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  • 'मुसलमान रिक्शावाला अगर 5 रुपये मांगे तो उसे 4 रुपये दो', हिमंत बिस्वा सरमा के बयान पर भड़की कांग्रेस

    'मुसलमान रिक्शावाला अगर 5 रुपये मांगे तो उसे 4 रुपये दो', हिमंत बिस्वा सरमा के बयान पर भड़की कांग्रेस

    नई दिल्ली । असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के एक विवादित बयान ने देश की राजनीति में नया बवंडर खड़ा कर दिया है। मुस्लिम समुदाय को लेकर की गई टिप्पणी पर कांग्रेस ने तीखी प्रतिक्रिया दी है और मुख्यमंत्री पर संविधान की शपथ का उल्लंघन करने तथा समाज में नफरत फैलाने का आरोप लगाया है। कांग्रेस ने इस मामले में भाजपा और आरएसएस को भी कटघरे में खड़ा किया है।

    रिक्शावाले वाले बयान पर कांग्रेस का तीखा हमला

    कांग्रेस ने गुरुवार (29 जनवरी 2026) को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर हिमंता बिस्वा सरमा का एक वीडियो साझा किया, जिसमें वे कथित तौर पर कहते सुनाई दे रहे हैं, “अगर कोई मुसलमान रिक्शावाला 5 रुपये मांगे तो उसे 4 रुपये दो… खूब परेशान करो।”
    इस वीडियो को साझा करते हुए कांग्रेस ने कहा कि यह बयान न सिर्फ असंवैधानिक है, बल्कि समाज को बांटने वाला और नफरत फैलाने वाला है।

    ‘संविधान और गंगा-जमुनी तहजीब पर हमला’

    कांग्रेस ने अपने बयान में कहा,
    “यह घटिया बयान असम के मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लाडले हिमंता बिस्वा सरमा का है। वे संविधान की शपथ लेकर उसी की धज्जियां उड़ा रहे हैं। यह भाजपा-आरएसएस की नफरती सोच का प्रतिबिंब है। यह बयान बाबा साहेब अंबेडकर के संविधान और हमारी गंगा-जमुनी तहजीब पर सीधा हमला है।”
    पार्टी ने मांग की कि इस बयान के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा पूरे देश से माफी मांगें।

    ‘मियां’ समुदाय को लेकर पहले भी दे चुके हैं बयान

    यह पहला मौका नहीं है जब असम के मुख्यमंत्री अपने बयानों को लेकर विवादों में आए हों। इससे पहले मंगलवार (27 जनवरी 2026) को डिगबोई में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने मतदाता सूची के विशेष संशोधन (एसआईआर) को लेकर कहा था कि इस प्रक्रिया से किसी असमिया नागरिक को दिक्कत नहीं हो रही, बल्कि केवल ‘मियां’ (बांग्ला भाषी मुस्लिम) समुदाय को ही परेशानी है।

    ‘बांग्लादेश में वोट दें’ वाले बयान ने बढ़ाया विवाद

    हिमंता बिस्वा सरमा ने यह भी कहा था कि ‘मियां’ समुदाय के लोगों को असम में वोट देने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए और उन्हें बांग्लादेश में वोट देना चाहिए। उन्होंने कहा,
    “हम यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि वे असम में वोट न दे सकें। अगर उन्हें दिक्कत हो रही है, तो हमें क्यों चिंता करनी चाहिए?”

    राजनीतिक और सामाजिक असर पर सवाल

    मुख्यमंत्री के इन बयानों के बाद राजनीतिक गलियारों में बहस तेज हो गई है। विपक्ष का आरोप है कि ऐसे बयान सामाजिक सौहार्द, संवैधानिक मूल्यों और लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरा हैं। वहीं, यह मुद्दा आने वाले समय में असम की राजनीति में और तीखा होने के संकेत दे रहा है।

  • मेरे पिता का नाम नहीं मिटाया जा सकता, रितेश देशमुख ने रवींद्र चव्हाण की विवादित टिप्पणी पर किया करारा पलटवार

    मेरे पिता का नाम नहीं मिटाया जा सकता, रितेश देशमुख ने रवींद्र चव्हाण की विवादित टिप्पणी पर किया करारा पलटवार


    मुंबई। महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर सियासी तूफान उठ खड़ा हुआ है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के महाराष्ट्र इकाई अध्यक्ष रवींद्र चव्हाण की दिवंगत पूर्व मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख के बारे में विवादित टिप्पणी ने राजनीतिक गलियारों में गर्माहट बढ़ा दी है। चव्हाण ने सोमवार को कहा था कि विलासराव देशमुख की यादें उनके गृह नगर लातूर से मिटा दी जाएंगी। इस बयान के बाद कांग्रेस और एनसीपी समेत कई दलों ने कड़ी आपत्ति जताई।

    इस विवाद पर रितेश देशमुख, जो कि विलासराव देशमुख के बेटे और बॉलीवुड अभिनेता हैं, ने मंगलवार को भावुक लेकिन स्पष्ट प्रतिक्रिया दी। उन्होंने एक वीडियो बयान जारी करते हुए कहा, मैं हाथ जोड़कर कहना चाहता हूं कि जो लोग जनता के लिए जीते हैं, उनके नाम लोगों के दिलों में गहरी छाप छोड़ जाते हैं। लिखे हुए को मिटाया जा सकता है, लेकिन दिलों पर पड़ी गहरी छाप को नहीं मिटाया जा सकता।

    रितेश का यह बयान सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया और उनके समर्थन में लोग सामने आए।

    विलासराव देशमुख महाराष्ट्र के कद्दावर नेताओं में से एक थे। उन्होंने लातूर से कई बार विधायक का चुनाव जीता, दो बार राज्य के मुख्यमंत्री पद पर कार्य किया और केंद्र सरकार में भी मंत्री रहे। उनके योगदान को महाराष्ट्र के विकास और प्रशासनिक स्थिरता के लिए याद किया जाता है। ऐसे में उनके नाम और विरासत को लेकर की गई टिप्पणी ने स्वाभाविक रूप से लोगों की भावनाओं को आहत किया।

    कांग्रेस ने रवींद्र चव्हाण के बयान की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि यह सत्ता के अहंकार और दिवंगत नेता के योगदान को कमतर आंकने का प्रयास है। पार्टी ने कहा कि इस तरह के बयान राजनीतिक मर्यादाओं और देशमुख की विरासत के प्रति अज्ञानता को दर्शाते हैं।

    इसी विवाद में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (अजित पवार गुट) भी कूद पड़ी। पार्टी के वरिष्ठ नेता नवाब मलिक ने कहा कि दिवंगत नेताओं को लेकर नैतिक मर्यादा का पालन होना चाहिए। उन्होंने कहा, “विलासराव देशमुख लातूर से कई बार चुनाव जीत चुके हैं, महाराष्ट्र के कई बार मुख्यमंत्री रहे और केंद्र में मंत्री भी। दिवंगत आत्माओं के बारे में बोलते समय मर्यादा बनाए रखना सभी के लिए जरूरी है।

    किसी के नाम या विरासत को मिटाने की बात करना उचित नहीं।

    इस पूरे विवाद ने महाराष्ट्र की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। सोशल मीडिया पर लोग रितेश देशमुख के समर्थन में आए और दिवंगत नेता के योगदान की सराहना कर रहे हैं। राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि यह घटना यह दर्शाती है कि नेता चाहे चले जाएं, लेकिन उनकी विरासत और कार्य आज भी लोगों के दिलों में जिंदा रहती है।

    रितेश देशमुख का यह बयान केवल एक बेटे की भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि उन लाखों लोगों की भावना का प्रतिनिधित्व करता है, जिन्होंने विलासराव देशमुख के नेतृत्व और कार्यों को नज़दीक से देखा और अनुभव किया। इस विवाद ने एक बार फिर यह सवाल उठाया है कि राजनीति में बयान देते समय भाषा और मर्यादा का ध्यान रखना कितना आवश्यक है।

    फिलहाल, रवींद्र चव्हाण या बीजेपी की महाराष्ट्र इकाई की तरफ से कोई औपचारिक सफाई नहीं आई है, लेकिन राजनीतिक गलियारे इस मामले पर लगातार चर्चा कर रहे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस विवाद का राजनीतिक नतीजा क्या होता है और मर्यादा के विषय में कोई पहल की जाती है या नहीं।