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  • अनकिस्ड गर्ल ऑफ इंडिया बनीं निम्मी एक फैसले ने दिलाई दुनिया भर में पहचान हॉलीवुड के ऑफर भी लौटाए

    अनकिस्ड गर्ल ऑफ इंडिया बनीं निम्मी एक फैसले ने दिलाई दुनिया भर में पहचान हॉलीवुड के ऑफर भी लौटाए


    नई दिल्ली। हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम दौर की चर्चित अभिनेत्री निम्मी ने अपने अभिनय और मासूमियत से करोड़ों दर्शकों का दिल जीता। ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मों के दौर से लेकर रंगीन सिनेमा तक उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई। दिलीप कुमार राज कपूर और भारत भूषण जैसे दिग्गज कलाकारों के साथ काम करने वाली निम्मी उस दौर की सबसे लोकप्रिय अभिनेत्रियों में गिनी जाती थीं। उनकी खूबसूरती और सादगी के किस्से आज भी फिल्म प्रेमियों के बीच चर्चा का विषय बने रहते हैं।

    निम्मी का असली नाम नवाब बानो था। फिल्म निर्माता और निर्देशक राज कपूर ने उन्हें अपनी चर्चित फिल्म बरसात के जरिए फिल्मी दुनिया में मौका दिया। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और एक के बाद एक कई यादगार फिल्मों में अपने अभिनय का जादू बिखेरा। उनकी सहज अदायगी और भावपूर्ण अभिनय ने उन्हें उस दौर की सबसे पसंदीदा अभिनेत्रियों में शामिल कर दिया।

    निम्मी के करियर का एक बेहद चर्चित किस्सा फिल्म आन से जुड़ा है। इस फिल्म का प्रीमियर लंदन के रियाल्टो थिएटर में आयोजित किया गया था जहां कई अंतरराष्ट्रीय मेहमान और हॉलीवुड से जुड़े कलाकार भी मौजूद थे। इसी कार्यक्रम के दौरान हॉलीवुड अभिनेता एरल फ्लिन ने पश्चिमी परंपरा के अनुसार निम्मी का हाथ चूमने की कोशिश की। लेकिन भारतीय संस्कारों में विश्वास रखने वाली निम्मी ने विनम्रता से ऐसा करने से इनकार कर दिया। उनका यह व्यवहार वहां मौजूद लोगों के लिए चर्चा का विषय बन गया।

    इस घटना के बाद विदेशी मीडिया ने निम्मी को अनकिस्ड गर्ल ऑफ इंडिया का नाम दिया। देखते ही देखते यह उपनाम पूरी दुनिया में उनकी पहचान बन गया। उस दौर में यह खबर अंतरराष्ट्रीय अखबारों की सुर्खियां बनी और निम्मी की लोकप्रियता भारत के बाहर भी तेजी से बढ़ गई।

    लंदन प्रीमियर के बाद निम्मी के सामने हॉलीवुड से चार फिल्मों के प्रस्ताव आए। किसी भी भारतीय अभिनेत्री के लिए उस समय यह बहुत बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी। हालांकि निम्मी ने बिना किसी हिचकिचाहट के इन सभी प्रस्तावों को अस्वीकार कर दिया। इसकी वजह केवल एक थी। वह अपनी व्यक्तिगत मर्यादाओं और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों से समझौता नहीं करना चाहती थीं। उस समय हॉलीवुड फिल्मों में किसिंग और अंतरंग दृश्यों का होना सामान्य माना जाता था जबकि निम्मी ऐसे दृश्य करने के पक्ष में नहीं थीं।

    निम्मी का मानना था कि सफलता तभी सार्थक है जब वह अपने सिद्धांतों और आत्मसम्मान के साथ मिले। उन्होंने कभी लोकप्रियता या बड़े अवसरों के लिए अपने मूल्यों से समझौता नहीं किया। यही कारण है कि आज भी उन्हें केवल एक सफल अभिनेत्री ही नहीं बल्कि मजबूत व्यक्तित्व वाली कलाकार के रूप में भी याद किया जाता है।

    अपने फिल्मी सफर में निम्मी ने बरसात दीदार आन दाग कुंदन भाई भाई उड़नखटोला और बसंत बहार जैसी कई यादगार फिल्मों में काम किया। उनकी फिल्मों और अभिनय ने हिंदी सिनेमा के इतिहास में एक अमिट छाप छोड़ी। निम्मी का जीवन इस बात का उदाहरण है कि सच्ची पहचान केवल सफलता से नहीं बल्कि अपने सिद्धांतों और मूल्यों पर अडिग रहने से भी बनती है। यही वजह है कि दशकों बाद भी उनका नाम सम्मान और गर्व के साथ लिया जाता है।

  • मोहम्मद रफी के गीत ने बदली इंदिरा गांधी की भावनाएं टैक्स फ्री हुई फिल्म नौनिहाल

    मोहम्मद रफी के गीत ने बदली इंदिरा गांधी की भावनाएं टैक्स फ्री हुई फिल्म नौनिहाल


    नई दिल्ली । भारत के सिनेमा इतिहास में कुछ घटनाएं ऐसी रही हैं जो आज भी लोगों के दिलों में जीवित हैं। ऐसी ही एक कहानी जुड़ी है महान गायक मोहम्मद रफी की मखमली और भावनाओं से भरी आवाज से। यह किस्सा फिल्म नौनिहाल से जुड़ा है जिसे सुनकर उस समय की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भावुक हो उठी थीं और उनकी आंखों में आंसू आ गए थे। इसी भावनात्मक अनुभव के बाद फिल्म को पूरे देश में टैक्स फ्री कर दिया गया था।

    साठ के दशक का समय हिंदी सिनेमा में संगीत का स्वर्ण युग माना जाता है। इस दौर में मोहम्मद रफी की आवाज ने लाखों दिलों पर राज किया। उनकी गायकी में ऐसा दर्द और ऐसा जादू था जो सीधे दिल को छू लेता था। जब भी किसी फिल्म में गहरे भावनात्मक गीत की जरूरत होती थी तो निर्माता और संगीतकार सबसे पहले रफी साहब को याद करते थे। उनकी आवाज में वह शक्ति थी जो कहानी को जीवंत बना देती थी।

    फिल्म नौनिहाल के निर्माता सावन कुमार टाक थे। वे देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से बहुत प्रभावित थे। जब 27 मई 1964 को जवाहरलाल नेहरू के निधन की खबर आई तो वे गहरे दुख में डूब गए। उन्होंने तय किया कि वे नेहरू को श्रद्धांजलि देने के लिए एक फिल्म बनाएंगे। इस सोच से फिल्म नौनिहाल की शुरुआत हुई। इस फिल्म की कहानी एक अनाथ बच्चे के इर्द गिर्द घूमती है जो अपने जीवन में एक बड़ी यात्रा पर निकलता है और भावनात्मक मोड़ से गुजरता है।

    फिल्म के लिए एक ऐसा गीत चाहिए था जो दर्शकों के दिल को झकझोर दे। गीतकार कैफी आजमी ने इस भावनात्मक गीत को लिखा। जब इस गीत को आवाज देने की बात आई तो मोहम्मद रफी का नाम चुना गया। रफी साहब ने जब इस गीत को अपनी आवाज दी तो उसमें एक गहरी संवेदना और दर्द समा गया।

    फिल्म रिलीज से पहले सावन कुमार टाक ने इसे टैक्स फ्री कराने के लिए प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मुलाकात की। इंदिरा गांधी ने फिल्म देखने से पहले कहा कि वे कोई गीत सुनना चाहेंगी। इसके बाद सावन कुमार ने टेप रिकॉर्डर पर रफी की आवाज में वह गीत सुनाया। जैसे ही गीत बजना शुरू हुआ पूरा माहौल भावनाओं से भर गया।

    गीत की पंक्तियां सुनते सुनते इंदिरा गांधी अपने पिता जवाहरलाल नेहरू की यादों में खो गईं। उनकी आंखें नम हो गईं और वे कुछ देर के लिए बहुत भावुक हो गईं। कुछ समय बाद वे अपने केबिन में चली गईं। इस भावनात्मक अनुभव के बाद फिल्म को पूरे देश में टैक्स फ्री करने का निर्णय लिया गया। यह घटना इस बात का प्रमाण है कि संगीत केवल मनोरंजन नहीं बल्कि भावनाओं की गहराई तक पहुंचने वाली शक्ति है और मोहम्मद रफी की आवाज उस शक्ति का सबसे बड़ा उदाहरण रही है।

  • शूटिंग के दौरान किशोर कुमार को पड़ा असली जोरदार मुक्का, 'विलेन' प्राण को आखिर क्यों उठाना पड़ा यह कदम?

    शूटिंग के दौरान किशोर कुमार को पड़ा असली जोरदार मुक्का, 'विलेन' प्राण को आखिर क्यों उठाना पड़ा यह कदम?


    नई दिल्ली:  भारतीय सिनेमा के इतिहास में किशोर कुमार एक ऐसे कलाकार रहे हैं, जिनकी ऊर्जा और मजाकिया अंदाज का कोई मुकाबला नहीं था। लेकिन कभी-कभी उनकी यही ‘मस्ती’ उनके साथी कलाकारों के लिए सिरदर्द बन जाया करती थी। ऐसा ही एक दिलचस्प किस्सा बॉलीवुड के मशहूर विलेन प्राण ने साझा किया था, जो फिल्म ‘पहली झलक’ की शूटिंग से जुड़ा है। प्राण और किशोर कुमार की जोड़ी ने ‘हाफ टिकट’ और ‘आशा’ जैसी कई यादगार फिल्मों में साथ काम किया, लेकिन ‘पहली झलक’ के सेट पर कुछ ऐसा हुआ जिसकी कल्पना खुद किशोर दा ने भी नहीं की होगी। वाकया एक फाइट सीन का था, जहाँ प्राण को किशोर कुमार के पेट में मुक्का मारना था, लेकिन किशोर कुमार की खिलंदड़ फितरत के चलते यह सीन पूरा होना नामुमकिन लग रहा था।

    प्राण साहब ने एक पुराने इंटरव्यू में इस घटना को याद करते हुए बताया था कि किशोर कुमार के साथ सीरियस सीन शूट करना किसी चुनौती से कम नहीं था। उस दिन फाइट सीन के दौरान जैसे ही प्राण उनके करीब जाकर फिल्मी मुक्का मारते, किशोर कुमार दर्द का नाटक करने के बजाय जोर-जोर से हंसने लगते थे। एक के बाद एक लगभग 12 से 14 रीटेक हो चुके थे, लेकिन किशोर कुमार गंभीर होने का नाम ही नहीं ले रहे थे। पूरी यूनिट परेशान थी और वक्त निकलता जा रहा था। आखिरकार, प्राण ने एक कड़ा फैसला लिया। अगले शॉट में जैसे ही कैमरा रोल हुआ, प्राण ने हवा में हाथ चलाने के बजाय सचमुच का एक जोरदार मुक्का किशोर कुमार के पेट में जड़ दिया। असली चोट लगते ही किशोर कुमार के मुंह से चीख निकल पड़ी और वे दर्द से दोहरे हो गए। प्राण ने तुरंत कहा, “बस, यही रिएक्शन तो हमें फिल्म के लिए चाहिए था!”

    इस वाकये के बाद सीन तो परफेक्ट शूट हो गया, लेकिन किशोर कुमार की हालत कुछ देर के लिए खराब हो गई थी। प्राण ने मजाकिया लहजे में यह भी स्वीकार किया कि किशोर कुमार का व्यक्तित्व इतना संक्रामक था कि उनके साथ काम करते-करते एक गंभीर विलेन की छवि वाला इंसान भी उनकी तरह ही बन जाता था। प्राण ने कहा कि अगर वे एक-दो फिल्में और किशोर दा के साथ कर लेते, तो शायद वे भी उनके ‘क्लोन’ बन जाते और अपनी गंभीरता खो देते। यह किस्सा आज भी बॉलीवुड के गलियारों में बड़े चाव से सुनाया जाता है, जो यह दर्शाता है कि उस दौर के कलाकारों के बीच कितनी गहरी समझ और काम के प्रति कितना अनूठा समर्पण हुआ करता था। किशोर कुमार आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी ये शरारतें और प्राण साहब जैसे दिग्गजों के साथ उनके ये किस्से आज भी प्रशंसकों के चेहरों पर मुस्कान ले आते हैं।