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  • भारत के लिए राहतभरा कदम, अमेरिका ने चार भारतीय कंपनियों को प्रतिबंध सूची से हटाया, व्यापारिक गतिविधियों को मिलेगी नई गति

    भारत के लिए राहतभरा कदम, अमेरिका ने चार भारतीय कंपनियों को प्रतिबंध सूची से हटाया, व्यापारिक गतिविधियों को मिलेगी नई गति

    नई दिल्ली । भारत और अमेरिका के आर्थिक एवं रणनीतिक संबंधों के बीच एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है। अमेरिका ने चार भारतीय कंपनियों को अपनी प्रतिबंध सूची से हटा दिया है। इन कंपनियों पर पहले रूस से जुड़े सैन्य-औद्योगिक नेटवर्क को उन्नत तकनीक और उपकरणों की आपूर्ति करने के आरोप लगाए गए थे। अब प्रतिबंध हटने के बाद इन कंपनियों के लिए अंतरराष्ट्रीय कारोबारी गतिविधियों को सामान्य रूप से आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हो गया है।

    प्रतिबंध सूची से हटाई गई कंपनियों में हैदराबाद की आरआरजी इंजीनियरिंग टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड और लोकेश मशीन्स लिमिटेड, अहमदाबाद की गैलेक्सी बियरिंग्स तथा नई दिल्ली की शौर्य एयरोनॉटिक्स प्राइवेट लिमिटेड शामिल हैं। इन सभी कंपनियों के नाम अब अमेरिकी प्रतिबंधित संस्थाओं की सूची से हटा दिए गए हैं, जिससे उनके अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वित्तीय लेनदेन पर लगी बाधाएं समाप्त हो गई हैं।

    इन कंपनियों पर पहले विभिन्न प्रकार के औद्योगिक उपकरण, मशीन टूल्स, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक्स, रोलर बियरिंग्स तथा अन्य दोहरे उपयोग वाली तकनीकों के निर्यात से जुड़े आरोप लगाए गए थे। अमेरिकी अधिकारियों का मानना था कि इन उत्पादों का उपयोग रूस के सैन्य-औद्योगिक ढांचे में किया जा सकता है। इन्हीं आरोपों के आधार पर वर्ष 2024 में इनके खिलाफ प्रतिबंधात्मक कार्रवाई की गई थी।

    प्रतिबंध लगने के बाद संबंधित कंपनियों के लिए कई अंतरराष्ट्रीय वित्तीय और कारोबारी लेनदेन प्रभावित हुए थे। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में काम करने वाली कंपनियों के लिए ऐसी कार्रवाई का सीधा असर निर्यात, बैंकिंग सेवाओं और विदेशी साझेदारियों पर पड़ता है। अब प्रतिबंध हटने से इन कंपनियों को वैश्विक बाजार में फिर से सामान्य कारोबारी अवसर मिलने की संभावना बढ़ गई है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय भारत और अमेरिका के बीच बढ़ते आर्थिक सहयोग और विश्वास का संकेत भी माना जा सकता है। दोनों देश रक्षा, प्रौद्योगिकी, विनिर्माण और व्यापार सहित कई क्षेत्रों में लगातार सहयोग बढ़ा रहे हैं। ऐसे में प्रतिबंध हटने से उद्योग जगत को सकारात्मक संदेश मिलने की उम्मीद है।

    हालांकि अमेरिकी प्रशासन ने इस फैसले के साथ यह स्पष्ट किया है कि निर्यात नियंत्रण और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से जुड़े नियमों का पालन सभी कंपनियों के लिए अनिवार्य रहेगा। वैश्विक व्यापार में संवेदनशील तकनीकों और दोहरे उपयोग वाले उपकरणों के निर्यात पर विभिन्न देशों की निगरानी पहले की तरह जारी रहेगी।

    उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम भारतीय कंपनियों के लिए राहत लेकर आया है और भविष्य में दोनों देशों के बीच औद्योगिक सहयोग, निवेश और उच्च प्रौद्योगिकी क्षेत्र में साझेदारी को भी नई गति मिल सकती है। साथ ही यह निर्णय उन भारतीय निर्यातकों के लिए भी सकारात्मक संकेत माना जा रहा है, जो वैश्विक बाजार में अपनी उपस्थिति लगातार मजबूत करने की दिशा में काम कर रहे हैं।

  • टैरिफ विवाद पर ट्रंप का बड़ा झटका…. कोर्ट ने दिए रिफंड के आदेश, कहा- कंपनियों को लौटाएं पैसे

    टैरिफ विवाद पर ट्रंप का बड़ा झटका…. कोर्ट ने दिए रिफंड के आदेश, कहा- कंपनियों को लौटाएं पैसे


    न्यूयॉर्क।
    अमेरिका (America) में टैरिफ विवाद (Tariff Dispute) में बड़ा मोड़ आ गया है। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट (American Supreme Court) के फैसले के बाद अब न्यूयॉर्क की संघीय अदालत ने भी ट्रंप प्रशासन को झटका दिया है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि जिन कंपनियों ने ट्रंप सरकार की तरफ से लगाए गए आयात टैरिफ का भुगतान किया था, उन्हें अब पैसा वापस किया जाएगा। यूएस कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड के जज रिचर्ड ईटन ने कहा कि सभी आयातक कंपनियां यूएस सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का लाभ पाने की हकदार हैं, जिसमें पिछले महीने ट्रंप के कई टैरिफ को असंवैधानिक बताया गया था।

    फैसला सुनाते हुए यूएस कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड में न्यायाधीश रिचर्ड ईटन ने कहा कि सभी आयातक रिकॉर्ड के मालिक इस फैसले का लाभ पाने के हकदार हैं। यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के उस निर्णय के बाद आया, जिसमें अमेरिकी टैरिफ को अवैध बताते हुए कहा गया था कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 1977 की अंतर्राष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्ति अधिनियम (आईईईपीए) के तहत लगाए गए टैरिफ संविधान के खिलाफ हैं।


    सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर एक नजर

    इतना ही नहीं अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी जोड़ा था कि राष्ट्रपति अकेले टैरिफ तय और बदल नहीं सकते, क्योंकि कर लगाने का अधिकार केवल कांग्रेस का है। इस फैसले में पारस्परिक टैरिफ, जो लगभग सभी देशों पर लगाए गए थे, को भी अवैध घोषित किया गया।


    कंपनियों के रिफंड पर कोर्ट सख्त

    न्यायाधीश ईटन ने अपने फैसले में कहा कि वह अकेले आईईईपीए टैरिफ की वापसी के मामलों को सुनेंगे। इससे यह साफ हुआ कि कंपनियों को टैरिफ लौटाने की प्रक्रिया कैसे होगी, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में इसका जिक्र नहीं किया। इसपर वकील रयान मेजरस ने कहा कि सरकार शायद इस फैसले के खिलाफ अपील करेगी या वापसी की प्रक्रिया को रोकने के लिए समय मांगेगी।


    ट्रंप ने 130 बिलियन अमेरिकी डॉलर इकट्ठा किए थे

    बता दें कि अमेरिका सरकार ने अब तक इन टैरिफ से 130 बिलियन अमेरिकी डॉलर इकट्ठा किए थे। विशेषज्ञों के अनुसार, सरकार को कुल 175 बिलियन डॉलर तक की वापसी करनी पड़ सकती है। ऐसे में यह फैसला विशेष रूप से एटमस निस्पंदन, नाशविल, टेनेसी की कंपनी के मामले पर आया है, जिसने टैरिफ की वापसी का दावा किया था। यह कंपनी फिल्टर्स और अन्य फिल्ट्रेशन प्रोडक्ट बनाती है।

    इस बात को ऐसे समझा जा सकता है कि जब कोई सामान अमेरिका में आता है, तो यूएस कस्टम्स एंड बॉर्डर प्रोटेक्शन उसका अंतिम हिसाब करती है, जिसे लिक्विडेशन कहते हैं। लिक्विडेशन के बाद आयातकों को 180 दिन का समय मिलता है, जिसके अंदर वे टैरिफ पर आपत्ति दर्ज कर सकते हैं। इसके बाद यह हिसाब कानूनी रूप से अंतिम माना जाता है।


    न्यायाधीश ने कस्टम्स को दिए ये निर्देश

    न्यायाधीश ने आगे आदेश दिया कि कस्टम्स उन टैरिफ को इकट्ठा करना बंद करें, जो सुप्रीम कोर्ट ने अवैध घोषित किए। और यदि कोई सामान पहले ही लिक्विडेशन प्रक्रिया से गुजर चुका है, तो उसका हिसाब बिना टैरिफ के फिर से किया जाएगा। कोर्ट के इस फैसले के बाद न्यूयॉर्क लॉ स्कूल के प्रोफेसर बैरी एप्पलटन ने कहा कि यह आयातकों और उपभोक्ताओं के लिए बहुत अच्छा फैसला है। इससे कस्टम्स ब्रोकरों की भी बहुत व्यस्तता बढ़ेगी और कोर्ट के लिए प्रक्रिया आसान होगी।


    पिछले सोमवार को भी संघीय अदालत ने दिया था फैसला

    गौरतलब है कि पिछले सोमवार को एक अन्य संघीय अदालत ने ट्रंप प्रशासन की वापसी रोकने की कोशिश को खारिज कर दिया। इसके बाद अमेरिकी कोर्ट ऑफ अपील्स फॉर द फेडरल सर्किट ने इसे न्यूयॉर्क ट्रेड कोर्ट में भेजा, ताकि वहां वापसी की अगली प्रक्रिया शुरू हो सके। अब यूएस कस्टम्स एंड बॉर्डर प्रोटेक्शन को यह तय करना होगा कि बड़ी मात्रा में टैरिफ की वापसी कैसे की जाए। वकील एलेक्सिस अर्ली के मुताबिक, “कस्टम्स आमतौर पर गलती होने पर टैरिफ लौटाते हैं, लेकिन उनका सिस्टम बड़े पैमाने पर वापसी के लिए नहीं बना है। यहां सबसे बड़ी चुनौती प्रशासनिक प्रक्रिया की होगी।