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  • नो कार डे पर ई-व्हीकल से निकले इंदौर कलेक्टर और अपर कलेक्टर, वीडियो हुआ वायरल

    नो कार डे पर ई-व्हीकल से निकले इंदौर कलेक्टर और अपर कलेक्टर, वीडियो हुआ वायरल

    मध्यप्रदेश: के इंदौर में नो कार डे के अवसर पर जिला कलेक्टर शिवम वर्मा और अपर कलेक्टर नवजीवन पवार ई-व्हीकल से फील्ड में नजर आए। दोनों अधिकारियों ने कार के बजाय इलेक्ट्रिक वाहन का इस्तेमाल किया। ई-व्हीकल से सफर करते हुए उनका वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।

    नो कार डे के मौके पर अधिकारियों की यह पहल शहर में पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण कम करने के संदेश से जुड़ी रही। अधिकारियों ने ई-व्हीकल के जरिए लोगों को रोजमर्रा के आवागमन में पर्यावरण के अनुकूल परिवहन साधनों को अपनाने के लिए प्रेरित करने का संदेश दिया।

    इंदौर में आयोजित इस पहल के दौरान जिला कलेक्टर शिवम वर्मा और अपर कलेक्टर नवजीवन पवार ने खुद ई-व्हीकल का इस्तेमाल किया। दोनों अधिकारियों के सड़क पर इलेक्ट्रिक वाहन से सफर करने का वीडियो सामने आने के बाद यह चर्चा का विषय बन गया।

    नो कार डे का उद्देश्य निजी वाहनों के इस्तेमाल को कम करने और लोगों को वैकल्पिक परिवहन साधनों के प्रति जागरूक करना है। इस दौरान सार्वजनिक परिवहन, साइकिल और इलेक्ट्रिक वाहनों जैसे विकल्पों को बढ़ावा देने पर जोर दिया जाता है।

    अधिकारियों की ओर से ई-व्हीकल का इस्तेमाल इसी संदेश को आगे बढ़ाने की पहल के तौर पर देखा गया। इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने से पारंपरिक ईंधन से चलने वाले वाहनों की तुलना में प्रदूषण कम करने में मदद मिल सकती है।

    इंदौर में पर्यावरण संरक्षण और स्वच्छ परिवहन को लेकर समय-समय पर जागरूकता गतिविधियां आयोजित की जाती रही हैं। नो कार डे के दौरान लोगों से निजी कारों का इस्तेमाल कम करने और जरूरत के अनुसार वैकल्पिक परिवहन साधनों का उपयोग करने की अपील की गई।

    कलेक्टर और अपर कलेक्टर के ई-व्हीकल से फील्ड में पहुंचने की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद लोगों का ध्यान इस पहल की ओर गया। अधिकारियों ने स्वयं इलेक्ट्रिक वाहन का इस्तेमाल कर ग्रीन ट्रांसपोर्ट को लेकर जागरूकता का संदेश दिया।

    नो कार डे जैसी पहल का फोकस शहर में वाहनों से होने वाले प्रदूषण को कम करने और पर्यावरण के प्रति लोगों की जिम्मेदारी बढ़ाने पर रहता है। इसके साथ ही ऐसे प्रयासों के जरिए नागरिकों को परिवहन के अधिक टिकाऊ विकल्पों के बारे में जानकारी देने की कोशिश की जाती है।

    इंदौर में अधिकारियों की यह पहल लोगों को अपने दैनिक आवागमन के विकल्पों पर विचार करने का संदेश देती है। ई-व्हीकल का इस्तेमाल कर अधिकारियों ने पर्यावरण के अनुकूल परिवहन को बढ़ावा देने की जरूरत को रेखांकित किया।

  • नरसिंहपुर किसानों की जमीन मामले में हाईकोर्ट सख्त, कलेक्टर को तीन दिन में सड़क सामग्री हटाकर खेत लौटाने का आदेश

    नरसिंहपुर किसानों की जमीन मामले में हाईकोर्ट सख्त, कलेक्टर को तीन दिन में सड़क सामग्री हटाकर खेत लौटाने का आदेश

    मध्यप्रदेश। हाईकोर्ट ने नरसिंहपुर जिले के छह किसानों की निजी कृषि भूमि से सड़क निर्माण सामग्री हटाने को लेकर जिला प्रशासन को सख्त निर्देश दिए हैं। अदालत ने कलेक्टर को आदेश दिया कि किसानों के खेतों में रखी निर्माण सामग्री तीन दिन के भीतर हटाई जाए और जमीन को उसकी मूल स्थिति में बहाल कर किसानों को वापस सौंपा जाए।

    यह मामला जामुन पानी और भोरपानी गांवों से जुड़ा है। किसानों ने वर्ष 2021 में अपनी निजी कृषि भूमि पर बिना अनुमति सड़क निर्माण से संबंधित गतिविधियां किए जाने का आरोप लगाते हुए न्यायालय का रुख किया था। किसानों की शिकायत थी कि उनकी जमीन का इस्तेमाल उनकी सहमति के बिना किया जा रहा है और लंबे समय से उन्हें अपनी भूमि का सामान्य उपयोग करने में परेशानी हो रही है।

    मामले की सुनवाई के दौरान जिला प्रशासन की ओर से यह दलील रखी गई थी कि संबंधित स्थान पर सड़क निर्माण का काम सीधे तौर पर नहीं किया जा रहा है। प्रशासन के अनुसार लोक निर्माण विभाग ने वहां केवल सड़क निर्माण में इस्तेमाल होने वाली सामग्री अस्थायी रूप से रखी थी। अदालत के समक्ष इस स्थिति को प्रशासन की ओर से अपने बचाव में प्रस्तुत किया गया।

    हालांकि हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने प्रशासन की इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि जिला कलेक्टर पूरे जिले के समग्र प्रशासनिक प्रभारी होते हैं। किसी समस्या से संबंधित विभाग अलग होने मात्र से कलेक्टर अपनी जिम्मेदारी से अलग नहीं हो सकते। न्यायालय ने जनहित से जुड़े मामलों में जिला प्रशासन की जवाबदेही को महत्वपूर्ण माना।

    अदालत की सख्ती के बाद कलेक्टर को किसानों की जमीन से निर्माण सामग्री हटाने के लिए स्पष्ट समय सीमा दी गई है। निर्देश के अनुसार तीन दिन के भीतर खेतों से सभी संबंधित सामग्री हटाकर भूमि को पहले जैसी स्थिति में लाना होगा। इसके बाद किसानों को उनकी जमीन वापस सौंपने की प्रक्रिया पूरी करनी होगी।

    न्यायालय ने मामले की अगली सुनवाई एक सप्ताह बाद निर्धारित की है। उस दौरान कलेक्टर को अदालत के निर्देशों के अनुपालन की रिपोर्ट पेश करनी होगी। इससे यह स्पष्ट होगा कि निर्धारित समय सीमा के भीतर निर्माण सामग्री हटाने और जमीन बहाल करने की कार्रवाई पूरी हुई या नहीं।

    किसानों के लिए अदालत का यह आदेश लंबे समय से चल रही कानूनी लड़ाई में महत्वपूर्ण राहत के रूप में सामने आया है। वर्ष 2021 से भूमि के इस्तेमाल को लेकर चल रहे विवाद में अब प्रशासन को निश्चित समय सीमा के भीतर कार्रवाई करनी होगी।

    इस मामले में हाईकोर्ट की टिप्पणी जिला प्रशासन की जिम्मेदारी को लेकर भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अदालत ने संकेत दिया कि किसी विभागीय कार्रवाई या प्रशासनिक व्यवस्था का हवाला देकर जिला स्तर पर नागरिकों की शिकायतों से जिम्मेदारी नहीं टाली जा सकती। कलेक्टर को जिले का समग्र प्रभारी मानते हुए न्यायालय ने समस्या के समाधान की जिम्मेदारी तय की है।

    किसानों की निजी कृषि भूमि से जुड़ा यह विवाद सरकारी निर्माण गतिविधियों और नागरिकों के भूमि अधिकारों के बीच संतुलन का विषय भी सामने लाता है। अदालत के आदेश के बाद अब प्रशासन को न केवल निर्माण सामग्री हटानी होगी, बल्कि जमीन को वास्तविक रूप से उपयोग योग्य स्थिति में वापस करना भी सुनिश्चित करना होगा।

    अगली सुनवाई में पेश होने वाली अनुपालन रिपोर्ट इस मामले में महत्वपूर्ण होगी। इससे यह भी स्पष्ट होगा कि आदेश के अनुरूप तीन दिन की समय सीमा में कार्रवाई पूरी की गई है या नहीं। फिलहाल हाईकोर्ट के निर्देश से छह किसानों को अपनी जमीन वापस मिलने की उम्मीद बनी है और जिला प्रशासन के सामने तय समय में आदेश लागू करने की जिम्मेदारी है।

  • गरीब हितग्राहियों के राशन में हेराफेरी पर प्रशासन सख्त, जांच में सामने आई अनियमितता के बाद सात विक्रेताओं पर होगी कार्रवाई

    गरीब हितग्राहियों के राशन में हेराफेरी पर प्रशासन सख्त, जांच में सामने आई अनियमितता के बाद सात विक्रेताओं पर होगी कार्रवाई

    मध्य प्रदेश: के टीकमगढ़ जिले में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत गरीब हितग्राहियों को दिए जाने वाले राशन में कथित गड़बड़ी का बड़ा मामला सामने आया है। जिला प्रशासन की जांच में सात शासकीय उचित मूल्य दुकानों पर खाद्यान्न के रिकॉर्ड और वास्तविक स्टॉक के बीच गंभीर अंतर पाया गया है। जांच के आधार पर संबंधित दुकान विक्रेताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने के निर्देश दिए गए हैं।

    मामला जिले की छिपरी, बिजरावन, बजीतपुर, बड़ागांव, सुरजपुर, भेलसी और अजनौर स्थित शासकीय उचित मूल्य दुकानों से जुड़ा है। इन दुकानों को लेकर जिला प्रशासन को शिकायतें मिली थीं। शिकायतों में गरीब हितग्राहियों के लिए आवंटित गेहूं के वितरण में गड़बड़ी और खाद्यान्न की हेराफेरी किए जाने के आरोप लगाए गए थे।

    शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए कलेक्टर विवेक श्रोतिय के निर्देश पर संबंधित राशन दुकानों की जांच कराई गई। जांच के दौरान दुकानों के दस्तावेजों, खाद्यान्न वितरण से जुड़े रिकॉर्ड और उपलब्ध वास्तविक स्टॉक का परीक्षण किया गया। इस प्रक्रिया में सरकारी रिकॉर्ड और मौके पर मौजूद खाद्यान्न की मात्रा में बड़ा अंतर सामने आया।

    जांच रिपोर्ट के अनुसार, सातों दुकानों से जुड़े मामले में करीब 62 लाख 78 हजार रुपये मूल्य के खाद्यान्न के गबन की बात सामने आई है। इसमें गरीब हितग्राहियों के लिए आवंटित गेहूं, चावल और नमक शामिल हैं। आरोप है कि इन खाद्य सामग्री के वितरण में अनियमितता बरती गई और निर्धारित व्यवस्था के अनुरूप हितग्राहियों तक राशन नहीं पहुंचाया गया।

    सरकारी राशन व्यवस्था का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को निर्धारित मात्रा में खाद्यान्न उपलब्ध कराना है। ऐसे में राशन के रिकॉर्ड और वास्तविक स्टॉक में अंतर पाए जाने के बाद प्रशासन ने मामले को गंभीरता से लिया है। जांच में सामने आई अनियमितताओं को आधार बनाकर संबंधित दुकान संचालकों के खिलाफ वैधानिक कार्रवाई की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है।

    प्रशासन ने जांच रिपोर्ट के आधार पर सात राशन दुकान विक्रेताओं के खिलाफ आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज कराने के निर्देश दिए हैं। इस कार्रवाई के बाद संबंधित विक्रेताओं की भूमिका की जांच पुलिस स्तर पर भी की जाएगी। मामले में आगे की कार्रवाई जांच और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर होगी।

    जिला प्रशासन की ओर से स्पष्ट किया गया है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी को गंभीरता से लिया जाएगा। गरीब हितग्राहियों के लिए निर्धारित राशन में अनियमितता पाए जाने पर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ नियमों के अनुसार कार्रवाई की जाएगी। प्रशासन का कहना है कि पात्र परिवारों के हक का खाद्यान्न किसी भी स्तर पर प्रभावित नहीं होने दिया जाएगा।

    इस कार्रवाई से राशन दुकानों के संचालन और खाद्यान्न वितरण की व्यवस्था पर निगरानी बढ़ाए जाने के संकेत भी मिले हैं। सात दुकानों में सामने आई कथित अनियमितताओं के बाद संबंधित रिकॉर्ड और स्टॉक की जांच को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अब एफआईआर की प्रक्रिया के साथ मामले में आगे की जांच और कानूनी कार्रवाई पर नजर रहेगी।

  • झाबुआ कलेक्टर बने डॉक्टर, मरीजों का किया इलाज; PHC निरीक्षण में खुद संभाली ओपीडी

    झाबुआ कलेक्टर बने डॉक्टर, मरीजों का किया इलाज; PHC निरीक्षण में खुद संभाली ओपीडी


    मध्य प्रदेश। झाबुआ में एक अनोखा दृश्य देखने को मिला, जब नए कलेक्टर और एमबीबीएस डॉक्टर डॉ. योगेश तुकाराम भरसट ने पिटोल स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) का निरीक्षण किया। निरीक्षण के दौरान अस्पताल में डॉक्टरों की अनुपस्थिति और मरीजों की लंबी कतार देखकर कलेक्टर ने खुद डॉक्टर की जिम्मेदारी संभाल ली।

    कलेक्टर ने ओपीडी में बैठकर लगभग 12 से 15 मरीजों का इलाज किया और उनकी समस्याओं को गंभीरता से सुना। उन्होंने न केवल मरीजों की जांच की, बल्कि गर्भवती महिलाओं से बातचीत कर उनके स्वास्थ्य, पोषण और नियमित जांच की जानकारी भी ली।

    उन्होंने गर्भवती महिलाओं को आवश्यक सावधानियों, समय पर जांच और चिकित्सकीय सलाह के महत्व के बारे में जागरूक किया। साथ ही हाई-रिस्क गर्भवती महिलाओं की पहचान कर समय पर उपचार सुनिश्चित करने पर विशेष जोर दिया।

    निरीक्षण के दौरान कलेक्टर ने स्वास्थ्य विभाग के ऑनलाइन रिकॉर्ड और एएनसी (एंटीनेटल केयर) पोर्टल की भी जांच की। रिकॉर्ड में गड़बड़ी पाए जाने पर उन्होंने कर्मचारियों को तुरंत डेटा अपडेट करने के निर्देश दिए और लापरवाही पर नाराजगी जताई।

    इसके अलावा उन्होंने अस्पताल में दवाओं की उपलब्धता और अन्य स्वास्थ्य सुविधाओं की भी समीक्षा की। उन्होंने स्पष्ट कहा कि मरीजों को इलाज के लिए परेशान करना किसी भी स्थिति में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

    निरीक्षण के अंत में कलेक्टर डॉ. भरसट ने पिटोल में निर्माणाधीन नए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) की बिल्डिंग का भी जायजा लिया। उन्होंने निर्माण कार्य की प्रगति की समीक्षा की और अधिकारियों को शेष कार्य जल्द पूरा करने के निर्देश दिए, ताकि जल्द से जल्द नए अस्पताल को शुरू किया जा सके।

    इस पहल से स्थानीय लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मिलने की उम्मीद जगी है और क्षेत्र में स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में इसे एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

  • गौकाष्ठ और उपलों से होलिका दहन: कलेक्टर देंगे तीन दिन में रिपोर्ट, पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा

    गौकाष्ठ और उपलों से होलिका दहन: कलेक्टर देंगे तीन दिन में रिपोर्ट, पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा


    भोपाल। प्रदेश में इस वर्ष होली के अवसर पर होलिका दहन में लकड़ी की जगह गौकाष्ठ और उपलों का उपयोग करने का आदेश जारी किया गया है। सरकार ने सभी कलेक्टरों और संभागायुक्तों को निर्देश दिए हैं कि वे यह सुनिश्चित करें कि गोबर आधारित होलिका दहन को प्रोत्साहित किया जाए और इसके बारे में रिपोर्ट सरकार को सौंपें।

    सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) ने निर्देश दिए हैं कि हर जिले में होलिका दहन कार्यक्रमों का सत्यापन और पंजीयन किया जाएगा। कलेक्टरों को आदेश दिया गया है कि वे तीन दिनों के भीतर संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों से जानकारी लेकर इसकी रिपोर्ट राज्य शासन को भेजें। इसके साथ ही यदि कोई संस्था या व्यक्ति इस दिशा में विशेष प्रयास करता है तो उसे प्रोत्साहित भी किया जाएगा।

    इस निर्णय के पीछे मुख्य उद्देश्य है लकड़ी की खपत कम करना और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करना। साथ ही सरकार ने नागरिकों से अपील की है कि वे प्राकृतिक रंगों से होली मनाएं और जल संरक्षण का ध्यान रखें।

    कलेक्टरों को दिए गए निर्देशों में स्पष्ट किया गया है कि सार्वजनिक होलिका दहन कार्यक्रमों का नि:शुल्क पंजीयन सुनिश्चित किया जाए। इसका पंजीयन जिला मुख्यालय, पंचायत, नगरीय निकाय और अन्य स्थानीय संस्थाओं के माध्यम से होगा। इसके अलावा आयोजनों का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाएगा और नगरीय निकाय एवं पंचायतों को सक्रिय रूप से शामिल किया जाएगा। आयोजकों से आवश्यक जानकारी जैसे पहचान पत्र और संपर्क विवरण भी ली जाएगी।

    आगामी दिनों में जिलेवार सम्मान समारोह भी आयोजित किए जाएंगे, जिनमें पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाली संस्थाओं और पदाधिकारियों को सम्मानित किया जाएगा। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि भविष्य में यदि इन संस्थाओं को किसी अन्य प्रकार का प्रोत्साहन या सहयोग दिया जाता है तो इसकी जानकारी अलग से साझा की जाएगी।

    इस पहल से न केवल होलिका दहन के दौरान पर्यावरणीय नुकसान कम होगा, बल्कि सामाजिक जागरूकता और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की दिशा में भी एक सकारात्मक संदेश जाएगा। कलेक्टर और अधिकारियों की यह रिपोर्टिंग व्यवस्था सुनिश्चित करेगी कि राज्य में होली का पर्व सुरक्षित, पर्यावरण अनुकूल और सामाजिक सद्भाव के साथ मनाया जाए।

  • भोपाल में यूनिफॉर्म और बुक खरीद पर स्कूलों को नहीं होगा दबाव, 8 SDM करेंगे कार्रवाई

    भोपाल में यूनिफॉर्म और बुक खरीद पर स्कूलों को नहीं होगा दबाव, 8 SDM करेंगे कार्रवाई


    नई दिल्ली। भोपाल जिला प्रशासन ने नए शिक्षा सत्र शुरू होने से पहले प्राइवेट स्कूलों में यूनिफॉर्म और किताबों की खरीद-फरोख्त पर रोक लगाने का बड़ा फैसला किया है। कलेक्टर कौशलेंद्र विक्रम सिंह ने आदेश जारी कर 8 एसडीएम को जिम्मेदारी सौंपी है कि वे सुनिश्चित करें कि पेरेंट्स पर किसी भी प्रकार का दबाव न डाला जाए।

    आदेश के मुताबिक, प्राइवेट स्कूल प्रबंधन और प्राचार्य बच्चों के माता-पिता को यूनिफॉर्म, जूते, टाई, किताबें या स्टेशनरी खरीदने के लिए निर्धारित दुकानों पर मजबूर नहीं कर सकते। इस कदम के पीछे यह वजह है कि वर्तमान में कई स्कूल पेरेंट्स को केवल कुछ चुनिंदा दुकानों से ही सामान खरीदने के लिए बाध्य करते हैं।

    कलेक्टर ने हर अनुभाग में 5 सदस्यीय टीम गठित की है। टीम में संबंधित एसडीएम, तहसीलदार और सरकारी स्कूल के प्राचार्य शामिल हैं। इन टीमों का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि नए सत्र में किसी भी स्कूल द्वारा पेरेंट्स पर दबाव न डाला जाए।

    स्कूलों की स्थिति और टाइमलाइन:
    अभी स्कूलों में परीक्षाएं चल रही हैं, जो मार्च तक जारी रहेंगी। अप्रैल में स्कूल फिर से खुलेंगे और इस दौरान अक्सर पेरेंट्स पर यूनिफॉर्म और बुक्स खरीदने का दबाव बनाया जाता है। पिछले साल भी कलेक्टर ने इसी प्रकार का आदेश जारी किया था, ताकि पेरेंट्स की परेशानियों को कम किया जा सके।

    जिम्मेदार टीमों के विवरण:

    एमपी नगर: एसडीएम एलके खरे, तहसीलदार दीपक कुमार द्विवेदी, प्राचार्य एसके खांडेकर, वंदना शुक्ला, नूतन सक्सेना।

    टीटी नगर: एसडीएम अर्चना शर्मा, तहसीलदार कुणाल राउत, प्राचार्य अभिषेक बैंस, सरला कश्यप, मनोज रोहतास।

    कोलार: एसडीएम पीसी पांडेय, तहसीलदार एनएस परमार, प्राचार्य आरके यादव, शीला मौर्य, बीआरसी रूपाली रिछारिया।

    शहर वृत्त: एसडीएम दीपक पांडेय, तहसीलदार रामप्रकाश पांडे, प्राचार्य एसके उपाध्याय, एसएस सिसौदिया, बीआरसी अमित श्रीवास्तव।

    बैरागढ़: एसडीएम रविशंकर राय, तहसीलदार हर्षविक्रम सिंह, प्राचार्य अनामिका खरे, नीलम बसानिया, वेरोनिका मंडल।

    गोविंदपुरा: एसडीएम भुवन गुप्ता, तहसीलदार सौरभ वर्मा, प्राचार्य विनोद राजोरिया, स्मिता मेश्राम, चक्रेश कुमार जैन।

    हुजूर: एसडीएम विनोद सोनकिया, तहसीलदार आलोक पारे, प्राचार्य सुनीता जैन, रचना श्रीवास्तव, अमिता शर्मा।

    बैरसिया: एसडीएम आशुतोष शर्मा, तहसीलदार दिलीप चौरसिया, बीईओ आरएन श्रीवास्त्री, प्राचार्य गीता जोशी, बृजेंद्र कुमार कटारे।

    कलेक्टर ने इन टीमों को निर्देश दिए हैं कि जैसे ही किसी पेरेंट्स की शिकायत मिले, तुरंत कार्रवाई करें। स्कूल प्रबंधन के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने में देरी न हो।

    इस आदेश का उद्देश्य है कि नए शिक्षा सत्र में पेरेंट्स पर अनावश्यक दबाव न डाला जाए, और बच्चों की पढ़ाई और स्कूली माहौल सुचारू रूप से चले। जिला प्रशासन का यह कदम पेरेंट्स की राहत और शिक्षा में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।

  • मुख्यमंत्री से कराया जनपद भवन का भूमिपूजन, भवन निर्माण के लिए जमीन की तलाश जारी, SDM ने किया विवाद खारिज

    मुख्यमंत्री से कराया जनपद भवन का भूमिपूजन, भवन निर्माण के लिए जमीन की तलाश जारी, SDM ने किया विवाद खारिज


    उज्जैन। उज्जैन के खाचरौद में नए बनने वाले जनपद भवन का भूमि पूजन मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने 2 जनवरी 2026 को किया। इस दौरान अधिकारियों ने 5.25 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले भवन का भूमि पूजन मुख्यमंत्री के हाथों करवा दिया। लेकिन इस महत्वपूर्ण खबर में एक चौंकाने वाली बात सामने आई कि भवन के लिए आवश्यक जमीन पूरी तरह से उपलब्ध नहीं थी, जिससे निर्माण प्रक्रिया और योजना को लेकर सवाल उठने लगे।

    जनपद अध्यक्ष पृथ्वीराज सिंह ने मामले की शिकायत कलेक्टर और कमिश्नर से की। अध्यक्ष का आरोप था कि नए भवन निर्माण के लिए 2 एकड़ भूमि की जरूरत है, लेकिन जिस जमीन (सर्वे क्रमांक 984) पर तहसील और एसडीएम कार्यालय बन रहे हैं, वहां पर्याप्त जगह नहीं बची।

    इसके कारण अब नए जनपद भवन के निर्माण के लिए पांच किलोमीटर दूर अतिरिक्त जमीन तलाशने की स्थिति बन गई।

    इस मुद्दे पर SDM खाचरौद, नेहा साहू ने बयान दिया कि अधिकारियों को पर्याप्त जमीन उपलब्ध है और विवादित जानकारी गलत तरीके से फैल रही है। उन्होंने जनपद अध्यक्ष को ऑनलाइन आवेदन कर सही भूमि निर्धारित करने का विकल्प भी दिया।

    जानकारी के मुताबिक, जनपद भवन और तहसील कार्यालय दोनों के निर्माण का उद्देश्य स्थानीय प्रशासनिक कार्यों को आधुनिक और सुव्यवस्थित ढंग से संचालित करना है।

    अधिकारियों की योजना के अनुसार नई इमारत में जनपद स्तर की सभी सुविधाएं मौजूद होंगी, लेकिन जमीन की सही व्यवस्था को लेकर अभी स्पष्टता जरूरी है।

    यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जनपद के विकास और सरकारी सेवाओं के सुचारू संचालन के लिए भवन निर्माण और भूमि का सही प्रबंधन अहम है। वहीं, अधिकारियों ने भी कहा है कि परियोजना की समीक्षा के दौरान सभी पहलुओं को ध्यान में रखा जा रहा है और जल्द ही निर्माण कार्य सुचारू रूप से शुरू किया जाएगा।

    इस घटनाक्रम ने स्थानीय प्रशासन और अधिकारियों के बीच जमीन आवंटन और योजना कार्यान्वयन में पारदर्शिता की
    आवश्यकता को उजागर किया है। जनता की निगाहें अब इस पर टिकी हैं कि प्रशासन इस समस्या का स्थायी और शीघ्र समाधान कैसे करेगा।