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  • यमन और सऊदी अरब में हूती हमलों से बढ़ा तनाव, 58 सैनिकों की मौत के बाद मिडिल ईस्ट में युद्ध का खतरा गहराया

    यमन और सऊदी अरब में हूती हमलों से बढ़ा तनाव, 58 सैनिकों की मौत के बाद मिडिल ईस्ट में युद्ध का खतरा गहराया

    नई दिल्ली । यमन और सऊदी अरब में हुए ताजा हमलों के बाद मध्य पूर्व में तनाव एक बार फिर बढ़ता दिखाई दे रहा है। गुरुवार को यमन में सेना के ठिकानों को मिसाइल और ड्रोन से निशाना बनाए जाने की जानकारी सामने आई। इस हमले में 58 सैनिकों की मौत हो गई और कई अन्य घायल बताए गए हैं। इन हमलों के लिए ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। घटना के बाद यमन में सुरक्षा स्थिति और गंभीर हो गई है।

    यमन के रक्षा मंत्रालय के अनुसार, सैन्य ठिकानों पर बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन से हमला किया गया। हमले में बड़ी संख्या में सैनिक हताहत हुए। अधिकारियों ने कहा है कि इस कार्रवाई का जवाब उचित समय पर दिया जाएगा। सैन्य ठिकानों पर हुए हमले ने यमन में लंबे समय से जारी संघर्ष को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है।

    इसी बीच सऊदी अरब के नजरान शहर में भी हमला हुआ। यहां 11 लोगों के घायल होने की जानकारी सामने आई है। घायलों में सऊदी अरब के नागरिकों के साथ यमन, मिस्र और पाकिस्तान के नागरिक भी शामिल बताए गए हैं। घायलों में चार साल का एक बच्चा भी बताया गया है। हमले के बाद कुछ स्थानों पर आग लग गई, जिसके बाद बचाव दलों ने मौके पर पहुंचकर राहत और बचाव अभियान चलाया।

    यमन और सऊदी अरब में लगभग एक ही समय पर सामने आई इन घटनाओं ने क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है। खासतौर पर मिसाइल और ड्रोन के इस्तेमाल से यह आशंका पैदा हुई है कि संघर्ष का दायरा आगे और बढ़ सकता है। यदि इस तरह के हमले जारी रहते हैं तो इसका असर केवल दोनों देशों तक सीमित नहीं रहने की संभावना है।

    मध्य पूर्व में तनाव ऐसे समय बढ़ रहा है जब महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों को लेकर भी स्थिति संवेदनशील बनी हुई है। होर्मुज जलडमरूमध्य और बाब-अल-मंदेब जैसे प्रमुख समुद्री रास्तों से अंतरराष्ट्रीय व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति जुड़ी हुई है। इन मार्गों पर जहाजों की आवाजाही कम होने की खबरों ने वैश्विक आपूर्ति व्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ाई है।

    होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते की चर्चाओं के बीच क्षेत्रीय घटनाक्रम पर भी नजर बनी हुई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से दोनों देशों के बीच बातचीत आगे बढ़ने के संकेत दिए जाने के बावजूद क्षेत्र में सैन्य तनाव कम होता नजर नहीं आ रहा है। समुद्री मार्गों पर किसी नए शुल्क या सुरक्षा संकट की स्थिति में परिवहन लागत बढ़ सकती है, जिसका असर अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर पड़ सकता है।

    इसी दौरान लेबनान में हुए एक धमाके में दो इजराइली सैनिकों की मौत की जानकारी भी सामने आई है। अलग-अलग इलाकों में सामने आ रही ऐसी घटनाएं मध्य पूर्व की सुरक्षा स्थिति को और जटिल बना रही हैं। एक मोर्चे पर तनाव कम होने की उम्मीद के बीच दूसरे क्षेत्र में हिंसा बढ़ने से स्थायी शांति की कोशिशों को चुनौती मिल रही है।

    हूती संगठन यमन का एक सशस्त्र विद्रोही संगठन है, जो लंबे समय से यमन की सरकार और सऊदी समर्थित गठबंधन के खिलाफ संघर्ष करता रहा है। अमेरिका और उसके सहयोगी देशों का आरोप है कि ईरान हूतियों को हथियार और सैन्य सहायता उपलब्ध कराता है। इसी वजह से हूती गतिविधियों को ईरान और क्षेत्रीय शक्तियों के बीच व्यापक तनाव से जोड़कर देखा जाता है।

    माना जाता है कि क्षेत्र में किसी एक पक्ष पर सैन्य या राजनीतिक दबाव बढ़ने पर दूसरे मोर्चों पर गतिविधियां तेज हो सकती हैं। ताजा हमलों ने इसी आशंका को फिर मजबूत किया है। यमन और सऊदी अरब में हुए हमलों के बाद अब सबसे बड़ी चुनौती तनाव को और फैलने से रोकना है। आने वाले दिनों में सैन्य जवाब, समुद्री मार्गों की स्थिति और अमेरिका-ईरान बातचीत का असर पूरे मध्य पूर्व के घटनाक्रम पर पड़ सकता है।

  • भारतीय नागरिकों से यात्रा टालने और उपलब्ध उड़ानों से जल्द देश छोड़ने की अपील..

    भारतीय नागरिकों से यात्रा टालने और उपलब्ध उड़ानों से जल्द देश छोड़ने की अपील..

    नई दिल्ली । ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति को एक बार फिर गंभीर बना दिया है। लगातार हो रही सैन्य कार्रवाई और अस्थिर हालात के बीच भारत सरकार ने अपने नागरिकों के लिए अहम यात्रा सलाह जारी करते हुए उन्हें अतिरिक्त सतर्कता बरतने को कहा है। तेहरान स्थित भारतीय दूतावास ने स्पष्ट किया है कि वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए भारतीय नागरिक अनावश्यक रूप से ईरान की यात्रा करने से बचें और जब तक हालात सामान्य नहीं हो जाते, अपनी यात्रा स्थगित रखें।

    भारतीय दूतावास की ओर से जारी एडवाइजरी में कहा गया है कि हाल के दिनों में ईरान के विभिन्न हिस्सों में सुरक्षा जोखिम लगातार बढ़ा है। इसी कारण उन भारतीय नागरिकों को विशेष सलाह दी गई है जो किसी भी उद्देश्य से ईरान जाने की योजना बना रहे हैं। दूतावास का कहना है कि मौजूदा हालात में यात्रा टालना ही सबसे सुरक्षित विकल्प होगा। सुरक्षा स्थिति में सुधार होने के बाद ही यात्रा संबंधी निर्णय लेने पर विचार किया जाना चाहिए।

    एडवाइजरी में उन भारतीय नागरिकों के लिए भी महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए गए हैं जो पहले से ईरान में मौजूद हैं। दूतावास ने उन्हें उपलब्ध वाणिज्यिक उड़ानों का उपयोग करते हुए अस्थायी रूप से ईरान छोड़ने पर विचार करने की सलाह दी है। इसका उद्देश्य किसी भी संभावित सुरक्षा जोखिम से भारतीय नागरिकों को सुरक्षित रखना है। साथ ही यह भी कहा गया है कि यात्रा संबंधी निर्णय लेते समय उपलब्ध विकल्पों और स्थानीय परिस्थितियों का ध्यान रखा जाए।

    जो भारतीय नागरिक फिलहाल ईरान में ही रहने का निर्णय लेते हैं, उन्हें अत्यधिक सावधानी बरतने की सलाह दी गई है। दूतावास ने कहा है कि सभी नागरिक स्थानीय घटनाक्रम पर लगातार नजर बनाए रखें और किसी भी प्रकार की सैन्य गतिविधि वाले क्षेत्रों से दूर रहें। विशेष रूप से ईरान के दक्षिणी तटीय इलाकों और संवेदनशील सैन्य क्षेत्रों में जाने से बचने की सलाह दी गई है। इसके अलावा स्थानीय प्रशासन द्वारा जारी सभी सुरक्षा निर्देशों और प्रतिबंधों का पूरी तरह पालन करने को कहा गया है।

    भारतीय दूतावास ने ईरान में मौजूद सभी भारतीय नागरिकों से जल्द से जल्द अपना पंजीकरण कराने की अपील भी की है। जिन लोगों ने अब तक दूतावास के पास अपना विवरण दर्ज नहीं कराया है, उन्हें तत्काल पंजीकरण कराने के लिए कहा गया है ताकि किसी भी आपात स्थिति में उनसे आसानी से संपर्क किया जा सके और आवश्यक सहायता उपलब्ध कराई जा सके। साथ ही नागरिकों से दूतावास की आधिकारिक सूचनाओं पर नियमित नजर बनाए रखने की भी सलाह दी गई है।

    क्षेत्र में जारी तनाव के कारण सुरक्षा एजेंसियां लगातार स्थिति पर नजर रखे हुए हैं। भारत सरकार भी अपने नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए हालात की लगातार समीक्षा कर रही है। यदि क्षेत्रीय परिस्थितियों में कोई बड़ा बदलाव होता है तो उसके अनुरूप नई सलाह और आवश्यक कदम उठाए जा सकते हैं। फिलहाल सरकार का जोर भारतीय नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने, उन्हें जोखिम वाले क्षेत्रों से दूर रखने और आवश्यक होने पर सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने की तैयारी बनाए रखने पर है। ऐसी स्थिति में नागरिकों से अपील की गई है कि वे अफवाहों से बचें, केवल आधिकारिक सूचनाओं पर भरोसा करें और जारी सुरक्षा निर्देशों का पूरी तरह पालन करें।

  • राज कपूर के गैर-पेशेवर व्यवहार के कारण उनसे नाराज थीं साधना; 'दूल्हा दुल्हन' के बाद फिर कभी साथ काम न करने की खाई थी कसम

    राज कपूर के गैर-पेशेवर व्यवहार के कारण उनसे नाराज थीं साधना; 'दूल्हा दुल्हन' के बाद फिर कभी साथ काम न करने की खाई थी कसम


    नई दिल्ली ।
    हिंदी सिनेमा के इतिहास में ‘शोमैन’ के नाम से विख्यात दिग्गज अभिनेता और निर्देशक राज कपूर अपनी बेहतरीन फिल्मों के साथ-साथ सह-कलाकारों के साथ अपने संबंधों को लेकर भी सदैव चर्चा में रहे। जहां एक ओर फिल्म उद्योग की अधिकांश अभिनेत्रियां उनके साथ काम करने के अवसर तलाशती थीं, वहीं दूसरी ओर साठ के दशक की शीर्ष और बेहद खूबसूरत अभिनेत्री साधना शिवदसानी के साथ उनके रिश्तों में एक ऐसी तल्खी आई जो जीवनभर बरकरार रही। फिल्मी गलियारों में यह बात आज भी बेहद चर्चा का विषय रहती है कि अपनी बेमिसाल खूबसूरती और अभिनय से दर्शकों के दिलों पर राज करने वाली साधना, राज कपूर के एक विशेष व्यवहार के कारण उनसे अत्यधिक नाराज थीं और उन्होंने जीवन में दोबारा कभी उनके साथ स्क्रीन साझा नहीं की।
    इस ऐतिहासिक तल्खी और विवाद की मुख्य वजह वर्ष 1964 में प्रदर्शित हुई लोकप्रिय फिल्म ‘दूल्हा दुल्हन’ के निर्माण के दौरान सामने आई थी। तत्कालीन समय की फिल्मी पत्रिकाओं और सूत्रों के अनुसार, इस फिल्म के मुख्य अभिनेता राज कपूर उस दौर में अपने कई अन्य बड़े प्रोजेक्ट्स और निर्देशन कार्यों में अत्यधिक व्यस्त थे। इस व्यस्तता के कारण वह अक्सर फिल्म ‘दूल्हा दुल्हन’ के सेट पर काफी विलंब से पहुंचते थे, जिसके चलते पूरी यूनिट का काम प्रभावित होता था। सेट पर समय की पाबंद और अपने काम के प्रति बेहद गंभीर रहने वाली अभिनेत्री साधना को राज कपूर के इस इंतजार में घंटों बैठना पड़ता था, जिसे उन्होंने पूरी तरह से गैर-पेशेवर आचरण माना।

    साधना ने इस व्यवहार को अपने काम और समय का अनादर समझा और इसी स्वाभिमान के चलते उन्होंने निर्णय लिया कि वह भविष्य में कभी भी राज कपूर के साथ किसी भी फिल्म में काम नहीं करेंगी। यद्यपि इस तल्खी को लेकर दोनों ही कलाकारों ने कभी सार्वजनिक रूप से कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया और न ही इसके कोई लिखित पुख्ता प्रमाण मिलते हैं, परंतु इसके बाद का फिल्मी इतिहास गवाह है कि इस सुपरहिट जोड़ी को दोबारा किसी फिल्म निर्माता ने एक साथ साइन नहीं किया। दोनों ने अपने पूरे करियर में मुख्य भूमिकाओं के रूप में केवल इसी एक फिल्म में साथ काम किया।

    दिलचस्प बात यह है कि व्यावसायिक रूप से ‘दूल्हा दुल्हन’ बॉक्स ऑफिस पर एक बेहद सफल फिल्म साबित हुई थी और इसके मधुर गीत आज भी संगीत प्रेमियों द्वारा बेहद पसंद किए जाते हैं। बहुत कम लोग इस ऐतिहासिक तथ्य से परिचित हैं कि इस मुख्य फिल्म से कई वर्ष पूर्व, जब साधना मात्र 15-16 वर्ष की थीं और एक स्थानीय डांस स्कूल में नृत्य की शिक्षा ले रही थीं, तब उन्होंने राज कपूर की कालजयी फिल्म ‘श्री 420’ के प्रसिद्ध गीत ‘मुड़ मुड़ के न देख’ में एक साधारण बैकग्राउंड डांसर के रूप में काम किया था। उस समय किसी ने यह नहीं सोचा था कि पृष्ठभूमि में नाचने वाली यही बच्ची आगे चलकर बॉलीवुड की सबसे बड़ी स्टार बनेगी और शोमैन के सामने अपने सिद्धांतों के लिए खड़ी होगी।

    मध्य प्रदेश सहित देश भर के पुराने सिनेमा प्रेमी आज भी इन दोनों कलाकारों के अभिनय और उनके बीच की इस मूक असहमति को बॉलीवुड के स्वर्णिम युग की एक अनसुनी दास्तान के रूप में याद करते हैं। साधना का यह कड़ा रुख यह स्पष्ट करता है कि उस दौर की अभिनेत्रियां न केवल अपने स्टारडम बल्कि अपने आत्मसम्मान और कार्यस्थल पर व्यावसायिकता को लेकर कितनी सजग थीं, भले ही सामने फिल्म उद्योग का सबसे बड़ा नाम ही क्यों न खड़ा हो। राज कपूर के साथ दोबारा काम न करने के फैसले के बावजूद साधना ने अपने दौर के अन्य सभी सुपरस्टार्स के साथ एक से बढ़कर एक ब्लॉकबस्टर फिल्में दीं और हिंदी सिनेमा में अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज कराया।

  • कुवैत का बड़ा दावा, ईरान ने डिसैलिनेशन प्लांट पर किया हमला, बिजली उत्पादन और पेयजल आपूर्ति पर मंडराया संकट

    कुवैत का बड़ा दावा, ईरान ने डिसैलिनेशन प्लांट पर किया हमला, बिजली उत्पादन और पेयजल आपूर्ति पर मंडराया संकट

    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच कुवैत ने ईरान पर अपने महत्वपूर्ण डिसैलिनेशन और बिजली संयंत्र पर हमला करने का आरोप लगाया है। कुवैती प्रशासन का कहना है कि इस हमले से संयंत्र को भारी नुकसान पहुंचा है और कुछ हिस्सों में आग भी लग गई थी। घटना के बाद राहत और मरम्मत कार्य तत्काल शुरू कर दिया गया है, जबकि सुरक्षा एजेंसियां पूरे मामले की निगरानी कर रही हैं।

    कुवैत के बिजली, पानी और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के अनुसार हमले के कारण बिजली उत्पादन से जुड़ी कई इकाइयों को क्षति पहुंची है। अधिकारियों ने बताया कि आग पर समय रहते काबू पा लिया गया, जिससे बड़े स्तर पर नुकसान को रोका जा सका। फिलहाल तकनीकी विशेषज्ञ प्रभावित इकाइयों का निरीक्षण कर रहे हैं और संयंत्र को दोबारा पूरी क्षमता से संचालित करने की दिशा में कार्य जारी है।

    कुवैत के लिए डिसैलिनेशन संयंत्र अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। यह देश प्राकृतिक मीठे जल स्रोतों की कमी के कारण अपनी अधिकांश पेयजल जरूरतों के लिए समुद्र के खारे पानी को मीठा बनाने की प्रक्रिया पर निर्भर है। ऐसे में यदि इस तरह के संयंत्र लंबे समय तक प्रभावित रहते हैं तो जल आपूर्ति के साथ-साथ बिजली व्यवस्था पर भी व्यापक असर पड़ सकता है। सरकार ने कहा है कि आवश्यक सेवाओं को बनाए रखने के लिए वैकल्पिक व्यवस्थाओं पर भी काम किया जा रहा है।

    कुवैती प्रशासन ने कहा कि इस प्रकार के महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर हमला केवल आर्थिक नुकसान तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे आम नागरिकों के दैनिक जीवन और आवश्यक सेवाओं पर भी गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। इसी कारण संबंधित एजेंसियों को नुकसान का त्वरित आकलन करने और संयंत्र को जल्द से जल्द सामान्य संचालन में लाने के निर्देश दिए गए हैं।

    इस घटना के बीच पश्चिम एशिया में सैन्य गतिविधियां भी तेज बनी हुई हैं। क्षेत्र में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण कई रणनीतिक ठिकानों और बुनियादी ढांचों को लेकर सुरक्षा चिंताएं लगातार बढ़ रही हैं। हाल के दिनों में दोनों पक्षों के बीच बढ़ी सैन्य कार्रवाई ने पूरे क्षेत्र में अस्थिरता का माहौल पैदा कर दिया है, जिसका असर पड़ोसी देशों पर भी दिखाई देने लगा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि ऊर्जा और जल आपूर्ति से जुड़े प्रतिष्ठानों पर किसी भी प्रकार का हमला केवल संबंधित देश ही नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र की स्थिरता को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में कुवैत द्वारा लगाए गए आरोपों के बाद क्षेत्रीय सुरक्षा और कूटनीतिक गतिविधियों पर भी नजरें टिकी हुई हैं। फिलहाल इस घटना के संबंध में आधिकारिक स्तर पर आगे की जांच और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया का इंतजार किया जा रहा है, जबकि कुवैत सरकार ने आवश्यक सेवाओं को निर्बाध बनाए रखने के लिए सभी संबंधित विभागों को सतर्क रहने के निर्देश दिए हैं।

  • ईरान से टकराव में रोज अरबों डॉलर खर्च कर रहा अमेरिका

    ईरान से टकराव में रोज अरबों डॉलर खर्च कर रहा अमेरिका

    वॉशिंगटन। दुनिया में जब भी कोई युद्ध शुरू होता है तो आमतौर पर ध्यान बमबारी, मिसाइल हमलों और सैनिकों की तैनाती पर जाता है, लेकिन हर युद्ध की एक बड़ी कीमत भी होती है। अमेरिका और ईरान (Iran) के बीच जारी संघर्ष में अमेरिका का सैन्य खर्च तेजी से बढ़ रहा है। शुरुआती आकलन बताते हैं कि अमेरिका इस अभियान पर हर दिन अरबों डॉलर खर्च कर रहा है।

    यह खर्च केवल हथियारों के इस्तेमाल तक सीमित नहीं है। इसमें मिसाइल, लड़ाकू विमानों का संचालन, नौसैनिक बेड़े की तैनाती, रक्षा प्रणाली, सैन्य ठिकानों का संचालन और युद्ध में हुए नुकसान की भरपाई भी शामिल है।

    रोज करीब 891 मिलियन डॉलर का खर्च
    वॉशिंगटन स्थित थिंक टैंक Center for Strategic and International Studies के विश्लेषण के अनुसार, अमेरिका इस संघर्ष में प्रति दिन करीब 891.4 मिलियन डॉलर खर्च कर रहा है। यह अनुमान सैन्य अभियान Operation Epic Fury के पहले 100 घंटों के खर्च के आधार पर लगाया गया है।

    इन शुरुआती घंटों में कुल खर्च करीब 3.7 अरब डॉलर रहा, जिससे रोजाना खर्च का औसत करीब 891 मिलियन डॉलर निकाला गया। कुछ अन्य विश्लेषणों के मुताबिक वास्तविक खर्च इससे भी ज्यादा हो सकता है और यह 1 अरब से बढ़कर 1.43 अरब डॉलर प्रतिदिन तक पहुंच सकता है।

    सबसे ज्यादा पैसा हथियारों पर
    इस युद्ध में सबसे बड़ा खर्च हथियारों और मिसाइलों पर हो रहा है। शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक करीब 3.1 अरब डॉलर केवल इस्तेमाल किए गए हथियारों और गोला-बारूद की भरपाई (म्यूनिशन रिप्लेसमेंट) पर खर्च किए गए हैं।

    इसके अलावा सैन्य ऑपरेशन चलाने में भी भारी खर्च आता है। इसमें युद्धपोत, लड़ाकू विमान, सैन्य ठिकाने और सैनिकों की तैनाती शामिल है। शुरुआती चरण में प्रत्यक्ष सैन्य संचालन पर लगभग 196 मिलियन डॉलर खर्च हुए, जबकि युद्ध में हुए नुकसान और सैन्य ढांचे की मरम्मत पर करीब 350 मिलियन डॉलर का अनुमान लगाया गया है।

    Pentagon के अधिकारियों के अनुसार, संघर्ष के पहले सप्ताह में ही कुल खर्च करीब 6 अरब डॉलर तक पहुंच गया था, जिसमें लगभग 4 अरब डॉलर सिर्फ मिसाइल और उन्नत इंटरसेप्टर सिस्टम पर खर्च हुए।

    विमानवाहक पोत की तैनाती भी महंगी
    युद्ध के दौरान अमेरिका ने अपने विमानवाहक पोत और नौसैनिक बेड़े को भी क्षेत्र में तैनात किया है। अनुमान है कि दो विमानवाहक पोतों के संचालन पर ही रोज करीब 13 मिलियन डॉलर खर्च होते हैं। इसके अलावा हवाई हमले, मिसाइल रक्षा प्रणाली और सैनिकों की आवाजाही जैसे कई सैन्य अभियानों से खर्च लगातार बढ़ रहा है।

    युद्ध लंबा चला तो बढ़ेगी लागत
    विश्लेषकों का कहना है कि अभी संघर्ष शुरुआती चरण में है, इसलिए खर्च बहुत ज्यादा दिखाई दे रहा है। अगर युद्ध लंबे समय तक चला तो इसकी कुल लागत और तेजी से बढ़ सकती है।

    पिछले युद्धों ने भी खाली किया खजाना
    अमेरिका के पिछले युद्धों का इतिहास बताता है कि लंबे सैन्य अभियान बेहद महंगे साबित होते हैं।

    Iraq War पर अमेरिका ने करीब 2 ट्रिलियन डॉलर खर्च किए।

    War in Afghanistan की लागत लगभग 2.3 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गई।

    9/11 के बाद विभिन्न युद्ध अभियानों पर अमेरिका का कुल खर्च करीब 8 ट्रिलियन डॉलर तक आंका गया है, जिसमें सैनिकों की देखभाल, कर्ज पर ब्याज और अन्य दीर्घकालिक खर्च भी शामिल हैं।

    असली खतरा तेल आपूर्ति पर
    विशेषज्ञों के मुताबिक इस संकट का सबसे बड़ा आर्थिक खतरा केवल युद्ध नहीं बल्कि ऊर्जा आपूर्ति है। Strait of Hormuz दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल परिवहन का प्रमुख समुद्री मार्ग है। अगर यहां लंबे समय तक बाधा आती है तो वैश्विक ऊर्जा बाजार पर बड़ा असर पड़ सकता है।

    अनुमान है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें 120 से 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचती हैं, तो अमेरिका में महंगाई 1 से 2 प्रतिशत अंक तक बढ़ सकती है।

    वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी असर
    तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी से केवल ईंधन ही महंगा नहीं होगा, बल्कि परिवहन लागत, औद्योगिक उत्पादन और वैश्विक बाजारों पर भी दबाव बढ़ेगा। साथ ही अमेरिकी सेना का ईंधन खर्च भी बढ़ जाएगा, जिससे युद्ध की कुल लागत और ज्यादा हो सकती है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी स्थिति में वैश्विक अर्थव्यवस्था को 100 अरब डॉलर से ज्यादा का झटका लग सकता है। फिलहाल अमेरिकी अर्थव्यवस्था शुरुआती खर्च संभाल सकती है, लेकिन अगर युद्ध लंबा खिंचा तो इसका आर्थिक बोझ काफी भारी पड़ सकता है।

  • इजरायल और अमेरिका के बीच संघर्ष गहराया, लेबनान तक फैल रहा तनाव

    इजरायल और अमेरिका के बीच संघर्ष गहराया, लेबनान तक फैल रहा तनाव

    तेहरान। इजरायल, ईरान और अमेरिका के बीच जारी सैन्य टकराव अब और अधिक भीषण होता जा रहा है। ईरान के कई सैन्य ठिकानों पर भारी बमबारी की खबरें सामने आई हैं, जिनमें शीर्ष सैन्य अधिकारियों, सैनिकों और आम नागरिकों के हताहत होने की आशंका जताई जा रही है।

    लेबनान तक फैलता संघर्ष
    तनाव अब पड़ोसी लेबनान तक फैल गया है। ईरान के समर्थन में माने जाने वाले संगठन हिज्बुल्लाह ने इजरायल पर हुए हमलों की जिम्मेदारी ली है। इसके बाद इजरायल ने उत्तरी मोर्चे पर जवाबी कार्रवाई तेज करते हुए हिज्बुल्लाह के ठिकानों पर गोलाबारी शुरू कर दी।

    मिसाइल और ड्रोन हमलों से बढ़ा तनाव
    रिपोर्ट्स के मुताबिक, इजरायल के शहर तेल अवीव के पास मिसाइल गिरने और यरूशलम पर भी हमले की कोशिश की गई। इसके अलावा वेस्ट बैंक के ऊपर संदिग्ध ड्रोन देखे जाने की बात कही गई। इन हमलों को पहले ईरान की सीधी प्रतिक्रिया माना जा रहा था, लेकिन बाद में हिज्बुल्लाह ने जिम्मेदारी ली।
    इजरायल का सैन्य अभियान
    इजरायली सेना Israel Defense Forces (IDF) ने बताया कि उसने पहले से तैयार सैन्य योजना के तहत कार्रवाई शुरू की है। इजरायल का आरोप है कि हिज्बुल्लाह, ईरानी नेतृत्व के निर्देश पर उसके नागरिक इलाकों को निशाना बना रहा है।

    अमेरिका का कड़ा रुख
    इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया है कि जब तक अमेरिका अपने रणनीतिक लक्ष्यों को हासिल नहीं कर लेता, तब तक अभियान जारी रहेगा। उनका कहना है कि कार्रवाई का उद्देश्य ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम को समाप्त करना और Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) की सैन्य क्षमता को कमजोर करना है।

    क्षेत्रीय अस्थिरता को लेकर बढ़ी चिंता
    लगातार हो रही सैन्य कार्रवाइयों से पूरे मध्य पूर्व में व्यापक अस्थिरता का खतरा बढ़ गया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आशंका जताई जा रही है कि यदि तनाव नहीं थमा तो यह संघर्ष बहु-देशीय युद्ध का रूप ले सकता है।