश्विक रिजर्व करेंसी के रूप में स्वीकार किया जाता है, तो यह वैश्विक वित्तीय संरचना को बदलने के संकेत हो सकते हैं। चीन का यह कदम निश्चित रूप से अमेरिका के लिए एक बड़ी चुनौती हो सकता है, जो डॉलर के माध्यम से वैश्विक वित्तीय व्यवस्था पर लंबे समय से अपना नियंत्रण बनाए हुए है।

    इन घटनाक्रमों के बाद ट्रंप और उनके समर्थक इससे और अधिक बौखलाएंगे, और अमेरिका द्वारा इसके जवाब में कुछ कड़े कदम उठाने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि चीन और ब्रिक्स देशों की यह नई रणनीति अमेरिकी डॉलर के प्रभाव को किस हद तक चुनौती देती है।