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  • सुप्रीम कोर्ट में इंसानियत और कानून का संगम, बुजुर्ग की अपील पर CJI सूर्यकांत का भावुक लेकिन स्पष्ट जवाब

    सुप्रीम कोर्ट में इंसानियत और कानून का संगम, बुजुर्ग की अपील पर CJI सूर्यकांत का भावुक लेकिन स्पष्ट जवाब

    नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट में गुरुद्वारा कमेटियों के फंड से जुड़े कथित दुरुपयोग के मामले की सुनवाई के दौरान एक बेहद भावुक और मानवीय क्षण सामने आया, जिसने पूरे माहौल को गंभीरता और संवेदनशीलता से भर दिया। सुनवाई के दौरान जब एक बुजुर्ग याचिकाकर्ता ने अपनी बात रखते हुए भावुक होकर कहा कि वह न्याय की उम्मीद में अदालत के आगे नतमस्तक हैं, तो पूरा कोर्टरूम कुछ पल के लिए शांत हो गया।

    याचिकाकर्ता ने अपनी अपील में मामले की गंभीरता को विस्तार से रखते हुए कहा कि यह मुद्दा केवल एक व्यक्तिगत विवाद नहीं, बल्कि समाज, शिक्षा और सार्वजनिक हित से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न है। उन्होंने न्यायालय से अनुरोध किया कि इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप करते हुए संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया जाए और किसी भी तरह के अपरिवर्तनीय निर्णय पर रोक लगाई जाए।

    इस भावुक अपील को सुनकर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने बेहद संतुलित और विनम्र तरीके से जवाब दिया। उन्होंने कहा कि अदालत हमेशा नागरिकों के लिए उपलब्ध है और कोई भी व्यक्ति अपनी बात रखने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन किसी भी नीति या कानून में बदलाव का अधिकार न्यायपालिका के बजाय विधायिका के पास होता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में उचित मंच तक पहुंचना ही सही प्रक्रिया होती है।

    CJI ने आगे याचिकाकर्ता को सलाह दी कि वह संबंधित विषय को संसद की याचिका समिति के समक्ष भी रख सकते हैं, ताकि वहां से उचित प्रक्रिया के तहत विचार किया जा सके। उन्होंने यह भी कहा कि न्यायपालिका हर मामले में सीमित दायरे में ही हस्तक्षेप कर सकती है, खासकर जब मामला नीतिगत या विधायी क्षेत्र से जुड़ा हो।

    इस पूरी सुनवाई के दौरान कोर्ट में भावनाओं और कानून का संतुलन स्पष्ट रूप से देखने को मिला। एक तरफ बुजुर्ग की भावुक अपील थी, तो दूसरी तरफ न्यायिक प्रक्रिया की स्पष्ट सीमाएं, जिन्हें मुख्य न्यायाधीश ने बेहद सम्मानपूर्वक और सहज भाषा में समझाया।

    यह घटना न केवल न्याय व्यवस्था की गरिमा को दर्शाती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि अदालतें भावनाओं को समझते हुए भी कानून की सीमाओं के भीतर ही निर्णय लेने के लिए बाध्य होती हैं।

  • एक ही वकील ने दायर कर दीं 25 PIL, भड़के CJI बोले- अपने ….

    एक ही वकील ने दायर कर दीं 25 PIL, भड़के CJI बोले- अपने ….

    नई दिल्‍ली। सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न मुद्दों पर 25 अलग-अलग जनहित याचिकाएं दायर करने वाले एक एडवोकेट से शुक्रवार को कहा कि उन्हें अदालत का रुख करने से पहले संबंधित प्राधिकरणों के पास जाना चाहिए। साथ ही, भड़के सीजेआई सूर्यकांत ने दो टूक कहा कि आप अपने प्रोफेशन पर ध्यान दें। जैसे ही मामले की सुनवाई शुरू हुई, याचिकाकर्ता के रूप में स्वयं पेश हुए अधिवक्ता सचिन गुप्ता ने भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ से कहा कि वह अपनी सभी जनहित याचिकाएं वापस लेना चाहते हैं।

    इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने साफ-साफ शब्दों में गुप्ता से कहा, ”आप अपने प्रोफेशन पर ध्यान दें। आपको सीधे अदालत का दरवाजा खटखटाने के बजाय संबंधित प्राधिकरणों के पास जाना चाहिए और उन्हें विभिन्न मुद्दों पर जानकारी देनी चाहिए।” पीठ ने कहा कि उचित समय आने पर यदि आवश्यकता हुई, तो न्यायालय उनकी याचिकाओं पर विचार भी करेगा। सीजेआई ने कहा कि बार के सदस्य और कानून की जानकारी रखने वाले व्यक्ति होने के नाते याचिकाकर्ता को विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण अपनाते हुए मुद्दों की पहचान करनी चाहिए और संबंधित अधिकारियों को जागरूक बनाने का प्रयास करना चाहिए। पीठ ने यह भी कहा कि यदि कोई कार्रवाई नहीं होती है, तब याचिकाकर्ता अदालत का रुख कर सकता है।

    सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के लिए सूचीबद्ध 25 जनहित याचिकाओं को वापस लेने की अनुमति दे दी। याचिकाकर्ता द्वारा दायर इन जनहित याचिकाओं में कई तरह के निर्देश देने का अनुरोध किया गया था, जिनमें देश में आधिकारिक कार्यों के लिए एक सामान्य संपर्क भाषा विकसित करने की नीति बनाने और आम जनता में कानूनी जागरूकता फैलाने के लिए टेलीविजन पर कानूनी कार्यक्रम शुरू करने की नीति तैयार करने की मांग शामिल थी। इन याचिकाओं में यह भी अनुरोध किया गया था कि साबुन में इस्तेमाल होने वाले रसायनों के उपयोग को लेकर दिशा-निर्देश तय किए जाएं, ताकि केवल वे रसायन इस्तेमाल हों जो हानिकारक बैक्टीरिया को खत्म करें, न कि त्वचा के लिए जरूरी बैक्टीरिया को। एक अन्य जनहित याचिका में भिखारियों, ट्रांसजेंडर जैसे वंचित वर्गों के उत्थान के लिए नीति बनाने के निर्देश देने का अनुरोध किया गया था।
    ‘आधी रात को ये सब याचिकाएं तैयार करते हो क्या?’

    सुप्रीम कोर्ट ने नौ मार्च को गुप्ता द्वारा दायर पांच ”निरर्थक” जनहित याचिकाओं को खारिज कर दिया था। इनमें एक याचिका ऐसी भी थी, जिसमें यह जानने के लिए वैज्ञानिक अध्ययन कराने की मांग की गई थी कि क्या प्याज और लहसुन में ‘तामसिक’ (नकारात्मक) ऊर्जा होती है। सीजेआई ने गुप्ता से नाराजगी जताते हुए कहा था, ”आधी रात को ये सब याचिकाएं तैयार करते हो क्या?” प्रधान न्यायाधीश ने इन जनहित याचिकाओं को “अस्पष्ट, निरर्थक और निराधार” करार दिया था। पीठ ने गुप्ता की चार अन्य जनहित याचिकाएं भी खारिज कर दी थीं, जिनमें से एक याचिका में शराब और तंबाकू उत्पादों में कथित रूप से मौजूद हानिकारक सामग्री को नियंत्रित करने का निर्देश जारी करने का अनुरोध किया गया था।

  • सीजेआई सूर्यकांत का बड़ा कदम: हाईकोर्ट में जजों की जल्द बहाली और महिला प्रतिनिधित्व पर जोर

    सीजेआई सूर्यकांत का बड़ा कदम: हाईकोर्ट में जजों की जल्द बहाली और महिला प्रतिनिधित्व पर जोर


    नई दिल्ली:
    देश की न्यायपालिका में जजों के खाली पदों और लंबित मामलों की समस्या किसी से छिपी नहीं है. सुनवाई का बारी आने तक कई मामलों में न्याय मिलने में लंबा समय लग जाता है. यही नहीं, न्यायपालिका में महिलाओं की भागीदारी भी हमेशा चर्चा का विषय रही है. इस गंभीर स्थिति को देखते हुए चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सीजेआई सूर्यकांत ने बड़ा कदम उठाया है.

    सीजेआई ने हाल ही में देश के सभी 25 हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों को विस्तृत पत्र लिखा है. इस पत्र में उन्होंने हाईकोर्ट्स में जजों की जल्द नियुक्ति करने का निर्देश दिया और महिला जजों के प्रतिनिधित्व को प्राथमिकता देने पर जोर दिया. उन्होंने स्पष्ट कहा कि किसी जज के रिटायर होने तक खाली पद का इंतजार न किया जाए, बल्कि नियुक्ति की प्रक्रिया पहले ही शुरू कर दी जाए ताकि न्यायपालिका में काम बाधित न हो.

    सीजेआई सूर्यकांत ने हाईकोर्ट कॉलेजियम से आग्रह किया है कि वे महिलाओं के लिए नियुक्तियों पर गंभीरता से विचार करें. उन्होंने कहा कि यह अपवाद नहीं बल्कि नियम होना चाहिए कि योग्य और मेधावी महिला वकीलों को उच्च न्यायपालिका में स्थान मिले. इसके अलावा, उन्होंने यह भी कहा कि जिन महिला वकीलों का संबंध संबंधित राज्यों से है लेकिन वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस कर रही हैं, उन्हें भी इस दिशा में देखा जाना चाहिए.

    महिला जजों की नियुक्तियों में सकारात्मक बदलाव भी देखने को मिला है. वर्तमान में कई हाईकोर्ट में मुख्य न्यायाधीश के रूप में महिलाएं कार्यरत हैं. उदाहरण के लिए, पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में 18 महिला जज काम कर रही हैं, जबकि मद्रास और बॉम्बे हाईकोर्ट में लगभग एक दर्जन महिला जज अपनी जिम्मेदारी निभा रही हैं. जिला स्तर पर न्यायिक अधिकारियों में भी लगभग 36.3 प्रतिशत महिलाएं कार्यरत हैं, जिसे सीजेआई ने पीढ़ीगत बदलाव का संकेत बताया है.

    केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल द्वारा फरवरी में लोकसभा में पेश किए गए आंकड़ों के अनुसार, 2014 के बाद से हाईकोर्ट में 170 महिला जजों की नियुक्ति हुई है, जिनमें से 96 पिछली पांच वर्षों में हुईं. वहीं, सुप्रीम कोर्ट में कुल 6 महिला जज नियुक्त हुई हैं. वर्तमान में देश के सभी हाईकोर्ट में कुल 116 महिला जज कार्यरत हैं. हाईकोर्ट में 1122 स्वीकृत पदों में से 308 पद खाली हैं, जबकि कार्यरत जजों की संख्या 814 है. सुप्रीम कोर्ट में 33 जज हैं, जिनमें फिलहाल एक महिला शामिल हैं.

    सीजेआई सूर्यकांत का यह पत्र न्यायपालिका में सुधार और महिलाओं के लिए अवसर बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है. उनका कहना है कि न्यायपालिका में महिलाओं की पर्याप्त भागीदारी समय की मांग है और इसके लिए उच्च न्यायालयों को सक्रिय और त्वरित कदम उठाने चाहिए. इस पहल से न केवल जजों के खाली पदों की समस्या हल होगी, बल्कि न्यायपालिका में महिलाओं की भूमिका भी मजबूत होगी और लंबित मामलों में सुनवाई की प्रक्रिया तेज होगी.

    यह कदम देश की न्यायपालिका में नए युग की शुरुआत का संकेत देता है, जिसमें महिला प्रतिनिधित्व और कार्यकुशलता को प्राथमिकता दी जाएगी.

  • CJI सूर्यकांत के सामने ही गुहार लगने लगीं ममता बनर्जी, बोली-संविधान, लोकतंत्र को बचा लीजिए

    CJI सूर्यकांत के सामने ही गुहार लगने लगीं ममता बनर्जी, बोली-संविधान, लोकतंत्र को बचा लीजिए


    कोलकाता। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने CJI सूर्यकांत से देश के संविधान, लोकतंत्र और न्यायपालिका की रक्षा करने का शनिवार को आग्रह किया। कलकत्ता हाई कोर्ट की जलपाईगुड़ी सर्किट बेंच के भवन के उद्घाटन कार्यक्रम में बनर्जी ने न्यायमूर्ति सूर्यकांत से देश के लोगों को ‘‘एजेंसियों’’ द्वारा गलत तरीके से निशाना बनाये जाने से बचाने का भी आह्वान किया।
    बिना विस्तृत जानकारी दिए उन्होंने कहा, ‘कृपया देश के संविधान, लोकतंत्र, न्यायपालिका, इतिहास और भूगोल को विनाश से बचाएं।’ बनर्जी ने कहा, ‘‘आप (प्रधान न्यायाधीश) हमारे संविधान के संरक्षक हैं, हम आपके कानूनी संरक्षण में हैं। कृपया जनता की रक्षा करें।’’
    न्यायमूर्ति सूर्यकांत भी कार्यक्रम में मौजूद थे।
    मीडिया ट्रायल को रोकना होगा

    बनर्जी ने कहा, ‘आजकल मामलों के निपटारे से पहले ही ‘मीडिया ट्रायल’ का चलन है; इसे भी रोकना होगा।’ एक जनसभा के बाद अपने व्हाट्सएप चैनल पर एक पोस्ट में, श्री बनर्जी ने पश्चिम मेदिनीपुर को एक ऐसी भूमि के रूप में चित्रित किया जिसने औपनिवेशिक विरोधी संघर्ष से लेकर 2011 के राजनीतिक उथल-पुथल तक बार-बार दमन के खिलाफ आवाज उठायी है। गौरतलब है कि वर्ष 2011 में टीएमसी ने पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे के 34 साल के शासन को समाप्त किया था।

    उन्होंने पश्चिमी मेदिनीपुर जिले के लंबे राजनीतिक प्रतिरोध के इतिहास का भी इस मौके पर जिक्र किया। बनर्जी ने लिखा, “अविभाजित मेदिनीपुर की धरती ने ब्रिटिश साम्राज्य की कठोर पकड़ को चुनौती देते हुए अत्याचार, शोषण और अन्याय के खिलाफ प्रतिरोध की गर्जना की थी। उसी विरासत को आगे बढ़ाते हुए, पश्चिम मेदिनीपुर के लोग 2011 में लोकतंत्र की बहाली के लिए अग्रणी भूमिका में खड़े हुए।”

    राणा संकल्प सभा में भारी जनसमूह की उपस्थिति का जिक्र करते हुए, तृणमूल नेता ने जोर देकर कहा कि यह भीड़ जनता के उस संकल्प को दर्शाती है जो विभाजन और भेदभाव की उन ताकतों को हराना चाहती है, जिन्हें उन्होंने ‘बंगाल-विरोधी विभाजनकारी ताकतें’ बताया।