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  • कर्नाटक का PRC सर्टिफिकेट बना सियासी विवाद का केंद्र, SIR से पहले कांग्रेस सरकार के फैसले पर बीजेपी ने उठाए संवैधानिक सवाल

    कर्नाटक का PRC सर्टिफिकेट बना सियासी विवाद का केंद्र, SIR से पहले कांग्रेस सरकार के फैसले पर बीजेपी ने उठाए संवैधानिक सवाल

    नई दिल्ली । कर्नाटक सरकार द्वारा राज्य के निवासियों को स्थायी निवास प्रमाणपत्र (पीआरसी) जारी करने की नई व्यवस्था ने राज्य की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया शुरू होने से पहले इस पहल के सामने आने के बाद राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है। कांग्रेस सरकार इसे प्रशासनिक और कल्याणकारी योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन का माध्यम बता रही है, जबकि भारतीय जनता पार्टी इसके अधिकार क्षेत्र और संवैधानिक वैधता पर सवाल खड़े कर रही है।

    राज्य सरकार का कहना है कि इस प्रमाणपत्र का उद्देश्य लंबे समय से कर्नाटक में रह रहे पात्र लोगों की पहचान सुनिश्चित करना और उन्हें विभिन्न सरकारी योजनाओं, शैक्षणिक अवसरों तथा अन्य लाभों तक आसानी से पहुंच उपलब्ध कराना है। सरकार के अनुसार इससे वास्तविक लाभार्थियों की पहचान आसान होगी और योजनाओं का लाभ सही लोगों तक पहुंच सकेगा। इसी उद्देश्य से ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से आवेदन की सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है।

    सरकार ने इस प्रक्रिया के लिए कई पात्रता मानदंड भी निर्धारित किए हैं। इनमें राज्य में जन्म, लंबे समय से निवास, शिक्षा, पारिवारिक संबंध, संपत्ति और सरकारी दस्तावेजों में दर्ज रिकॉर्ड जैसे आधार शामिल हैं। अधिकारियों का कहना है कि इन मानकों के आधार पर प्रमाणपत्र जारी किया जाएगा ताकि पात्र व्यक्तियों की पहचान पारदर्शी तरीके से हो सके।

    वहीं बीजेपी ने इस पहल को लेकर गंभीर आपत्ति जताई है। पार्टी नेताओं का कहना है कि नागरिकता और निवास से जुड़े विषयों पर अंतिम अधिकार केंद्र सरकार के पास है। उनका तर्क है कि यदि कोई राज्य सरकार ऐसे प्रमाणपत्रों को नागरिकता या विशेष अधिकारों से जोड़ने की कोशिश करती है तो यह संवैधानिक प्रश्न खड़े कर सकता है। विपक्ष का आरोप है कि एसआईआर प्रक्रिया से पहले इस तरह की पहल राजनीतिक उद्देश्यों से प्रेरित हो सकती है।

    हालांकि संवैधानिक विशेषज्ञों का कहना है कि स्थायी निवास प्रमाणपत्र और नागरिकता प्रमाणपत्र दोनों अलग-अलग विषय हैं। भारतीय नागरिकता का निर्धारण केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है और यह नागरिकता कानूनों के तहत संचालित होता है। दूसरी ओर, राज्य सरकारें प्रशासनिक जरूरतों और स्थानीय योजनाओं के संचालन के लिए निवास या डोमिसाइल से जुड़े प्रमाणपत्र जारी कर सकती हैं। ऐसे दस्तावेज किसी व्यक्ति को भारतीय नागरिक घोषित नहीं करते, बल्कि केवल उसके राज्य में निवास से जुड़े तथ्यों की पुष्टि करते हैं।

    कर्नाटक सरकार का दावा है कि पीआरसी का उपयोग केवल राज्य की योजनाओं, शैक्षणिक सुविधाओं, रोजगार अवसरों और अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं में किया जाएगा। सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह प्रमाणपत्र किसी व्यक्ति की भारतीय नागरिकता का प्रमाण नहीं माना जाएगा। इसके बावजूद राजनीतिक दलों के बीच इस मुद्दे को लेकर बहस जारी है और आने वाले दिनों में यह राज्य की राजनीति का महत्वपूर्ण विषय बना रह सकता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरे विवाद का केंद्र प्रमाणपत्र की प्रकृति से अधिक उसके समय और संभावित प्रभाव को लेकर है। एसआईआर की प्रक्रिया, मतदाता सूची के अद्यतन और राज्य सरकार की नई पहल के बीच संबंधों को लेकर विभिन्न राजनीतिक दल अपने-अपने दृष्टिकोण सामने रख रहे हैं। ऐसे में इस विषय पर कानूनी, प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर चर्चा आगे भी जारी रहने की संभावना है।

  • कर्नाटक में कांग्रेस का बुलडोज़र अभियान: 400 से ज्यादा मुस्लिमों के घर ढहाए, सियासत में गरमा गए पारे

    कर्नाटक में कांग्रेस का बुलडोज़र अभियान: 400 से ज्यादा मुस्लिमों के घर ढहाए, सियासत में गरमा गए पारे




    बेंगलुरु।
    कर्नाटक कांग्रेस सरकार का बुलडोज़र अभियान अब राजनीति का नया विवाद बन गया है। 22 दिसंबर को सुबह 4 बजे कोगिलु गांव के फकीर कॉलोनी और वसीम लेआउट में 400 से ज्यादा घरों को गिराया गया। अधिकांश प्रभावित परिवार मुस्लिम समुदाय से हैं। इस कार्रवाई से सैकड़ों लोग बेघर हो गए और ठंड में सड़कों पर या अस्थायी शेल्टरों में रात गुजारने को मजबूर हैं।कर्नाटक सरकार का कहना है कि ये घर उर्दू गवर्नमेंट स्कूल के पास झील किनारे सरकारी ज़मीन पर अवैध रूप से बने थे।
    निवासियों की आपत्ति
    स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया कि उन्हें कोई नोटिस नहीं दिया गया और पुलिस ने जबरदस्ती उन्हें बेदखल किया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार कई लोग 25 सालों से इलाके में रह रहे हैं और उनके पास वैध आधार कार्ड व वोटर आईडी हैं। निकाले गए ज्यादातर लोग प्रवासी और मजदूरी कर जीवनयापन करते हैं।

    विरोध प्रदर्शन और सियासी हलचल
    इस कार्रवाई के खिलाफ स्थानीय लोगों ने विरोध प्रदर्शन शुरू किया। राजस्व मंत्री कृष्णा बायरे गौड़ा के घर के पास भी प्रदर्शन हुआ।

    दलित संघर्ष समिति और कई अन्य संगठन भी इस कार्रवाई का विरोध कर रहे हैं।

    केरल सरकार की निंदा
    पड़ोसी राज्य के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने इसे “अल्पसंख्यक विरोधी राजनीति” करार दिया। उन्होंने कहा कि डर और ज़बरदस्ती से शासन करने वाली सरकारें संवैधानिक मूल्यों और मानवीय गरिमा का उल्लंघन करती हैं। केरल के मंत्री वी शिवनकुट्टी ने इसे “अमानवीय कार्रवाई” बताया और कहा कि यह इमरजेंसी के दौर की याद दिलाती है।

    कर्नाटक उपमुख्यमंत्री का जवाब
    कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने कहा कि यह इलाका अवैध कब्ज़े और कचरा फेंकने की जगह था, जिसे लैंड माफिया झुग्गी बस्ती में बदलने की कोशिश कर रहे थे। उन्होंने कहा कि लोगों को नई जगह शिफ्ट करने का समय पहले ही दिया गया था। शिवकुमार ने पिनाराई विजयन पर तंज कसते हुए कहा कि नेताओं को ज़मीनी हकीकत जाने बिना टिप्पणी नहीं करनी चाहिए।

    यह मामला न केवल बेंगलुरु बल्कि पूरे कर्नाटक की राजनीति में गर्मागरम बहस का केंद्र बन गया है। कांग्रेस सरकार के बुलडोज़र अभियान ने शहर के गरीब और अल्पसंख्यक समुदायों को सीधे प्रभावित किया है, जबकि विपक्ष और पड़ोसी राज्यों ने इसे लोकतांत्रिक और मानवाधिकारों के दृष्टिकोण से सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है।