Tag: CommerceMinistry

  • थोक महंगाई में तेज उछाल, मई में 9.68 प्रतिशत पहुंची डब्ल्यूपीआई दर; सरकार ने नई मूल्यांकन प्रणाली की शुरुआत की

    थोक महंगाई में तेज उछाल, मई में 9.68 प्रतिशत पहुंची डब्ल्यूपीआई दर; सरकार ने नई मूल्यांकन प्रणाली की शुरुआत की

    नई दिल्ली । देश में महंगाई के आकलन और उत्पादक स्तर पर कीमतों की निगरानी को अधिक आधुनिक और वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाने की दिशा में सरकार ने महत्वपूर्ण कदम उठाया है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने 2022-23 को नया आधार वर्ष मानते हुए संशोधित थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) सीरीज लागू कर दी है। इसके साथ ही मई माह के लिए जारी आंकड़ों में थोक महंगाई दर 9.68 प्रतिशत दर्ज की गई है, जो उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखला से जुड़े क्षेत्रों में लागत दबाव को दर्शाती है।

    नई सीरीज ने 2011-12 आधार वर्ष वाली पुरानी व्यवस्था का स्थान ले लिया है। सरकार का उद्देश्य बदलती आर्थिक संरचना, उत्पादन पैटर्न और ऊर्जा क्षेत्र में आए बदलावों को महंगाई मापन प्रणाली में बेहतर तरीके से शामिल करना है। संशोधित व्यवस्था के जरिए देश की वास्तविक आर्थिक गतिविधियों और बाजार स्थितियों को अधिक सटीक रूप से प्रतिबिंबित करने का प्रयास किया गया है।

    मई के आंकड़ों के अनुसार सभी वस्तुओं का समग्र थोक मूल्य सूचकांक बढ़कर 109.9 पर पहुंच गया। प्राथमिक वस्तुओं की श्रेणी में भी महंगाई बढ़कर 4.99 प्रतिशत दर्ज की गई। हालांकि सबसे अधिक प्रभाव ईंधन और ऊर्जा क्षेत्र में देखने को मिला, जहां महंगाई दर लगभग 30 प्रतिशत तक पहुंच गई। यह वृद्धि ऊर्जा लागत में बढ़ोतरी और उससे जुड़े उत्पादन व्यय के प्रभाव को दर्शाती है।

    विनिर्माण क्षेत्र भी लागत दबाव से अछूता नहीं रहा। मैन्यूफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स की महंगाई दर मई में 7.48 प्रतिशत दर्ज की गई। औद्योगिक उत्पादन से जुड़े कई क्षेत्रों में कच्चे माल और ऊर्जा लागत में बढ़ोतरी का असर कीमतों पर दिखाई दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह प्रवृत्ति लंबे समय तक बनी रहती है तो इसका असर उपभोक्ता स्तर की महंगाई पर भी पड़ सकता है।

    मंत्रालय के अनुसार खनिज तेल, कच्चा पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, रसायन एवं रासायनिक उत्पाद तथा बेसिक मेटल्स जैसी श्रेणियां थोक महंगाई में वृद्धि के प्रमुख कारणों में शामिल रहीं। इन क्षेत्रों में लागत बढ़ने का प्रभाव उद्योगों की उत्पादन लागत पर सीधे तौर पर पड़ा है।

    खाद्य क्षेत्र में स्थिति अपेक्षाकृत नियंत्रित रही। डब्ल्यूपीआई फूड इंडेक्स के तहत खाद्य महंगाई दर 4.49 प्रतिशत दर्ज की गई। यह संकेत देता है कि खाद्य वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि हुई है, लेकिन अन्य प्रमुख श्रेणियों की तुलना में दबाव सीमित रहा।

    नई डब्ल्यूपीआई सीरीज की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसका विस्तारित दायरा है। पहले जहां बास्केट में 697 वस्तुएं शामिल थीं, वहीं अब उनकी संख्या बढ़ाकर 957 कर दी गई है। इससे विभिन्न क्षेत्रों की मूल्य स्थिति का अधिक व्यापक और यथार्थपरक आकलन संभव होगा।

    ऊर्जा क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं। पहली बार सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और परमाणु ऊर्जा से उत्पादित बिजली को सूचकांक बास्केट में शामिल किया गया है। यह कदम देश के ऊर्जा क्षेत्र में हो रहे बदलावों और नवीकरणीय स्रोतों की बढ़ती भूमिका को प्रतिबिंबित करता है।

    इसके अलावा कच्चे पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस को प्राथमिक वस्तुओं की श्रेणी से हटाकर ईंधन और ऊर्जा वर्ग में शामिल किया गया है। नई पद्धति में वस्तुओं का वेटेज तय करने के लिए ग्रॉस वैल्यू ऑफ आउटपुट का उपयोग किया गया है, जिससे आर्थिक गतिविधियों का अधिक सटीक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो सके।

    सरकार ने संशोधित डब्ल्यूपीआई के साथ आउटपुट प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स, ट्रायल इनपुट प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स तथा विभिन्न सेवा क्षेत्रों के लिए नई मूल्य सूचकांक श्रृंखलाएं भी जारी की हैं। इससे उत्पादक स्तर पर कीमतों की निगरानी और आर्थिक नीतियों के निर्माण में अधिक व्यापक और विश्वसनीय आंकड़े उपलब्ध हो सकेंगे।

  • वैश्विक सीफूड बाजार में हिस्सेदारी बढ़ाने की तैयारी, अगले पांच वर्षों में निर्यात को 30 अरब डॉलर तक पहुंचाने का रोडमैप

    वैश्विक सीफूड बाजार में हिस्सेदारी बढ़ाने की तैयारी, अगले पांच वर्षों में निर्यात को 30 अरब डॉलर तक पहुंचाने का रोडमैप

    नई दिल्ली । भारत के समुद्री उत्पाद निर्यात क्षेत्र ने पिछले एक दशक में उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है और अब देश इस क्षेत्र को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने की तैयारी में जुट गया है। केंद्र सरकार ने अगले पांच वर्षों में समुद्री उत्पादों के निर्यात को 30 अरब डॉलर तक पहुंचाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है। इस दिशा में निर्यात क्षमता बढ़ाने, वैश्विक बाजारों तक पहुंच मजबूत करने और मूल्य संवर्धित उत्पादों को बढ़ावा देने पर विशेष जोर दिया जा रहा है।

    हाल ही में आयोजित राष्ट्रीय समुद्री उत्पाद निर्यात कार्यशाला के दौरान केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि भारत का समुद्री उत्पाद निर्यात पिछले दस वर्षों में लगभग 70 प्रतिशत बढ़ा है। उन्होंने बताया कि वर्तमान में वैश्विक सीफूड व्यापार में भारत की हिस्सेदारी करीब चार प्रतिशत है, जिसे आने वाले वर्षों में उल्लेखनीय रूप से बढ़ाने की आवश्यकता है। इसके लिए सरकार, उद्योग, निर्यातक और किसानों के बीच बेहतर समन्वय को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    उन्होंने कहा कि केवल पारंपरिक निर्यात पर निर्भर रहने के बजाय रेडी-टू-ईट और रेडी-टू-कुक जैसे वैल्यू एडेड उत्पादों के उत्पादन और निर्यात को बढ़ावा देना समय की मांग है। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में ऐसे उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है और भारत के लिए यह एक बड़ा अवसर साबित हो सकता है। इसके साथ ही हाल के वर्षों में विभिन्न देशों के साथ हुए मुक्त व्यापार समझौतों से खुले नए बाजारों का लाभ उठाने की रणनीति पर भी बल दिया गया।

    मत्स्य पालन क्षेत्र के आंकड़े भी इस विकास यात्रा को मजबूत आधार प्रदान करते हैं। देश में मछली उत्पादन वर्ष 2012-13 के लगभग 95.8 लाख टन से बढ़कर 2024-25 में करीब 198 लाख टन तक पहुंच चुका है। उत्पादन में यह वृद्धि न केवल घरेलू मांग को पूरा करने में सहायक रही है बल्कि निर्यात क्षमता बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। वैश्विक आर्थिक चुनौतियों और बाजार में उतार-चढ़ाव के बावजूद भारत का समुद्री उत्पाद निर्यात लगभग 8.46 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है।

    समुद्री निर्यात में फ्रोजन झींगा अब भी सबसे प्रमुख उत्पाद बना हुआ है। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में इसकी मांग लगातार बनी हुई है, जिससे भारत को विदेशी मुद्रा अर्जित करने में मदद मिल रही है। सरकार इस क्षेत्र में ट्रेसबिलिटी, गुणवत्ता नियंत्रण और टिकाऊ उत्पादन प्रणालियों को मजबूत बनाने के लिए विभिन्न योजनाओं के माध्यम से निवेश और सहायता उपलब्ध करा रही है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि निर्यात वृद्धि के लिए केवल उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। कोल्ड चेन नेटवर्क, आधुनिक लॉजिस्टिक्स, गुणवत्तापूर्ण बीजों की उपलब्धता, रोग प्रबंधन और अंतरराष्ट्रीय प्रमाणन मानकों का पालन जैसे क्षेत्रों में भी व्यापक सुधार आवश्यक हैं। इसी उद्देश्य से कार्यशाला में उद्योग प्रतिनिधियों, वैज्ञानिकों, स्टार्टअप्स और किसानों ने विभिन्न चुनौतियों और संभावित समाधानों पर विस्तार से चर्चा की।

    समुद्री उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देने में परिवहन और एयर कार्गो अवसंरचना की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। उच्च मूल्य वाले उत्पादों को तेजी से अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचाने के लिए मल्टीमॉडल कनेक्टिविटी और आधुनिक कार्गो सुविधाओं के विस्तार पर काम किया जा रहा है। सरकार का मानना है कि बेहतर बुनियादी ढांचा, तकनीकी नवाचार और टिकाऊ मत्स्य पालन पद्धतियां भारत को वैश्विक सीफूड व्यापार में अधिक प्रतिस्पर्धी बना सकती हैं।

    आने वाले वर्षों में यदि उत्पादन, प्रसंस्करण, गुणवत्ता नियंत्रण और बाजार विस्तार की योजनाएं प्रभावी ढंग से लागू होती हैं, तो भारत न केवल अपने निर्यात लक्ष्य को हासिल कर सकता है बल्कि वैश्विक समुद्री उत्पाद व्यापार में एक प्रमुख शक्ति के रूप में भी उभर सकता है।

  • भारत-अमेरिका ट्रेड डील: तेल खरीदने की रणनीति पर गोयल ने दिया स्पष्टीकरण

    भारत-अमेरिका ट्रेड डील: तेल खरीदने की रणनीति पर गोयल ने दिया स्पष्टीकरण


    नई दिल्ली। केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने भारत और अमेरिका के बीच हाल ही में हुई ट्रेड डील पर अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि अमेरिका से तेल खरीदना भारत के रणनीतिक हित में है, क्योंकि इससे देश को स्रोत में विविधता मिलती है। वहीं, रूसी तेल को लेकर उन्होंने स्पष्ट जवाब देने से बचते हुए कहा कि इस मामले में विदेश मंत्रालय अधिक उपयुक्त जवाब दे सकता है।

    तेल खरीद निर्णय खरीददारों पर निर्भर

    गोयल ने कहा, अमेरिका से कच्चा तेल, एलएनजी या एलपीजी खरीदना रणनीतिक हित में है। लेकिन यह फैसला घरेलू खरीदार खुद ही लेते हैं। ट्रेड डील यह तय नहीं करती कि कौन किससे क्या खरीदेगा। उन्होंने बताया कि व्यापार समझौते का उद्देश्य दोनों देशों के बीच कारोबार को आसान बनाना और विशेष पहुंच प्रदान करना है। गोयल ने कहा, “एफ़टीए का मतलब ही होता है कि प्रतिस्पर्धियों की तुलना में विशेष पहुंच मिले। जब हम पर 18 प्रतिशत का पारस्परिक शुल्क है, तो हमें दूसरे विकासशील देशों पर बढ़त मिलती है।

    500 अरब डॉलर का व्यापार भी कोई चुनौती नहीं
    मीडिया से बातचीत में गोयल ने कहा कि भारत अगले पांच वर्षों में अमेरिका से 500 अरब डॉलर मूल्य के उत्पाद खरीदने में सक्षम है। उन्होंने इसे अत्यंत रूढ़िवादी आंकड़ा बताया। इसके अंतर्गत ऊर्जा उत्पाद, विमान और उनके पुर्जे, कीमती धातुएं, प्रौद्योगिकी उत्पाद और कोकिंग कोयला शामिल हैं। गोयल ने कहा, “तेल, एलएनजी, एलपीजी और कच्चे तेल के अलावा केवल विमानन क्षेत्र के लिए ही कम से कम 100 अरब डॉलर से अधिक की आवश्यकता होगी।

    डील का रणनीतिक महत्व
    साथ ही उन्होंने बताया कि वर्तमान में भारत अमेरिका से लगभग 300 अरब डॉलर मूल्य के ऐसे सामान आयात कर सकता है, जो अब तक अन्य देशों से खरीदे जा रहे थे। यह समझौता दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों को गति देने और प्रतिस्पर्धा में बढ़त दिलाने के लिए किया गया है।