Tag: Connectivity

  • हिमालय में बार-बार क्यों आती है तबाही? बाढ़, भूस्खलन और भूकंप का कनेक्शन समझिए

    हिमालय में बार-बार क्यों आती है तबाही? बाढ़, भूस्खलन और भूकंप का कनेक्शन समझिए


    काठमांडू।
    नेपाल में बाढ़ और भूस्खलन ने एक बार फिर हिमालयी क्षेत्रों की संवेदनशीलता को सामने ला दिया है। खूबसूरत पहाड़ों और घाटियों के लिए पहचाना जाने वाला हिमालय दरअसल प्राकृतिक आपदाओं के लिहाज से दुनिया के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में शामिल है। यहां बाढ़, भूस्खलन, बादल फटना, भूकंप और ग्लेशियर से जुड़ी घटनाएं समय-समय पर बड़े संकट में बदल जाती हैं।

    लेकिन आखिर हिमालय से सटे इलाकों में आपदाओं का खतरा इतना ज्यादा क्यों है? इसके पीछे भूगर्भीय बनावट, पहाड़ों की ढलान, भारी बारिश और तेजी से बदलती जलवायु जैसे कई कारण एक साथ काम करते हैं।

    भारतीय और यूरेशियन प्लेटों की टक्कर है बड़ी वजह

    हिमालय दुनिया की सबसे युवा प्रमुख पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है। इसका निर्माण भारतीय और यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेटों की लगातार टक्कर से हुआ है। खास बात यह है कि दोनों प्लेटों की गति आज भी जारी है।

    इन प्लेटों की लगातार हलचल पृथ्वी के भीतर भूगर्भीय तनाव पैदा करती है। इसी कारण हिमालयी क्षेत्र तकनीकी रूप से बेहद सक्रिय है और यहां भूकंप का खतरा लगातार बना रहता है।

    हिमालय से जुड़े भारत के कई हिस्से भी उच्च भूकंपीय जोखिम वाले क्षेत्रों में आते हैं, खासकर भूकंपीय क्षेत्र IV और V में शामिल इलाके।

    पहाड़ों की युवा संरचना क्यों बढ़ाती है खतरा?

    हिमालय की अपेक्षाकृत युवा भूगर्भीय संरचना का एक परिणाम यह भी है कि यहां कई जगह मिट्टी, चट्टान और तलछट अपेक्षाकृत अस्थिर हैं। तेज बारिश होने पर यही सामग्री ढलानों से नीचे खिसकने लगती है।

    इससे भूस्खलन की घटनाएं होती हैं। जब बड़ी मात्रा में मिट्टी, पत्थर और मलबा अचानक नीचे आता है तो सड़कें, पुल और बस्तियां इसकी चपेट में आ सकती हैं।

    खड़ी ढलानें पानी को बना देती हैं खतरनाक

    हिमालय का भूभाग बेहद खड़ा है। यहां गहरी घाटियां और तीखी ढलानें हैं। भारी बारिश के दौरान पानी पहाड़ों पर ज्यादा देर ठहरने के बजाय तेजी से नीचे की ओर बहता है और संकरी नदी घाटियों में पहुंच जाता है।

    तेज बहाव अपने साथ चट्टान, मिट्टी, पेड़ और दूसरे मलबे को भी बहाकर ले जा सकता है। यही प्रक्रिया अचानक आने वाली बाढ़ को और ज्यादा विनाशकारी बना देती है।

    संकरी घाटियों में पानी का वेग बहुत तेजी से बढ़ सकता है। इसका सीधा असर नदी किनारे बने घरों, सड़कों, पुलों और अन्य बुनियादी ढांचे पर पड़ता है।

    जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई मुश्किल

    हिमालय की प्राकृतिक संवेदनशीलता के ऊपर अब जलवायु परिवर्तन का अतिरिक्त दबाव भी पड़ रहा है। हिमालय को कई बार ‘तीसरा ध्रुव’ कहा जाता है क्योंकि ध्रुवीय क्षेत्रों के बाहर यहां बड़ी मात्रा में बर्फ और ग्लेशियर मौजूद हैं।

    बढ़ते तापमान के कारण कई ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं। इसके साथ ही जमी हुई जमीन और पहाड़ी ढलानों की स्थिरता पर भी असर पड़ सकता है।

    ग्लेशियर की झील फटी तो तबाही और तेज

    ग्लेशियरों के पिघलने से उनके आसपास बनी झीलों का आकार बढ़ सकता है। इन झीलों को रोकने वाली प्राकृतिक बर्फ, चट्टान या मलबे की दीवार अगर पानी के दबाव, भूस्खलन या किसी अन्य वजह से टूट जाए तो अचानक बड़ी मात्रा में पानी नीचे की ओर बह सकता है।

    इसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) कहा जाता है।

    ऐसी बाढ़ कुछ ही समय में निचली घाटियों में बड़े पैमाने पर तबाही मचा सकती है। खासकर उन इलाकों में खतरा ज्यादा होता है जहां बस्तियां और बुनियादी ढांचा नदियों के बेहद करीब बना हुआ है।

    बादल फटने से कुछ मिनटों में बदल सकते हैं हालात

    हिमालयी इलाकों में बादल फटना भी अचानक बड़ी आपदा का कारण बन सकता है। इसमें बेहद कम समय में एक छोटे क्षेत्र में बहुत ज्यादा बारिश होती है।

    पहाड़ी इलाकों में इसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। अचानक हुई मूसलाधार बारिश एक साथ भूस्खलन, मलबा प्रवाह और फ्लैश फ्लड जैसी घटनाओं को जन्म दे सकती है।

    नदियों का जलस्तर तेजी से बढ़ सकता है और अतिरिक्त पानी का भार पहले से कमजोर पहाड़ी ढलानों को अस्थिर कर सकता है।

    हिमालय में आपदाएं अलग-अलग नहीं, एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं

    हिमालयी क्षेत्रों की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि यहां एक प्राकृतिक घटना दूसरी आपदा को जन्म दे सकती है। भारी बारिश से ढलान कमजोर होता है, भूस्खलन नदी का रास्ता रोक सकता है और बाद में जमा पानी अचानक निकलकर बाढ़ ला सकता है। वहीं ग्लेशियरों के पिघलने से बनी झीलों के टूटने पर भी निचले इलाकों में अचानक जलप्रलय आ सकता है।

    यानी हिमालय में भूगर्भीय सक्रियता, खड़ी ढलान, अस्थिर चट्टानें, भारी बारिश, ग्लेशियरों में बदलाव और जलवायु परिवर्तन मिलकर आपदा का जोखिम बढ़ाते हैं।

    इसीलिए नेपाल, भारत, भूटान और हिमालय से जुड़े दूसरे क्षेत्रों में आपदा प्रबंधन, शुरुआती चेतावनी प्रणाली, नदी घाटियों में सुरक्षित निर्माण और संवेदनशील इलाकों की लगातार निगरानी बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।

  • भारत-भूटान संबंधों में रणनीतिक सहयोग बढ़ा, आर्थिक विकास, जलविद्युत, सीमा संपर्क और डिजिटल कनेक्टिविटी को मिली नई गति

    भारत-भूटान संबंधों में रणनीतिक सहयोग बढ़ा, आर्थिक विकास, जलविद्युत, सीमा संपर्क और डिजिटल कनेक्टिविटी को मिली नई गति


    नई दिल्ली ।
    भारत और भूटान के बीच लंबे समय से कायम मित्रता अब विकास सहयोग से आगे बढ़कर व्यापक और भविष्य केंद्रित रणनीतिक साझेदारी का रूप ले रही है। दोनों देशों के बीच पिछले एक वर्ष के दौरान आर्थिक योजना, ऊर्जा परिवर्तन, क्षेत्रीय संपर्क और ज्ञान साझाकरण जैसे क्षेत्रों में सहयोग को नई गति मिली है।

    भारत और भूटान के संबंध 1949 और 2007 की मैत्री संधियों की भावना पर आधारित हैं। समय के साथ दोनों देशों के बीच सहयोग का दायरा बढ़ा है और भारत की विकास भागीदारी अब केवल अलग-अलग परियोजनाओं तक सीमित नहीं रह गई है। इसे भूटान की दीर्घकालिक राष्ट्रीय विकास प्राथमिकताओं के साथ जोड़ा जा रहा है।

    हाल में हुई पांचवीं भारत-भूटान विकास सहयोग वार्ता में भूटान की 13वीं पंचवर्षीय योजना 2024-29 के लिए भारत की ओर से घोषित 10,000 करोड़ रुपये की सहायता की समीक्षा की गई। इस सहयोग पैकेज का बड़ा हिस्सा प्राथमिकता वाली विकास परियोजनाओं के लिए निर्धारित किया गया है।

    इसमें 6,860 करोड़ रुपये 82 उच्च प्राथमिकता वाली परियोजनाओं के लिए निर्धारित हैं। इन परियोजनाओं में स्वास्थ्य सेवाएं, शहरी बुनियादी ढांचा और आपदा प्रतिरोधी विकास जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र शामिल हैं। शेष राशि भूटान के आर्थिक प्रोत्साहन कार्यक्रम के लिए बजटीय सहायता के रूप में उपलब्ध कराई जा रही है।

    भारत-भूटान सहयोग की एक प्रमुख विशेषता यह है कि विकास परियोजनाओं को भूटान की अपनी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप आगे बढ़ाया जा रहा है। इससे स्थानीय स्वामित्व मजबूत होने और योजनाओं को अधिक प्रभावी ढंग से लागू करने में मदद मिलने की उम्मीद है।

    ऊर्जा क्षेत्र दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी का महत्वपूर्ण आधार बना हुआ है। भारत की जेएसडब्ल्यू एनर्जी और भूटान की ड्रुक ग्रीन पावर कॉरपोरेशन ने 920 मेगावाट की पुनात्सांगछू-III जलविद्युत परियोजना के विकास के लिए संयुक्त उद्यम बनाया है। इसमें भूटानी कंपनी की 51 प्रतिशत और भारतीय कंपनी की 49 प्रतिशत हिस्सेदारी है।

    इसके अलावा, भूटान सरकार और भारतीय निर्यात-आयात बैंक के बीच 4,000 करोड़ रुपये की अम्ब्रेला ऋण सुविधा सक्रिय हुई है। इसका इस्तेमाल नई नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं के वित्तपोषण के लिए किया जाना है। इससे भूटान के ऊर्जा क्षेत्र में निवेश और क्षमता विस्तार को समर्थन मिलने की उम्मीद है।

    दोनों देश सीमा क्षेत्र को केवल भौगोलिक संपर्क के बजाय व्यापार और आर्थिक गतिविधियों के महत्वपूर्ण गलियारे के रूप में विकसित करने की दिशा में भी आगे बढ़ रहे हैं। दक्षिण-पूर्वी भूटान के सामरंग और असम के उदालगुड़ी जिले के बीच नया भूमि सीमा शुल्क मार्ग विकसित किया जा रहा है।

    इस मार्ग से कृषि उत्पादों, औद्योगिक सामग्री और रोजमर्रा की वस्तुओं के आवागमन को सुविधा मिलने की उम्मीद है। साथ ही भूटान के दक्षिणी क्षेत्रों और भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के बीच संपर्क बेहतर होगा तथा वैकल्पिक परिवहन मार्ग उपलब्ध होंगे।

    भारत-भूटान सहयोग का विस्तार डिजिटल और डाक सेवाओं तक भी हुआ है। गुवाहाटी में शुरू हुई अंतरराष्ट्रीय डाक सहयोग पहल के तहत इंडिया पोस्ट और भूटान पोस्ट के बीच सहयोग को औपचारिक रूप दिया गया है। इसमें यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन की पॉसट्रांसफर व्यवस्था को भारत की यूपीआई प्रणाली से जोड़ने की पहल शामिल है।

    रेल संपर्क भी भविष्य के सहयोग का अहम हिस्सा है। भूटान के पास अभी घरेलू रेल नेटवर्क नहीं है, लेकिन भारत सीमा तक रेल संपर्क के विस्तार पर काम कर रहा है। इसका उद्देश्य भविष्य में भूटानी माल ढुलाई को तेज, कम लागत वाला और अधिक कुशल परिवहन विकल्प उपलब्ध कराना है।

    इस तरह भारत और भूटान के रिश्ते अब पारंपरिक विकास सहायता से आगे बढ़कर ऊर्जा, व्यापार, डिजिटल सेवाओं, बुनियादी ढांचे और क्षेत्रीय संपर्क के साझा हितों पर आधारित व्यापक साझेदारी में बदल रहे हैं। आने वाले समय में इन क्षेत्रों में बढ़ता सहयोग दोनों देशों के आर्थिक और रणनीतिक संबंधों को और मजबूत कर सकता है।

  • यूपी जापान इन्वेस्टमेंट मीट में मुख्यमंत्री ने निवेशकों को दिया सहयोग का भरोसा, नीतियों और बुनियादी ढांचे पर गिनाईं उपलब्धियां

    यूपी जापान इन्वेस्टमेंट मीट में मुख्यमंत्री ने निवेशकों को दिया सहयोग का भरोसा, नीतियों और बुनियादी ढांचे पर गिनाईं उपलब्धियां

    नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जापान के प्रमुख उद्योगपतियों और मुख्य कार्यकारी अधिकारियों के साथ हुई राउंड टेबल मीटिंग में राज्य में निवेश की संभावनाओं को सामने रखा। यूपी जापान इन्वेस्टमेंट मीट के दौरान मुख्यमंत्री ने उद्योग जगत के प्रतिनिधियों से उत्तर प्रदेश में कारोबारी गतिविधियों का विस्तार करने का आह्वान किया। उन्होंने निवेशकों को भरोसा दिलाया कि राज्य सरकार निवेश की प्रक्रिया में आवश्यक सहयोग उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध है।

    मुख्यमंत्री ने कहा कि उत्तर प्रदेश में पिछले नौ वर्षों के दौरान कानून व्यवस्था, आधारभूत ढांचे, कनेक्टिविटी और औद्योगिक वातावरण के क्षेत्र में बदलाव हुए हैं। उनके अनुसार इन सुधारों के कारण राज्य में कारोबार के लिए परिस्थितियां पहले की तुलना में अधिक अनुकूल हुई हैं। उन्होंने निवेशकों के सामने प्रदेश में उपलब्ध अवसरों और सरकार की नीतिगत प्राथमिकताओं को भी रखा।

    योगी आदित्यनाथ ने कहा कि उत्तर प्रदेश में कारोबार शुरू करने या मौजूदा गतिविधियों का विस्तार करने वाली कंपनियों को सरकारी स्तर पर जरूरी सहयोग दिया जाएगा। निवेश से जुड़ी प्रक्रियाओं को सरल, पारदर्शी और समयबद्ध बनाने पर जोर देने की बात उन्होंने कही। मुख्यमंत्री ने उद्योग जगत को भरोसा दिया कि निवेशकों की व्यावहारिक जरूरतों और सामने आने वाली समस्याओं को गंभीरता से लिया जाएगा।

    राउंड टेबल बैठक के दौरान उद्योग प्रतिनिधियों की ओर से रखे गए सुझावों और अपेक्षाओं को भी मुख्यमंत्री ने महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि निवेशकों द्वारा उठाए गए विषयों पर सरकार की टीम ध्यान दे रही है। जिन क्षेत्रों में व्यावहारिक कठिनाइयां सामने आएंगी, वहां समाधान के लिए जरूरी कदम उठाए जाएंगे।

    मुख्यमंत्री ने उत्तर प्रदेश की बड़ी युवा आबादी को निवेश के लिहाज से महत्वपूर्ण ताकत बताया। उन्होंने कहा कि राज्य में उद्योगों के लिए व्यापक मानव संसाधन उपलब्ध है। सरकार युवाओं को उद्योगों की बदलती जरूरतों के अनुसार प्रशिक्षण और कौशल विकास के अवसर उपलब्ध कराने पर काम कर रही है। इससे विभिन्न क्षेत्रों में निवेश करने वाली कंपनियों को प्रशिक्षित मानव संसाधन मिलने में मदद मिलने की उम्मीद है।

    योगी आदित्यनाथ ने कहा कि राज्य में औद्योगिक गतिविधियों के विस्तार के लिए कनेक्टिविटी और बुनियादी ढांचे को मजबूत किया जा रहा है। बेहतर संपर्क व्यवस्था के साथ कुशल मानव संसाधन और कारोबारी माहौल तैयार करना सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है। उनका कहना था कि इन क्षेत्रों में लगातार सुधार से निवेशकों के लिए उत्तर प्रदेश में कारोबार शुरू करना और उसका विस्तार करना अधिक सुविधाजनक हो सकता है।

    मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि सरकार केवल नीतियां बनाने तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन पर भी ध्यान दिया जा रहा है। कानून व्यवस्था में सुधार और औद्योगिक वातावरण को मजबूत करने के साथ निवेश को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न स्तरों पर व्यवस्थाओं को बेहतर बनाने की दिशा में काम किया जा रहा है।

    इन्वेस्टमेंट मीट को मुख्यमंत्री ने सरकार और उद्योग जगत के बीच संवाद का महत्वपूर्ण माध्यम बताया। उनके अनुसार ऐसे आयोजनों से निवेशकों की वास्तविक जरूरतों और अपेक्षाओं को समझने का अवसर मिलता है। साथ ही उद्योग प्रतिनिधियों को उत्तर प्रदेश में उपलब्ध कारोबारी अवसरों, आधारभूत सुविधाओं और नीतिगत सहयोग की जानकारी भी मिलती है।

    मुख्यमंत्री ने विश्वास जताया कि उत्तर प्रदेश में प्रमुख उद्योग समूहों की बढ़ती रुचि से आने वाले समय में नए निवेश और रोजगार के अवसरों को बढ़ावा मिल सकता है। उन्होंने जापानी उद्योग जगत से प्रदेश की विकास यात्रा में सहभागी बनने और यहां उपलब्ध निवेश अवसरों का लाभ उठाने का आह्वान किया।

  • दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे से बदलेगी सफर की रफ्तार, 1386 किमी की दूरी 12 घंटे में, छह राज्यों को मिलेगा हाईस्पीड नेटवर्क

    दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे से बदलेगी सफर की रफ्तार, 1386 किमी की दूरी 12 घंटे में, छह राज्यों को मिलेगा हाईस्पीड नेटवर्क


    नई दिल्ली ।
    देश की सबसे महत्वाकांक्षी सड़क परियोजनाओं में शामिल दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे अपने अंतिम चरण की ओर बढ़ रहा है। 1,386 किलोमीटर लंबा यह एक्सप्रेसवे पूरा होने के बाद दिल्ली और मुंबई के बीच यात्रा समय को लगभग आधा कर देगा। वर्तमान में करीब 24 घंटे में तय होने वाला सफर घटकर लगभग 12 घंटे का रह जाएगा। इस परियोजना का उद्देश्य केवल तेज यातायात उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि देश के प्रमुख औद्योगिक और आर्थिक क्षेत्रों को आधुनिक सड़क नेटवर्क से जोड़ना भी है।

    दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे छह राज्यों—दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र—से होकर गुजरेगा। राजधानी से शुरू होने वाला यह मार्ग हरियाणा के सोहना और नूंह, राजस्थान के दौसा, सवाई माधोपुर और कोटा, मध्य प्रदेश के झाबुआ और रतलाम, गुजरात के वडोदरा, भरूच और सूरत होते हुए महाराष्ट्र के ठाणे के रास्ते मुंबई तक पहुंचेगा। इस मार्ग से लगभग 20 प्रमुख शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों को हाईस्पीड सड़क संपर्क मिलेगा, जिससे क्षेत्रीय विकास को नई गति मिलने की उम्मीद है।

    एक्सप्रेसवे को फिलहाल आठ लेन के रूप में विकसित किया जा रहा है, जबकि भविष्य में इसे 12 लेन तक विस्तारित करने की योजना है। इस मार्ग पर वाहनों के लिए अधिकतम 120 किलोमीटर प्रति घंटे की डिजाइन गति निर्धारित की गई है। इससे लंबी दूरी की यात्रा अधिक सुरक्षित, तेज और सुविधाजनक होगी। साथ ही माल परिवहन की लागत और समय दोनों में कमी आने की संभावना है, जिससे उद्योग और व्यापार जगत को सीधा लाभ मिलेगा।

    यह परियोजना आधुनिक तकनीक और पर्यावरणीय संतुलन को ध्यान में रखकर तैयार की जा रही है। एक्सप्रेसवे पर स्मार्ट ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम, हाई-टेक सीसीटीवी कैमरे और डिजिटल निगरानी व्यवस्था स्थापित की जा रही है। ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए कई स्थानों पर सौर ऊर्जा आधारित सुविधाएं विकसित की गई हैं। इसके अलावा सड़क सुरक्षा को मजबूत करने के लिए नियमित अंतराल पर ट्रॉमा सेंटर, आपातकालीन सहायता सेवाएं और हेलीकॉप्टर लैंडिंग की सुविधा वाले हेलीपैड भी बनाए जा रहे हैं।

    वन्यजीव संरक्षण को ध्यान में रखते हुए इस एक्सप्रेसवे की विशेष डिजाइन भी चर्चा का विषय है। रणथंभौर और मुकुंदरा हिल्स क्षेत्र से गुजरने वाले हिस्सों में वन्यजीवों की सुरक्षित आवाजाही के लिए विशेष एनिमल ओवरपास और अंडरपास तैयार किए गए हैं। साथ ही ध्वनि प्रदूषण कम करने के लिए साउंड बैरियर लगाए जा रहे हैं, जिससे प्राकृतिक आवास और वन्यजीवों पर सड़क यातायात का प्रभाव न्यूनतम रहे।

    विशेषज्ञों का मानना है कि दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे देश के लॉजिस्टिक्स नेटवर्क को नई दिशा देगा। तेज परिवहन व्यवस्था से ईंधन की बचत, कार्बन उत्सर्जन में कमी और सप्लाई चेन की दक्षता में सुधार होगा। राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात के औद्योगिक क्षेत्रों को बेहतर बाजार संपर्क मिलेगा, जबकि पर्यटन, निवेश और स्थानीय रोजगार के अवसर भी बढ़ने की संभावना है। परियोजना पूरी होने के बाद यह एक्सप्रेसवे देश की आर्थिक गतिविधियों को गति देने वाली सबसे महत्वपूर्ण आधारभूत संरचना परियोजनाओं में शामिल होगा।

  • जब सड़कें और पुल बह गए तो हाथियों ने संभाली जिम्मेदारी, अरुणाचल के बाढ़ प्रभावित गांवों तक राहत पहुंचाने की बनी अनोखी जीवनरेखा

    जब सड़कें और पुल बह गए तो हाथियों ने संभाली जिम्मेदारी, अरुणाचल के बाढ़ प्रभावित गांवों तक राहत पहुंचाने की बनी अनोखी जीवनरेखा

    नई दिल्ली । अरुणाचल प्रदेश के लोअर सियांग जिले में आई भीषण बाढ़ ने जनजीवन को गंभीर रूप से प्रभावित कर दिया है। लगातार बारिश और फ्लैश फ्लड के कारण कई सड़कें और पुल क्षतिग्रस्त हो गए, जिससे एक दर्जन से अधिक गांवों का संपर्क मुख्य मार्गों से पूरी तरह टूट गया। ऐसे हालात में प्रशासन और स्थानीय ग्रामीणों ने राहत पहुंचाने के लिए ऐसा तरीका अपनाया है, जिसने संकट की घड़ी में मानव और प्रकृति के सहयोग की मिसाल पेश की है। दुर्गम इलाकों तक जरूरी सामान पहुंचाने के लिए हाथियों की मदद ली जा रही है।

    बाढ़ का सबसे अधिक असर नारी-कोयू विधानसभा क्षेत्र के कोयू सर्कल के गांवों पर पड़ा है। यहां सड़क संपर्क टूटने के कारण सामान्य वाहनों की आवाजाही पूरी तरह बंद हो गई है। कई गांवों तक न तो खाद्यान्न पहुंच पा रहा था और न ही दवाइयों तथा ईंधन जैसी आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति संभव हो रही थी। ऐसे में प्रभावित परिवारों के सामने रोजमर्रा की जरूरतों का संकट गहराने लगा।

    स्थिति की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन ने स्थानीय समुदाय के सहयोग से हाथियों के माध्यम से राहत सामग्री पहुंचाने की व्यवस्था शुरू की। हाथियों की पीठ पर राशन, दवाइयां, ईंधन और अन्य जरूरी सामान लादकर उन रास्तों से भेजा जा रहा है, जहां वाहन तो दूर, कई स्थानों पर पैदल पहुंचना भी बेहद कठिन है। पहाड़ी इलाकों में प्राकृतिक परिस्थितियों के अनुरूप चलने की उनकी क्षमता राहत कार्यों में बेहद उपयोगी साबित हो रही है।

    यह अभियान आसान नहीं है। हाथियों को तेज बहाव वाली नदियों, कीचड़ से भरे रास्तों, ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी मार्गों और बड़े-बड़े पत्थरों के बीच कई किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ रही है। इसके बावजूद राहत कार्य लगातार जारी है। प्रशासन का प्रयास है कि किसी भी गांव में आवश्यक वस्तुओं की कमी न होने पाए और सभी प्रभावित परिवारों तक समय पर मदद पहुंच सके।

    स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि हाथियों की सहायता नहीं ली जाती तो कई गांवों तक राहत सामग्री पहुंचाना लगभग असंभव हो जाता। कई स्थानों पर सड़कें पूरी तरह बह चुकी हैं और अस्थायी रास्ते भी सुरक्षित नहीं हैं। ऐसे में हाथी ही एकमात्र भरोसेमंद माध्यम बनकर उभरे हैं, जिनकी मदद से लगातार राहत सामग्री गांवों तक पहुंच रही है। इससे सैकड़ों लोगों को भोजन, दवा और अन्य जरूरी सुविधाएं मिल रही हैं।

    प्राकृतिक आपदाओं के दौरान वैकल्पिक संसाधनों का प्रभावी उपयोग किस तरह राहत कार्यों को गति दे सकता है, इसका यह उदाहरण बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। स्थानीय प्रशासन के साथ ग्रामीणों की भागीदारी और प्रशिक्षित हाथियों का सहयोग राहत अभियान को सफल बनाने में अहम भूमिका निभा रहा है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि कठिन भौगोलिक परिस्थितियों वाले क्षेत्रों में स्थानीय संसाधनों का सही उपयोग आपदा प्रबंधन को अधिक प्रभावी बना सकता है।

    अरुणाचल प्रदेश में राहत एवं बचाव कार्य लगातार जारी हैं और प्रभावित क्षेत्रों में सामान्य स्थिति बहाल करने के प्रयास किए जा रहे हैं। क्षतिग्रस्त सड़कों और पुलों की मरम्मत की दिशा में भी काम शुरू किया गया है, ताकि जल्द से जल्द गांवों का संपर्क फिर से स्थापित हो सके। तब तक हाथियों के जरिए राहत सामग्री पहुंचाने का यह अभियान प्रभावित लोगों के लिए उम्मीद की सबसे मजबूत कड़ी बना हुआ है। यह पहल केवल राहत वितरण तक सीमित नहीं है, बल्कि कठिन समय में मानव, स्थानीय समुदाय और प्रकृति के बीच सहयोग की प्रेरक मिसाल भी प्रस्तुत करती है।

  • पीएम मोदी की उड़ान योजना का बड़ा विस्तार, दमन को मिली दिल्ली के लिए पहली सीधी हवाई सेवा, पर्यटन, उद्योग और निवेश को मिलेगी नई रफ्तार

    पीएम मोदी की उड़ान योजना का बड़ा विस्तार, दमन को मिली दिल्ली के लिए पहली सीधी हवाई सेवा, पर्यटन, उद्योग और निवेश को मिलेगी नई रफ्तार

    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की क्षेत्रीय हवाई संपर्क योजना के तहत दमन को पहली बार राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से जोड़ने वाली सीधी हवाई सेवा की शुरुआत हो गई है। इस नई सेवा के शुरू होने के साथ ही केंद्र शासित प्रदेश दमन देश के प्रमुख शहरों से बेहतर हवाई संपर्क वाले क्षेत्रों में शामिल हो गया है। सरकार का मानना है कि इस पहल से न केवल यात्रियों की आवाजाही आसान होगी, बल्कि पर्यटन, व्यापार, उद्योग और निवेश गतिविधियों को भी उल्लेखनीय बढ़ावा मिलेगा। यह कदम क्षेत्रीय विकास को नई दिशा देने की सरकार की व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

    नई हवाई सेवा का शुभारंभ दमन स्थित नवनिर्मित नमो एयरपोर्ट से किया गया, जहां से दिल्ली के लिए पहली नियमित उड़ान रवाना हुई। इस अवसर पर केंद्रीय नागर विमानन मंत्री राम मोहन नायडू ने कहा कि उड़ान योजना का उद्देश्य छोटे शहरों और दूरस्थ क्षेत्रों को देश के प्रमुख आर्थिक और प्रशासनिक केंद्रों से जोड़ना है। उन्होंने कहा कि दमन को पहली बार राजधानी से सीधा हवाई संपर्क मिलने से यहां के नागरिकों, व्यापारियों और पर्यटकों को बड़ी सुविधा मिलेगी।

    नई उड़ान सेवा शुरू होने के बाद दमन और दिल्ली के बीच यात्रा का समय काफी कम हो जाएगा। सड़क मार्ग से जहां यह सफर पहले लगभग आठ से दस घंटे में पूरा होता था, वहीं अब हवाई यात्रा के माध्यम से यह दूरी करीब ढाई घंटे में तय की जा सकेगी। इससे समय की बचत के साथ व्यावसायिक यात्राएं भी अधिक सुविधाजनक होंगी और क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों को गति मिलने की संभावना है।

    दमन का नमो एयरपोर्ट आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित दोहरे उपयोग वाला हवाई अड्डा है, जिसे भारतीय तटरक्षक बल के एयर स्टेशन परिसर में विकसित किया गया है। लगभग 25 एकड़ क्षेत्र में निर्मित इस एयरपोर्ट का आधुनिक टर्मिनल प्रतिदिन कई एटीआर विमानों के संचालन में सक्षम है। इसकी वार्षिक यात्री क्षमता लगभग 3.67 लाख यात्रियों की रखी गई है, जिससे भविष्य में बढ़ती हवाई मांग को भी आसानी से पूरा किया जा सकेगा।

    सरकार का मानना है कि दमन, दीव, दादरा और नगर हवेली औद्योगिक दृष्टि से तेजी से विकसित हो रहे क्षेत्र हैं। यहां हजारों उद्योग संचालित हो रहे हैं, जबकि आसपास के औद्योगिक क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में कारोबारी गतिविधियां जुड़ी हुई हैं। बेहतर हवाई संपर्क उपलब्ध होने से निवेशकों, उद्योगपतियों और उद्यमियों की आवाजाही आसान होगी, जिससे नए निवेश, औद्योगिक विस्तार और रोजगार के अवसरों में वृद्धि होने की उम्मीद है।

    पर्यटन के क्षेत्र में भी इस नई सेवा को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। समुद्री तटों और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध दमन हर वर्ष लाखों पर्यटकों को आकर्षित करता है। अब दिल्ली से सीधी हवाई सेवा उपलब्ध होने के बाद पर्यटकों की संख्या में और बढ़ोतरी की संभावना है, जिसका सीधा लाभ स्थानीय होटल, परिवहन, रेस्तरां और अन्य पर्यटन आधारित व्यवसायों को मिलेगा।

    केंद्र सरकार भविष्य में नमो एयरपोर्ट के रनवे का विस्तार करने की योजना पर भी काम कर रही है ताकि यहां से बड़े यात्री विमानों का संचालन संभव हो सके। इसके बाद मुंबई, सूरत, अहमदाबाद और पटना सहित अन्य प्रमुख शहरों के लिए भी सीधी उड़ानें शुरू करने की तैयारी की जाएगी। साथ ही सरकार ने उड़ान योजना को अगले दस वर्षों के लिए विस्तारित करते हुए देशभर में नए एयरपोर्ट और हेलीपैड विकसित करने का लक्ष्य तय किया है। इससे क्षेत्रीय हवाई संपर्क को और मजबूत करने के साथ देश के छोटे शहरों को राष्ट्रीय विकास की मुख्यधारा से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति होने की उम्मीद है।

  • कैबिनेट की मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर मंजूरी, दिल्ली में बनेगी 6 लेन द्वारका टनल, कानपुर-कबरई फोरलेन हाईवे से बुंदेलखंड को मिलेगी नई रफ्तार

    कैबिनेट की मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर मंजूरी, दिल्ली में बनेगी 6 लेन द्वारका टनल, कानपुर-कबरई फोरलेन हाईवे से बुंदेलखंड को मिलेगी नई रफ्तार

    नई दिल्ली । केंद्र सरकार ने देश की सड़क अवसंरचना को और मजबूत बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए दो महत्वपूर्ण राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं को मंजूरी दी है। केंद्रीय कैबिनेट के फैसले के तहत राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में छह लेन वाली द्वारका टनल तथा उत्तर प्रदेश के कानपुर से कबरई तक चार लेन हाईवे का निर्माण किया जाएगा। इन दोनों परियोजनाओं से यातायात व्यवस्था में सुधार, यात्रा समय में कमी और आर्थिक गतिविधियों को नई गति मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।

    कैबिनेट के निर्णय के अनुसार दिल्ली में करीब आठ किलोमीटर लंबी छह लेन द्वारका टनल का निर्माण किया जाएगा। इस परियोजना पर लगभग 6,970 करोड़ रुपये की लागत आने का अनुमान है। प्रस्तावित टनल शिवमूर्ति क्षेत्र से शुरू होकर वसंत कुंज के रास्ते बारापुला के निकट तक विकसित की जाएगी। परियोजना को लगभग पांच वर्षों में पूरा करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

    इस टनल के निर्माण से दिल्ली के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में लंबे समय से बनी ट्रैफिक समस्या को काफी हद तक कम करने में मदद मिलेगी। साथ ही हवाई अड्डे, द्वारका, गुरुग्राम और दक्षिण दिल्ली के बीच यात्रा अधिक सुगम और तेज होने की संभावना है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे शहर के प्रमुख मार्गों पर वाहनों का दबाव कम होगा और ईंधन की बचत के साथ प्रदूषण में भी कमी आएगी।

    कैबिनेट ने दूसरी बड़ी परियोजना के रूप में उत्तर प्रदेश के कानपुर से कबरई तक लगभग 242 किलोमीटर लंबे फोरलेन राष्ट्रीय राजमार्ग को भी मंजूरी प्रदान की है। इस परियोजना की अनुमानित लागत 7,145 करोड़ रुपये होगी और इसे लगभग ढाई वर्ष में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। यह मार्ग आगे चलकर मध्य प्रदेश की दिशा में बेहतर सड़क संपर्क का महत्वपूर्ण हिस्सा बनेगा और बुंदेलखंड क्षेत्र को नई विकास संभावनाओं से जोड़ेगा।

    नई सड़क बनने के बाद कानपुर से कबरई के बीच यात्रा समय में उल्लेखनीय कमी आने का अनुमान है। वर्तमान में इस मार्ग को तय करने में लगभग साढ़े तीन घंटे का समय लगता है, जबकि परियोजना पूरी होने के बाद यही दूरी करीब डेढ़ घंटे में पूरी की जा सकेगी। इससे यात्रियों के साथ-साथ व्यावसायिक परिवहन को भी बड़ा लाभ मिलेगा।

    विशेषज्ञों का मानना है कि बेहतर सड़क संपर्क से औद्योगिक गतिविधियों, कृषि उत्पादों के परिवहन और क्षेत्रीय व्यापार को नई गति मिलेगी। बुंदेलखंड क्षेत्र लंबे समय से बेहतर कनेक्टिविटी की मांग करता रहा है और यह परियोजना निवेश तथा रोजगार के अवसर बढ़ाने में भी सहायक सिद्ध हो सकती है। सड़क नेटवर्क मजबूत होने से लॉजिस्टिक्स लागत में कमी आने और विभिन्न शहरों के बीच आर्थिक गतिविधियां बढ़ने की भी संभावना है।

    केंद्र सरकार का उद्देश्य आधुनिक, सुरक्षित और तेज परिवहन नेटवर्क विकसित करना है, ताकि देश के विभिन्न क्षेत्रों के बीच संपर्क और अधिक सशक्त हो सके। हाल के वर्षों में राष्ट्रीय राजमार्गों, एक्सप्रेसवे और सुरंग परियोजनाओं पर विशेष जोर दिया गया है। नई स्वीकृत दोनों परियोजनाएं इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा मानी जा रही हैं।

  • नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट से अकासा एयर की उड़ानों का आगाज, नवी मुंबई और बेंगलुरु के लिए मिली सीधी हवाई कनेक्टिविटी

    नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट से अकासा एयर की उड़ानों का आगाज, नवी मुंबई और बेंगलुरु के लिए मिली सीधी हवाई कनेक्टिविटी


    नई दिल्ली
    । देश के विमानन क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण विकास के तहत नोएडा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से अकासा एयर ने अपनी वाणिज्यिक उड़ान सेवाओं की औपचारिक शुरुआत कर दी है। इस कदम के साथ एयरलाइन उन शुरुआती कंपनियों में शामिल हो गई है जिन्होंने देश के इस नए और महत्वाकांक्षी हवाई अड्डे से नियमित संचालन शुरू किया है। कंपनी ने पहले चरण में नवी मुंबई और बेंगलुरु के लिए सीधी उड़ान सेवाएं शुरू की हैं, जिससे यात्रियों को बेहतर कनेक्टिविटी का लाभ मिलेगा।

    नोएडा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से उड़ानों का संचालन शुरू होना क्षेत्रीय और राष्ट्रीय हवाई संपर्क को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और आसपास के इलाकों के यात्रियों को अब वैकल्पिक हवाई यात्रा सुविधाएं उपलब्ध होंगी, जिससे दिल्ली क्षेत्र के अन्य हवाई अड्डों पर दबाव कम करने में भी सहायता मिलने की उम्मीद है।

    एयरलाइन के अनुसार, नवी मुंबई से रवाना हुई पहली उड़ान निर्धारित समय पर नोएडा पहुंची और इसके बाद वापसी सेवा भी संचालित की गई। इसी क्रम में बेंगलुरु के लिए भी सीधी उड़ानों की शुरुआत की गई है। इन नई सेवाओं से व्यापारिक यात्रियों, कॉर्पोरेट सेक्टर, छात्रों और पर्यटन गतिविधियों को विशेष लाभ मिलने की संभावना है।

    कंपनी ने कहा कि नोएडा एयरपोर्ट से शुरुआती चरण में परिचालन शुरू करना उसकी दीर्घकालिक विकास रणनीति का हिस्सा है। एयरलाइन तेजी से विकसित हो रहे शहरों और नए विमानन बाजारों में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराना चाहती है। इसके साथ ही आधुनिक विमानन अवसंरचना के विकास में भागीदारी को भी कंपनी अपनी प्राथमिकताओं में शामिल कर रही है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि नोएडा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा आने वाले वर्षों में उत्तर भारत के प्रमुख विमानन केंद्रों में शामिल हो सकता है। ऐसे में शुरुआती दौर में सेवाएं शुरू करने वाली एयरलाइनों को भविष्य में यात्री आधार और नेटवर्क विस्तार के मामले में महत्वपूर्ण लाभ मिल सकता है। अकासा एयर का यह कदम इसी रणनीतिक सोच का हिस्सा माना जा रहा है।

    एयरलाइन प्रबंधन ने कहा कि नोएडा से उड़ान संचालन की शुरुआत कंपनी की विकास यात्रा में एक अहम उपलब्धि है। कंपनी का लक्ष्य यात्रियों को सुरक्षित, भरोसेमंद और सुविधाजनक यात्रा अनुभव उपलब्ध कराना है। इसके लिए नए मार्गों के विकास और बेहतर सेवा गुणवत्ता पर लगातार ध्यान दिया जाएगा।

    वहीं हवाई अड्डा प्रबंधन ने भी अकासा एयर के परिचालन को क्षेत्रीय कनेक्टिविटी के लिए सकारात्मक कदम बताया है। अधिकारियों के अनुसार, नई उड़ानों से यात्रियों को अधिक विकल्प मिलेंगे और हवाई यात्रा का दायरा विस्तारित होगा। इससे नोएडा एयरपोर्ट के विकास को भी गति मिलेगी और भविष्य में अन्य शहरों के लिए नई सेवाओं का मार्ग प्रशस्त होगा।

    विमानन उद्योग के जानकारों का कहना है कि उत्तर भारत में बढ़ती हवाई यात्रा मांग, बेहतर अवसंरचना और नए हवाई अड्डों के विकास के बीच यह पहल पूरे क्षेत्र के आर्थिक और परिवहन नेटवर्क को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। आने वाले समय में अधिक एयरलाइनों के जुड़ने से नोएडा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा देश के प्रमुख विमानन केंद्रों में अपनी पहचान स्थापित कर सकता है।

  • नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट से शुरू हुई वाणिज्यिक उड़ानें, इंडिगो की पहली सेवा के साथ दिल्ली-एनसीआर को मिला नया एविएशन हब

    नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट से शुरू हुई वाणिज्यिक उड़ानें, इंडिगो की पहली सेवा के साथ दिल्ली-एनसीआर को मिला नया एविएशन हब

    नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश के जेवर स्थित नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट ने सोमवार को भारतीय विमानन क्षेत्र में एक नया अध्याय जोड़ते हुए वाणिज्यिक उड़ानों का संचालन शुरू कर दिया। लंबे समय से प्रतीक्षित इस परियोजना के परिचालन में आने के साथ ही दिल्ली-एनसीआर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश को एक नया हवाई प्रवेश द्वार मिल गया है। एयरपोर्ट से पहली नियमित उड़ान सेवा शुरू करने का गौरव इंडिगो एयरलाइन को मिला, जिसने यहां से अपने वाणिज्यिक संचालन का औपचारिक शुभारंभ किया।

    एयरपोर्ट के संचालन की शुरुआत के साथ ही क्षेत्रीय और राष्ट्रीय हवाई संपर्क को नई मजबूती मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। पहली उड़ान लखनऊ से नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट पहुंची, जबकि इसके बाद यहां से पहली प्रस्थान उड़ान बेंगलुरु के लिए रवाना हुई। यह शुरुआत केवल एक नई सेवा का आरंभ नहीं बल्कि देश के तेजी से विकसित हो रहे विमानन बुनियादी ढांचे का भी प्रतीक मानी जा रही है।

    इंडिगो ने घोषणा की है कि वह इस नए एयरपोर्ट को देश के 16 से अधिक प्रमुख गंतव्यों से सीधे जोड़ेगी। इसके अतिरिक्त कई शहरों के बीच वन-स्टॉप कनेक्टिविटी की सुविधा भी उपलब्ध होगी, जिससे यात्रियों को अधिक विकल्प और बेहतर यात्रा अनुभव प्राप्त होगा। इस व्यवस्था का सबसे बड़ा लाभ टियर-2 और टियर-3 शहरों के यात्रियों को मिलेगा, जिन्हें अब बड़े महानगरों तक पहुंचने के लिए कम समय और कम जटिल यात्रा करनी पड़ेगी।

    विशेषज्ञों का मानना है कि नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट का संचालन शुरू होने से दिल्ली-एनसीआर के मौजूदा हवाई यातायात दबाव को कम करने में मदद मिलेगी। राजधानी क्षेत्र में बढ़ती यात्री संख्या और विमान सेवाओं की मांग को देखते हुए यह एयरपोर्ट एक महत्वपूर्ण पूरक भूमिका निभाएगा। इसके साथ ही यह क्षेत्रीय आर्थिक गतिविधियों को गति देने में भी सहायक साबित हो सकता है।

    यमुना एक्सप्रेसवे के किनारे स्थित यह एयरपोर्ट रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बेहतर सड़क संपर्क और औद्योगिक क्षेत्रों के निकट होने के कारण इसे भविष्य में एक प्रमुख एविएशन तथा लॉजिस्टिक्स हब के रूप में विकसित करने की योजना है। इससे व्यापार, निवेश, पर्यटन और माल परिवहन गतिविधियों को भी नई दिशा मिलने की संभावना है।

    विमानन क्षेत्र के जानकारों के अनुसार, किसी भी बड़े एयरपोर्ट का प्रभाव केवल हवाई सेवाओं तक सीमित नहीं रहता। इसके आसपास रोजगार के नए अवसर पैदा होते हैं, होटल, परिवहन और सेवा क्षेत्र का विस्तार होता है तथा स्थानीय अर्थव्यवस्था को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लाभ मिलता है। नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट के साथ भी इसी प्रकार के व्यापक आर्थिक प्रभावों की उम्मीद की जा रही है।

    एयरपोर्ट प्रबंधन ने कहा है कि यात्रियों को आधुनिक और सुविधाजनक यात्रा अनुभव उपलब्ध कराने पर विशेष ध्यान दिया गया है। प्रथम चरण में विकसित इस परियोजना की वार्षिक यात्री क्षमता लगभग 1.2 करोड़ रखी गई है। वर्तमान परिचालन ढांचे में एक रनवे, एकीकृत टर्मिनल भवन और अत्याधुनिक एयर ट्रैफिक कंट्रोल टावर शामिल हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में एयरपोर्ट के विस्तार के साथ इसकी क्षमता और कनेक्टिविटी दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। वाणिज्यिक उड़ानों की शुरुआत के साथ नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट अब केवल एक महत्वाकांक्षी परियोजना नहीं रहा, बल्कि उत्तर भारत के विमानन मानचित्र पर एक सक्रिय और महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में उभर चुका है। इससे क्षेत्रीय विकास, पर्यटन और आर्थिक गतिविधियों को नई गति मिलने की संभावना और मजबूत हुई है।

  • रूस के राष्ट्रीय दिवस समारोह में भारत का संदेश, विदेश सचिव विक्रम मिस्री बोले- भरोसा और आपसी समझ ही भारत-रूस संबंधों की सबसे बड़ी ताकत

    रूस के राष्ट्रीय दिवस समारोह में भारत का संदेश, विदेश सचिव विक्रम मिस्री बोले- भरोसा और आपसी समझ ही भारत-रूस संबंधों की सबसे बड़ी ताकत


    नई दिल्ली ।
    भारत और रूस के बीच दशकों पुरानी रणनीतिक साझेदारी को नई ऊर्जा देते हुए विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने रूसी फेडरेशन के राष्ट्रीय दिवस समारोह में भारत का प्रतिनिधित्व किया। इस अवसर पर उन्होंने रूस को राष्ट्रीय दिवस की शुभकामनाएं देते हुए दोनों देशों के बीच विकसित हुए मजबूत और भरोसेमंद संबंधों को वैश्विक अनिश्चितताओं के दौर में स्थिरता का महत्वपूर्ण आधार बताया।

    समारोह को संबोधित करते हुए विदेश सचिव ने कहा कि भारत और रूस के संबंध केवल कूटनीतिक औपचारिकताओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह एक ऐसी साझेदारी है जिसने समय की हर परीक्षा में अपनी मजबूती साबित की है। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच स्थापित विश्वास और परस्पर सम्मान ने विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग को निरंतर विस्तार देने में अहम भूमिका निभाई है।

    उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पिछले कुछ वर्षों में भारत-रूस विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी और अधिक सुदृढ़ हुई है। दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच नियमित संवाद तथा उच्च स्तरीय यात्राओं ने संबंधों को नई दिशा प्रदान की है। उन्होंने कहा कि एक-दूसरे की प्राथमिकताओं, हितों और संवेदनशीलताओं को समझने की क्षमता ही इस संबंध की सबसे बड़ी विशेषता है।

    विदेश सचिव ने वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्तमान समय में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती चुनौतियों और तनावों के बीच भारत और रूस के संबंध संतुलन और सहयोग का महत्वपूर्ण उदाहरण बने हुए हैं। उन्होंने कहा कि दोनों देश केवल अपने राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि क्षेत्रीय और वैश्विक स्थिरता में भी सकारात्मक योगदान दे रहे हैं।

    उन्होंने पिछले वर्ष आयोजित भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन का उल्लेख करते हुए कहा कि यह द्विपक्षीय संबंधों के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हुआ। इस दौरान कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण समझौतों और सहमति पत्रों पर हस्ताक्षर किए गए। शिक्षा, स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, समुद्री सहयोग, आर्कटिक क्षेत्र, कौशल विकास और अकादमिक आदान-प्रदान जैसे क्षेत्रों में साझेदारी को नई गति मिली है।

    आर्थिक संबंधों पर चर्चा करते हुए विदेश सचिव ने कहा कि भारत और रूस के बीच व्यापारिक सहयोग लगातार मजबूत हो रहा है। लगातार दो वित्तीय वर्षों में द्विपक्षीय व्यापार 60 अरब डॉलर से अधिक रहा है, जो दोनों देशों के आर्थिक संबंधों की बढ़ती गहराई को दर्शाता है। उन्होंने बताया कि दोनों देशों के नेताओं ने वर्ष 2030 तक व्यापार को 100 अरब डॉलर तक पहुंचाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है और इस दिशा में ठोस प्रयास किए जा रहे हैं।

    उन्होंने कहा कि रक्षा सहयोग भारत-रूस संबंधों का महत्वपूर्ण स्तंभ बना हुआ है। इसके अलावा नागरिक परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष क्षेत्र में भी दोनों देशों के बीच सहयोग निरंतर आगे बढ़ रहा है। नई तकनीकों, नवाचार और औद्योगिक विकास के क्षेत्रों में भी सहयोग की संभावनाओं पर काम किया जा रहा है।

    विक्रम मिस्री ने कौशल आधारित मानव संसाधन सहयोग को भविष्य की बड़ी संभावनाओं वाला क्षेत्र बताया। उन्होंने कहा कि भारत का विशाल पेशेवर और प्रशिक्षित कार्यबल रूस की बढ़ती कौशल आवश्यकताओं को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इसके साथ ही दोनों देश नए कनेक्टिविटी और परिवहन नेटवर्क विकसित करने की दिशा में भी कार्य कर रहे हैं, जिससे व्यापार और आर्थिक गतिविधियों को और गति मिलेगी।

    उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि पारंपरिक सहयोग के क्षेत्रों को और मजबूत करने तथा नए अवसरों की तलाश के माध्यम से भारत और रूस की साझेदारी आने वाले वर्षों में और अधिक व्यापक तथा प्रभावशाली बनेगी।