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  • अमरनाथ यात्रा शुरू होते ही पिघला प्राकृतिक हिमलिंग, पांचवें दिन बाबा बर्फानी के अंतर्ध्यान होने से उठे पर्यावरण और व्यवस्थाओं पर सवाल

    अमरनाथ यात्रा शुरू होते ही पिघला प्राकृतिक हिमलिंग, पांचवें दिन बाबा बर्फानी के अंतर्ध्यान होने से उठे पर्यावरण और व्यवस्थाओं पर सवाल

    नई दिल्ली । इस वर्ष की अमरनाथ यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं के लिए एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है। यात्रा शुरू होने के महज पांच दिन बाद ही अमरनाथ गुफा में बनने वाला प्राकृतिक हिमलिंग पूरी तरह पिघल जाने की जानकारी सामने आई है। इस घटनाक्रम ने जहां श्रद्धालुओं में निराशा पैदा की है, वहीं पर्यावरणीय परिस्थितियों और यात्रा प्रबंधन को लेकर नई चर्चा भी शुरू हो गई है। अमरनाथ यात्रा इस वर्ष 3 जुलाई से आरंभ हुई थी और निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार इसका समापन रक्षाबंधन के अवसर पर होना है।

    प्राकृतिक रूप से बनने वाला हिमलिंग हर वर्ष मौसम, तापमान और गुफा के भीतर मौजूद प्राकृतिक परिस्थितियों के अनुसार आकार लेता है। सामान्य तौर पर यात्रा के दौरान इसका आकार धीरे-धीरे बदलता रहता है, लेकिन इस बार शुरुआती दिनों में ही इसके पूरी तरह पिघल जाने की सूचना ने सभी का ध्यान आकर्षित किया है। यात्रा के पहले चरण में बड़ी संख्या में श्रद्धालु गुफा तक पहुंचकर दर्शन कर चुके हैं, जबकि आने वाले दिनों में भी हजारों श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है।

    यात्रा प्रबंधन से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि हिमलिंग का बनना और पिघलना पूरी तरह प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिस पर मानव का प्रत्यक्ष नियंत्रण संभव नहीं है। उनका मानना है कि ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्रों में तापमान, आर्द्रता और मौसम में होने वाले बदलाव का सीधा प्रभाव हिमलिंग के स्वरूप पर पड़ता है। हालांकि इस घटनाक्रम के बाद यात्रा की व्यवस्थाओं और संरक्षण संबंधी उपायों को लेकर भी कई सवाल उठाए जा रहे हैं।

    पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन और लगातार बढ़ते तापमान का असर हिमालयी क्षेत्रों में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। उनके अनुसार पिछले कुछ वर्षों में गर्मी का प्रभाव बढ़ने से ग्लेशियरों और प्राकृतिक बर्फ संरचनाओं के पिघलने की गति तेज हुई है। कुछ विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की एक साथ मौजूदगी से स्थानीय तापमान और वातावरण पर सीमित स्तर पर प्रभाव पड़ सकता है, हालांकि इस विषय पर वैज्ञानिक अध्ययन और विस्तृत विश्लेषण की आवश्यकता बनी हुई है।

    उपलब्ध जानकारी के अनुसार मई के अंतिम सप्ताह में हिमलिंग का आकार लगभग सात फीट बताया गया था, जो जून के अंतिम दिनों तक घटकर लगभग पांच फीट रह गया। जुलाई के पहले सप्ताह तक इसके पूरी तरह पिघल जाने की स्थिति सामने आई। इससे पहले भी वर्ष 2013 और 2016 में यात्रा समाप्त होने से पहले हिमलिंग के शीघ्र पिघलने जैसी घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी घटनाएं अब पहले की तुलना में अधिक बार देखने को मिल रही हैं, जो बदलती जलवायु परिस्थितियों की ओर संकेत करती हैं।

    अमरनाथ यात्रा हिंदू धर्म की सबसे महत्वपूर्ण तीर्थ यात्राओं में शामिल मानी जाती है। धार्मिक मान्यता है कि इसी पवित्र गुफा में भगवान शिव ने माता पार्वती को अमरत्व का रहस्य बताया था। इसी कारण हर वर्ष देश और विदेश से लाखों श्रद्धालु कठिन पर्वतीय मार्ग पार कर यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं। इस बार भी यात्रा निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार जारी रहेगी। प्रशासन और संबंधित प्रबंधन संस्थाएं श्रद्धालुओं की सुरक्षा, सुविधाओं और यात्रा संचालन को सुचारु बनाए रखने के लिए आवश्यक व्यवस्थाएं जारी रखे हुए हैं, जबकि पर्यावरणीय चुनौतियों के बीच प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण पर भी व्यापक चर्चा तेज हो गई है।

  • हीटवेव ने बढ़ाई ठंडी हवा की मांग, 80% घर अब भी बिना AC, फिर भी यूरोप में एयर कंडीशनर बाजार ने पकड़ी रिकॉर्ड रफ्तार

    हीटवेव ने बढ़ाई ठंडी हवा की मांग, 80% घर अब भी बिना AC, फिर भी यूरोप में एयर कंडीशनर बाजार ने पकड़ी रिकॉर्ड रफ्तार

    नई दिल्ली । लगातार बढ़ते तापमान और बार-बार पड़ रही भीषण हीटवेव ने यूरोप में रहने के तौर-तरीकों को तेजी से बदलना शुरू कर दिया है। लंबे समय तक ऐसा माना जाता रहा कि यूरोप की जलवायु एयर कंडीशनर पर निर्भर रहने वाली नहीं है, लेकिन अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। रिकॉर्ड स्तर की गर्मी ने न केवल लोगों की दिनचर्या प्रभावित की है, बल्कि एयर कंडीशनिंग उद्योग के लिए भी नए अवसर पैदा कर दिए हैं। यही वजह है कि दुनिया के सबसे कम एसी उपयोग वाले क्षेत्रों में शामिल यूरोप अब सबसे तेज़ी से बढ़ते एयर कंडीशनर बाजार के रूप में उभर रहा है।

    यूरोप के अधिकांश देशों में दशकों तक गर्मियों का मौसम अपेक्षाकृत हल्का रहा। इसी कारण यहां के घरों, कार्यालयों और सार्वजनिक भवनों का निर्माण ठंडी जलवायु को ध्यान में रखकर किया गया। मोटी दीवारें, सीमित वेंटिलेशन और गर्मी को भीतर रोकने वाली संरचनाएं पहले उपयोगी थीं, लेकिन बदलती जलवायु में यही डिज़ाइन अब बड़ी चुनौती बन गए हैं। लगातार बढ़ती गर्मी के बीच घरों के भीतर तापमान लंबे समय तक बना रहता है, जिससे लोगों के लिए सामान्य जीवन भी कठिन हो जाता है।

    यूरोप के करीब 80 प्रतिशत घरों में आज भी एयर कंडीशनर उपलब्ध नहीं हैं। इसके पीछे ऐतिहासिक जलवायु, ऊंची बिजली दरें, महंगा इंस्टॉलेशन, पुराने भवनों पर निर्माण संबंधी प्रतिबंध और पर्यावरण संरक्षण जैसी कई वजहें रही हैं। कई देशों में ऐतिहासिक इमारतों पर बाहरी एसी यूनिट लगाने की अनुमति भी नहीं मिलती, जिससे नई व्यवस्था स्थापित करना आसान नहीं होता।

    हालांकि पिछले कुछ वर्षों में लगातार रिकॉर्ड तोड़ गर्मी ने लोगों की सोच बदल दी है। फ्रांस, जर्मनी, स्पेन, इटली और ब्रिटेन जैसे देशों में गर्मियों के दौरान तापमान कई बार 40 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच चुका है। ऐसे हालात में एयर कंडीशनर अब विलासिता नहीं बल्कि स्वास्थ्य और सुरक्षा से जुड़ी आवश्यकता के रूप में देखा जाने लगा है। इसी बदलाव ने पूरे यूरोप में एसी की मांग को नई ऊंचाई तक पहुंचा दिया है।

    बाजार में इस परिवर्तन का असर स्पष्ट दिखाई दे रहा है। रिटेल स्टोर, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियां लगातार बढ़ती मांग का सामना कर रही हैं। कई स्थानों पर स्टॉक तेजी से समाप्त हो रहे हैं और पोर्टेबल एयर कंडीशनर, कूलिंग डिवाइस तथा पंखों की बिक्री में कई गुना वृद्धि दर्ज की जा रही है। निर्माताओं ने भी यूरोपीय बाजार के लिए विशेष मॉडल तैयार करने शुरू कर दिए हैं, ताकि बदलती जरूरतों के अनुरूप उत्पाद उपलब्ध कराए जा सकें।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मौजूदा जलवायु रुझान जारी रहे तो आने वाले वर्षों में यूरोप में एयर कंडीशनर की संख्या कई गुना बढ़ सकती है। हालांकि इसके साथ ऊर्जा खपत, बिजली आपूर्ति और पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर बहस भी तेज हो रही है। एक वर्ग का मानना है कि भीषण गर्मी से लोगों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए, जबकि दूसरा पक्ष ऊर्जा दक्ष भवनों और टिकाऊ कूलिंग तकनीकों को अधिक उपयुक्त समाधान मानता है।

    बदलते मौसम ने स्पष्ट कर दिया है कि यूरोप अब केवल ठंडी जलवायु वाला महाद्वीप नहीं रह गया है। जलवायु परिवर्तन के प्रभावों ने वहां रहने की परिस्थितियों को तेजी से बदला है और एयर कंडीशनर उद्योग को अभूतपूर्व विस्तार का अवसर दिया है। आने वाले वर्षों में कूलिंग तकनीक, ऊर्जा दक्षता और टिकाऊ निर्माण मॉडल यूरोप की नई शहरी योजना का महत्वपूर्ण हिस्सा बनने की संभावना है।

  • यूरोप झुलसा रिकॉर्ड गर्मी से, WHO ने दी गंभीर चेतावनी; कई देशों में जनजीवन प्रभावित, स्वास्थ्य और बिजली व्यवस्था पर बढ़ा संकट

    यूरोप झुलसा रिकॉर्ड गर्मी से, WHO ने दी गंभीर चेतावनी; कई देशों में जनजीवन प्रभावित, स्वास्थ्य और बिजली व्यवस्था पर बढ़ा संकट

    नई दिल्ली । यूरोप इस समय भीषण हीटवेव की चपेट में है, जहां कई देशों में रिकॉर्ड स्तर का तापमान दर्ज किया जा रहा है। लगातार बढ़ती गर्मी ने स्वास्थ्य सेवाओं, बिजली व्यवस्था और सार्वजनिक बुनियादी ढांचे पर गंभीर दबाव पैदा कर दिया है। अस्पतालों में मरीजों की संख्या बढ़ रही है, जबकि कई स्थानों पर अत्यधिक तापमान के कारण सामान्य जनजीवन भी प्रभावित हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों का स्पष्ट संकेत है।

    विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चेतावनी दी है कि यूरोप दुनिया का सबसे तेजी से गर्म होने वाला महाद्वीप बन चुका है। संगठन के अनुसार महाद्वीप का तापमान वैश्विक औसत की तुलना में लगभग दोगुनी गति से बढ़ रहा है। वर्तमान हीटवेव से लगभग 15 करोड़ लोग प्रभावित बताए जा रहे हैं। कई देशों में स्कूलों के संचालन पर असर पड़ा है और बिजली की मांग अचानक बढ़ने से ऊर्जा प्रणालियों पर अतिरिक्त दबाव देखा जा रहा है।

    जर्मनी में अत्यधिक गर्मी का असर परिवहन व्यवस्था पर भी दिखाई दिया। लीपज़िग में तेज तापमान के कारण ट्राम की पटरियों को नुकसान पहुंचने की खबरें सामने आईं, जिससे सेवाएं प्रभावित हुईं। वहीं राजधानी बर्लिन में लोगों को राहत पहुंचाने के लिए सार्वजनिक स्थानों पर पानी का छिड़काव किया गया। कई शहरों में प्रशासन ने लोगों से दोपहर के समय घरों में रहने और अनावश्यक यात्रा से बचने की अपील की है।

    फ्रांस में स्वास्थ्य विभाग के अनुसार जून के अंतिम सप्ताह के दौरान सामान्य से अधिक मौतें दर्ज की गई हैं। अंतिम संस्कार से जुड़े संस्थानों पर भी काम का दबाव बढ़ा है। पेरिस सहित कई क्षेत्रों में श्मशान और कब्रिस्तानों की क्षमता पर अतिरिक्त बोझ पड़ने की बात सामने आई है। स्थानीय प्रशासन स्थिति पर लगातार निगरानी रखे हुए है और आवश्यकता के अनुसार अतिरिक्त व्यवस्थाएं की जा रही हैं।

    युद्धग्रस्त यूक्रेन में यह हीटवेव नई चुनौती बनकर उभरी है। पहले से क्षतिग्रस्त ऊर्जा ढांचे पर बढ़ती बिजली मांग का दबाव बढ़ गया है। कई इलाकों में बिजली आपूर्ति को संतुलित रखने के लिए आपातकालीन कटौती लागू की गई है। ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि युद्ध और भीषण गर्मी का संयुक्त प्रभाव देश की बिजली व्यवस्था के लिए गंभीर परीक्षा साबित हो रहा है।

    यूरोप के कई हिस्सों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच चुका है। कई स्थानों पर सड़कें, रेल ढांचा और अन्य सार्वजनिक सुविधाएं भीषण गर्मी से प्रभावित हुई हैं। सोशल मीडिया पर अत्यधिक तापमान से जुड़ी अनेक तस्वीरें और वीडियो सामने आए हैं, हालांकि प्रशासन लोगों से अपुष्ट सूचनाओं पर भरोसा न करने और केवल आधिकारिक सलाह का पालन करने की अपील कर रहा है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार बढ़ती हीटवेव केवल मौसमी घटना नहीं, बल्कि बदलती जलवायु का गंभीर संकेत है। अत्यधिक गर्मी का प्रभाव केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहता, बल्कि कृषि, ऊर्जा, परिवहन और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। इसलिए दीर्घकालिक स्तर पर जलवायु अनुकूल नीतियों, हरित ऊर्जा के विस्तार और शहरी ढांचे को अत्यधिक तापमान के अनुरूप विकसित करने की आवश्यकता पहले से अधिक महसूस की जा रही है। वर्तमान हालात यह संकेत देते हैं कि यदि वैश्विक स्तर पर उत्सर्जन में कमी और पर्यावरण संरक्षण के प्रभावी उपाय नहीं किए गए, तो भविष्य में इस तरह की चरम मौसमी घटनाएं और अधिक गंभीर रूप ले सकती हैं।

  • सुपर एल नीनो 2027 की चेतावनी से वैज्ञानिक चिंतित, दुनिया के सबसे गर्म साल का खतरा; मौसम में भारी बदलाव की आशंका

    सुपर एल नीनो 2027 की चेतावनी से वैज्ञानिक चिंतित, दुनिया के सबसे गर्म साल का खतरा; मौसम में भारी बदलाव की आशंका


    नई दिल्ली। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि साल 2027 में एक शक्तिशाली “सुपर एल नीनो” विकसित हो सकता है, जो वैश्विक तापमान को रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचा सकता है। अमेरिकी एजेंसी NOAA के शुरुआती आकलनों के अनुसार प्रशांत महासागर के तापमान में लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है, जो इस जलवायु पैटर्न के बनने का संकेत है।

    एल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर के भूमध्यीय हिस्से (Niño 3.4 क्षेत्र) का तापमान असामान्य रूप से बढ़ जाता है। जब यह वृद्धि अत्यधिक होती है, तो इसे “सुपर एल नीनो” कहा जाता है, जिसका असर पूरी दुनिया के मौसम पर पड़ सकता है।

    विशेषज्ञों के मुताबिक, इस स्थिति में कई क्षेत्रों में सूखा, बाढ़, हीटवेव और जंगल की आग जैसी घटनाएं बढ़ सकती हैं। साथ ही अटलांटिक और प्रशांत महासागर में तूफानों की तीव्रता भी प्रभावित हो सकती है।

    मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि यह पैटर्न मजबूत रूप में विकसित होता है, तो 2027 हाल के इतिहास के सबसे गर्म वर्षों में शामिल हो सकता है। इससे पहले 1997-98 के एल नीनो ने भी वैश्विक स्तर पर गंभीर मौसमीय प्रभाव डाले थे।

    हालांकि, वैज्ञानिक यह भी स्पष्ट कर रहे हैं कि यह फिलहाल शुरुआती मॉडल और संभावनाओं पर आधारित अनुमान है और इसकी तीव्रता व समय में बदलाव संभव है।