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  • सीनियरिटी से नहीं मिलता हाईकोर्ट जज बनने का अधिकार कॉलेजियम विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी

    सीनियरिटी से नहीं मिलता हाईकोर्ट जज बनने का अधिकार कॉलेजियम विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी


    नई दिल्ली । हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्ति से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि कॉलेजियम की सिफारिशों में सामान्य परिस्थितियों में न्यायिक हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता। सर्वोच्च अदालत ने कहा कि संवैधानिक अदालतों में न्यायाधीशों की नियुक्ति पूरी तरह कॉलेजियम के स्वतंत्र आकलन और गोपनीय प्रक्रिया पर आधारित होती है। ऐसे मामलों की गहन न्यायिक जांच केवल असाधारण परिस्थितियों में ही संभव है।

    मामला हिमाचल प्रदेश के एक वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी अरविंद मल्होत्रा की याचिका से जुड़ा था। उन्होंने भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाले सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की उस सिफारिश को चुनौती दी थी जिसमें उनसे जूनियर तीन न्यायिक अधिकारियों के नाम हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के न्यायाधीश के रूप में आगे बढ़ाए गए थे। याचिकाकर्ता का कहना था कि पहले उनके नाम पर पुनर्विचार के निर्देश दिए गए थे लेकिन बाद में उनसे कनिष्ठ अधिकारियों की सिफारिश कर दी गई।

    सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि जब हाईकोर्ट कॉलेजियम की सिफारिश को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम पहले ही मंजूरी दे चुका है तब इस स्तर पर उस प्रक्रिया की न्यायिक समीक्षा का कोई ठोस आधार नहीं बनता। अदालत ने यह भी कहा कि कॉलेजियम की कार्यवाही पूरी तरह गोपनीय होती है और उसकी जांच पड़ताल शुरू करना पूरी व्यवस्था के लिए गंभीर परिणाम पैदा कर सकता है।

    पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसे मामलों में गोपनीयता बनाए रखना बेहद आवश्यक है। यदि हर सिफारिश की न्यायिक जांच शुरू कर दी जाए तो यह पूरी नियुक्ति प्रक्रिया को प्रभावित करेगा और अनावश्यक विवादों का रास्ता खुल जाएगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि वह इस स्तर पर कॉलेजियम के फैसलों की पड़ताल कर किसी नए विवाद या मुसीबतों का पिटारा नहीं खोलना चाहती।

    सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि उनके मुवक्किल संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर याचिका को आगे नहीं बढ़ाना चाहते। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए उन्हें यह स्वतंत्रता दी कि यदि आवश्यक समझें तो हाईकोर्ट के सक्षम प्रशासनिक प्राधिकारी के समक्ष अपनी शिकायत रखें अथवा उपलब्ध कानूनी उपायों का सहारा लें।

    अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल वरिष्ठता के आधार पर किसी न्यायिक अधिकारी को हाईकोर्ट का न्यायाधीश बनाए जाने का अधिकार नहीं मिल जाता। कॉलेजियम नियुक्ति के समय योग्यता अनुभव कार्यशैली ईमानदारी और समग्र मूल्यांकन जैसे कई पहलुओं पर विचार करता है। इसलिए केवल वरिष्ठ होने के आधार पर नियुक्ति का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।

    पीठ ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई तथ्य मौजूद नहीं है जिससे यह साबित हो कि याचिकाकर्ता की उम्मीदवारी को औपचारिक रूप से खारिज किया गया है। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने संकेत दिया कि उनकी सेवा अवधि अभी लंबी है और भविष्य में रिक्तियां आने पर उनके नाम पर फिर विचार किया जा सकता है।

    इस फैसले के साथ सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर स्पष्ट संदेश दिया है कि न्यायपालिका में नियुक्तियों की पारदर्शिता जितनी महत्वपूर्ण है उतनी ही आवश्यक उसकी गोपनीयता भी है। कॉलेजियम प्रणाली में अदालत का हस्तक्षेप सीमित रहेगा ताकि संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और गरिमा बनी रहे।

  • नवी मुंबई एयरपोर्ट नाम विवाद पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, CJI बोले- विरोध करें लेकिन आम लोगों को परेशानी न हो

    नवी मुंबई एयरपोर्ट नाम विवाद पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, CJI बोले- विरोध करें लेकिन आम लोगों को परेशानी न हो

    नई दिल्ली । नवी मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट के नामकरण को लेकर चल रहा विवाद अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया, जहां मंगलवार को इस मामले पर अहम सुनवाई हुई। अदालत ने एयरपोर्ट का नाम बदलने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करने से इनकार करते हुए साफ कहा कि यह नीति निर्माण से जुड़ा विषय है और इसमें न्यायपालिका हस्तक्षेप नहीं कर सकती। सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने विरोध प्रदर्शनों को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की, जो अब राजनीतिक और सामाजिक चर्चा का विषय बन गई है।

    मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि लोकतंत्र में हर नागरिक को शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करने का अधिकार है, लेकिन किसी भी प्रदर्शन के कारण आम लोगों के जीवन में बाधा नहीं आनी चाहिए। उन्होंने विशेष रूप से युवाओं से अपील करते हुए कहा कि विरोध दर्ज कराने के नाम पर सड़कें जाम करना, कानून व्यवस्था प्रभावित करना या लोगों के लिए परेशानी खड़ी करना उचित नहीं है। अदालत की यह टिप्पणी उस समय आई जब एयरपोर्ट के नामकरण को लेकर लगातार विरोध प्रदर्शन किए जा रहे हैं।

    यह मामला नवी मुंबई एयरपोर्ट का नाम बदलकर एक क्षेत्रीय नेता के नाम पर रखने की मांग से जुड़ा था। याचिकाकर्ता ने केंद्र सरकार से राज्य सरकार के प्रस्ताव पर जल्द निर्णय लेने की मांग की थी। हालांकि सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने स्पष्ट किया कि नामकरण जैसे फैसले सरकार के अधिकार क्षेत्र में आते हैं और अदालत ऐसे मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकती।

    सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि विरोध करने वाले लोगों को कानून के दायरे में रहकर अपनी बात रखनी चाहिए। उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि कुछ प्रदर्शन अब आम जनता के लिए परेशानी का कारण बनने लगे हैं। अदालत ने कहा कि लोकतांत्रिक अधिकारों का सम्मान जरूरी है, लेकिन उसके साथ जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

    इसी बीच मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत हाल के कुछ बयानों को लेकर भी चर्चा में रहे। उन्होंने हाल ही में स्पष्ट किया था कि उनके कुछ पुराने बयान संदर्भ से हटाकर प्रस्तुत किए गए थे। उनका कहना था कि उनका उद्देश्य किसी वर्ग या युवाओं का अपमान करना नहीं था, बल्कि उन लोगों की ओर ध्यान दिलाना था जो गलत तरीकों से विभिन्न पेशों में प्रवेश करने की कोशिश करते हैं।

    नवी मुंबई एयरपोर्ट विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने यह साफ कर दिया है कि अदालत नीति निर्माण के मामलों में सीमित दखल ही देती है। साथ ही अदालत ने यह भी संदेश दिया कि विरोध लोकतंत्र का अहम हिस्सा है, लेकिन उसका तरीका ऐसा होना चाहिए जिससे आम नागरिकों को कठिनाई का सामना न करना पड़े।

  • सुप्रीम कोर्ट में तीखी टिप्पणी से मचा विवाद, CJI सूर्यकांत ने युवाओं और एक्टिविस्ट्स पर कही बड़ी बात

    सुप्रीम कोर्ट में तीखी टिप्पणी से मचा विवाद, CJI सूर्यकांत ने युवाओं और एक्टिविस्ट्स पर कही बड़ी बात



    नई दिल्ली। सूर्यकांत ने सुप्रीम कोर्ट में एक सुनवाई के दौरान कड़ी टिप्पणी करते हुए कुछ युवाओं और एक्टिविस्ट्स को लेकर सख्त शब्दों का इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा कि समाज में ऐसे लोग भी मौजूद हैं जो न तो किसी पेशे में स्थिर होते हैं और न ही किसी जिम्मेदारी से जुड़े होते हैं, और बाद में वे विभिन्न मंचों से सिस्टम की आलोचना करने लगते हैं।

    यह टिप्पणी उस समय आई जब जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच एक याचिकाकर्ता की सीनियर एडवोकेट बनने की मांग पर सुनवाई कर रही थी। कोर्ट ने याचिकाकर्ता के आचरण और सोशल मीडिया पर इस्तेमाल की गई भाषा पर भी सवाल उठाए।

    सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि कुछ लोग बिना स्थायी पेशे या जिम्मेदारी के अलग-अलग मंचों पर सक्रिय होकर सिस्टम पर लगातार हमला करते हैं। हालांकि अदालत की टिप्पणी को लेकर अब बहस भी शुरू हो गई है और इसे लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।

    कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सीनियर एडवोकेट का दर्जा कोई स्टेटस सिंबल नहीं है, बल्कि यह योग्यता, अनुभव और पेशेवर योगदान के आधार पर दिया जाने वाला सम्मान है। बेंच ने कहा कि इस पद को पाने के लिए प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है और इसे केवल प्रतिष्ठा के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। इस पूरे मामले के बाद न्यायिक भाषा और सार्वजनिक टिप्पणियों की मर्यादा को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है।

  • न्यायपालिका में एआई के उपयोग पर मुख्य न्यायाधीश की सख्त और संतुलित चेतावनी..

    न्यायपालिका में एआई के उपयोग पर मुख्य न्यायाधीश की सख्त और संतुलित चेतावनी..

    नई दिल्ली: देश की न्यायपालिका में तेजी से बढ़ते तकनीकी हस्तक्षेप के बीच मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग को लेकर महत्वपूर्ण और संतुलित संदेश दिया है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि एआई न्याय व्यवस्था के लिए एक उपयोगी सहयोगी साबित हो सकता है, लेकिन इसे कभी भी मानव निर्णय क्षमता का विकल्प नहीं बनाया जा सकता। उन्होंने न्यायिक अधिकारियों से अपील की कि वे तकनीक से घबराने के बजाय उसे समझदारी और सतर्कता के साथ अपनाएं।

    एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि एआई के आगमन से न्यायपालिका के सामने नए अवसर भी खुले हैं और कई गंभीर चुनौतियां भी सामने आई हैं। उनके अनुसार तकनीक का सही उपयोग न्यायिक प्रक्रिया को अधिक तेज, पारदर्शी और प्रभावी बना सकता है, लेकिन इसके साथ ही इसकी सीमाओं को समझना भी उतना ही आवश्यक है।

    उन्होंने कहा कि एआई का इस्तेमाल विशेष रूप से कानूनी शोध, मामलों के प्रबंधन और बड़े आंकड़ों के विश्लेषण में सहायक हो सकता है। इससे न्यायाधीशों पर पड़ने वाले प्रशासनिक दबाव को कम किया जा सकता है और कार्यक्षमता में सुधार लाया जा सकता है। हालांकि उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि इन तकनीकों पर अत्यधिक निर्भरता न्याय के मूल सिद्धांतों को प्रभावित कर सकती है।

    मुख्य न्यायाधीश ने जोर देकर कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में मानवीय तत्व की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि किसी भी मामले में अंतिम निर्णय लेते समय न्यायाधीश की समझ, अनुभव और संवैधानिक दृष्टिकोण ही सर्वोपरि होना चाहिए। तकनीक केवल सहायता प्रदान कर सकती है, लेकिन निर्णय की जिम्मेदारी पूरी तरह मानव के पास ही रहनी चाहिए।

    अपने संबोधन में उन्होंने एआई से जुड़े संभावित खतरों की ओर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि हाल के समय में ऐसे कई उदाहरण सामने आए हैं, जहां एआई आधारित प्रणालियों ने गलत या काल्पनिक कानूनी संदर्भ प्रस्तुत किए हैं। इस तरह की त्रुटियां न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकती हैं और गलत दिशा में फैसलों को ले जा सकती हैं।

    उन्होंने इसे केवल तकनीकी कमी नहीं बल्कि न्याय व्यवस्था के लिए एक गंभीर चुनौती बताया। उनके अनुसार यदि इन त्रुटियों को समय रहते नियंत्रित नहीं किया गया, तो यह न्याय की गुणवत्ता और निष्पक्षता दोनों पर असर डाल सकती हैं।

    मुख्य न्यायाधीश ने न्यायिक अधिकारियों से कहा कि जब वे जटिल मामलों पर निर्णय लेते हैं, तो उन्हें गहराई से सोचने और संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता होती है। इसी प्रकार एआई का उपयोग भी सोच समझकर और जिम्मेदारी के साथ किया जाना चाहिए, ताकि न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा बनी रहे।

    उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य की न्यायपालिका वही होगी जो अपनी मूल पहचान को बनाए रखते हुए नए बदलावों को अपनाने में सक्षम होगी। इसके लिए निरंतर सीखने, आत्ममंथन और उत्कृष्टता के प्रति प्रतिबद्धता आवश्यक है।

  • NCERT के विवादित चैप्टर पर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे विशेषज्ञ, CJI सूर्यकांत के सामने रखा पक्ष

    NCERT के विवादित चैप्टर पर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे विशेषज्ञ, CJI सूर्यकांत के सामने रखा पक्ष

    नई दिल्ली। एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका से जुड़े विवादित अध्याय पर घिरे तीन शिक्षाविदों ने अब सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। मामले की सुनवाई सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ के समक्ष हुई, जहां विशेषज्ञों ने कहा कि अध्याय का मसौदा किसी एक व्यक्ति ने नहीं, बल्कि सामूहिक प्रक्रिया से तैयार किया गया था।

    विशेषज्ञों ने क्या कहा

    याचिका में मिशेल डैनिनो, सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्न कुमार की ओर से दलील दी गई कि उन्हें “अविश्वसनीय” बताना उचित नहीं है और उनकी पेशेवर विश्वसनीयता प्रभावित हुई है। उन्होंने अदालत से पूरी प्रक्रिया सामने रखने का मौका मांगा।

    आलोक प्रसन्न कुमार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि पिछली टिप्पणियों से शिक्षाविदों को नुकसान हुआ है और वे संदर्भ स्पष्ट करना चाहते हैं। वहीं सुपर्णा दिवाकर की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जे साई दीपक ने कहा कि पाठ्य सामग्री तैयार करना सामूहिक निर्णय की प्रक्रिया थी।

    कोर्ट ने क्या कहा

    पीठ ने आवेदन रिकॉर्ड में लेने का निर्देश दिया और दो सप्ताह बाद सुनवाई तय की। अदालत ने यह भी दर्ज किया कि संशोधित अध्याय की समीक्षा के लिए एक समिति बनाई गई है, जिसमें इंदु मल्होत्रा, के.के. वेणुगोपाल और प्रकाश सिंह शामिल हैं।

    समिति राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी के सहयोग से काम करेगी, जिसकी अध्यक्षता अनिरुद्ध बोस कर रहे हैं।

    पहले दिया था संबंध तोड़ने का निर्देश

    इससे पहले 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों को तीनों विशेषज्ञों से संबंध खत्म करने का निर्देश दिया था। अदालत ने कहा था कि विवादित सामग्री से न्यायपालिका की नकारात्मक छवि प्रस्तुत होती है।

    माफी भी दायर

    मामले में दिनेश प्रसाद सकलानी ने बिना शर्त माफी का हलफनामा दाखिल किया। इससे पहले अदालत ने विवादित अध्याय वाले प्रकाशन, पुनर्मुद्रण और डिजिटल प्रसार पर भी रोक लगा दी थी।
    अब इस मामले की अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद होगी, जिसमें विशेषज्ञों की दलीलों पर विस्तार से विचार किया जाएगा।

  • NCERT की 8वीं क्लास की किताब में ज्यूडिशियरी करप्शन पर CJI सूर्यकांत भड़के, बोले न्यायपालिका को बदनाम

    NCERT की 8वीं क्लास की किताब में ज्यूडिशियरी करप्शन पर CJI सूर्यकांत भड़के, बोले न्यायपालिका को बदनाम


    नई दिल्ली । दिल्ली में नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग की 8वीं कक्षा की सोशल साइंस की किताब में पहली बार ज्यूडिशियरी करप्शन नामक चैप्टर शामिल किया गया है। इस चैप्टर में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार लंबित मुकदमों की बड़ी संख्या और जजों की पर्याप्त कमी जैसे मुद्दों को समझाया गया है। वहीं सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश CJI सूर्यकांत ने इस कदम पर कड़ा विरोध जताया और इसे न्यायपालिका को बदनाम करने की सोची-समझी कार्रवाई बताया। उन्होंने कहा कि इस तरह की सामग्री देश में वकीलों और जजों के बीच चिंता का कारण बन रही है और वे न्यायपालिका की गरिमा को किसी भी तरह से प्रभावित नहीं होने देंगे।

    CJI सूर्यकांत ने यह प्रतिक्रिया बुधवार 25 फरवरी 2026 को तब दी जब वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने मामले को उनके समक्ष उठाया। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि न्यायपालिका की छवि को बदनाम करने की किसी भी कोशिश को मंजूरी नहीं दी जाएगी। न्यायपालिका में पारदर्शिता बनाए रखने और भ्रष्टाचार के मामलों को नियंत्रित करने के लिए पहले से ही ठोस तंत्र मौजूद हैं और इनकी जानकारी बच्चों तक पहुंचाना इस तरह के ढंग में सही नहीं है।

    NCERT की नई किताब में हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका शीर्षक वाले चैप्टर में अदालतों के पदानुक्रम न्याय तक पहुंच और न्यायिक प्रणाली की चुनौतियों के समाधान का उल्लेख किया गया है। इस चैप्टर में यह भी बताया गया है कि जज एक आचार संहिता Code of Conduct के तहत बंधे होते हैं जो न केवल अदालत के भीतर बल्कि बाहर भी उनके आचरण को नियंत्रित करती है। गंभीर मामलों में जज को हटाने के संवैधानिक नियम पार्लियामेंट के इंपीचमेंट मोशन और केंद्रीय एवं राज्य स्तर पर पारदर्शिता बढ़ाने के उपायों का भी जिक्र है।

    किताब में CPGRAMS सेंट्रलाइज्ड पब्लिक ग्रिवांस रिड्रेस एंड मॉनिटरिंग सिस्टम के जरिए 2017 से 2021 के बीच लगभग 1,600 से अधिक शिकायतें प्राप्त होने का आंकड़ा भी साझा किया गया है। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट में 81,000 हाईकोर्ट्स में 62.40 लाख और जिला तथा अधीनस्थ न्यायालयों में 4.70 करोड़ लंबित मामले होने का विवरण भी दिया गया है।

    सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि न्यायपालिका के अलग-अलग स्तरों पर भ्रष्टाचार का सामना करने वाले मामले सही रूप में और संतुलित तरीके से प्रस्तुत किए जाने चाहिए। गरीब और वंचित वर्ग के लिए न्याय तक पहुंच का मुद्दा गंभीर है लेकिन इसे पाठ्यपुस्तक में इस तरह से दर्शाना न्यायपालिका की छवि को प्रभावित करता है। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका की गरिमा बनाए रखना उनकी जिम्मेदारी है और वे किसी भी कदम को रोकने या संशोधित करने में सक्रिय भूमिका निभाएंगे।

    इस विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि बच्चों को शिक्षा में वास्तविकता और संवेदनशील विषयों को कैसे प्रस्तुत किया जाए ताकि उन्हें जानकारी मिल सके लेकिन संस्थाओं की छवि को बदनाम किए बिना। NCERT ने इस एडिशन में मुख्य रूप से सिस्टम की कमजोरियों और सुधार प्रयासों को उजागर किया है लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे संवेदनशील मानते हुए आगे कार्रवाई की संभावना जताई है।

  • महाशिवरात्रि पूजा पर रोक की मांग लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंची दरगाह कमेटी, CJI ने जताई नाराजगी

    महाशिवरात्रि पूजा पर रोक की मांग लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंची दरगाह कमेटी, CJI ने जताई नाराजगी


    नई दिल्ली । कर्नाटक के कलबुर्गी जिले के आलंद स्थित लाडले मशाइक दरगाह एक बार फिर धार्मिक विवाद के केंद्र में आ गई है। दरगाह कमेटी ने महाशिवरात्रि के अवसर पर प्रस्तावित पूजा-अर्चना पर रोक लगाने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। कमेटी का कहना है कि दरगाह परिसर में किसी भी तरह की पूजा या निर्माण गतिविधि से उसकी मूल धार्मिक पहचान प्रभावित हो सकती है, इसलिए शीर्ष अदालत हस्तक्षेप करे और यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दे।

    यह मामला भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ के समक्ष प्रस्तुत किया गया। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, दरगाह कमेटी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विभा दत्ता मखीजा ने अदालत से अनुरोध किया कि 15 फरवरी, यानी महाशिवरात्रि से पहले इस याचिका पर त्वरित सुनवाई की जाए। उन्होंने अदालत को बताया कि दरगाह परिसर में शिवरात्रि मनाने की योजना बनाई जा रही है, जिससे विवाद की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।

    हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल सुनवाई का आश्वासन देने के बजाय इस पर विचार करने की बात कही। साथ ही अदालत ने इस बात पर नाराजगी जताई कि ऐसे मामलों में सीधे अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट का रुख किया जा रहा है, जबकि पहले संबंधित हाई कोर्ट में जाना चाहिए। सीजेआई सूर्यकांत ने टिप्पणी की, सब कुछ अनुच्छेद 32 के तहत क्यों आ रहा है? इससे यह धारणा बनती है कि याचिकाएं इसलिए दायर की जा रही हैं क्योंकि कानून सुविधाजनक है। इससे यह संदेश जाता है कि हाई कोर्ट निष्क्रिय हो चुका है। हम इसकी जांच करेंगे।”

    दरअसल, यह विवाद उस ऐतिहासिक स्थल से जुड़ा है जो 14वीं शताब्दी के सूफी संत हजरत शेख अलाउद्दीन अंसारी, जिन्हें लाडले मशाइक के नाम से जाना जाता है, और 15वीं शताब्दी के हिंदू संत राघव चैतन्य से संबंधित है। दोनों संतों के अवशेष इसी परिसर में बताए जाते हैं। परिसर में राघव चैतन्य शिवलिंग नामक एक संरचना भी मौजूद है। वर्षों से यहां हिंदू श्रद्धालु पूजा-अर्चना करते रहे हैं, जबकि मुस्लिम समुदाय दरगाह में अकीदत पेश करता रहा है।

    साल 2022 में यह मामला तब गरमा गया जब कुछ उपद्रवियों द्वारा कथित रूप से शिवलिंग पर आपत्तिजनक कृत्य किए जाने की घटना सामने आई, जिसके बाद सांप्रदायिक तनाव बढ़ गया। इसके बाद पूजा-अधिकार को लेकर कानूनी लड़ाई शुरू हुई।

    फरवरी 2025 में कर्नाटक हाई कोर्ट ने हिंदू समुदाय के 15 सदस्यों को राघव चैतन्य शिवलिंग पर महाशिवरात्रि के दिन पूजा करने की अनुमति दी थी। यह पूजा कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच संपन्न हुई थी और किसी प्रकार की अप्रिय घटना सामने नहीं आई थी। एक वर्ष पूर्व भी अदालत के आदेश के आधार पर सीमित संख्या में श्रद्धालुओं को प्रवेश और अनुष्ठान की अनुमति दी गई थी, जो शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुई थी।

    अब दरगाह कमेटी की नई याचिका ने इस संवेदनशील मामले को फिर से कानूनी और सामाजिक बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है। सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सुप्रीम कोर्ट इस विवाद में क्या रुख अपनाता है और महाशिवरात्रि से पहले क्या कोई अंतरिम आदेश जारी होता है।

  • गरीब नहीं, संघर्षशील महिला कहिए- वकील की दलील पर CJI सूर्यकांत की सख्त टिप्पणी

    गरीब नहीं, संघर्षशील महिला कहिए- वकील की दलील पर CJI सूर्यकांत की सख्त टिप्पणी


    नई दिल्ली।
    सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में रोजाना सैकड़ों मामलों की सुनवाई होती है, लेकिन शुक्रवार को एक सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice- CJI) सूर्यकांत (Suryakant.) की टिप्पणी ने सबका ध्यान खींच लिया। मामला एक महिला से जुड़ी लंबित क्लेम याचिका का था, जो लंबे समय से हाई कोर्ट (High Court) में विचाराधीन है। सुनवाई के दौरान जब महिला की ओर से पेश वकील ने उसे “गरीब महिला” बताया, तो इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने तीखा और चर्चा में रहने वाला जवाब दिया।

    लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, जैसे ही वकील ने कहा कि याचिकाकर्ता एक गरीब महिला है, सीजेआई सूर्यकांत ने तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए पूछा, “वह सुप्रीम कोर्ट आने से पहले गरीब थी या सुप्रीम कोर्ट आने के बाद गरीब हुई है?”

    सीजेआई ने वकील को आगे समझाते हुए कहा कि अदालत के सामने इस तरह की शब्दावली का प्रयोग न किया जाए। उन्होंने कहा कि उसे गरीब महिला कहने के बजाय “फाइटर महिला” कहा जाना चाहिए, जो तब तक शांत नहीं बैठेगी जब तक उसका पूरा दावा तार्किक अंजाम तक नहीं पहुंच जाता। सीजेआई ने यह भी जोड़ा कि जब कोई महिला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची है, तो उसे कमजोर या गरीब बताने की जरूरत क्यों पड़ती है।

    यह मामला हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट से संबंधित है, जहां महिला का केस करीब 11 वर्षों से लंबित है। याचिका में सुप्रीम कोर्ट से यह आग्रह किया गया है कि हाई कोर्ट को निर्देश दिया जाए ताकि मामले की सुनवाई शीघ्र पूरी हो और फैसला सुनाया जा सके।

    इसी दिन एक अन्य मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की। न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने कहा कि अदालतें किसी महिला, विशेषकर नाबालिग लड़की को, जबरन गर्भ जारी रखने के लिए मजबूर नहीं कर सकतीं।

    पीठ के समक्ष यह मामला आया था कि एक नाबालिग लड़की पड़ोस के एक लड़के के साथ संबंध में थी और उसी दौरान वह गर्भवती हो गई। लड़की ने अदालत से चिकित्सकीय रूप से गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति मांगी थी। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई के जेजे अस्पताल को निर्देश दिया कि नाबालिग की गर्भावस्था को मेडिकल प्रक्रिया के तहत समाप्त किया जाए। साथ ही अदालत ने यह भी सुनिश्चित करने को कहा कि इस दौरान सभी जरूरी चिकित्सकीय सुरक्षा मानकों का पूरी तरह पालन किया जाए।

    इन दोनों मामलों में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों को महिला अधिकारों और न्याय तक पहुंच के संदर्भ में बेहद अहम माना जा रहा है।