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  • शारदीय नवरात्रि में नारंगी से पीकॉक ग्रीन तक नौ रंगों की परंपरा, जानें किस दिन किस देवी की पूजा होती है और क्या है रंगों का महत्व

    शारदीय नवरात्रि में नारंगी से पीकॉक ग्रीन तक नौ रंगों की परंपरा, जानें किस दिन किस देवी की पूजा होती है और क्या है रंगों का महत्व


    नई दिल्ली ।
    शारदीय नवरात्रि का पर्व देशभर में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। इन नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक अनुष्ठानों के साथ-साथ इस दौरान पारंपरिक कपड़े पहनने और हर दिन अलग रंग चुनने की परंपरा भी कई क्षेत्रों में प्रचलित है। भक्त पूजा, गरबा और डांडिया जैसे आयोजनों के लिए अपने परिधानों की तैयारी पहले से करते हैं। नवरात्रि के प्रत्येक दिन को एक देवी स्वरूप से जोड़ा जाता है और प्रचलित रंगों की सूची में नारंगी, सफेद, लाल, रॉयल ब्लू, पीला, हरा, ग्रे, पर्पल और पीकॉक ग्रीन शामिल हैं। इन रंगों को उत्साह, शांति, शक्ति, प्रसन्नता और नई शुरुआत जैसे भावों से जोड़ा जाता है। हालांकि, रंगों का क्रम और उनसे जुड़ी मान्यताएं अलग-अलग क्षेत्रों और परंपराओं के अनुसार बदल सकती हैं। पूजा के लिए किसी विशेष रंग के कपड़े पहनना अनिवार्य नहीं है।

    नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। इस दिन नारंगी रंग पहनने की परंपरा बताई जाती है। नारंगी रंग को उत्साह, ऊर्जा और सकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है। भक्त इस अवसर पर नारंगी रंग की साड़ी, सूट या कुर्ता पहनकर पारंपरिक अंदाज अपना सकते हैं। दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की आराधना होती है और सफेद रंग को इस दिन से जोड़ा जाता है। सफेद रंग शांति, सादगी और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। इस दिन सफेद सूट या साड़ी के साथ हल्की जूलरी पहनकर सादगी भरा उत्सवी लुक तैयार किया जा सकता है। तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। इस दिन लाल रंग पहनने की परंपरा है। लाल रंग को शक्ति और साहस से जोड़कर देखा जाता है। लाल साड़ी, अनारकली सूट या अन्य पारंपरिक परिधान इस दिन के लिए चुने जा सकते हैं।

    नवरात्रि के चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा होती है और प्रचलित सूची में रॉयल ब्लू रंग शामिल है। इस रंग को गहराई, स्थिरता और शांति से जोड़ा जाता है। भक्त नीले रंग का कुर्ता, साड़ी या लहंगा पहनकर उत्सव के अनुरूप अपना पहनावा चुन सकते हैं। पांचवें दिन मां स्कंदमाता की आराधना की जाती है। इस दिन पीला रंग पहनने की परंपरा बताई गई है। पीले रंग को खुशहाली, प्रसन्नता और उमंग का प्रतीक माना जाता है। पीले रंग की कुर्ती, साड़ी या सूट पारंपरिक परिधान के विकल्प हो सकते हैं। छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा होती है और हरे रंग को इस दिन से जोड़ा जाता है। हरा रंग प्रकृति, विकास और नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। इस अवसर पर हरे रंग के परिधान पहनकर नवरात्रि के उत्सव में शामिल हुआ जा सकता है।

    सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा की जाती है। इस दिन ग्रे रंग को प्रचलित रंगों की सूची में रखा गया है। ग्रे रंग को संतुलन और स्थिरता से जोड़ा जाता है। इस दिन ग्रे रंग की साड़ी या एथनिक सूट के साथ सिल्वर जूलरी पहनने का विकल्प चुना जा सकता है। आठवें दिन मां महागौरी की आराधना होती है और पर्पल यानी बैंगनी रंग इस दिन से संबंधित माना गया है। बैंगनी रंग को गरिमा, समृद्धि और भव्यता से जोड़ा जाता है। इस दिन बैंगनी साड़ी, सूट या लहंगा पहनकर उत्सवी लुक तैयार किया जा सकता है। नवरात्रि के नौवें और अंतिम दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा होती है। इस दिन पीकॉक ग्रीन यानी मोरपंखी हरे रंग को प्रचलित रंगों की सूची में शामिल किया गया है। इस रंग की साड़ी, सूट या लहंगा पहनकर भक्त अंतिम दिन के उत्सव के लिए पारंपरिक पहनावा चुन सकते हैं।

    नवरात्रि में नौ रंगों के कपड़े पहनने की परंपरा का उद्देश्य त्योहार के उत्साह और देवी उपासना से जुड़े भावों को पहनावे के माध्यम से व्यक्त करना भी है। अलग-अलग रंगों को विशेष गुणों और प्रतीकों से जोड़ा जाता है। लाल रंग शक्ति, सफेद शांति और हरा रंग प्रकृति तथा विकास का प्रतीक माना जाता है। इसी तरह नारंगी को ऊर्जा, पीले को प्रसन्नता और बैंगनी को भव्यता से जोड़ा जाता है। हालांकि, इन रंगों की सूची हर जगह एक जैसी नहीं होती और क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार इसमें बदलाव देखने को मिल सकता है। इसलिए नवरात्रि के दौरान रंगों का चयन व्यक्तिगत पसंद, स्थानीय परंपरा और सुविधा के अनुसार किया जा सकता है। मां दुर्गा की आराधना में श्रद्धा और पूजा का महत्व प्रमुख है; किसी खास रंग के कपड़े पहनना धार्मिक रूप से अनिवार्य नहीं माना जाता।

  • इंदौर में आज पारंपरिक गेर में मिसाइलों से उड़ेगा रंग, टेसू के फूलों से बने गुलाल से सजेगा राजवाड़ा

    इंदौर में आज पारंपरिक गेर में मिसाइलों से उड़ेगा रंग, टेसू के फूलों से बने गुलाल से सजेगा राजवाड़ा


    इंदौर।
    मालवा की सांस्कृतिक राजधानी इंदौर में आज रविवार को रंगों का सबसे बड़ा और भव्य उत्सव देखने को मिलेगा। पारंपरिक गेर के साथ पूरा पश्चिम क्षेत्र रंगों से सराबोर हो जाएगा। लाखों लोग इस अनूठे रंगोत्सव में शामिल होकर गुलाल और रंगों की बौछारों का आनंद लेंगे।

    गेर के साथ ही शहर में फागयात्रा भी निकलेगी, जिसमें बड़ी संख्या में महिलाएं शामिल होंगी। आयोजकों ने इस भव्य आयोजन के लिए सभी तैयारियां पूरी कर ली हैं। कार्यक्रम के दौरान हजारों किलो गुलाल उड़ाया जाएगा, जिससे शहर का माहौल पूरी तरह रंगमय हो जाएगा।

    70 साल पुरानी परंपरा

    यह परंपरागत गेर राजवाड़ा से निकाली जाती है और इसका इतिहास करीब सात दशक पुराना है। शुरुआत में बड़े कड़ावों में रंग भरकर लोगों को भिगोने की परंपरा थी। समय के साथ यह आयोजन बैलगाड़ियों और ट्रैक्टरों से होते हुए डीजे और आधुनिक तकनीक तक पहुंच गया। अब गेर में रंग बरसाने के लिए विशेष मिसाइल तकनीक का उपयोग किया जाता है, जिससे रंग और पानी करीब 200 फीट तक हवा में उछाला जाएगा।

    लाखों लोग बनेंगे रंगोत्सव के साक्षी

    पिछले तीन वर्षों से गेर में शामिल होने वाले लोगों की संख्या 5 लाख से अधिक रही है। यही वजह है कि यह आयोजन देश के सबसे बड़े रंगोत्सवों में गिना जाने लगा है। इस बार भी लाखों लीटर पानी और हजारों किलो गुलाल उड़ाने की तैयारी की गई है। राजवाड़ा और आसपास के 5 से 6 किलोमीटर क्षेत्र में रंग, गुलाल और पानी की बौछारें देखने को मिलेंगी।

    टेसू के फूलों से बने गुलाल से बनेगा तिरंगा

    इस आयोजन की खास बात यह है कि करीब 8 हजार किलो टेसू के फूलों से तैयार गुलाल का इस्तेमाल किया जाएगा। इससे राजवाड़ा पर तिरंगा बनाया जाएगा, जो उत्सव का विशेष आकर्षण होगा।

    ढोल-ताशे, झांकियां और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां

    गेर में बैंड, ढोल-ताशे, आकर्षक झांकियां और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां भी देखने को मिलेंगी। गेर और फागयात्रा अपने-अपने तय मार्गों से निकलकर शहरवासियों को रंगों के इस महासागर में डुबो देंगी।