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  • MP BJP का बड़ा संगठन महामंथन, ओरछा में 30-31 अगस्त को प्रदेश कार्यसमिति बैठक, 20 समितियों में 180 से अधिक कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी

    MP BJP का बड़ा संगठन महामंथन, ओरछा में 30-31 अगस्त को प्रदेश कार्यसमिति बैठक, 20 समितियों में 180 से अधिक कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी

    मध्य प्रदेश : भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति की दो दिवसीय बैठक 30 और 31 अगस्त को धार्मिक नगरी ओरछा में आयोजित होने जा रही है। बैठक को लेकर पार्टी संगठन ने तैयारियां तेज कर दी हैं। आयोजन को व्यवस्थित तरीके से पूरा कराने के लिए 20 विशेष समितियों का गठन किया गया है। इन समितियों में 180 से अधिक कार्यकर्ताओं को अलग-अलग जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं। पार्टी का जोर बैठक के दौरान व्यवस्थाओं के साथ-साथ संगठनात्मक अनुशासन और आगामी रणनीति पर भी रहेगा।

    ओरछा में होने वाली इस बैठक को भाजपा के लिए संगठन की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के अनुसार, बैठक के माध्यम से बूथ स्तर से लेकर संगठन के विस्तार तक की आगामी रणनीति पर व्यापक मंथन किया जाएगा। इसके साथ ही पार्टी के संगठन को अधिक सक्रिय, मजबूत और प्रभावी बनाने से जुड़े विषयों पर चर्चा होगी।

    बैठक में आने वाले वरिष्ठ नेताओं, प्रदेश पदाधिकारियों और अन्य प्रमुख अतिथियों की व्यवस्थाओं को लेकर अलग-अलग समितियों को जिम्मेदारी दी गई है। ओरछा की धार्मिक और ऐतिहासिक पहचान को देखते हुए मंदिर दर्शन व्यवस्था पर भी विशेष ध्यान दिया गया है। इसके लिए मंदिर दर्शन व्यवस्था समिति का गठन किया गया है, जिसमें नौ प्रमुख कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी सौंपी गई है। यह समिति वरिष्ठ अतिथियों को भगवान रामराजा के दर्शन कराने से जुड़ी व्यवस्थाओं को संभालेगी।

    पार्टी ने बैठक के दौरान चिकित्सा सुविधाओं को लेकर भी व्यवस्था सुनिश्चित की है। चिकित्सा समिति में डॉक्टरों की टीम को जिम्मेदारी दी गई है, ताकि किसी भी आकस्मिक स्थिति में तत्काल सहायता उपलब्ध कराई जा सके। इसी तरह मीडिया और प्रचार-प्रसार से संबंधित जिम्मेदारियों के लिए अलग टीम बनाई गई है। आयोजन स्थल की साज-सज्जा, पार्किंग, कार्यकर्ता व्यवस्था और साउंड सिस्टम के लिए भी समितियां गठित की गई हैं।

    मंच और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी पार्टी ने अलग-अलग जिम्मेदारियां तय की हैं। मंच व्यवस्था समिति बैठक स्थल पर कार्यक्रम से जुड़ी तैयारियों को संभालेगी, जबकि सुरक्षा समिति आयोजन के दौरान सुरक्षा संबंधी समन्वय पर नजर रखेगी। इसके अलावा परिवहन व्यवस्था के लिए भी कार्यकर्ताओं की टीम बनाई गई है, जो नेताओं और पदाधिकारियों के आवागमन से जुड़ी व्यवस्थाओं को संभालने का काम करेगी।

    प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में आगामी राजनीतिक अभियानों और महत्वपूर्ण संगठनात्मक प्रस्तावों को अंतिम रूप दिए जाने की संभावना है। जिला स्तर पर पार्टी के कार्यक्रमों और संगठनात्मक गतिविधियों की समीक्षा भी बैठक के एजेंडे का हिस्सा रहेगी। इसके साथ ही कार्यकर्ताओं के बीच अनुशासन और मितव्ययिता को लेकर भी चर्चा हो सकती है।

    भाजपा संगठन का लक्ष्य बैठक के माध्यम से आगामी गतिविधियों के लिए स्पष्ट दिशा तय करना है। बूथ स्तर पर संगठन की सक्रियता बढ़ाने, कार्यकर्ताओं की भूमिका मजबूत करने और विभिन्न अभियानों को प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाने जैसे विषयों पर विचार-विमर्श किया जाएगा। ओरछा में होने वाली बैठक के लिए जिम्मेदारियां पहले से तय किए जाने से पार्टी संगठन व्यवस्थाओं को लेकर किसी तरह की कमी नहीं छोड़ना चाहता। बैठक के दौरान लिए जाने वाले फैसलों का असर आने वाले समय में प्रदेश भाजपा की संगठनात्मक गतिविधियों और राजनीतिक कार्यक्रमों में दिखाई दे सकता है।

  • CJI सूर्यकांत ने सरकार से जांच जारी रखने वाली FIR की सूची मांगी, सभी पक्षों को कमेटी के सामने रखने होंगे अपने तर्क

    CJI सूर्यकांत ने सरकार से जांच जारी रखने वाली FIR की सूची मांगी, सभी पक्षों को कमेटी के सामने रखने होंगे अपने तर्क

    नई दिल्ली ।पेपर लीक के विरोध में दिल्ली के जंतर-मंतर सहित विभिन्न स्थानों पर हुए प्रदर्शनों के दौरान दर्ज FIR को रद्द करने की मांग पर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। मामले में प्रदर्शनकारियों की ओर से सभी FIR खत्म करने की मांग रखी गई, जबकि सरकार ने इसका विरोध करते हुए कुछ मामलों में जांच जारी रखने की जरूरत बताई।

    सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने पूरे मामले के लिए हाई पावर्ड कमेटी गठित करने की बात कही। अदालत ने स्पष्ट किया कि सभी संबंधित पक्ष कमेटी के सामने अपनी बात रख सकेंगे। कमेटी मामले से जुड़े तथ्यों और विभिन्न पक्षों के तर्कों पर विचार करने के बाद अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपेगी।

    प्रदर्शनकारियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने अदालत से सभी FIR रद्द करने का आदेश देने का अनुरोध किया। उनका कहना था कि आंदोलन के दौरान दर्ज मामलों पर व्यापक स्तर पर विचार किया जाना चाहिए। वहीं सरकार की ओर से इसका विरोध किया गया और कुछ मामलों में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले आरोपियों को राहत देने पर आपत्ति जताई गई।

    सरकार की ओर से पेश वकीलों ने कहा कि प्रत्येक मामले की परिस्थितियों को अलग-अलग देखना जरूरी है। उनका तर्क था कि यदि सभी FIR एक साथ रद्द कर दी जाती हैं तो इससे गलत संदेश जा सकता है। संसद मार्च का मुद्दा भी सुनवाई के दौरान उठाया गया और इसे कानून के दायरे में रहने की आवश्यकता से जोड़ा गया।

    इस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि संविधान शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांग रखने का अधिकार देता है। हालांकि, अदालत ने यह भी संकेत दिया कि प्रदर्शन के दौरान कानून का उल्लंघन या गंभीर आपराधिक गतिविधि के आरोपों वाले मामलों को अलग नजरिए से देखा जा सकता है।

    सरकार की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि सुप्रीम कोर्ट से अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल कर सभी FIR खत्म करने की मांग की जा रही है। अदालत ने सरकार की आपत्तियों और सुझावों को सुनते हुए कहा कि सभी पक्षों की बात को प्रस्तावित कमेटी के समक्ष रखा जा सकता है।

    सुनवाई के दौरान घायल पुलिसकर्मियों के परिवारों की ओर से भी अपनी बात रखने की मांग की गई। उनके पक्ष का कहना था कि FIR या अन्य मामलों में कोई निर्णय लेने से पहले प्रभावित पुलिसकर्मियों और उनके परिवारों की स्थिति पर भी विचार किया जाना चाहिए।

    मुख्य न्यायाधीश ने सरकार से उन मामलों की सूची भी मांगी जिनमें जांच आगे जारी रखना आवश्यक समझा जा रहा है। अदालत ने संकेत दिया कि प्रस्तावित कमेटी सभी मामलों को देखने के बाद यह समझने में मदद करेगी कि किन मामलों में कार्रवाई जारी रहनी चाहिए और किन मामलों में राहत पर विचार किया जा सकता है।

    कमेटी की संरचना को लेकर अदालत ने बताया कि एक पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश, पूर्व पुलिस महानिदेशक और पूर्व सीबीआई निदेशक से सहमति ली गई है। इसके अलावा कमेटी में अन्य सदस्यों को शामिल करने के सुझावों पर भी विचार किया जाएगा।

    अदालत की इस पहल से अब FIR से जुड़े सभी पक्षों को अपनी स्थिति विस्तार से रखने का अवसर मिलेगा। कमेटी की रिपोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट आगे की कार्रवाई पर विचार करेगा। फिलहाल अदालत ने सभी संबंधित मामलों की सूची और पक्षों की दलीलों को एक व्यापक प्रक्रिया के तहत देखने का रास्ता तैयार किया है।

  • दतिया उपचुनाव में हार के कारण तलाशेगी भाजपा, प्रदेश नेतृत्व ने गठित की दो सदस्यीय समीक्षा समिति

    दतिया उपचुनाव में हार के कारण तलाशेगी भाजपा, प्रदेश नेतृत्व ने गठित की दो सदस्यीय समीक्षा समिति

    मध्य प्रदेश । दतिया विधानसभा उपचुनाव में मिली हार के बाद भारतीय जनता पार्टी ने संगठनात्मक स्तर पर समीक्षा प्रक्रिया शुरू कर दी है। प्रदेश नेतृत्व ने चुनाव परिणामों का विस्तृत विश्लेषण करने और हार के कारणों का पता लगाने के लिए दो सदस्यीय समिति का गठन किया है। समिति चुनाव से जुड़े पदाधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और वरिष्ठ नेताओं से चर्चा कर अपनी रिपोर्ट तैयार करेगी, जिसके आधार पर आगे की रणनीति तय की जाएगी।

    प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने समीक्षा समिति के गठन की घोषणा की है। समिति में प्रदेश महामंत्री गौरव रणदीवे और वरिष्ठ नेता अंबाराम कराड़ा को शामिल किया गया है। पार्टी का कहना है कि समिति उपचुनाव के दौरान संगठन की भूमिका, चुनावी प्रबंधन, कार्यकर्ताओं की सक्रियता और मतदान से जुड़े विभिन्न पहलुओं का गहन अध्ययन करेगी। इसके बाद तैयार रिपोर्ट प्रदेश नेतृत्व को सौंपी जाएगी।

    भाजपा के अनुसार समिति यह भी आकलन करेगी कि चुनाव में अपेक्षित प्रदर्शन क्यों नहीं हो सका और किन कारणों से पार्टी सीट जीतने में असफल रही। समीक्षा रिपोर्ट में संगठनात्मक सुधार, चुनावी रणनीति और भविष्य की तैयारियों से जुड़े सुझाव भी शामिल किए जा सकते हैं। माना जा रहा है कि रिपोर्ट के आधार पर पार्टी आगामी चुनावों के लिए अपनी कार्ययोजना में आवश्यक बदलाव कर सकती है।

    दतिया विधानसभा सीट पर उपचुनाव पूर्व विधायक राजेंद्र भारती की सदस्यता समाप्त होने के बाद कराया गया था। इसके बाद रिक्त हुई सीट पर 30 जुलाई को मतदान हुआ। कांग्रेस ने एक बार फिर घनश्याम सिंह को उम्मीदवार बनाया, जबकि भाजपा ने इस बार पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा की जगह आशुतोष तिवारी को चुनाव मैदान में उतारा। पार्टी को नए चेहरे से बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद थी, लेकिन परिणाम उसके पक्ष में नहीं आया।

    चुनाव प्रचार के दौरान मुख्यमंत्री मोहन यादव और वरिष्ठ भाजपा नेता नरोत्तम मिश्रा ने भी पार्टी उम्मीदवार के समर्थन में व्यापक प्रचार किया था। इसके बावजूद भाजपा सीट अपने नाम नहीं कर सकी। इस नतीजे के बाद पार्टी के भीतर चुनावी रणनीति, उम्मीदवार चयन और संगठनात्मक समन्वय को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

    राजनीतिक हलकों में सबसे अधिक चर्चा उम्मीदवार बदलने के फैसले को लेकर हो रही है। वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के राजेंद्र भारती ने नरोत्तम मिश्रा को पराजित किया था। उपचुनाव में भाजपा ने नया उम्मीदवार उतारकर चुनावी समीकरण बदलने की कोशिश की, लेकिन यह रणनीति सफल नहीं हो सकी। अब इस निर्णय को भी समीक्षा के महत्वपूर्ण बिंदुओं में शामिल माना जा रहा है।

    उपचुनाव के नतीजों के बाद बूथवार मतदान के आंकड़ों ने भी राजनीतिक चर्चा को नई दिशा दी है। नरोत्तम मिश्रा के बूथ नंबर 121 पर भी भाजपा कांग्रेस से पीछे रही। इस बूथ पर कांग्रेस को भाजपा से अधिक मत मिले, जिससे स्थानीय संगठन की सक्रियता और परंपरागत वोट बैंक को लेकर कई सवाल उठने लगे हैं। इसके बाद पार्टी के भीतर समन्वय और संभावित भीतरघात को लेकर भी चर्चाएं सामने आई हैं।

    भाजपा नेतृत्व का मानना है कि चुनावी हार की निष्पक्ष समीक्षा से भविष्य में संगठन को मजबूत बनाने और चुनावी रणनीति को अधिक प्रभावी बनाने में मदद मिलेगी। अब सभी की नजर समिति की रिपोर्ट पर है, जिससे यह स्पष्ट होगा कि दतिया उपचुनाव में हार के पीछे कौन-कौन से प्रमुख कारण रहे और पार्टी आगे किन सुधारों पर जोर देगी।

  • बांग्लादेशी घुसपैठ पर संसदीय समिति सख्त, सीमाओं पर संयुक्त निगरानी तंत्र बनाने की दी सिफारिश।

    बांग्लादेशी घुसपैठ पर संसदीय समिति सख्त, सीमाओं पर संयुक्त निगरानी तंत्र बनाने की दी सिफारिश।

    नई दिल्ली। भारत और बांग्लादेश के बीच द्विपक्षीय संबंधों और सीमा प्रबंधन को लेकर संसद की विदेश मामलों की स्थायी समिति ने एक महत्वपूर्ण समीक्षा रिपोर्ट प्रस्तुत की है। वरिष्ठ सांसद शशि थरूर की अध्यक्षता वाली इस समिति ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि पड़ोसी देश बांग्लादेश से होने वाली अवैध घुसपैठ आज भी भारत की आंतरिक सुरक्षा और जनसांख्यिकी के लिए एक अत्यंत गंभीर चिंता का विषय बनी हुई है। समिति ने इस संवेदनशील समस्या से निपटने के लिए दोनों देशों के बीच एक समर्पित ‘संयुक्त कार्य समूह’ या स्थायी द्विपक्षीय तंत्र स्थापित करने का सुझाव दिया है, ताकि सीमा पार से होने वाली गतिविधियों पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सके।

    रिपोर्ट में उजागर किया गया है कि वर्तमान समय में लगभग 2,369 संदिग्ध प्रवासियों की राष्ट्रीयता की पुष्टि का मामला बांग्लादेश सरकार के पास लंबित पड़ा हुआ है। स्थायी समिति का मानना है कि दोनों देशों के बीच एक औपचारिक और जवाबदेह प्रशासनिक ढांचा बनने से पहचान सत्यापन की यह प्रक्रिया त्वरित गति से पूरी की जा सकेगी। इसके साथ ही, समिति ने यह मानवीय और कानूनी हिदायत भी दी है कि जांच और सत्यापन की पूरी प्रक्रिया के दौरान पूरी सतर्कता बरती जाए ताकि किसी भी भारतीय नागरिक को गलती से सीमा पार न भेजा जाए और हिरासत में लिए गए व्यक्तियों के साथ मानवीय दृष्टिकोण अपनाया जाए।

    सीमा सुरक्षा के तकनीकी पहलुओं का उल्लेख करते हुए रिपोर्ट में बताया गया है कि दोनों देशों के बीच फैली 4,096 किलोमीटर लंबी कुल सीमा में से लगभग 3,231 किलोमीटर हिस्से में ही सुरक्षा बाड़ लगाई जा सकी है। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों, नदी क्षेत्रों और विवादित भूखंडों के कारण अभी भी करीब 864 किलोमीटर की सीमा बिना बाड़ के खुली हुई है, जिसका फायदा अवैध गतिविधियों के लिए उठाया जाता है। रिपोर्ट के अनुसार इस घुसपैठ का सबसे अधिक प्रतिकूल प्रभाव सीमावर्ती राज्यों जैसे पश्चिम बंगाल और असम पर पड़ रहा है, जहां सुरक्षा एजेंसियों को लगातार सतर्क रहना पड़ता है।

    सुरक्षा चिंताओं के अलावा समिति ने दोनों देशों के बीच व्यापारिक नियमों के दुरुपयोग पर भी गंभीर आपत्ति जताई है। रिपोर्ट के मुताबिक, दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार क्षेत्र (साफ्टा) के तहत मिलने वाली रियायतों का गलत फायदा उठाकर तीसरे देशों की सामग्री, विशेष रूप से चीनी कपड़ों और उत्पादों को बांग्लादेश के रास्ते भारतीय बाजारों में खपाया जा रहा है। इससे घरेलू उद्योगों और निष्पक्ष व्यापार प्रतिस्पर्धा को भारी नुकसान पहुंच रहा है। समिति ने वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय को व्यापारिक नियमों को और अधिक कड़ा करने और उच्च स्तर पर इस मुद्दे को उठाने का परामर्श दिया है।

    संसदीय समिति ने सुरक्षा और व्यापारिक कड़ाई के साथ-साथ कूटनीतिक और सांस्कृतिक संबंधों को पुनः पटरी पर लाने की आवश्यकता पर भी बल दिया है। स्थिति सामान्य होते ही वीजा सेवाओं को चरणबद्ध तरीके से सुचारू करने, वार्षिक संयुक्त साहित्य महोत्सवों के आयोजन और युवाओं के आदान-प्रदान के माध्यम से जन-सामान्य के बीच आपसी विश्वास बढ़ाने की सिफारिश की गई है। इसके अतिरिक्त, समिति ने वैश्विक पटल पर भारत की वैज्ञानिक और कूटनीतिक पहुंच बढ़ाने के लिए ‘ध्रुवीय राजदूत’ की नियुक्ति और अंटार्कटिका में अनुसंधान केंद्रों के निर्माण में तेजी लाने का सुझाव भी दिया है।

  • महाराष्ट्र में भी लागू होगा UCC…. ड्राफ्ट तैयार करने के सरकार बनाएगी कमेटी

    महाराष्ट्र में भी लागू होगा UCC…. ड्राफ्ट तैयार करने के सरकार बनाएगी कमेटी


    मुंबई।
    महाराष्ट्र (Maharashtra) में यूनिफॉर्म सिविल कोड (Uniform Civil Code- UCC) लागू करने की दिशा में राज्य सरकार एक अहम कदम उठाने जा रही है. जानकारी के मुताबिक कानून का ड्राफ्ट तैयार करने के लिए जल्द ही एक कमेटी का गठन किया जाएगा.

    अधिकारियों ने शुक्रवार को बताया कि महाराष्ट्र सरकार (Government of Maharashtra) यूनिफॉर्म सिविल कोड के लिए कानून का ड्राफ्ट तैयार करने हेतु दो हफ्ते के भीतर एक कमेटी बना सकती है. उन्होंने जानकारी दी कि कमेटी के गठन और इसके काम करने के दायरे को अभी फाइनल किया जाना बाकी है।

    जानकारी के मुताबिक एक अधिकारी ने जानकारी दी कि यूनिफॉर्म सिविल कोड के लिए कानून का ड्राफ्ट तैयार करने वाली कमेटी बनाने का प्रोसेस चल रहा है और अगले दो हफ्तों के भीतर इसका गठन कर दिया जाएगा।

    बता दें कि पिछले हफ्ते ही गृह राज्य मंत्री योगेश कदम ने विधानसभा में जानकारी दी थी कि महाराष्ट्र में यूसीसी लागू किया जाएगा और इस कानून का ड्राफ्ट तैयार करने के लिए हाई कोर्ट के एक रिटायर्ड जज की अगुवाई में कमेटी बनाई जाएगी.

    यूनिफॉर्म सिविल कोड एक संवैधानिक निर्देश है, जिसका मकसद सभी नागरिकों के लिए शादी, तलाक, विरासत और एडॉप्शन जैसे मामलों में एक समान कानून लागू करना है. कानून की नजर में सब एक समान होते हैं. शादी, तलाक, एडॉप्शन, उत्तराधिकार, विरासत लेकिन सबसे बढ़कर लैंगिक समानता वो कारण है, जिस वजह से यूनिफार्म सिविल कोड की जरूरत महसूस की जाती रही है।

    यूसीसी का मतलब है कि शादी, तलाक, बच्चा गोद लेने और संपत्ति के बंटवारे जैसे मामलों में सभी नागरिकों पर एक समान कानून लागू हो, चाहे उनका धर्म या जाति कुछ भी हो. जिस राज्य में समान नागरिक संहिता लागू होगी, वहां इन मामलों में सभी धर्मों के लोगों के लिए एक ही कानूनी व्यवस्था लागू होगी।

  • NCERT किताब विवाद सुलझा…. केन्द्र ने न्यायपालिका पर आधारित चैप्टर री-ड्राफ्ट करने के लिए गठित की कमेटी

    NCERT किताब विवाद सुलझा…. केन्द्र ने न्यायपालिका पर आधारित चैप्टर री-ड्राफ्ट करने के लिए गठित की कमेटी


    नई दिल्ली।
    केंद्र सरकार (Central Government) ने शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) को सूचित किया कि उसने एनसीईआरटी (NCERT) की पाठ्यपुस्तकों में न्यायपालिका पर आधारित चैप्टर को फिर से तैयार यानी री-ड्राफ्ट (Re-draft) करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया है। इस समिति में सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज जस्टिस इंदु मल्होत्रा, पूर्व जज जस्टिस अनिरुद्ध बोस और पूर्व अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल शामिल होंगे। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वीएम पंचोली की पीठ के समक्ष सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने केंद्र की ओर से यह जानकारी दी।

    बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को बताया, “हमने चैप्टर का मसौदा तैयार करने के लिए समिति बनाई है। वेणुगोपाल और जस्टिस इंदु मल्होत्रा समिति का हिस्सा होंगे। हमने राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी से जस्टिस अनिरुद्ध बोस से भी अनुरोध किया है और वे भी इसमें शामिल होंगे। इस आश्वासन और समिति के गठन की जानकारी के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने विवादित चैप्टर पर दर्ज किए गए अपने स्वतः संज्ञान मामले का निपटारा कर दिया।


    क्या है पूरा विवाद?

    यह विवाद कक्षा 8 की किताब ‘एक्सप्लोरिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियॉन्ड’ (वॉल्यूम 2) से जुड़ा है। इसमें ‘हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका’ नामक चैप्टर के तहत कथित तौर पर ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ पर एक हिस्सा शामिल किया गया था। इस मुद्दे को सबसे पहले 25 फरवरी को वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने अदालत के सामने उठाया था, जिस पर कोर्ट ने बताया था कि उसने पहले ही इसका स्वतः संज्ञान ले लिया है। विवाद बढ़ने पर NCERT ने एक प्रेस नोट जारी कर कहा था कि यह एक अनजाने में हुई गलती थी। उन्होंने विवादित हिस्से को किताब से वापस लेने और उचित परामर्श के बाद इसे फिर से लिखने की बात कही थी।


    सुप्रीम कोर्ट की पिछली कार्रवाइयां और नाराजगी

    किताब पर बैन: 26 फरवरी को हुई विस्तारपूर्ण सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने इस किताब के उत्पादन और वितरण पर पूरी तरह से रोक लगा दी थी। अवमानना का नोटिस: अदालत ने स्कूल शिक्षा विभाग और NCERT के निदेशक डॉ. दिनेश प्रसाद सकलानी को अवमानना अधिनियम के तहत कारण बताओ नोटिस जारी कर पूछा था कि विवादित चैप्टर को लिखने या मंजूरी देने वालों के खिलाफ उपयुक्त कार्रवाई क्यों न की जाए।

    NCERT डायरेक्टर के जवाब पर आपत्ति: पिछली सुनवाई में कोर्ट ने NCERT निदेशक के उस जवाब पर कड़ी आपत्ति जताई थी, जिसमें कहा गया था कि चैप्टर को फिर से लिख लिया गया है। कोर्ट ने इस जवाब को परेशान करने वाला बताया था क्योंकि इसमें यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि किन विशेषज्ञों ने इसे दोबारा लिखा है या किसने इसे मंजूरी दी है।

    इसके बाद अदालत ने केंद्र सरकार को एक सप्ताह के भीतर एक समिति बनाने का निर्देश दिया था, जिसमें एक सेवानिवृत्त जज, एक प्रसिद्ध शिक्षाविद और एक प्रख्यात वकील शामिल हों। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया था कि कानूनी अध्ययन की सामग्री तैयार करने के लिए भोपाल स्थित राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी को भी भरोसे में लिया जाना चाहिए।


    पुराने लेखकों से दूर रहने का निर्देश

    अदालत ने यह भी कड़ा निर्देश दिया है कि केंद्र और राज्य सरकारें प्रोफेसर मिशेल डैनिनो, सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्ना कुमार के साथ भविष्य में कोई जुड़ाव न रखें। यह निर्देश तब आया जब NCERT निदेशक ने कोर्ट को बताया था कि पिछला विवादित चैप्टर मुख्य रूप से प्रोफेसर डैनिनो द्वारा तैयार किया गया था और दिवाकर व कुमार ने इस कार्य में उनकी सहायता की थी।


    सोशल मीडिया पर भी सुप्रीम कोर्ट हुआ सख्त

    इस मामले में अदालत ने सोशल मीडिया पर गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार करने वाले कुछ तत्वों के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई का निर्देश दिया है। पीठ ने कड़े शब्दों में कहा: तथाकथित सोशल मीडिया पर कुछ तत्वों ने गैर-जिम्मेदाराना हरकतें की हैं। हम समस्याओं का डटकर सामना करने में विश्वास रखते हैं। हम भारत सरकार को निर्देश देते हैं कि वह ऐसे प्लेटफार्मों और उन लोगों की पहचान करे जो इसमें लिप्त हैं, ताकि उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सके। कानून अपना काम करेगा। भले ही वे इस देश में कहीं भी छिपे हों, हम उन्हें नहीं छोड़ेंगे।