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  • सीडब्ल्यूजी 2026 में भारत का दमदार पंच, लवलीना सहित 10 मुक्केबाज पहुंचे फाइनल

    सीडब्ल्यूजी 2026 में भारत का दमदार पंच, लवलीना सहित 10 मुक्केबाज पहुंचे फाइनल


    नई दिल्ली। कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारतीय मुक्केबाजों ने शानदार प्रदर्शन करते हुए एक बार फिर दुनिया को अपनी ताकत का अहसास करा दिया है। ग्लासगो में खेले गए सेमीफाइनल मुकाबलों में भारत के दस मुक्केबाजों ने अपने प्रतिद्वंद्वियों को हराकर फाइनल में जगह बनाई है। अब पूरा देश इन खिलाड़ियों से स्वर्ण पदकों की उम्मीद लगाए बैठा है। जिस आत्मविश्वास और आक्रामक अंदाज के साथ भारतीय खिलाड़ियों ने अपने मुकाबले जीते हैं उससे साफ संकेत मिल रहे हैं कि टीम इस बार केवल पदक जीतने नहीं बल्कि बॉक्सिंग में अपना दबदबा स्थापित करने उतरी है।

    महिलाओं की 75 किलोग्राम स्पर्धा में ओलंपिक पदक विजेता लवलीना बोरगोहेन ने एक बार फिर अपने अनुभव और तकनीक का शानदार प्रदर्शन किया। उन्होंने तुवालू की प्रतिद्वंद्वी को एकतरफा मुकाबले में 5-0 से हराते हुए फाइनल में प्रवेश किया। मुकाबले के पहले राउंड से ही लवलीना ने अपने लंबे रीच बेहतरीन फुटवर्क और सटीक पंचों के दम पर विरोधी पर पूरी तरह नियंत्रण बनाए रखा। उनकी जीत ने भारत की स्वर्ण पदक की उम्मीदों को और मजबूत कर दिया।

    विश्व चैंपियन जैस्मिन लेंबोरिया ने भी शानदार प्रदर्शन करते हुए महिलाओं की 57 किलोग्राम स्पर्धा में अपनी प्रतिद्वंद्वी को लगातार दबाव में रखा। मुकाबले के दौरान विरोधी खिलाड़ी को कई बार स्टैंडिंग काउंट मिला जिसके बाद रेफरी ने मुकाबला रोकते हुए जैस्मिन को विजेता घोषित कर दिया। उनकी दमदार जीत ने भारतीय टीम का मनोबल और ऊंचा कर दिया।

    महिलाओं की 70 किलोग्राम स्पर्धा में अरुंधति चौधरी ने दिन का सबसे बड़ा उलटफेर करते हुए गत चैंपियन को हराकर फाइनल में जगह बनाई। उन्होंने शुरुआत से ही आक्रामक खेल दिखाया और अपने शानदार पंचों से विरोधी को संभलने का मौका नहीं दिया। इस जीत ने साबित कर दिया कि भारतीय महिला मुक्केबाज अब दुनिया की किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।

    प्रीति पवार साक्षी और प्रिया घणघस ने भी अपने मुकाबलों में शानदार प्रदर्शन करते हुए फाइनल का टिकट पक्का किया। इन तीनों खिलाड़ियों ने एकतरफा जीत दर्ज कर यह दिखाया कि भारतीय महिला बॉक्सिंग लगातार नई ऊंचाइयों को छू रही है और भविष्य में भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का नाम रोशन करती रहेगी।

    पुरुष वर्ग में भी भारतीय खिलाड़ियों ने शानदार प्रदर्शन किया। जादुमणि सिंह सचिन सिवाच अंकुश पंघाल और नरेंद्र बरवाल ने अपने अपने मुकाबले जीतकर फाइनल में जगह बनाई। इन सभी खिलाड़ियों ने तकनीक आत्मविश्वास और आक्रामक खेल का बेहतरीन प्रदर्शन किया। खासकर सुपर हैवीवेट वर्ग में नरेंद्र बरवाल की जीत ने दर्शकों को बेहद प्रभावित किया और भारत के लिए एक और संभावित स्वर्ण पदक की उम्मीद जगा दी।

    भारतीय मुक्केबाजों का यह प्रदर्शन केवल पदकों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं है बल्कि यह देश में बॉक्सिंग के लगातार मजबूत होते स्तर का भी प्रमाण है। पिछले कुछ वर्षों में खिलाड़ियों ने विश्व स्तर पर लगातार शानदार प्रदर्शन किया है और अब कॉमनवेल्थ गेम्स में भी उनका दबदबा साफ दिखाई दे रहा है। यदि फाइनल में भी यही लय बरकरार रही तो भारत के खाते में कई स्वर्ण पदक आ सकते हैं और यह अभियान भारतीय खेल इतिहास के सबसे यादगार अभियानों में शामिल हो सकता है।

  • नीरज चोपड़ा का सिल्वर, यशवीर सिंह का ऐतिहासिक ब्रॉन्ज; सीडब्ल्यूजी 2026 में भारत की पदकों की झड़ी

    नीरज चोपड़ा का सिल्वर, यशवीर सिंह का ऐतिहासिक ब्रॉन्ज; सीडब्ल्यूजी 2026 में भारत की पदकों की झड़ी


    नई दिल्ली। कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारतीय एथलेटिक्स ने एक बार फिर अपनी ताकत का शानदार प्रदर्शन किया। मेंस जैवलिन थ्रो स्पर्धा में भारत के दो खिलाड़ियों ने एक साथ पोडियम पर जगह बनाकर देश का गौरव बढ़ाया। ओलंपिक पदक विजेता नीरज चोपड़ा ने 85.83 मीटर के शानदार थ्रो के साथ रजत पदक अपने नाम किया जबकि युवा खिलाड़ी यशवीर सिंह ने अंतिम प्रयास में 85.41 मीटर का व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए कांस्य पदक जीत लिया। एक ही स्पर्धा में दो भारतीय खिलाड़ियों का पदक जीतना भारतीय एथलेटिक्स के लगातार मजबूत होते प्रदर्शन का बड़ा संकेत माना जा रहा है।

    प्रतियोगिता की शुरुआत नीरज चोपड़ा ने 80.97 मीटर के थ्रो से की लेकिन दूसरे प्रयास में उन्होंने 85.83 मीटर की दूरी तय कर मुकाबले में मजबूत दावेदारी पेश कर दी। इसके बाद भी उन्होंने लगातार स्थिर प्रदर्शन करते हुए 81.29 मीटर और 80.73 मीटर के थ्रो किए। हालांकि श्रीलंका के रुमेश थरंगा पथिराज ने 89.75 मीटर का शानदार थ्रो कर स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया और नीरज को रजत पदक से संतोष करना पड़ा। इसके बावजूद नीरज का यह प्रदर्शन उनके मौजूदा सत्र का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन रहा जिसने आगामी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के लिए उनके आत्मविश्वास को नई मजबूती दी।

    दूसरी ओर यशवीर सिंह ने शानदार संघर्ष का परिचय दिया। शुरुआती प्रयासों में वह पदक की दौड़ से कुछ पीछे दिखाई दे रहे थे लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। दूसरे प्रयास में 78.55 मीटर और तीसरे प्रयास में 81.33 मीटर का थ्रो करने के बाद उन्होंने अंतिम प्रयास में 85.41 मीटर की दूरी तय कर मुकाबले का रुख बदल दिया। यह उनके करियर का व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन भी रहा और इसी के दम पर उन्होंने कांस्य पदक जीतकर भारत को दोहरी खुशी दी। यशवीर का यह प्रदर्शन भारतीय जैवलिन थ्रो की नई पीढ़ी की क्षमता को भी साबित करता है।

    भारत के एक अन्य खिलाड़ी रोहित यादव भी फाइनल में उतरे और उन्होंने 81.56 मीटर का सर्वश्रेष्ठ थ्रो करते हुए सातवां स्थान हासिल किया। हालांकि वह पदक नहीं जीत सके लेकिन उनका प्रदर्शन भी संतोषजनक माना गया।

    इन दो पदकों के साथ भारत का कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में कुल पदकों का आंकड़ा 23 तक पहुंच गया है। देश के खाते में अब 5 स्वर्ण 12 रजत और 6 कांस्य पदक दर्ज हो चुके हैं। एथलेटिक्स और पैरा एथलेटिक्स में भारत ने अब तक 11 पदक जीत लिए हैं जबकि वेटलिफ्टिंग में 8 पदक जूडो में 3 पदक और पैरा पावरलिफ्टिंग में 1 कांस्य पदक हासिल हुआ है।

    पदक तालिका में भारत फिलहाल दसवें स्थान पर बना हुआ है जबकि ऑस्ट्रेलिया शीर्ष पर कायम है। इंग्लैंड दूसरे और कनाडा तीसरे स्थान पर है। भारतीय खिलाड़ियों का लगातार बेहतर प्रदर्शन यह संकेत दे रहा है कि आने वाले मुकाबलों में पदकों की संख्या और बढ़ सकती है। नीरज चोपड़ा और यशवीर सिंह की यह उपलब्धि न केवल भारतीय खेल इतिहास में एक और सुनहरा अध्याय जोड़ती है बल्कि युवा खिलाड़ियों को भी बड़े मंच पर बेहतर प्रदर्शन करने की प्रेरणा देती है।

  • कॉमनवेल्थ गेम्स में जूडो में भारत का कमाल, राष्ट्रपति ने स्वर्ण विजेताओं अस्मिता डे और हर्ष सिंह को सराहा

    कॉमनवेल्थ गेम्स में जूडो में भारत का कमाल, राष्ट्रपति ने स्वर्ण विजेताओं अस्मिता डे और हर्ष सिंह को सराहा


    नई दिल्ली। ग्लासगो में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत के खिलाड़ियों ने शानदार प्रदर्शन करते हुए जूडो में नया इतिहास रच दिया है। भारतीय खिलाड़ियों की इस उपलब्धि पर पूरे देश में खुशी की लहर है। महिलाओं की 48 किलोग्राम स्पर्धा में अस्मिता डे और पुरुषों की 60 किलोग्राम स्पर्धा में हर्ष सिंह ने स्वर्ण पदक जीतकर भारत का नाम रोशन किया। इन दोनों खिलाड़ियों की ऐतिहासिक सफलता पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने उन्हें बधाई देते हुए कहा कि उनकी मेहनत समर्पण और उत्कृष्ट प्रदर्शन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगा।

    राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने अपने संदेश में कहा कि अस्मिता डे ने कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला जूडो खिलाड़ी बनकर इतिहास रचा है। उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि केवल एक खिलाड़ी की जीत नहीं बल्कि पूरे देश के खेल जगत के लिए गर्व का विषय है। राष्ट्रपति ने विश्वास जताया कि अस्मिता आगे भी इसी तरह शानदार प्रदर्शन करती रहेंगी और भारत का नाम दुनिया भर में ऊंचा करेंगी।

    अस्मिता डे ने महिलाओं की 48 किलोग्राम जूडो स्पर्धा के फाइनल मुकाबले में कनाडा की हेइडी क्वैच को हराकर स्वर्ण पदक अपने नाम किया। यह जीत इसलिए भी विशेष रही क्योंकि पहली बार किसी भारतीय महिला जूडो खिलाड़ी ने कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल हासिल किया है। उनकी तकनीक आत्मविश्वास और संयम ने पूरे मुकाबले में दर्शकों का दिल जीत लिया।

    अस्मिता की ऐतिहासिक जीत के कुछ ही समय बाद हर्ष सिंह ने भी शानदार प्रदर्शन करते हुए पुरुषों की 60 किलोग्राम स्पर्धा के फाइनल में ऑस्ट्रेलिया के जोशुआ कैट्ज को हराकर स्वर्ण पदक जीत लिया। इसके साथ ही हर्ष सिंह कॉमनवेल्थ गेम्स के इतिहास में जूडो में स्वर्ण पदक जीतने वाले पहले भारतीय पुरुष खिलाड़ी बन गए। उनकी इस उपलब्धि ने भारतीय जूडो को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाई है।

    राष्ट्रपति मुर्मु ने हर्ष सिंह को भी बधाई देते हुए कहा कि उनका धैर्य अनुशासन और खेल कौशल भारत के युवाओं के लिए प्रेरणादायक है। उन्होंने आशा जताई कि हर्ष भविष्य में भी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में देश के लिए ऐसे ही गौरवशाली प्रदर्शन करते रहेंगे।

    भारत के लिए जूडो में यह दिन इसलिए भी यादगार रहा क्योंकि यामिनी मौर्य ने महिलाओं की 57 किलोग्राम स्पर्धा में रजत पदक जीतकर देश की पदक संख्या में महत्वपूर्ण योगदान दिया। फाइनल मुकाबले में उन्हें इंग्लैंड की एसेलिया टोपराक के खिलाफ हार का सामना करना पड़ा लेकिन उनका प्रदर्शन पूरे टूर्नामेंट में सराहनीय रहा।

    जूडो में दो स्वर्ण और एक रजत पदक भारत के लिए इस बात का संकेत है कि देश अब इस खेल में भी लगातार मजबूत होता जा रहा है। खिलाड़ियों की मेहनत आधुनिक प्रशिक्षण और बेहतर खेल सुविधाओं का सकारात्मक परिणाम अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर दिखाई देने लगा है। खेल विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इसी तरह खिलाड़ियों को अवसर और संसाधन मिलते रहे तो आने वाले वर्षों में भारत जूडो सहित कई अन्य खेलों में भी विश्व स्तर पर बड़ी ताकत बन सकता है।

    कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारतीय खिलाड़ियों का यह प्रदर्शन देश के खेल इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ता है। अस्मिता डे हर्ष सिंह और यामिनी मौर्य ने यह साबित कर दिया कि समर्पण कठिन परिश्रम और आत्मविश्वास के बल पर कोई भी लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। उनकी सफलता पूरे देश के युवा खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा बनकर लंबे समय तक याद की जाएगी।

  • कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत के सितारों का कमाल, राष्ट्रपति से लेकर रक्षा मंत्री तक ने दी बधाई, कहा- आपने रचा नया इतिहास

    कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत के सितारों का कमाल, राष्ट्रपति से लेकर रक्षा मंत्री तक ने दी बधाई, कहा- आपने रचा नया इतिहास


    नई दिल्ली।  कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारतीय खिलाड़ियों का शानदार प्रदर्शन लगातार देश का गौरव बढ़ा रहा है। सातवें दिन भारत के एथलीटों ने एक बार फिर अपनी प्रतिभा और दमदार प्रदर्शन से दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा। पुरुषों की पैरा 100 मीटर टी47 स्पर्धा में दिलीप महादु गावित ने स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया जबकि मोहम्मद बासिल ने रजत पदक अपने नाम किया। वहीं पुरुषों की लंबी कूद स्पर्धा में मुरली श्रीशंकर ने शानदार प्रदर्शन करते हुए लगातार दूसरे कॉमनवेल्थ गेम्स में रजत पदक जीतकर अपनी निरंतरता साबित की। इन ऐतिहासिक उपलब्धियों पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु सहित देश के कई वरिष्ठ नेताओं ने खिलाड़ियों को बधाई दी और उनके प्रदर्शन को भारतीय खेलों के लिए प्रेरणादायक बताया।

    राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर दिलीप महादु गावित और मोहम्मद बासिल को बधाई देते हुए कहा कि भारतीय पैरा एथलेटिक्स ने कॉमनवेल्थ गेम्स में एक नया और यादगार अध्याय लिखा है। उन्होंने कहा कि दिलीप का स्वर्ण और बासिल का रजत पदक भारतीय पैरा एथलेटिक्स के लिए बड़ी उपलब्धि है। राष्ट्रपति ने दोनों खिलाड़ियों के दृढ़ संकल्प और उत्कृष्ट प्रदर्शन की सराहना करते हुए विश्वास जताया कि वे भविष्य में भी देश का नाम रोशन करते रहेंगे और नई पीढ़ी के खिलाड़ियों को प्रेरित करेंगे।

    राष्ट्रपति ने मुरली श्रीशंकर की भी जमकर प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि लगातार दूसरे कॉमनवेल्थ गेम्स में रजत पदक जीतना असाधारण उपलब्धि है। यह उनकी मेहनत निरंतरता और खेल के प्रति समर्पण का प्रमाण है। उन्होंने श्रीशंकर के उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए कहा कि पूरा देश उनकी सफलता पर गर्व महसूस कर रहा है।

    केंद्रीय खेल मंत्री मनसुख मांडविया ने भी तीनों खिलाड़ियों की उपलब्धियों को ऐतिहासिक बताया। उन्होंने कहा कि पुरुष पैरा 100 मीटर टी47 स्पर्धा में भारत का वन टू फिनिश भारतीय खेल इतिहास का गर्व का क्षण है। उन्होंने विशेष रूप से दिलीप गावित की सराहना करते हुए कहा कि वे कॉमनवेल्थ गेम्स में एथलेटिक्स का स्वर्ण जीतने वाले पहले भारतीय पुरुष पैरा एथलीट बन गए हैं। यह उपलब्धि भारतीय पैरा खेलों के लिए मील का पत्थर है। वहीं उन्होंने मुरली श्रीशंकर की 8.09 मीटर की शानदार छलांग की भी प्रशंसा करते हुए इसे भारतीय एथलेटिक्स के लिए गौरवपूर्ण पल बताया।

    केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी मुरली श्रीशंकर को बधाई देते हुए कहा कि लगातार दो कॉमनवेल्थ गेम्स में रजत पदक जीतना उनकी अद्भुत निरंतरता और मानसिक मजबूती का प्रमाण है। उन्होंने कहा कि गंभीर घुटने की चोट से उबरकर इतनी शानदार वापसी करना हर खिलाड़ी के लिए प्रेरणा का विषय है। उनकी सफलता देशभर के युवा खिलाड़ियों के लिए एक मिसाल है।

    दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने भी दिलीप महादु गावित और मोहम्मद बासिल को बधाई देते हुए कहा कि दोनों खिलाड़ियों ने भारत को ऐतिहासिक वन टू फिनिश दिलाकर देश का गौरव बढ़ाया है। उन्होंने कहा कि दोनों एथलीटों की यह उपलब्धि भारतीय पैरा एथलेटिक्स के स्वर्णिम भविष्य की झलक है और आने वाले वर्षों में उनसे और भी बड़ी सफलताओं की उम्मीद है।

    कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारतीय खिलाड़ियों के इस शानदार प्रदर्शन ने यह साबित कर दिया है कि देश के एथलीट अब वैश्विक मंच पर लगातार नई ऊंचाइयों को छू रहे हैं। इन खिलाड़ियों की मेहनत और उपलब्धियां न केवल भारत के लिए गर्व का विषय हैं बल्कि आने वाली पीढ़ियों को बड़े सपने देखने और उन्हें साकार करने की प्रेरणा भी दे रही हैं।

  • कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में लंबी कूद में चमके मुरली श्रीशंकर 8.09 मीटर की छलांग लगाकर भारत को दिलाया सिल्वर

    कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में लंबी कूद में चमके मुरली श्रीशंकर 8.09 मीटर की छलांग लगाकर भारत को दिलाया सिल्वर


    नई दिल्ली। कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारतीय एथलेटिक्स का शानदार प्रदर्शन लगातार जारी है। भारत के स्टार लॉन्ग जंपर मुरली श्रीशंकर ने पुरुषों की लंबी कूद स्पर्धा में बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए देश को सिल्वर मेडल दिलाया। ग्लासगो में आयोजित फाइनल मुकाबले में श्रीशंकर ने 8.09 मीटर की शानदार छलांग लगाकर दूसरा स्थान हासिल किया और एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का गौरव बढ़ाया।

    केरल के पलक्कड़ के रहने वाले 27 वर्षीय श्रीशंकर ने प्रतियोगिता की शुरुआत 8.03 मीटर की छलांग से की। इसके बाद दूसरे प्रयास में उन्होंने 8.09 मीटर की दूरी तय की जो उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन साबित हुआ। इसके बाद कुछ प्रयास फाउल रहे लेकिन उन्होंने आत्मविश्वास बनाए रखा और अंतिम दो प्रयासों में 7.94 मीटर तथा 7.97 मीटर की छलांग लगाकर अपना अभियान समाप्त किया। पूरे मुकाबले के दौरान वह पदक की दौड़ में मजबूती से बने रहे।

    यह उपलब्धि श्रीशंकर के करियर की एक और बड़ी सफलता है। इससे पहले उन्होंने 2022 के बर्मिंघम कॉमनवेल्थ गेम्स में भी सिल्वर मेडल जीतकर इतिहास रचा था। वह कॉमनवेल्थ गेम्स में पुरुषों की लंबी कूद में पदक जीतने वाले पहले भारतीय एथलीट बने थे। अब ग्लासगो में भी उन्होंने लगातार दूसरी बार सिल्वर जीतकर अपनी प्रतिभा और निरंतरता को साबित कर दिया है।

    इस मुकाबले में जमैका के विश्व चैंपियन ताजे गेल ने 8.15 मीटर की छलांग लगाकर गोल्ड मेडल अपने नाम किया जबकि स्कॉटलैंड के स्टीफन मैकेंजी ने 8.08 मीटर की छलांग के साथ ब्रॉन्ज मेडल हासिल किया। मुकाबला बेहद रोमांचक रहा क्योंकि चार खिलाड़ियों ने आठ मीटर से अधिक दूरी तय की लेकिन श्रीशंकर का प्रदर्शन उन्हें दूसरे स्थान तक पहुंचाने में सफल रहा।

    भारत के लिए इस स्पर्धा में एक और एथलीट लोकेश सत्यनाथन भी उतरे थे। उन्होंने 7.97 मीटर की सर्वश्रेष्ठ छलांग लगाकर पांचवां स्थान हासिल किया। हालांकि वह पदक से चूक गए लेकिन उनका प्रदर्शन भी सराहनीय रहा और भविष्य के लिए सकारात्मक संकेत छोड़ गया।

    श्रीशंकर के इस सिल्वर मेडल के साथ भारत के कुल पदकों की संख्या और बढ़ गई। एथलेटिक्स और पैरा एथलेटिक्स दोनों में भारतीय खिलाड़ियों का प्रदर्शन लगातार बेहतर होता जा रहा है। इससे यह साफ संकेत मिलता है कि भारतीय खिलाड़ी अब विश्व स्तर की प्रतियोगिताओं में हर इवेंट में मजबूत चुनौती पेश कर रहे हैं।

    कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारतीय दल का आत्मविश्वास लगातार बढ़ रहा है। वेटलिफ्टिंग पैरा एथलेटिक्स और अब लंबी कूद जैसे इवेंट में मिले पदकों ने देश की उम्मीदों को और मजबूत किया है। श्रीशंकर की यह सफलता आने वाले युवा खिलाड़ियों के लिए भी प्रेरणा बनेगी और भारतीय एथलेटिक्स को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

  • ग्लासगो में भारत की रफ्तार का जलवा 100 मीटर टी47 में गोल्ड और सिल्वर जीतकर पैरा एथलीट्स ने बढ़ाया देश का मान

    ग्लासगो में भारत की रफ्तार का जलवा 100 मीटर टी47 में गोल्ड और सिल्वर जीतकर पैरा एथलीट्स ने बढ़ाया देश का मान


    नई दिल्ली। कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत के पैरा एथलीटों ने ऐसा प्रदर्शन किया जिसने पूरे देश को गर्व से भर दिया। ग्लासगो में आयोजित पुरुषों की 100 मीटर टी47 फाइनल स्पर्धा में भारतीय खिलाड़ियों ने गोल्ड और सिल्वर दोनों पदकों पर कब्जा जमाकर इतिहास रच दिया। यह उपलब्धि केवल पदक जीतने तक सीमित नहीं रही बल्कि भारतीय पैरा एथलेटिक्स के बढ़ते स्तर और खिलाड़ियों की मेहनत का भी शानदार प्रमाण बन गई।

    भारत के दिलीप महादु गावित ने 10.71 सेकंड का समय निकालते हुए न केवल स्वर्ण पदक अपने नाम किया बल्कि नया गेम्स रिकॉर्ड भी कायम कर दिया। यह उनके करियर का इस सीजन का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन भी रहा। वहीं दूसरे भारतीय धावक मोहम्मद बासिल मोर्सिंगनाकथ ने 10.83 सेकंड का समय निकालकर रजत पदक अपने नाम किया और भारत को इस स्पर्धा में वन टू फिनिश दिलाई। इंग्लैंड के केविन सैंटोस 10.85 सेकंड के साथ तीसरे स्थान पर रहे और उन्हें कांस्य पदक मिला।

    दिलीप गावित की यह जीत कई मायनों में ऐतिहासिक बन गई। वह कॉमनवेल्थ गेम्स के इतिहास में पैरा एथलेटिक्स में स्वर्ण पदक जीतने वाले पहले भारतीय पुरुष खिलाड़ी बन गए हैं। इससे पहले महिला शॉट पुट एफ57 वर्ग में शर्मिला ने भारत के लिए स्वर्ण पदक जीता था। अब दिलीप का नाम भी भारतीय पैरा खेलों के स्वर्णिम इतिहास में दर्ज हो गया है।

    इस शानदार प्रदर्शन के साथ कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत का तीसरा स्वर्ण पदक भी आया। इससे पहले मीराबाई चानू और शर्मिला स्वर्ण जीत चुकी थीं। दिलीप और बासिल की सफलता के बाद भारत के कुल पदकों की संख्या बढ़कर 15 हो गई है जिसमें 3 गोल्ड 9 सिल्वर और 3 ब्रॉन्ज पदक शामिल हैं। इससे पदक तालिका में भारत की स्थिति भी और मजबूत हुई है।

    महाराष्ट्र के नासिक के पास स्थित तोरण डोंगरी गांव से आने वाले दिलीप गावित लंबे समय से भारतीय पैरा एथलेटिक्स का बड़ा नाम रहे हैं। उन्होंने एशियन पैरा गेम्स 2022 में 400 मीटर टी47 स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतकर भारत के लिए ऐतिहासिक 100वां पदक दिलाया था। इसके अलावा पेरिस पैरालंपिक 2024 के फाइनल में पहुंचकर भी उन्होंने अपनी प्रतिभा का परिचय दिया था। अब कॉमनवेल्थ गेम्स में गेम्स रिकॉर्ड के साथ स्वर्ण जीतकर उन्होंने अपने करियर में एक और स्वर्णिम अध्याय जोड़ दिया है।

    वहीं केरल के मलप्पुरम जिले के वेलियानकोड के रहने वाले मोहम्मद बासिल मोर्सिंगनाकथ भी लगातार मेहनत और अनुशासित प्रशिक्षण के दम पर भारतीय पैरा स्प्रिंटिंग में नई पहचान बना रहे हैं। तिरुवनंतपुरम स्थित एलएनसीपीई साई केंद्र में कोच श्रीनिवासन के मार्गदर्शन में प्रशिक्षण लेने वाले बासिल ने इस प्रतियोगिता में रजत पदक जीतकर साबित कर दिया कि भारत के पास विश्व स्तर पर चुनौती देने वाले प्रतिभाशाली खिलाड़ी मौजूद हैं।

    कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारतीय पैरा खिलाड़ियों का यह प्रदर्शन आने वाले अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों के लिए भी बेहद उत्साहजनक माना जा रहा है। दिलीप और बासिल की सफलता ने यह संदेश दिया है कि भारतीय पैरा एथलीट अब केवल भागीदारी नहीं बल्कि स्वर्णिम इतिहास रचने के इरादे से मैदान में उतर रहे हैं। उनकी उपलब्धि देश के लाखों युवा खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगी।

  • ई रिक्शा चलाने वाले बिहार के लाल ने रचा इतिहास कॉमनवेल्थ गेम्स में झंडू कुमार ने दिलाया भारत को पहला मेडल

    ई रिक्शा चलाने वाले बिहार के लाल ने रचा इतिहास कॉमनवेल्थ गेम्स में झंडू कुमार ने दिलाया भारत को पहला मेडल


    नई दिल्ली। कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत ने अपने अभियान की शानदार शुरुआत करते हुए पहला पदक जीत लिया है। यह ऐतिहासिक उपलब्धि बिहार के पैरा पावरलिफ्टर झंडू कुमार ने हासिल की जिन्होंने पुरुषों की हेवीवेट स्पर्धा में ब्रॉन्ज मेडल जीतकर पूरे देश को गर्व का अवसर दिया। ग्लासगो में आयोजित इस मुकाबले में झंडू कुमार ने अपने दमदार प्रदर्शन से साबित कर दिया कि कठिन परिस्थितियां कभी भी मजबूत इरादों को नहीं रोक सकतीं। उनका यह पदक केवल भारत के लिए पहला मेडल नहीं बल्कि संघर्ष और मेहनत की जीत का प्रतीक भी बन गया।

    झंडू कुमार की सफलता इसलिए भी खास मानी जा रही है क्योंकि उनका जीवन बेहद कठिन परिस्थितियों में बीता है। कभी ई रिक्शा चलाकर परिवार की जिम्मेदारियां निभाने वाले झंडू के पिता सड़क किनारे सब्जियां बेचकर घर चलाते थे। सीमित संसाधनों और आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने अपने सपनों को कभी मरने नहीं दिया। लगातार अभ्यास और आत्मविश्वास के दम पर उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का तिरंगा ऊंचा कर दिखाया।

    29 वर्षीय झंडू कुमार ने प्रतियोगिता की शुरुआत पूरे आत्मविश्वास के साथ की। दूसरे प्रयास में उन्होंने 190 किलोग्राम वजन सफलतापूर्वक उठाया और खुद को पदक की दौड़ में मजबूत स्थिति में पहुंचा दिया। यह वजन उनके व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन से थोड़ा कम जरूर था लेकिन प्रतियोगिता के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ। इसके बाद उन्होंने अंतिम प्रयास में 196 किलोग्राम वजन उठाकर बड़ा रिकॉर्ड बनाने की कोशिश की लेकिन मामूली अंतर से सफल नहीं हो सके। हालांकि उनका पहले का प्रदर्शन उन्हें पदक दिलाने के लिए पर्याप्त साबित हुआ।

    मुकाबले में आखिरी क्षण तक रोमांच बना रहा। नाइजीरिया के रिलुवान इदरीस ने अंतिम प्रयास में 212 किलोग्राम वजन उठाने की कोशिश की लेकिन वह इसमें असफल रहे। इसी के साथ झंडू कुमार का ब्रॉन्ज मेडल पूरी तरह पक्का हो गया। इस रोमांचक नतीजे के बाद भारतीय दल और दर्शकों में खुशी की लहर दौड़ गई।

    प्रतियोगिता में नाइजीरिया के रिलुवान इदरीस ने 208 किलोग्राम की सफल लिफ्ट के साथ स्वर्ण पदक अपने नाम किया जबकि इंग्लैंड के मैथ्यू हार्डिंग ने 199 किलोग्राम वजन उठाकर रजत पदक हासिल किया। झंडू कुमार ने 190 किलोग्राम की सफल लिफ्ट और 130.9 अंक के साथ तीसरा स्थान प्राप्त करते हुए भारत की झोली में पहला पदक डाल दिया।

    इस उपलब्धि का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि दिन की शुरुआत भारत के लिए निराशाजनक रही थी। पुरुषों की लाइटवेट स्पर्धा में भारतीय खिलाड़ी पदक से चूक गया था लेकिन झंडू कुमार ने शानदार प्रदर्शन कर पूरे भारतीय दल का मनोबल बढ़ा दिया। उनकी जीत ने यह संदेश दिया कि भारतीय खिलाड़ी हर चुनौती का सामना करने के लिए तैयार हैं।

    झंडू कुमार की कहानी लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा है। उन्होंने यह साबित किया कि सफलता पाने के लिए महंगे संसाधनों से ज्यादा जरूरी मजबूत इरादे और लगातार मेहनत होती है। बिहार के एक साधारण परिवार से निकलकर कॉमनवेल्थ गेम्स के मंच पर देश के लिए पदक जीतना उनके संघर्ष और समर्पण का सबसे बड़ा प्रमाण है। अब पूरे देश को उम्मीद है कि इस पहले पदक के बाद भारतीय खिलाड़ी आने वाले मुकाबलों में भी शानदार प्रदर्शन करते हुए पदकों की संख्या लगातार बढ़ाएंगे।