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  • राष्ट्रमंडल खेल 2026 में भारत चौथे स्थान पर, 39 पदकों के साथ अभियान समाप्त

    राष्ट्रमंडल खेल 2026 में भारत चौथे स्थान पर, 39 पदकों के साथ अभियान समाप्त


    ग्लासगो।
    राष्ट्रमंडल खेल 2026 के सभी मुकाबलों के समापन के साथ भारत ने पदक तालिका में चौथा स्थान हासिल किया। भारतीय दल ने कुल 39 पदक जीतकर लगातार दूसरी बार राष्ट्रमंडल खेलों में चौथे स्थान पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई।

    भारत के खाते में 13 स्वर्ण, 17 रजत और 9 कांस्य पदक आए। इनमें पुरुष खिलाड़ियों ने 5 स्वर्ण, 13 रजत और 5 कांस्य सहित कुल 23 पदक, जबकि महिला खिलाड़ियों ने 8 स्वर्ण, 4 रजत और 4 कांस्य सहित 16 पदक जीते।

    पदक तालिका में ऑस्ट्रेलिया 70 स्वर्ण, 45 रजत और 56 कांस्य सहित कुल 171 पदकों के साथ शीर्ष पर रहा। इंग्लैंड 110 पदकों के साथ दूसरे और कनाडा 62 पदकों के साथ तीसरे स्थान पर रहा। भारत और स्कॉटलैंड दोनों ने 39-39 पदक जीते, लेकिन अधिक रजत पदकों के आधार पर भारत चौथे स्थान पर रहा।

    अहम बात यह रही कि इस बार राष्ट्रमंडल खेल के कार्यक्रम में भारत के मजबूत खेलों में शामिल कुछ प्रमुख स्पर्धाएं नहीं थीं। इसके बावजूद भारतीय खिलाड़ियों ने शानदार प्रदर्शन करते हुए बर्मिंघम 2022 की तरह इस बार भी चौथा स्थान हासिल किया।

    भारत के अभियान में मुक्केबाजी, टेबल टेनिस, एथलेटिक्स, भारोत्तोलन, जूडो और अन्य खेलों में खिलाड़ियों ने उल्लेखनीय प्रदर्शन किया। महिला खिलाड़ियों ने स्वर्ण पदकों की संख्या में पुरुषों से बेहतर प्रदर्शन करते हुए भारतीय दल की सफलता में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

  • राष्ट्रमंडल खेल 2026: अस्मिता डे ने जूडो में जीता स्वर्ण, भारत को दिलाया ऐतिहासिक पहला गोल्ड

    राष्ट्रमंडल खेल 2026: अस्मिता डे ने जूडो में जीता स्वर्ण, भारत को दिलाया ऐतिहासिक पहला गोल्ड


    ग्लासगो।
    भारत की युवा जूडोका अस्मिता डे ने राष्ट्रमंडल खेल 2026 में इतिहास रचते हुए महिलाओं के 48 किलोग्राम वर्ग में स्वर्ण पदक जीत लिया। त्रिपुरा की 23 वर्षीय अस्मिता ने फाइनल में कनाडा की हाइडी क्वाच को युको (2-1) से हराकर राष्ट्रमंडल खेलों में जूडो का भारत का पहला स्वर्ण पदक अपने नाम किया।

    फाइनल मुकाबले की शुरुआत बेहद संघर्षपूर्ण रही। दोनों खिलाड़ियों के बीच मैट के किनारों पर लगातार जोरदार भिड़ंत देखने को मिली। मुकाबले के दौरान कनाडाई खिलाड़ी क्वाच ने 2 मिनट 35 सेकंड पर पिन के जरिए पहला अंक हासिल कर बढ़त बना ली।

    हालांकि, अस्मिता ने शानदार वापसी करते हुए दबाव बनाए रखा। इसके बाद उन्होंने तेज़ थ्रो और पिन के जरिए बराबरी का अंक हासिल कर मुकाबले को रोमांचक बना दिया। नियमित समय तक दोनों खिलाड़ी बराबरी पर रहीं, जिसके बाद मुकाबला गोल्डन स्कोर में पहुंच गया।

    गोल्डन स्कोर में अस्मिता ने संयम और बेहतरीन तकनीक का प्रदर्शन करते हुए 4 मिनट 25 सेकंड पर शानदार पिन लगाकर निर्णायक अंक हासिल किया और स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया।

    जीत के बाद अस्मिता ने मुस्कुराते हुए दर्शकों का अभिवादन किया और अपने खास अंदाज में जश्न मनाया। इस ऐतिहासिक जीत के साथ उन्होंने राष्ट्रमंडल खेलों में जूडो में भारत को पहला स्वर्ण पदक दिलाकर अपना नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज करा दिया।

    हालांकि इसके बाद पुरुष वर्ग में हर्ष सिंह ने भी भारत को जूडो में आज लगातार दूसरा स्वर्ण पदक दिलाया। हर्ष ने ऑस्ट्रेलिया के जोशुआ कैट्ज को हराया।

  • कॉमनवेल्थ गेम्स में चमके हर्ष सिंह, पुरुष जूडो में भारत को दिलाया पहला स्वर्ण

    कॉमनवेल्थ गेम्स में चमके हर्ष सिंह, पुरुष जूडो में भारत को दिलाया पहला स्वर्ण


    नई दिल्ली।
    राष्ट्रमंडल खेल 2026 में भारतीय जूडो खिलाड़ी हर्ष सिंह ने ऐतिहासिक प्रदर्शन करते हुए पुरुषों के 60 किलोग्राम भार वर्ग में स्वर्ण पदक जीत लिया। फाइनल में उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के अनुभवी जुडोका और ओलंपियन जोशुआ कात्ज़ को पराजित कर राष्ट्रमंडल खेलों के इतिहास में पुरुष जूडो में भारत का पहला स्वर्ण पदक अपने नाम किया।

    23 वर्षीय हर्ष सिंह दिल्ली के रहने वाले हैं और अंतरराष्ट्रीय जूडो महासंघ (IJF) के सर्किट में भारत के उभरते खिलाड़ियों में गिने जाते हैं। राष्ट्रमंडल खेलों से पहले वह कई ग्रैंड स्लैम और ग्रैंड प्रिक्स प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार प्रतिस्पर्धा से मिले अनुभव का लाभ उन्हें ग्लासगो में देखने को मिला।

    41 सेकेंड में पलटा मुकाबला

    फाइनल मुकाबले में हर्ष का सामना ऑस्ट्रेलिया के जोशुआ कात्ज़ से हुआ, जिन्हें इस स्पर्धा का मजबूत दावेदार माना जा रहा था। चार मिनट तक चले मुकाबले में दोनों खिलाड़ियों के बीच कड़ी टक्कर रही और अंतिम क्षणों तक कोई निर्णायक बढ़त नहीं बन सकी।

    मैच समाप्त होने से 41 सेकेंड पहले हर्ष ने प्रतिद्वंद्वी की एक छोटी सी चूक का फायदा उठाते हुए ‘वाजा-अरी’ (Waza-ari) स्कोर किया। इसके बाद उन्होंने शेष समय तक बढ़त बरकरार रखते हुए मुकाबला अपने नाम कर लिया और स्वर्ण पदक जीत लिया।

    अनुभवी प्रतिद्वंद्वी को दी मात

    जोशुआ कात्ज़ ऑस्ट्रेलिया के अनुभवी जुडोका हैं। वह कई बार ओशिनिया चैंपियन रह चुके हैं और 2022 राष्ट्रमंडल खेलों में कांस्य पदक जीत चुके हैं। उनके परिवार का भी जूडो से गहरा संबंध रहा है और उनके पिता ऑस्ट्रेलिया की ओलंपिक जूडो टीम के राष्ट्रीय कोच रह चुके हैं।

    भारतीय जूडो के लिए ऐतिहासिक दिन

    हर्ष सिंह की इस उपलब्धि ने भारतीय जूडो के इतिहास में नया अध्याय जोड़ दिया। इससे पहले महिलाओं के 48 किलोग्राम वर्ग में अस्मिता डे ने स्वर्ण पदक जीतकर भारत को पहली सफलता दिलाई थी। इसके बाद हर्ष ने पुरुष वर्ग में स्वर्ण जीतकर एक ही दिन में भारत को जूडो में दो स्वर्ण पदक दिलाने का इतिहास रच दिया।

    कम उम्र में पहली बार राष्ट्रमंडल खेलों में उतरकर स्वर्ण पदक जीतने वाले हर्ष सिंह की यह सफलता भारतीय जूडो के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है और इससे आने वाले खिलाड़ियों को भी नई प्रेरणा मिलेगी।

  • कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत का दमदार पंच, जादुमनी ने एकतरफा मुकाबले में दर्ज की शानदार जीत

    कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत का दमदार पंच, जादुमनी ने एकतरफा मुकाबले में दर्ज की शानदार जीत


    नई दिल्ली। ग्लासगो में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारतीय बॉक्सिंग दल ने शानदार आगाज किया है। पुरुषों के 55 किलोग्राम वर्ग में भारत के युवा मुक्केबाज जादुमनी सिंह मंडेन्गबाम ने अपने पहले ही मुकाबले में दमदार प्रदर्शन करते हुए मेजबान स्कॉटलैंड के एरन कलन को 5-0 से करारी शिकस्त दी। इस प्रभावशाली जीत के साथ जादुमनी ने राउंड ऑफ 16 में जगह पक्की कर ली और पदक की ओर एक मजबूत कदम बढ़ा दिया।

    एसईसी हॉल में खेले गए इस मुकाबले में शुरुआत से ही जादुमनी पूरी तरह लय में नजर आए। उन्होंने तेज रफ्तार, सटीक पंच और मजबूत डिफेंस का शानदार प्रदर्शन करते हुए अपने प्रतिद्वंद्वी को कोई मौका नहीं दिया। पहले राउंड से लेकर आखिरी राउंड तक भारतीय मुक्केबाज का दबदबा साफ दिखाई दिया। घरेलू दर्शकों के जोरदार समर्थन के बावजूद स्कॉटलैंड के एरन कलन भारतीय खिलाड़ी की आक्रामक रणनीति के सामने बेबस नजर आए।

    मुकाबले के दौरान जादुमनी ने बेहतरीन फुटवर्क और सटीक काउंटर अटैक का प्रदर्शन किया। उनके लगातार सटीक पंचों ने विपक्षी खिलाड़ी को पूरे मुकाबले में दबाव में रखा। यही वजह रही कि पांचों जजों ने एकमत से जादुमनी को विजेता घोषित किया। सभी जजों ने प्रत्येक राउंड में भारतीय बॉक्सर के पक्ष में 30-27 का समान स्कोर दिया, जिससे उनकी एकतरफा जीत की तस्वीर साफ हो गई।

    इस शानदार जीत के बाद अब जादुमनी का अगला मुकाबला 26 जुलाई को पाकिस्तान के मुक्केबाज रहमान से होगा। दोनों देशों के खिलाड़ियों के बीच होने वाला यह मुकाबला काफी रोमांचक माना जा रहा है। यदि जादुमनी इस चुनौती को भी पार कर लेते हैं तो वह क्वार्टर फाइनल में पहुंच जाएंगे और पदक की उम्मीदें और मजबूत हो जाएंगी। भारतीय दल को उनसे इस प्रतियोगिता में शानदार प्रदर्शन की पूरी उम्मीद है।

    कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारतीय बॉक्सिंग टीम इस बार अधिक से अधिक पदक जीतने के लक्ष्य के साथ उतरी है। हालांकि इस संस्करण में बैडमिंटन, हॉकी, क्रिकेट, शूटिंग और कुश्ती जैसे कई प्रमुख खेल शामिल नहीं किए गए हैं, जिनमें भारत पारंपरिक रूप से मजबूत रहा है। ऐसे में बॉक्सिंग से भारतीय दल को बड़ी उम्मीदें हैं।

    इससे पहले भारत की स्टार मुक्केबाज और ओलंपिक कांस्य पदक विजेता लवलीना बोरगोहेन बिना मुकाबला खेले ही सेमीफाइनल में पहुंच चुकी हैं। पहले दौर में बाय मिलने के कारण उनका कांस्य पदक पहले ही सुनिश्चित हो गया है। अब वह 31 जुलाई को अपना पहला मुकाबला खेलेंगी। यदि लवलीना जीत दर्ज करती हैं तो उनका कम से कम रजत पदक पक्का हो जाएगा।

    जादुमनी की दमदार शुरुआत ने भारतीय बॉक्सिंग टीम का आत्मविश्वास बढ़ा दिया है। अब सभी की निगाहें उनके अगले मुकाबले पर टिकी हैं, जहां पाकिस्तान के खिलाफ जीत दर्ज कर वह पदक की दौड़ में खुद को और मजबूती से स्थापित करना चाहेंगे।

  • प्रकाश पादुकोण: भारतीय बैडमिंटन के पहले वैश्विक नायक, कॉमनवेल्थ में दिलाया ऐतिहासिक स्वर्ण

    प्रकाश पादुकोण: भारतीय बैडमिंटन के पहले वैश्विक नायक, कॉमनवेल्थ में दिलाया ऐतिहासिक स्वर्ण


    मध्यप्रदेश । भारत में बैडमिंटन को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने वाले सबसे बड़े नामों में Prakash Padukone का स्थान शीर्ष पर माना जाता है। उन्होंने न सिर्फ देश में इस खेल को लोकप्रिय बनाया, बल्कि भारत को पहली बार वैश्विक मंच पर स्वर्ण पदक दिलाकर इतिहास रच दिया।

    कॉमनवेल्थ में ऐतिहासिक स्वर्ण
    1978 के कॉमनवेल्थ गेम्स (एडमोंटन, कनाडा) में प्रकाश पादुकोण ने पुरुष एकल वर्ग में स्वर्ण पदक जीतकर नया इतिहास बनाया। यह भारत के लिए बैडमिंटन में पहला कॉमनवेल्थ गोल्ड था, जिसने देश को इस खेल में एक नई पहचान दी। उनकी इस उपलब्धि ने आने वाली पीढ़ियों के खिलाड़ियों के लिए रास्ता खोला और भारत को विश्व बैडमिंटन में गंभीर दावेदार के रूप में स्थापित किया।

    दुनिया के नंबर-1 खिलाड़ी बनने तक का सफर
    पादुकोण का खेल करियर लगातार उपलब्धियों से भरा रहा। 1980 में वह दुनिया के नंबर-1 बैडमिंटन खिलाड़ी बने, जो उस दौर में किसी भी भारतीय खिलाड़ी के लिए बेहद बड़ी उपलब्धि थी। उन्होंने 1980 के दशक में डेनिश ओपन, स्वीडिश ओपन और कई अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट जीतकर अपनी श्रेष्ठता साबित की। 1980 में ऑल इंग्लैंड चैंपियनशिप जीतकर वे इस प्रतिष्ठित खिताब को जीतने वाले पहले भारतीय बने।

    शुरुआती जीवन और करियर
    प्रकाश पादुकोण का जन्म 10 जून 1955 को बेंगलुरु में हुआ था। उनके पिता रमेश पादुकोण ने उन्हें बैडमिंटन की ओर प्रेरित किया। उन्होंने 1962 में अपना पहला जूनियर टूर्नामेंट खेला और बाद में राष्ट्रीय स्तर पर लगातार सफलता हासिल की। 1972 में उन्होंने जूनियर और सीनियर दोनों राष्ट्रीय खिताब जीतकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया।

    अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियां
    उनके करियर में कई बड़े पदक शामिल रहे-
    1974 एशियन गेम्स: कांस्य
    1981 वर्ल्ड कप: स्वर्ण
    1983 वर्ल्ड चैंपियनशिप: कांस्य
    1986 एशियन गेम्स: कांस्य
    इन उपलब्धियों ने उन्हें दुनिया के शीर्ष खिलाड़ियों में शामिल कर दिया।

    कोच और योगदानकर्ता के रूप में भूमिका
    1991 में संन्यास के बाद उन्होंने बैडमिंटन प्रशासन और कोचिंग में भी अहम भूमिका निभाई। उन्होंने भारतीय टीम को कोचिंग दी और युवा खिलाड़ियों को तैयार करने में योगदान दिया। Olympic Gold Quest की स्थापना में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही, जो भारतीय ओलंपिक खेलों को बढ़ावा देने के लिए काम करता है।

    सम्मान और विरासत
    भारत सरकार ने उन्हें 1972 में अर्जुन पुरस्कार और 1982 में पद्मश्री से सम्मानित किया। आज भी उनकी बनाई हुई Prakash Padukone Badminton Academy कई युवा खिलाड़ियों के लिए प्रशिक्षण का प्रमुख केंद्र है। बॉलीवुड अभिनेत्री Deepika Padukone उनकी पुत्री हैं, जिन्होंने मनोरंजन जगत में अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाई।

  • एक अलग खेल में भारत का नाम रोशन-संदीप कुमार की संघर्ष और सफलता की कहानी..

    एक अलग खेल में भारत का नाम रोशन-संदीप कुमार की संघर्ष और सफलता की कहानी..


    नई दिल्ली ।
    भारतीय एथलेटिक्स में ऐसे कई खिलाड़ी हैं जिन्होंने अपनी मेहनत और समर्पण से देश को नई पहचान दिलाई है, और उन्हीं में एक नाम संदीप कुमार का भी है। हरियाणा के एक साधारण परिवार से आने वाले संदीप ने उस खेल को चुना, जो देश में उतना लोकप्रिय नहीं था, लेकिन अपनी लगन और अनुशासन के दम पर उन्होंने इसे नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।

    रेस वॉकिंग एक बेहद तकनीकी और चुनौतीपूर्ण खेल माना जाता है, जिसमें सिर्फ गति ही नहीं बल्कि सही तकनीक बनाए रखना भी जरूरी होता है। इस खेल में लगातार अभ्यास और मानसिक मजबूती की आवश्यकता होती है। संदीप कुमार ने इस चुनौती को स्वीकार किया और वर्षों तक कड़ी मेहनत कर खुद को इस स्तर तक तैयार किया कि वह अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व कर सके।

    उनका सफर धीरे-धीरे राष्ट्रीय स्तर से अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा। लगातार बेहतर प्रदर्शन के दम पर उन्हें बड़े खेल आयोजनों में भारत का प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिला। इस दौरान उन्होंने एशियाई खेलों और अन्य अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेकर अनुभव हासिल किया और अपने खेल को और मजबूत बनाया।

    सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब उन्हें ओलंपिक जैसे बड़े मंच पर देश का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला। वहां पहुंचना ही किसी भी खिलाड़ी के लिए बड़ी उपलब्धि माना जाता है, और संदीप ने इस अवसर पर अपने खेल से देश का नाम रोशन किया। हालांकि पदक हासिल करना आसान नहीं था, लेकिन उनका प्रदर्शन उनकी क्षमता और मेहनत को दर्शाता है।

    इसके बाद उन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स जैसे बड़े मंच पर भी सफलता हासिल की और पदक जीतकर अपनी मेहनत का परिणाम साबित किया। यह उपलब्धि उनके करियर का एक अहम हिस्सा बनी और देश में रेस वॉकिंग को लेकर जागरूकता भी बढ़ी।

    संदीप कुमार की कहानी इस बात का उदाहरण है कि अगर मेहनत और अनुशासन के साथ किसी लक्ष्य पर लगातार काम किया जाए, तो कम लोकप्रिय खेलों में भी भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई जा सकती है।