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  • दिल्ली में जुटेंगे ब्रिक्स देशों के नेता… पश्चिम एशिया संघर्ष पर टकराव की आशंका!

    दिल्ली में जुटेंगे ब्रिक्स देशों के नेता… पश्चिम एशिया संघर्ष पर टकराव की आशंका!


    नई दिल्ली।
    ब्रिक्स शिखर सम्मेलन (BRICS Summit) में पश्चिम एशिया संघर्ष (West Asia Conflict) को लेकर सदस्य देशों में टकराव की आशंका है लेकिन भारत (India) ने इस मुद्दे पर आम सहमति बनाने के लिए कूटनीतिक प्रयास तेज कर दिए हैं। भारत की कोशिश है कि सभी मुद्दों पर सहमति से संयुक्त बयान जारी हो।

    पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच भारत की अध्यक्षता में 12-13 सितंबर को दिल्ली के भारत मंडपम में ब्रिक्स सम्मेलन आयोजित हो रहा। भारत की अध्यक्षता में चौथी बार आयोजित हो रहे सम्मेलन का विषय, ‘लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण’ है।

    सम्मेलन के लिए भारत ने बाकी 10 सदस्य देशों के अलावा दस पार्टनर देशों को भी आमंत्रित किया है। इसमें में बेलारूस, बोलिविया, क्यूबा, कजाकिस्तान, मलेशिया, नाइजीरिया, थाइलैंड, युगांडा, उजबेकिस्तान एवं वियतनाम शामिल हैं।


    बांग्लादेश को भी आमंत्रित किया गया

    इसके अलावा बिमस्टेक चेयर के नाते बांग्लादेश को भी आमंत्रित किया गया है। सूत्रों के अनुसार ईरान की कोशिश रहेगी कि संयुक्त बयान में अमेरिका और इजरायल के हमले की निंदा की जाए क्योंकि यह एक ब्रिक्स सदस्य देश की संप्रभुता पर हमला है।

    दूसरे, उसका आरोप है कि एक दूसरे सदस्य यूएई ने हमलों में अमेरिका का साथ दिया तथा अपनी भूमि का इस्तेमाल होने दिया। इसी के चलते मई में विदेश मंत्रियों की बैठक में इस मुद्दे पर बयान जारी नहीं हो सका। यह स्थिति शिखर सम्मेलन में भी हो सकती है।


    ब्रिक्स मुद्रा शुरू करने का प्रस्ताव नहीं

    विदेश मंत्रालय के अनुसार यूरो की तर्ज पर ब्रिक्स मुद्रा शुरू करने का कोई प्रस्ताव नहीं है। दरअसल, इस मुद्दे पर अमेरिकी राष्ट्रपति आक्रामक हैं और वे बार-बार ब्रिक्स देशों को चेतावनी दे रहे हैं। सूत्रों ने कहा कि ब्रिक्स देशों के बीच व्यापार के दौरान लेन-देन की कीमत को कम करने के लिए व्यवहारिक तरीके अपनाने पर बातचीत चल रही है। इनमें स्थानीय मुद्रा में कारोबार जैसे विकल्प शामिल हैं। सितंबर में ब्रिक्स वित्त मंत्रियों की बैठक की जाएगी।


    भारत हमेशा कूटनीति के पक्ष में रहा

    सूत्रों ने कहा कि संयुक्त बयान में ईरान पर हमले की निंदा को शामिल करना संभव नहीं होगा। इसके पीछे वजह यह है कि एक तो ब्रिक्स सुरक्षा से जुड़ा मंच नहीं है। दूसरे, भारत अपनी अध्यक्षता के दौरान ऐसा कोई संदेश नहीं देना चाहेगा जिससे पश्चिम को नाराजगी हो। सूत्रों ने कहा कि भारत हमेशा कूटनीति के पक्ष में रहा है। सभी सदस्य चाहते हैं कि संकट जल्द खत्म हो और जलमार्गों से निर्बाध नौवहन शुरू हो। इस विषय को शामिल किया जा सकता है।

  • टीएमसी की अंदरूनी कलह पर सियासी संग्राम, कीर्ति आजाद और निशिकांत दुबे के बीच सोशल मीडिया पर तीखी नोकझोंक के बाद दिखी पारिवारिक गर्माहट

    टीएमसी की अंदरूनी कलह पर सियासी संग्राम, कीर्ति आजाद और निशिकांत दुबे के बीच सोशल मीडिया पर तीखी नोकझोंक के बाद दिखी पारिवारिक गर्माहट

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की राजनीति में जारी हलचल और तृणमूल कांग्रेस के भीतर सामने आ रहे असंतोष के बीच एक दिलचस्प राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिला, जब तृणमूल कांग्रेस सांसद कीर्ति आजाद और भारतीय जनता पार्टी के सांसद निशिकांत दुबे सोशल मीडिया मंच पर आमने-सामने आ गए। हालांकि आरोप-प्रत्यारोप से शुरू हुई यह बहस अंततः राजनीतिक मतभेदों से आगे बढ़कर पुराने व्यक्तिगत और पारिवारिक संबंधों की चर्चा तक पहुंच गई।

    पूरा विवाद उस समय शुरू हुआ जब तृणमूल कांग्रेस में कथित असंतोष और दल छोड़ने की चर्चाओं को लेकर कीर्ति आजाद ने भाजपा पर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्षी दलों में सेंध लगाने की कोशिशें की जा रही हैं और इसे एक सुनियोजित राजनीतिक अभियान का हिस्सा बताया। इस दौरान उन्होंने कुछ भाजपा नेताओं के नामों का उल्लेख करते हुए पार्टी के खिलाफ तीखे सवाल उठाए।

    कीर्ति आजाद के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने सोशल मीडिया पर जवाब दिया। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में हर व्यक्ति को अपनी बात रखने का अधिकार है और यदि किसी को प्रेस वार्ता करनी है तो उसके लिए उनके आवास का उपयोग भी किया जा सकता है। इसके साथ ही उन्होंने अपने और कीर्ति आजाद के पुराने राजनीतिक तथा पारिवारिक संबंधों का भी जिक्र किया।

    निशिकांत दुबे ने याद दिलाया कि दोनों नेता लंबे समय तक एक ही राजनीतिक दल में साथ सांसद रह चुके हैं। उन्होंने यह भी कहा कि कीर्ति आजाद के पिता उनके लिए एक अभिभावक समान थे और उनके परिवार के साथ पुराने संबंध रहे हैं। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि कीर्ति आजाद का पैतृक गांव उनके संसदीय क्षेत्र में आता है और वहां के लोगों से उनका वर्षों पुराना जुड़ाव है।

    इस जवाब के बाद राजनीतिक बहस का स्वर कुछ नरम पड़ता दिखाई दिया। कीर्ति आजाद ने भी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके और निशिकांत दुबे के बीच कोई व्यक्तिगत संघर्ष नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि राजनीतिक मतभेद लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन उन्हें व्यक्तिगत रिश्तों पर हावी नहीं होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि विचारों में असहमति हो सकती है, लेकिन मनभेद की स्थिति नहीं बननी चाहिए।

    कीर्ति आजाद ने अपने आरोपों को दोहराते हुए कहा कि वे केवल राजनीतिक घटनाक्रमों और दल-बदल से जुड़ी गतिविधियों पर सवाल उठा रहे थे। उनके अनुसार, जिन घटनाओं का वे उल्लेख कर रहे हैं, वे सार्वजनिक रूप से दिखाई दे रही हैं और उन्हें अलग से प्रमाणित करने की आवश्यकता नहीं है। हालांकि इसके साथ उन्होंने व्यक्तिगत रिश्तों का सम्मान बनाए रखने की बात भी कही।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम भारतीय राजनीति की उस परंपरा को भी दर्शाता है, जहां तीखे राजनीतिक मतभेदों के बावजूद कई नेताओं के बीच व्यक्तिगत संबंध और आपसी सम्मान कायम रहता है। सोशल मीडिया के दौर में जहां राजनीतिक बहसें अक्सर कटुता का रूप ले लेती हैं, वहीं इस मामले में अंततः संवाद का स्वर अपेक्षाकृत संयमित दिखाई दिया।

    तृणमूल कांग्रेस के भीतर जारी राजनीतिक गतिविधियों और कथित असंतोष को लेकर चर्चाएं अभी भी जारी हैं। ऐसे में कीर्ति आजाद और निशिकांत दुबे के बीच हुई यह बहस केवल दो नेताओं के बीच की प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि मौजूदा राजनीतिक माहौल की झलक भी मानी जा रही है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी और तेज हो सकती है, लेकिन फिलहाल दोनों नेताओं ने यह संकेत दिया है कि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद व्यक्तिगत सम्मान और संवाद की परंपरा कायम रहनी चाहिए।