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  • स्वास्थ्य और पोषण दावों पर सख्ती के बाद कई कंपनियों ने उत्पाद लेबल सुधारे, ऑनलाइन लिस्टिंग हटाईं और अनुपालन रिपोर्ट दी

    स्वास्थ्य और पोषण दावों पर सख्ती के बाद कई कंपनियों ने उत्पाद लेबल सुधारे, ऑनलाइन लिस्टिंग हटाईं और अनुपालन रिपोर्ट दी

    नई दिल्ली ।भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण की ओर से खाद्य उत्पादों पर भ्रामक स्वास्थ्य, पोषण, व्यापारिक और उत्पाद संबंधी दावों के खिलाफ जारी नोटिस के बाद कई कंपनियों ने अपने स्तर पर सुधारात्मक कार्रवाई की है। कंपनियों ने उपभोक्ताओं को भ्रमित करने वाले दावों को हटाने, विज्ञापन वापस लेने, ऑनलाइन उत्पाद लिस्टिंग हटाने और पैकेजिंग में बदलाव करने जैसे कदम उठाए हैं।

    नियामक ने स्पष्ट किया है कि खाद्य उत्पादों के लेबल, पैकेजिंग और प्रचार सामग्री में ऐसे दावे नहीं किए जा सकते, जिनसे उपभोक्ताओं को उत्पाद की प्रकृति, गुणवत्ता, पोषण संबंधी विशेषताओं या अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं को लेकर गलत धारणा बन सकती है। कार्रवाई का उद्देश्य खाद्य बाजार में पारदर्शिता बढ़ाने और उपभोक्ताओं को सही जानकारी उपलब्ध कराना है।

    मोंडेलेज इंडिया फूड्स प्राइवेट लिमिटेड के कुछ उत्पादों के संबंध में स्वास्थ्य और पोषण से जुड़े तुलनात्मक दावों को लेकर आपत्ति दर्ज की गई थी। नोटिस के बाद कंपनी ने संबंधित दावों और विज्ञापन सामग्री को ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म से हटाने की कार्रवाई की। इसके साथ ही नियमों के अनुरूप आवश्यक संशोधन भी किए गए।

    एक अन्य मामले में सैपियंस लैब्स को भी भ्रामक दावे से संबंधित नोटिस दिया गया था। इसके बाद कंपनी ने नियामक को अपना जवाब सौंपा और उत्पाद से जुड़े संबंधित दावों तथा प्रचार सामग्री को वापस लेने की जानकारी दी। इससे यह संकेत मिलता है कि नोटिस के बाद संबंधित कंपनियां अपने विपणन दावों की समीक्षा कर रही हैं।

    विची एग्रो प्रोडक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड से जुड़े एक मामले में विपणन किए जा रहे उत्पाद और मिसेज जानकी जय बारोट यानी जेजे फूड्स द्वारा प्रसंस्कृत एवं पैक किए गए उत्पाद के व्यापारिक नाम को लेकर आपत्ति सामने आई। नियामकीय हस्तक्षेप के बाद संबंधित ऑनलाइन उत्पाद लिस्टिंग को हटाने की कार्रवाई की गई।

    एमवे इंडिया एंटरप्राइजेज प्राइवेट लिमिटेड के मामले में उत्पाद के नाम में 100 परसेंट प्योर कोकोनट ऑयल शब्दावली के इस्तेमाल पर सवाल उठाया गया। नियामक के अनुसार नाम में 100 परसेंट शब्द का उपयोग खाद्य सुरक्षा कानून, विज्ञापन एवं दावे संबंधी नियमों और इस तरह की शब्दावली के इस्तेमाल को रोकने संबंधी परामर्श के अनुरूप नहीं था।

    नोटिस मिलने के बाद एमवे इंडिया ने अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत की। कंपनी ने बताया कि उसने अपने उत्पाद की पैकेजिंग और प्रचार सामग्री से 100 परसेंट शब्द स्वेच्छा से हटा दिया है। कंपनी ने पुराने स्टॉक की बिक्री रोकने और संशोधित पैकेजिंग के साथ नए उत्पाद बाजार में उपलब्ध कराने की भी पुष्टि की।

    एफएसएसएआई की कार्रवाई से यह स्पष्ट है कि खाद्य उत्पादों की पैकेजिंग और विज्ञापन में इस्तेमाल होने वाली भाषा पर नियामकीय निगरानी बढ़ाई जा रही है। खासतौर पर स्वास्थ्य, पोषण, गुणवत्ता और उत्पाद की विशेषताओं से जुड़े दावों को लेकर कंपनियों को अधिक सावधानी बरतनी होगी।

    नियामक का जोर इस बात पर है कि उपभोक्ताओं को उत्पाद खरीदने से पहले लेबल और प्रचार सामग्री के माध्यम से स्पष्ट तथा तथ्यात्मक जानकारी मिले। भ्रामक दावों से उपभोक्ता की खरीद संबंधी धारणा प्रभावित हो सकती है, इसलिए ऐसे मामलों में सुधारात्मक कार्रवाई को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    एफएसएसएआई ने संकेत दिया है कि उपभोक्ता हितों की सुरक्षा और खाद्य बाजार में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए भ्रामक दावों के खिलाफ कार्रवाई जारी रहेगी। इससे खाद्य कंपनियों के लिए पैकेजिंग, विज्ञापन और ऑनलाइन बिक्री सामग्री को निर्धारित नियमों के अनुरूप रखना और भी महत्वपूर्ण हो गया है।

  • पीएम मोदी का वीडियो हटाने के विवाद के बाद Meta पर कार्रवाई का दबाव बढ़ा, सरकार ने अवैध कंटेंट को लेकर मांगा जवाब

    पीएम मोदी का वीडियो हटाने के विवाद के बाद Meta पर कार्रवाई का दबाव बढ़ा, सरकार ने अवैध कंटेंट को लेकर मांगा जवाब

    नई दिल्ली । भारत में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर गैरकानूनी सामग्री को लेकर सरकार का रुख लगातार सख्त होता जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जुड़े एक वीडियो को फेसबुक से हटाए जाने के विवाद के बाद Meta पर सरकार की निगरानी और दबाव बढ़ा था। इसी पृष्ठभूमि में अब कंपनी की ओर से बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी गैरकानूनी सामग्री यानी CSAM के खिलाफ कार्रवाई किए जाने की जानकारी सामने आई है। इस पूरे घटनाक्रम ने भारत में सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही और उन्हें मिलने वाली सेफ हार्बर सुरक्षा को लेकर बहस को फिर तेज कर दिया है।

    सरकारी रुख के अनुसार सोशल मीडिया कंपनियां यदि अपने प्लेटफॉर्म पर मौजूद गैरकानूनी सामग्री के खिलाफ जरूरी कदम नहीं उठाती हैं तो उन्हें कानूनी संरक्षण को लेकर मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। अधिकारियों का कहना है कि कानून का उल्लंघन करने वाली सामग्री के मामलों में सेफ हार्बर का लाभ स्वतः सुनिश्चित नहीं माना जा सकता। हालांकि किसी कंपनी ने कानून का उल्लंघन किया है या नहीं और उसे सेफ हार्बर सुरक्षा मिलेगी या नहीं इसका अंतिम निर्णय न्यायिक प्रक्रिया के तहत ही होगा।

    Meta के लिए यह मामला केवल CSAM सामग्री हटाने तक सीमित नहीं है। कंपनी के एल्गोरिदम, कंटेंट मॉडरेशन व्यवस्था और प्लेटफॉर्म पर सामग्री की पहुंच बढ़ाने वाली प्रणालियों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। सरकार की ओर से कंपनी से इस बात को लेकर जवाब मांगा गया है कि गैरकानूनी सामग्री को रोकने और बार बार सामने आने वाली ऐसी सामग्री पर कार्रवाई करने के लिए उसकी तकनीकी प्रणालियां किस तरह काम करती हैं।

    प्रधानमंत्री मोदी का फेसबुक वीडियो कुछ समय के लिए हटाए जाने के बाद भारत में Meta की कार्यप्रणाली को लेकर विवाद काफी बढ़ गया था। इस घटनाक्रम के बाद कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों और सरकार के बीच बैठक भी हुई थी। Meta की ओर से वीडियो हटाए जाने को गलती बताया गया और कंपनी के प्रमुख मार्क जुकरबर्ग ने इस मामले पर माफी मांगी थी। इसके बाद सरकार ने प्लेटफॉर्म पर मौजूद अन्य गंभीर समस्याओं को लेकर भी कंपनी से जवाब तलब किया।

    संसदीय स्तर पर भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को लेकर सख्त संदेश दिया गया था। समिति ने बाल यौन शोषण सामग्री, महिलाओं से जुड़ी आपत्तिजनक सामग्री और अन्य गैरकानूनी कंटेंट को हटाने की जिम्मेदारी को गंभीरता से लेने की बात कही थी। साथ ही चेतावनी दी गई थी कि कानून का पालन नहीं करने की स्थिति में संबंधित प्लेटफॉर्म के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जा सकती है।

    सरकार और Meta के बीच हुई चर्चाओं में CSAM के अलावा डीपफेक, वेरिफाइड अकाउंट की सुरक्षा, एल्गोरिद्मिक पक्षपात और भारतीय कानूनों के अनुपालन जैसे मुद्दे भी सामने आए। इससे स्पष्ट है कि भारत में सोशल मीडिया कंपनियों के लिए केवल कंटेंट हटाना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उन्हें अपनी मॉडरेशन व्यवस्था और तकनीकी प्रक्रियाओं को भी अधिक जवाबदेह बनाना पड़ सकता है।

    दुनिया के दूसरे देशों में भी सोशल मीडिया से जुड़े नुकसान और बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ी है। ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन सहित कई देशों में प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी और डिजिटल सामग्री की निगरानी को लेकर नियम कड़े किए जा रहे हैं। भारत में भी सरकार का मौजूदा रुख इसी व्यापक वैश्विक बहस के बीच सोशल मीडिया कंपनियों पर बढ़ती जवाबदेही का संकेत माना जा रहा है।

  • आरबीआई ने एनबीएफसी से रिवॉल्विंग क्रेडिट नियमों पर मांगी राय, जोखिम नियंत्रण और आंतरिक अनुपालन मजबूत करने पर जोर

    आरबीआई ने एनबीएफसी से रिवॉल्विंग क्रेडिट नियमों पर मांगी राय, जोखिम नियंत्रण और आंतरिक अनुपालन मजबूत करने पर जोर

    नई दिल्ली । भारतीय रिजर्व बैंक ने गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों यानी एनबीएफसी के तेजी से बढ़ते कारोबार और नए डिजिटल लेंडिंग मॉडल से जुड़े जोखिमों को लेकर निगरानी बढ़ा दी है। केंद्रीय बैंक ने प्रस्तावित रिवॉल्विंग क्रेडिट नियमों पर एनबीएफसी से राय मांगी है। इसके साथ ही कंपनियों को मजबूत अनुपालन व्यवस्था, आंतरिक ऑडिट और जोखिम प्रबंधन ढांचे पर विशेष ध्यान देने की सलाह दी गई है।

    आरबीआई और एनबीएफसी के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच हुई बैठक में तेजी से विस्तार कर रहे लेंडिंग सेगमेंट से जुड़े जोखिमों पर चर्चा हुई। केंद्रीय बैंक ने वित्तीय संस्थानों से कहा कि नए उत्पादों और कारोबारी मॉडल से जुड़े संभावित जोखिमों की पहचान शुरुआती स्तर पर ही की जाए, ताकि किसी कमजोरी के बड़े संकट में बदलने से पहले उसे नियंत्रित किया जा सके।

    रिवॉल्विंग क्रेडिट ऐसे ऋण या क्रेडिट सुविधा से संबंधित है, जिसमें ग्राहक निर्धारित सीमा के भीतर जरूरत के अनुसार राशि का इस्तेमाल कर सकता है और भुगतान के बाद उपलब्ध क्रेडिट सीमा फिर से उपयोग कर सकता है। इस तरह के उत्पादों के विस्तार के साथ उनके जोखिम और नियामकीय अनुपालन को लेकर भी केंद्रीय बैंक का ध्यान बढ़ा है।

    आरबीआई ने एनबीएफसी के आंतरिक नियंत्रण तंत्र को मजबूत करने की जरूरत पर जोर दिया। इसके तहत कंपनियों से अपेक्षा की गई है कि वे अपने कारोबार में जोखिमों की नियमित समीक्षा करें और आंतरिक ऑडिट व्यवस्था को प्रभावी बनाएं। खासतौर पर तेजी से विकसित हो रहे तकनीक आधारित उत्पादों में जोखिम की निगरानी को महत्वपूर्ण माना गया है।

    एनबीएफसी अक्सर टेक्नोलॉजी आधारित लेंडिंग उत्पादों और नए कारोबारी मॉडल को जल्दी अपनाने वाली वित्तीय संस्थाओं में शामिल होती हैं। डिजिटल माध्यमों से ग्राहकों तक पहुंच, ऋण आवेदन, मूल्यांकन और सर्विसिंग की प्रक्रिया तेज हुई है। ऐसे में इन कंपनियों के अनुभव से मिलने वाली जानकारी भविष्य में उभरते वित्तीय क्षेत्रों के लिए नियामकीय ढांचा तैयार करने में मददगार हो सकती है।

    केंद्रीय बैंक एनबीएफसी के नियामकीय ढांचे को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप और मजबूत बनाने पर भी विचार कर रहा है। इसका उद्देश्य वित्तीय प्रणाली में स्थिरता बनाए रखने के साथ नए कारोबारी मॉडल से उत्पन्न होने वाले जोखिमों को समय रहते नियंत्रित करना है।

    बैठक में स्व-नियामक संगठनों यानी एसआरओ की भूमिका पर भी चर्चा हुई। आरबीआई ने स्पष्ट किया कि एसआरओ को समानांतर नियामक के रूप में काम नहीं करना चाहिए। उनकी भूमिका उद्योग में नियमों के अनुपालन को बढ़ावा देने और उभरते जोखिमों की पहचान तथा समाधान में सहयोग करने की होनी चाहिए। उन्हें उद्योग की पहली सुरक्षा पंक्ति के रूप में प्रभावी भूमिका निभाने की अपेक्षा की गई है।

    ग्राहक शिकायतों के समाधान को लेकर भी एनबीएफसी को स्पष्ट सलाह दी गई है। कंपनियों से कहा गया है कि वे शिकायत निवारण व्यवस्था को मजबूत करें और ग्राहकों की शिकायतों का समाधान निर्धारित समयसीमा के भीतर प्रभावी तरीके से सुनिश्चित करें। डिजिटल लेंडिंग के बढ़ते इस्तेमाल के बीच ग्राहक सेवा और पारदर्शिता को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    इसके साथ ही एनबीएफसी को डिजिटल लेंडिंग से संबंधित मौजूदा नियामकीय ढांचे और डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण कानून का पूरी तरह पालन करने को कहा गया है। ग्राहकों को जोड़ने, ऋण का आकलन करने और सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए तकनीक पर बढ़ती निर्भरता के कारण डेटा सुरक्षा और गोपनीयता का महत्व भी बढ़ गया है।

    आरबीआई की यह पहल ऐसे समय में सामने आई है जब एनबीएफसी क्षेत्र में नए डिजिटल उत्पादों और कारोबारी मॉडलों का तेजी से विस्तार हो रहा है। प्रस्तावित रिवॉल्विंग क्रेडिट नियमों पर उद्योग की राय लेने के साथ केंद्रीय बैंक जोखिम आधारित निगरानी को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। आने वाले समय में इन सुझावों और नियामकीय समीक्षा के आधार पर एनबीएफसी क्षेत्र के लिए अनुपालन और जोखिम प्रबंधन से जुड़े नियमों में बदलाव की दिशा स्पष्ट हो सकती है।

  • FSSAI खाद्य सुरक्षा जांच, खाद्य उत्पाद लेबलिंग, FSSAI नोटिस कंपनियां, खाद्य पैकेजिंग नियम, भ्रामक खाद्य दावे

    FSSAI खाद्य सुरक्षा जांच, खाद्य उत्पाद लेबलिंग, FSSAI नोटिस कंपनियां, खाद्य पैकेजिंग नियम, भ्रामक खाद्य दावे

    नई दिल्ली । भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण की ओर से भ्रामक दावों, गैर-मानकीकृत उत्पादों और लेबलिंग नियमों के उल्लंघन को लेकर जारी नोटिसों के बाद कई खाद्य कारोबारियों ने सुधारात्मक कदम उठाए हैं। नियामक की ओर से रविवार को बताया गया कि नोटिस मिलने के बाद संबंधित कंपनियों ने अपने उत्पादों और पैकेजिंग में आवश्यक बदलाव शुरू किए हैं।

    खाद्य नियामक के अनुसार, सुधारात्मक कार्रवाई में उत्पादों के लेबल पर किए गए भ्रामक दावों को हटाना, उत्पादों के नाम में बदलाव करना और पैकेजिंग को लागू नियमों के अनुरूप बनाना शामिल है। इन कदमों का उद्देश्य उपभोक्ताओं को सही जानकारी उपलब्ध कराना और खाद्य सुरक्षा मानकों का पालन सुनिश्चित करना है।

    कुछ कंपनियों को भ्रामक ट्रेडमार्क के इस्तेमाल को लेकर नोटिस जारी किए गए थे। इनमें ऑनेस्ट इनोवेशन फॉर यू प्राइवेट लिमिटेड और हेलियोस्टोन स्पेशलिटीज प्राइवेट लिमिटेड शामिल हैं। नोटिस मिलने के बाद दोनों कंपनियों ने अपने संबंधित उत्पादों के नाम में बदलाव किया।

    राजस्थान एग्रो एंड जनरल इंडस्ट्रीज के मामले में भी भ्रामक ट्रेडमार्क से जुड़ी आपत्ति सामने आई थी। कंपनी ने नियामकीय निर्देशों के अनुरूप उत्पादों से जुड़े भ्रामक दावों को हटाया। इसके अलावा उत्पादों से संबंधित संचार में पीपीएम शब्द का इस्तेमाल भी बंद कर दिया गया।

    एक अन्य मामले में आयोटा नैनोटेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड को गैर-मानकीकृत उत्पाद से संबंधित नियमों के उल्लंघन के लिए चिन्हित किया गया। कंपनी ने संबंधित उत्पाद के लेबल से भ्रामक दावों को हटाने के साथ गैर-मानकीकृत पानी का उत्पादन भी बंद कर दिया।

    पंचामृत इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड को इलेक्ट्रोलाइट ड्रिंक से जुड़े मामले में नोटिस जारी किया गया था। नियामकीय कार्रवाई के बाद कंपनी ने संबंधित उत्पाद को अपनी वेबसाइट से हटा दिया। यह कदम कंपनी की ओर से नोटिस के बाद की गई सुधारात्मक कार्रवाई का हिस्सा रहा।

    लिव्योर वेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड के उत्पाद ‘लिव्योर रोस्टेड एडामे बीन्स’ के लेबल पर किए गए ‘वीगन’ और ‘हेल्थी’ दावों को लेकर भी आपत्ति दर्ज की गई थी। कंपनी ने इन दावों को नियमों के अनुरूप नहीं होने की बात स्वीकार करते हुए सुधारात्मक कदम उठाए।

    कंपनी के अनुसार, लागू नियमों की जानकारी के अभाव में ये दावे अनजाने में उत्पाद के लेबल पर दर्ज हो गए थे। कंपनी ने इस मामले पर खेद जताते हुए माफी मांगी और भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा नहीं होने का आश्वासन दिया।

    इसके साथ ही कंपनी ने संशोधित लेबल भी तैयार किया। नियमों का उल्लंघन करने वाले दावों वाली मौजूदा पैकेजिंग सामग्री को नष्ट करने की प्रक्रिया शुरू करने की बात भी कही गई। कंपनी ने अपने उत्पादों के लेबल की समीक्षा और संशोधन का काम भी शुरू कर दिया है।

    खाद्य उत्पादों के लेबल पर लिखी जानकारी उपभोक्ताओं के लिए महत्वपूर्ण होती है। उत्पाद की प्रकृति, दावे और संबंधित विवरण में किसी तरह की गलत या भ्रामक जानकारी उपभोक्ता के फैसले को प्रभावित कर सकती है। ऐसे में नियामकीय निगरानी का उद्देश्य कंपनियों को निर्धारित मानकों के अनुरूप कारोबार करने के लिए बाध्य करना है।

    नोटिसों के बाद कंपनियों की ओर से किए गए बदलाव यह दिखाते हैं कि खाद्य उत्पादों की पैकेजिंग और प्रचार सामग्री में नियमों के पालन पर निगरानी बढ़ रही है। आने वाले समय में कंपनियों के लिए लेबलिंग दावों की सटीकता और नियामकीय अनुपालन पहले से अधिक महत्वपूर्ण रहने की संभावना है।

  • महाराष्ट्र FDA की बड़ी कार्रवाई, 434 आयुर्वेदिक दवा निर्माताओं की जांच के बाद 135 को शोकॉज नोटिस, 10 लाइसेंस रद्द

    महाराष्ट्र FDA की बड़ी कार्रवाई, 434 आयुर्वेदिक दवा निर्माताओं की जांच के बाद 135 को शोकॉज नोटिस, 10 लाइसेंस रद्द

    नई दिल्ली ।महाराष्ट्र में आयुर्वेदिक दवा निर्माताओं के खिलाफ खाद्य एवं औषधि प्रशासन यानी FDA ने सख्त कार्रवाई की है। राज्यभर में लाइसेंस प्राप्त 434 आयुर्वेदिक दवा बनाने वाली इकाइयों का निरीक्षण किया गया। जांच के दौरान अलग-अलग स्तर पर नियमों का उल्लंघन और निर्माण प्रक्रिया से जुड़ी गंभीर कमियां सामने आने के बाद 135 निर्माताओं को शोकॉज नोटिस जारी किए गए हैं।

    FDA की इस कार्रवाई का उद्देश्य आयुर्वेदिक दवाओं की गुणवत्ता, सुरक्षा और प्रभावशीलता सुनिश्चित करना है। जिन कंपनियों को नोटिस जारी किए गए हैं, उन्हें निरीक्षण के दौरान सामने आई कमियों पर स्पष्टीकरण देने और निर्धारित नियमों के अनुपालन की दिशा में आवश्यक कदम उठाने को कहा गया है।

    जांच अभियान के दौरान ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940, ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स रूल्स, 1945 और शेड्यूल टी के तहत निर्धारित प्रावधानों के पालन की जांच की गई। शेड्यूल टी में आयुर्वेदिक, सिद्ध और यूनानी दवाओं के लिए गुड मैन्युफैक्चरिंग प्रैक्टिस यानी GMP से जुड़े मानक निर्धारित हैं।

    निरीक्षण में कुछ इकाइयों में योग्य या स्वीकृत तकनीकी कर्मचारियों की कमी सामने आई। ऐसी स्थिति भी पाई गई जहां आवश्यक तकनीकी स्टाफ की पर्याप्त मौजूदगी के बिना दवा निर्माण किया जा रहा था। कई कंपनियों में गुणवत्ता नियंत्रण विभाग अपेक्षित तरीके से काम नहीं कर रहे थे।

    कुछ निर्माण इकाइयों में दवाओं के उत्पादन और परीक्षण के लिए जरूरी मशीनरी तथा उपकरणों की भी कमी पाई गई। इसके अलावा साफ-सफाई से जुड़े मानकों में खामियां, बैच उत्पादन के रिकॉर्ड का अभाव और कच्चे माल से संबंधित दस्तावेजों में अनियमितताएं सामने आईं।

    जांच के दौरान कुछ उत्पादों के लेबल पर गलत निर्माण तिथियां दर्ज होने की बात भी सामने आई। कच्चे माल और तैयार उत्पादों की जांच से जुड़े रिकॉर्ड तथा परीक्षण व्यवस्था में भी कमियां पाई गईं। कुछ निर्माताओं के पास कच्चे माल का उचित रिकॉर्ड नहीं था और कुछ निर्माण इकाइयों का लेआउट स्वीकृत व्यवस्था के अनुरूप नहीं पाया गया।

    तकनीकी कर्मचारियों और श्रमिकों की मेडिकल जांच से जुड़े रिकॉर्ड का अभाव भी निरीक्षण में सामने आया। इसके अलावा कुछ कंपनियों में कर्मचारियों को दी गई ट्रेनिंग का रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था। कंट्रोल सैंपल और मास्टर फॉर्मूला रिकॉर्ड जैसे महत्वपूर्ण गुणवत्ता नियंत्रण दस्तावेज भी कुछ इकाइयों में नहीं मिले।

    दवा निर्माण के दौरान क्रॉस-कंटामिनेशन रोकने के लिए पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने की कमियां भी सामने आईं। क्रॉस-कंटामिनेशन की स्थिति में एक उत्पाद या कच्चे पदार्थ का दूसरे उत्पाद में अनजाने में मिलना दवा की गुणवत्ता और सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है।

    सबसे गंभीर मामलों में FDA ने 10 आयुर्वेदिक दवा निर्माताओं के मैन्युफैक्चरिंग लाइसेंस स्थायी रूप से रद्द कर दिए। इन इकाइयों में ऐसी कमियां पाई गईं जिन्हें दवाओं की गुणवत्ता, सुरक्षा और प्रभावशीलता के लिए गंभीर माना गया। कार्रवाई का उद्देश्य ऐसी निर्माण प्रक्रियाओं पर रोक लगाना है जिनसे उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका हो सकती है।

    महाराष्ट्र FDA ने आयुर्वेदिक दवा निर्माताओं को स्पष्ट किया है कि पारंपरिक आयुर्वेदिक दवाओं का निर्माण मान्यता प्राप्त संदर्भ ग्रंथों और निर्धारित मानकों के अनुरूप होना चाहिए। वहीं पेटेंट और प्रोप्राइटरी आयुर्वेदिक दवाओं के लिए निर्धारित गुणवत्ता नियंत्रण आवश्यकताओं का पालन जरूरी है।

    राज्यभर में चलाया गया यह निरीक्षण अभियान आयुर्वेदिक दवा निर्माण क्षेत्र में नियामकीय अनुपालन मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। FDA ने संकेत दिया है कि शेड्यूल टी के GMP मानकों का पालन नहीं करने वाली इकाइयों के खिलाफ आगे भी सख्त कार्रवाई की जा सकती है। इससे निर्माताओं पर गुणवत्ता नियंत्रण, दस्तावेजीकरण, स्वच्छता और सुरक्षित उत्पादन व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी और बढ़ गई है।

  • फार्मा सेक्टर के लिए नए नियम लागू, मार्केटिंग खर्च का खुलासा अनिवार्य; अनैतिक प्रचार पर कड़ी निगरानी

    फार्मा सेक्टर के लिए नए नियम लागू, मार्केटिंग खर्च का खुलासा अनिवार्य; अनैतिक प्रचार पर कड़ी निगरानी

    नई दिल्ली । दवा कंपनियों की मार्केटिंग प्रक्रिया में पारदर्शिता और नैतिक मानकों को मजबूत करने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने नए सख्त नियम लागू किए हैं। इन प्रावधानों के तहत दवा कंपनियों के प्रचार-प्रसार के तरीकों पर निगरानी बढ़ाई गई है और डॉक्टरों को गिफ्ट, नकद लाभ या अन्य प्रकार के व्यक्तिगत प्रलोभन देने पर स्पष्ट रोक लगा दी गई है। सरकार का कहना है कि इन कदमों का उद्देश्य दवाओं के प्रचार को जिम्मेदार, पारदर्शी और जनहित के अनुरूप बनाना है।

    सरकार के अनुसार, यूनिफॉर्म कोड फॉर फार्मास्युटिकल मार्केटिंग प्रैक्टिसेज (यूसीपीएमपी) 2024 के तहत सभी दवा कंपनियों को अपनी आंतरिक नैतिक व्यवस्था को मजबूत करना होगा। इसके लिए प्रत्येक कंपनी को एथिक्स कमेटी का गठन करना, एथिक्स ऑफिसर नियुक्त करना और शिकायतों के निपटारे के लिए प्रभावी व्यवस्था विकसित करना अनिवार्य किया गया है। साथ ही नियमों के पालन से संबंधित स्व-घोषणा भी देनी होगी, जिससे कंपनियों की जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके।

    नए नियमों में यह भी प्रावधान किया गया है कि दवा कंपनियां अपने वार्षिक मार्केटिंग खर्च का विस्तृत विवरण निर्धारित पोर्टल पर उपलब्ध कराएं। विशेष रूप से डॉक्टरों और स्वास्थ्य संस्थानों से जुड़ी प्रचार गतिविधियों, कॉन्फ्रेंस, सेमिनार, कार्यशालाओं तथा कंटीन्यूइंग मेडिकल एजुकेशन और कंटीन्यूइंग प्रोफेशनल डेवलपमेंट कार्यक्रमों पर किए गए खर्च का भी खुलासा करना होगा। सरकार का मानना है कि इससे फार्मा उद्योग में वित्तीय पारदर्शिता बढ़ेगी और अनावश्यक प्रभाव की संभावनाएं कम होंगी।

    नियमों के तहत मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव और अन्य मार्केटिंग कर्मचारियों की गतिविधियों की जिम्मेदारी संबंधित दवा कंपनी की होगी। यदि किसी कर्मचारी द्वारा नियमों का उल्लंघन किया जाता है तो उसकी जवाबदेही कंपनी पर भी तय की जाएगी। इसके अलावा स्वतंत्र, रैंडम अथवा जोखिम आधारित ऑडिट का भी प्रावधान रखा गया है, ताकि नियमों के अनुपालन की नियमित समीक्षा की जा सके।

    सरकार ने स्पष्ट किया है कि किसी भी दवा कंपनी को डॉक्टरों या उनके परिवार के सदस्यों को उपहार, नकद लाभ, महंगे आतिथ्य या अन्य व्यक्तिगत सुविधाएं उपलब्ध कराने की अनुमति नहीं होगी। इस कदम का उद्देश्य चिकित्सकीय निर्णयों को व्यावसायिक प्रभाव से मुक्त रखना और मरीजों के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता देना है। इसके साथ ही डॉक्टरों और दवा कंपनियों के प्रतिनिधियों के बीच होने वाले संपर्क और प्रचार गतिविधियों के लिए भी स्पष्ट दिशा-निर्देश निर्धारित किए गए हैं।

    शिकायतों के निपटारे के लिए दो-स्तरीय व्यवस्था बनाई गई है, जबकि अपीलों का अंतिम निपटारा संबंधित विभाग द्वारा किया जाएगा। सरकार का कहना है कि इन व्यवस्थाओं से शिकायतों के समाधान की प्रक्रिया अधिक प्रभावी और पारदर्शी बनेगी। साथ ही कंपनियों को नियमों के पालन के लिए नियमित निगरानी और उत्तरदायित्व की व्यवस्था भी सुनिश्चित करनी होगी।

    स्वास्थ्य क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन प्रावधानों का प्रभावी ढंग से पालन कराया जाता है तो फार्मास्युटिकल उद्योग में पारदर्शिता बढ़ेगी, चिकित्सकीय निर्णयों की निष्पक्षता मजबूत होगी और मरीजों का स्वास्थ्य व्यवस्था पर भरोसा भी और सुदृढ़ होगा। सरकार का यह कदम स्वास्थ्य सेवाओं में नैतिक आचरण को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।

  • RBI की बड़ी कार्रवाई, नियमों के उल्लंघन पर बैंक ऑफ बड़ौदा और GIC हाउसिंग फाइनेंस पर लाखों रुपये का जुर्माना

    RBI की बड़ी कार्रवाई, नियमों के उल्लंघन पर बैंक ऑफ बड़ौदा और GIC हाउसिंग फाइनेंस पर लाखों रुपये का जुर्माना

    नई दिल्ली । भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बैंकिंग नियमों के पालन में लापरवाही बरतने पर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक बैंक ऑफ बड़ौदा और जीआईसी हाउसिंग फाइनेंस के खिलाफ सख्त कार्रवाई की है। केंद्रीय बैंक ने दोनों संस्थानों पर कुल 66.7 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। यह कार्रवाई नियामकीय प्रावधानों के उल्लंघन के मामलों में की गई है। साथ ही RBI ने स्पष्ट किया है कि इस निर्णय का ग्राहकों के खातों, जमा राशि या बैंकिंग सेवाओं पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।

    RBI के अनुसार बैंक ऑफ बड़ौदा पर 63.6 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया है। जांच के दौरान पाया गया कि बैंक ने कुछ ऋण खातों में निर्धारित सीमा से अधिक ब्याज वसूला, जो लागू नियामकीय निर्देशों के अनुरूप नहीं था। इसके अलावा बैंक कुछ ग्राहकों से संबंधित केवाईसी दस्तावेज निर्धारित समय के भीतर केंद्रीय रजिस्ट्री में अपलोड करने में भी विफल रहा। केंद्रीय बैंक ने इसे अनुपालन संबंधी गंभीर चूक माना है।

    वहीं जीआईसी हाउसिंग फाइनेंस पर 3.1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया है। जांच में सामने आया कि कंपनी अपने ऋण खातों के जोखिम का निर्धारित अंतराल पर मूल्यांकन नहीं कर रही थी। नियमानुसार ऐसे खातों की कम से कम प्रत्येक छह महीने में समीक्षा की जानी चाहिए, लेकिन कंपनी इस प्रक्रिया का समय पर पालन नहीं कर सकी। इसी आधार पर नियामकीय कार्रवाई की गई।

    RBI ने कहा है कि वित्तीय संस्थानों के लिए नियामकीय मानकों का पालन अनिवार्य है। बैंकिंग प्रणाली में पारदर्शिता, जवाबदेही और ग्राहकों के हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए समय-समय पर निरीक्षण और अनुपालन की समीक्षा की जाती है। जहां भी नियमों के उल्लंघन के मामले सामने आते हैं, वहां निर्धारित प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जाती है।

    केंद्रीय बैंक ने यह भी स्पष्ट किया कि लगाया गया जुर्माना केवल नियामकीय कमियों से संबंधित है और इसका उद्देश्य संस्थानों को नियमों के बेहतर पालन के लिए प्रेरित करना है। यह कार्रवाई किसी ग्राहक के खाते, जमा राशि, ऋण अनुबंध या बैंकिंग लेनदेन की वैधता पर कोई प्रभाव नहीं डालती। ग्राहकों की धनराशि पूरी तरह सुरक्षित है और बैंकिंग सेवाएं पहले की तरह सामान्य रूप से जारी रहेंगी।

    विशेषज्ञों का मानना है कि हाल के वर्षों में RBI ने अनुपालन मानकों को लेकर सख्त रुख अपनाया है। बैंकों और वित्तीय संस्थानों से अपेक्षा की जाती है कि वे ग्राहक हितों की सुरक्षा, पारदर्शिता और जोखिम प्रबंधन से जुड़े सभी दिशा-निर्देशों का समय पर पालन करें। नियमों में किसी भी प्रकार की लापरवाही पर केंद्रीय बैंक लगातार निगरानी रख रहा है और आवश्यक होने पर दंडात्मक कार्रवाई भी कर रहा है।

    इस ताजा कार्रवाई को भी वित्तीय क्षेत्र में बेहतर प्रशासन और मजबूत नियामकीय व्यवस्था सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। RBI का संदेश स्पष्ट है कि बैंकिंग प्रणाली में नियमों के पालन से किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा और भविष्य में भी ऐसे मामलों में आवश्यक कार्रवाई जारी रहेगी।

  • NEET-UG री-एग्जाम के लिए NTA का सख्त एक्शन प्लान, बायोमेट्रिक जांच, ड्रेस कोड और सुरक्षा नियमों का पालन अनिवार्य

    NEET-UG री-एग्जाम के लिए NTA का सख्त एक्शन प्लान, बायोमेट्रिक जांच, ड्रेस कोड और सुरक्षा नियमों का पालन अनिवार्य

    नई दिल्ली । राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET-UG) 2026 की पुनर्परीक्षा को लेकर राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी ने विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए हैं। परीक्षा की पारदर्शिता, निष्पक्षता और सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से इस बार कई प्रक्रियाओं को और अधिक सख्त बनाया गया है। एजेंसी ने उम्मीदवारों को परीक्षा केंद्र पर समय से पहुंचने, निर्धारित नियमों का पालन करने और सुरक्षा जांच में पूर्ण सहयोग करने की सलाह दी है।

    पुनर्परीक्षा 21 जून को आयोजित की जानी है और इसके लिए देशभर के परीक्षा केंद्रों पर विशेष प्रबंध किए गए हैं। एजेंसी के अनुसार प्रत्येक अभ्यर्थी को परीक्षा केंद्र में प्रवेश से पहले अनिवार्य सुरक्षा जांच और बायोमेट्रिक सत्यापन प्रक्रिया से गुजरना होगा। यह व्यवस्था परीक्षा में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी या फर्जीवाड़े की संभावना को रोकने के उद्देश्य से लागू की गई है।

    एजेंसी ने स्पष्ट किया है कि बायोमेट्रिक सत्यापन प्रक्रिया परीक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा होगी, लेकिन यदि किसी तकनीकी समस्या, मशीन में खराबी, नेटवर्क संबंधी दिक्कत या शारीरिक कारणों से किसी अभ्यर्थी का बायोमेट्रिक सत्यापन पूरा नहीं हो पाता है तो उसे परीक्षा देने से नहीं रोका जाएगा। ऐसे मामलों में संबंधित उम्मीदवार को निर्धारित घोषणा पत्र भरना होगा और बाद में प्रक्रिया पूरी की जा सकती है।

    परीक्षा संचालन से जुड़े अधिकारियों को भी निर्देश दिए गए हैं कि बायोमेट्रिक सत्यापन के दौरान किसी अभ्यर्थी को अनावश्यक परेशानी न हो। एजेंसी का मानना है कि सुरक्षा और सुविधा के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है, ताकि योग्य उम्मीदवार किसी तकनीकी कारण से परीक्षा से वंचित न रह जाएं।

    ड्रेस कोड को लेकर भी विस्तृत सलाह जारी की गई है। अभ्यर्थियों को हल्के और आरामदायक कपड़े पहनकर परीक्षा केंद्र पहुंचने की सलाह दी गई है। गर्मी और मौसम की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए ऐसे वस्त्र पहनने को कहा गया है जिनकी जांच आसानी से की जा सके। यदि कोई उम्मीदवार पूर्ण बाजू वाले कपड़े या अतिरिक्त परिधान पहनता है, तो उसे समय से पहले परीक्षा केंद्र पहुंचना होगा ताकि सुरक्षा जांच प्रक्रिया समय पर पूरी की जा सके।

    धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं का सम्मान करते हुए कुछ विशेष वस्त्रों और प्रतीकों को अनुमति दी गई है। हालांकि ऐसे अभ्यर्थियों को अतिरिक्त सुरक्षा जांच से गुजरना पड़ सकता है। एजेंसी ने स्पष्ट किया है कि सभी व्यवस्थाएं सुरक्षा मानकों के अनुरूप लागू की जाएंगी और किसी भी उम्मीदवार के साथ भेदभाव नहीं किया जाएगा।

    परीक्षा केंद्र में ले जाने वाली वस्तुओं को लेकर भी स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। उम्मीदवार केवल पारदर्शी पानी की बोतल और निर्धारित प्रारूप में रखे प्रवेश पत्र को ही अपने साथ ले जा सकेंगे। मोबाइल फोन, स्मार्ट घड़ी, ब्लूटूथ डिवाइस, ईयरफोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण पूरी तरह प्रतिबंधित रहेंगे। इसके अलावा धातु से बनी भारी वस्तुएं, बड़े आभूषण और अन्य संदिग्ध सामग्री भी केंद्र में ले जाने की अनुमति नहीं होगी।

    फुटवियर को लेकर भी विशेष सलाह दी गई है। अभ्यर्थियों को साधारण चप्पल या कम ऊंचाई वाले फुटवियर पहनने की सलाह दी गई है। ऊंची एड़ी वाले जूते या जटिल डिजाइन वाले फुटवियर की अतिरिक्त जांच की जा सकती है, जिससे प्रवेश प्रक्रिया में समय अधिक लग सकता है।

    परीक्षा निर्धारित समयानुसार दोपहर 2 बजे शुरू होकर शाम 5 बजकर 15 मिनट तक चलेगी। विशेष श्रेणी के पात्र अभ्यर्थियों को नियमानुसार अतिरिक्त समय भी उपलब्ध कराया जाएगा। एजेंसी ने सभी उम्मीदवारों से अपील की है कि वे अंतिम समय की जल्दबाजी से बचें और परीक्षा केंद्र पर निर्धारित समय से पहले पहुंचकर सभी औपचारिकताएं पूरी कर लें।

    विशेषज्ञों का मानना है कि हालिया घटनाक्रमों और परीक्षा प्रक्रिया को लेकर बढ़ी संवेदनशीलता के बीच यह व्यवस्था परीक्षा प्रणाली में विश्वास बहाल करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है। सख्त सुरक्षा, तकनीकी निगरानी और स्पष्ट दिशा-निर्देशों के माध्यम से परीक्षा को निष्पक्ष और पारदर्शी बनाने का प्रयास किया जा रहा है।

  • एफएसएसएआई का सख्त निर्देश: खाद्य कारोबार में जंग लगे चाकू और क्षतिग्रस्त कटिंग टूल्स पर रोक, नियम तोड़ने वालों पर होगी कड़ी कार्रवाई

    एफएसएसएआई का सख्त निर्देश: खाद्य कारोबार में जंग लगे चाकू और क्षतिग्रस्त कटिंग टूल्स पर रोक, नियम तोड़ने वालों पर होगी कड़ी कार्रवाई

    नई दिल्ली । देश में खाद्य सुरक्षा मानकों को और अधिक मजबूत बनाने की दिशा में भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने महत्वपूर्ण कदम उठाया है। प्राधिकरण ने सभी खाद्य कारोबारियों को स्पष्ट निर्देश जारी करते हुए कहा है कि खाद्य पदार्थों के उत्पादन, प्रसंस्करण, पैकेजिंग और वितरण के दौरान केवल फूड-ग्रेड तथा जंग-रोधी चाकू, ब्लेड और अन्य कटिंग उपकरणों का ही उपयोग किया जाए। यह निर्देश ऐसे समय में जारी किया गया है जब विभिन्न क्षेत्रों से खाद्य पदार्थों के संपर्क में आने वाले जंग लगे और क्षतिग्रस्त उपकरणों के इस्तेमाल की शिकायतें सामने आई हैं।

    एफएसएसएआई के अनुसार कई खाद्य प्रतिष्ठानों में ऐसे चाकू और कटिंग टूल्स उपयोग में पाए गए हैं जो जंग लगे हुए, टूटे-फूटे, दरारयुक्त या अत्यधिक खराब स्थिति में हैं। कुछ मामलों में पेंट किए गए या क्षतिग्रस्त उपकरणों के इस्तेमाल की भी जानकारी मिली है। ऐसे उपकरण खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता और सुरक्षा दोनों के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकते हैं। नियामक का मानना है कि इनकी वजह से खाद्य उत्पादों में भौतिक, रासायनिक और सूक्ष्मजीव संबंधी दूषण की आशंका बढ़ जाती है, जिससे उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

    प्राधिकरण ने स्पष्ट किया है कि खाद्य सुरक्षा से जुड़े मौजूदा नियम पहले से ही यह निर्धारित करते हैं कि भोजन के संपर्क में आने वाले सभी उपकरण, बर्तन और सतहें सुरक्षित, गैर-विषाक्त और जंग-रोधी सामग्री से निर्मित होनी चाहिए। इसके बावजूद यदि कहीं अनुपयुक्त उपकरणों का इस्तेमाल हो रहा है तो यह निर्धारित मानकों और स्वच्छता संबंधी प्रावधानों का सीधा उल्लंघन माना जाएगा।

    एफएसएसएआई ने अपने निर्देश में कहा है कि सभी खाद्य कारोबारी यह सुनिश्चित करें कि उनके यहां उपयोग में आने वाले चाकू, ब्लेड और अन्य कटिंग उपकरण पूरी तरह साफ-सुथरे और कार्यक्षम स्थिति में हों। इनमें जंग, टूट-फूट, दरार, रंग उखड़ने या किसी अन्य प्रकार की ऐसी खामी नहीं होनी चाहिए जिससे खाद्य पदार्थ दूषित होने का जोखिम उत्पन्न हो। इसके साथ ही उपकरणों की नियमित सफाई, सैनिटाइजेशन और आवश्यकता पड़ने पर स्टरलाइजेशन की प्रक्रिया अपनाने पर भी जोर दिया गया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि खाद्य उत्पादन और प्रसंस्करण में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों की गुणवत्ता सीधे तौर पर उपभोक्ता स्वास्थ्य से जुड़ी होती है। यदि कटिंग उपकरणों से धातु के कण, जंग या अन्य हानिकारक तत्व खाद्य सामग्री में मिल जाएं तो यह खाद्य जनित बीमारियों और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का कारण बन सकते हैं। यही वजह है कि खाद्य सुरक्षा मानकों में उपकरणों की गुणवत्ता और रखरखाव को अत्यधिक महत्व दिया जाता है।

    नियामक संस्था ने खाद्य कारोबारियों को सलाह दी है कि वे अपने प्रतिष्ठानों में मौजूद सभी पुराने, जंग लगे या अनुपयोगी कटिंग टूल्स की तत्काल समीक्षा करें और आवश्यक होने पर उन्हें बदल दें। इसके साथ ही समय-समय पर उपकरणों की जांच और रखरखाव की प्रभावी व्यवस्था विकसित करने की भी सिफारिश की गई है ताकि दूषण की संभावनाओं को न्यूनतम किया जा सके।

    एफएसएसएआई ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि जारी एडवाइजरी का पालन न करने वाले कारोबारियों के खिलाफ खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 के तहत कार्रवाई की जा सकती है। नियमों के उल्लंघन की स्थिति में आर्थिक दंड सहित अन्य कानूनी कदम भी उठाए जा सकते हैं। इस पहल का उद्देश्य देशभर में खाद्य सुरक्षा मानकों का प्रभावी अनुपालन सुनिश्चित करना और उपभोक्ताओं तक सुरक्षित एवं गुणवत्तापूर्ण खाद्य उत्पाद पहुंचाना है।

  • RBI का बड़ा फैसला, बैंक और NBFC की मनमानी पर लगेगी लगाम, मिस-सेलिंग रोकने के लिए 2027 से लागू होंगे सख्त नियम

    RBI का बड़ा फैसला, बैंक और NBFC की मनमानी पर लगेगी लगाम, मिस-सेलिंग रोकने के लिए 2027 से लागू होंगे सख्त नियम

    नई दिल्ली । भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र में ग्राहकों के हितों की सुरक्षा को मजबूत करने के उद्देश्य से मिस-सेलिंग के खिलाफ नया नियामकीय ढांचा जारी किया है। यह फ्रेमवर्क 1 जनवरी 2027 से लागू होगा और इसके तहत बैंकों, गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों तथा अन्य विनियमित संस्थाओं को ग्राहकों की जरूरत, वित्तीय स्थिति और जोखिम क्षमता के अनुरूप ही उत्पादों की पेशकश करनी होगी। इस कदम को वित्तीय क्षेत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    लंबे समय से ऐसी शिकायतें सामने आती रही हैं कि कई बैंक और वित्तीय संस्थान अपने बिक्री लक्ष्य पूरे करने के लिए ग्राहकों को ऐसे उत्पाद बेच देते हैं जिनकी उन्हें आवश्यकता नहीं होती। कई मामलों में ऋण लेने वाले ग्राहकों को अतिरिक्त बीमा योजनाएं खरीदने के लिए प्रेरित किया जाता है, जबकि कुछ निवेश उत्पादों से जुड़े जोखिमों की पूरी जानकारी भी साझा नहीं की जाती। ऐसे मामलों को ध्यान में रखते हुए केंद्रीय बैंक ने स्पष्ट नियम निर्धारित किए हैं ताकि ग्राहकों को बेहतर सुरक्षा मिल सके।

    नए नियमों के अनुसार यदि किसी ग्राहक को उसकी आय, निवेश क्षमता या वित्तीय आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं होने वाला उत्पाद बेचा जाता है, तो उसे मिस-सेलिंग माना जाएगा। इसी तरह किसी उत्पाद के बारे में अधूरी, भ्रामक या गलत जानकारी देना भी नियमों का उल्लंघन माना जाएगा। ग्राहक की स्पष्ट और सूचित सहमति के बिना किसी वित्तीय उत्पाद की बिक्री पर भी रोक रहेगी। इसके अलावा किसी एक सेवा का लाभ लेने के लिए ग्राहक को दूसरा उत्पाद खरीदने के लिए मजबूर करना भी प्रतिबंधित श्रेणी में शामिल किया गया है।

    RBI ने डिजिटल युग की चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए एजेंटों, मार्केटिंग एजेंसियों और सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर्स की भूमिका पर भी विशेष ध्यान दिया है। हाल के वर्षों में बैंक और वित्तीय संस्थान अपने उत्पादों के प्रचार के लिए बाहरी एजेंसियों और डिजिटल माध्यमों का व्यापक उपयोग कर रहे हैं। नए प्रावधानों के तहत यदि कोई एजेंट या प्रचारक किसी उत्पाद के बारे में भ्रामक दावा करता है, तो उसकी जिम्मेदारी संबंधित बैंक या वित्तीय संस्था पर ही होगी। संस्थाएं यह तर्क देकर जिम्मेदारी से बच नहीं सकेंगी कि गलती किसी तीसरे पक्ष द्वारा की गई थी।

    नियमों में यह भी कहा गया है कि ग्राहकों को किसी भी वित्तीय उत्पाद की फीस, जोखिम, लॉक-इन अवधि, निकासी नियम और अन्य महत्वपूर्ण शर्तों की जानकारी स्पष्ट रूप से पहले ही उपलब्ध कराई जानी चाहिए। इससे ग्राहकों को सूचित निर्णय लेने में सहायता मिलेगी और बाद में विवाद की संभावनाएं कम होंगी। यदि किसी मामले में मिस-सेलिंग साबित होती है, तो प्रभावित ग्राहक को उचित राहत या धनवापसी भी मिल सकती है।

    केंद्रीय बैंक ने बिक्री से जुड़े प्रोत्साहन तंत्र पर भी निगरानी बढ़ाने का निर्णय लिया है। कई बार कर्मचारियों और एजेंटों को दिए जाने वाले इंसेंटिव उन्हें आक्रामक बिक्री के लिए प्रेरित करते हैं, जिससे ग्राहक हित प्रभावित हो सकते हैं। नए नियमों के तहत संस्थानों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनकी प्रोत्साहन नीतियां ग्राहकों पर अनावश्यक दबाव न बनाएं। हालांकि प्रदर्शन आधारित प्रोत्साहन पूरी तरह समाप्त नहीं किए गए हैं, लेकिन उनके संचालन पर अधिक निगरानी रखी जाएगी।

    विशेषज्ञों का मानना है कि इस फ्रेमवर्क के लागू होने से बैंकिंग और वित्तीय सेवाओं में पारदर्शिता बढ़ेगी, ग्राहकों का भरोसा मजबूत होगा और वित्तीय उत्पादों की बिक्री अधिक जिम्मेदार तरीके से की जा सकेगी। आने वाले समय में यह व्यवस्था उपभोक्ता अधिकारों की सुरक्षा और वित्तीय क्षेत्र में बेहतर प्रशासन सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।