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  • राज्यसभा में NDA मजबूत, AAP सांसदों के दल-बदल से दो-तिहाई बहुमत के करीब पहुंचा गठबंधन

    राज्यसभा में NDA मजबूत, AAP सांसदों के दल-बदल से दो-तिहाई बहुमत के करीब पहुंचा गठबंधन


    नई दिल्ली। देश की राजनीति में एक अहम बदलाव देखने को मिला है, जहां आम आदमी पार्टी के सात सांसदों के दल बदलकर भाजपा में शामिल होने के बाद राज्यसभा में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की स्थिति काफी मजबूत हो गई है। इस घटनाक्रम ने उच्च सदन में राजनीतिक संतुलन को प्रभावित किया है और सत्ता पक्ष को दो-तिहाई बहुमत के और करीब पहुंचा दिया है।

    वर्तमान स्थिति के अनुसार राज्यसभा में कुल 244 सदस्य हैं और किसी भी पार्टी या गठबंधन को दो-तिहाई बहुमत हासिल करने के लिए 163 सदस्यों का समर्थन आवश्यक होता है। हालिया बदलावों के बाद एनडीए के समर्थन में सांसदों की संख्या 145 तक पहुंच गई है। हालांकि यह आंकड़ा अभी भी आवश्यक बहुमत से 18 सीट दूर है, लेकिन इसे सत्ता पक्ष के लिए एक महत्वपूर्ण बढ़त माना जा रहा है।

    भाजपा की स्थिति भी इस घटनाक्रम के बाद मजबूत हुई है। पहले जहां पार्टी के पास 106 सांसद थे, वहीं अब यह संख्या बढ़कर 113 हो गई है। इसके अलावा कुछ मनोनीत सदस्यों और निर्दलीय सांसदों के समर्थन से यह आंकड़ा और बढ़कर करीब 122 तक पहुंचने की संभावना जताई जा रही है, जो सदन के कुल सदस्यों का लगभग आधा हिस्सा है।

    राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही रुझान जारी रहता है, तो आने वाले समय में सरकार को महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने में आसानी हो सकती है। विशेष रूप से वे संविधान संशोधन विधेयक, जिनके लिए दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है, उन पर सत्ता पक्ष की स्थिति पहले से अधिक मजबूत दिखाई दे रही है।

    हाल ही में महिला आरक्षण से जुड़े एक महत्वपूर्ण संविधान संशोधन विधेयक को लोकसभा में आवश्यक बहुमत न मिलने के कारण झटका लगा था। उस समय सत्ता पक्ष दो-तिहाई बहुमत हासिल नहीं कर सका था, जिससे यह विधेयक पारित नहीं हो पाया। अब राज्यसभा में बदलते समीकरणों को उसी संदर्भ में देखा जा रहा है।

    सूत्रों के अनुसार, हाल ही में शामिल हुए सांसदों का विलय राज्यसभा में उनकी मूल पार्टी के संसदीय दल के दो-तिहाई से अधिक हिस्से का प्रतिनिधित्व होने के कारण मान्य किया जा सकता है। यदि ऐसा होता है, तो यह सत्ता पक्ष की स्थिति को और मजबूत करेगा और सदन में उसकी पकड़ और अधिक प्रभावी हो जाएगी।

  • लोकसभा सीट बढ़ाने का विधेयक 54 वोट से गिरा, सरकार आवश्यक बहुमत जुटाने में असफल

    लोकसभा सीट बढ़ाने का विधेयक 54 वोट से गिरा, सरकार आवश्यक बहुमत जुटाने में असफल

    नई दिल्ली:लोकसभा की सीटों की संख्या बढ़ाने से जुड़ा संविधान संशोधन विधेयक संसद में आवश्यक समर्थन हासिल नहीं कर सका और 54 वोट से गिर गया। इस प्रस्ताव के तहत मौजूदा 543 सीटों को बढ़ाकर 850 करने की योजना थी, लेकिन मतदान के दौरान सरकार को अपेक्षित दो तिहाई बहुमत नहीं मिल पाया। इस असफलता के बाद यह विधेयक आगे नहीं बढ़ सका और राजनीतिक स्तर पर यह एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है।

    मतदान प्रक्रिया में कुल 528 सांसदों ने भाग लिया, जिनमें 298 ने पक्ष में और 230 ने विरोध में मतदान किया। हालांकि विधेयक को पारित करने के लिए 352 वोटों की आवश्यकता थी, जो सरकार पूरी नहीं कर सकी। लंबे समय तक चली चर्चा के बाद हुए इस मतदान ने संसद में बने राजनीतिक समीकरणों को स्पष्ट कर दिया।

    यह विधेयक केवल सीटों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं था, बल्कि इसका संबंध परिसीमन और महिला आरक्षण की प्रक्रिया से भी जुड़ा हुआ था। प्रस्ताव के अनुसार परिसीमन के बाद लोकसभा में महिला आरक्षण को 33 प्रतिशत तक लागू करने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा था। लेकिन इसके गिरने के बाद इस प्रक्रिया में और देरी की संभावना बढ़ गई है।

    करीब 21 घंटे चली बहस में सरकार और विपक्ष दोनों ने अपने तर्क रखे। सरकार का कहना था कि सीटों में वृद्धि से देश के सभी क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व बेहतर होगा और लोकतंत्र अधिक मजबूत बनेगा। वहीं विपक्ष ने इस प्रस्ताव पर आपत्ति जताते हुए कहा कि इससे क्षेत्रीय संतुलन प्रभावित हो सकता है और कुछ राज्यों का प्रतिनिधित्व कम हो सकता है।

    विपक्ष ने परिसीमन प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए और कहा कि बिना व्यापक सामाजिक और जनसंख्या आंकड़ों के बदलाव करना उचित नहीं होगा। उनका तर्क था कि यह निर्णय राजनीतिक संतुलन को प्रभावित कर सकता है और इससे कुछ राज्यों को नुकसान हो सकता है।

    सरकार की ओर से इस सत्र में जुड़े अन्य संबंधित विधेयकों को अलग से मतदान के लिए पेश नहीं किया गया। संसदीय कार्य मंत्री ने कहा कि सभी प्रस्ताव एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, इसलिए अलग मतदान की आवश्यकता नहीं समझी गई।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटना सरकार के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है, क्योंकि बहुमत होने के बावजूद आवश्यक समर्थन न मिल पाना संसद में सहमति की कमी को दर्शाता है। मतदान से पहले सरकार की ओर से विपक्ष से समर्थन जुटाने की कोशिश भी की गई, लेकिन सहमति नहीं बन सकी।

    इस घटनाक्रम के बाद अब यह संभावना जताई जा रही है कि सरकार इस विधेयक में संशोधन कर दोबारा पेश कर सकती है या विपक्ष के साथ व्यापक सहमति बनाने का प्रयास करेगी। फिलहाल इस असफलता के बाद परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े मुद्दों पर अनिश्चितता बनी हुई है।

  • महिला आरक्षण पर पीएम मोदी का बड़ा बयान, इसे बताया ऐतिहासिक और निर्णायक कदम..

    महिला आरक्षण पर पीएम मोदी का बड़ा बयान, इसे बताया ऐतिहासिक और निर्णायक कदम..

    नई दिल्ली:लोकसभा में महिला आरक्षण विधेयक पर चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक महत्वपूर्ण और निर्णायक क्षण बताया। उन्होंने कहा कि यह अवसर केवल एक विधायी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि देश की आधी आबादी को नीति निर्माण में समान भागीदारी देने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। उनके अनुसार ऐसे मौके बार-बार नहीं आते और इन्हें देश के भविष्य को मजबूत करने के लिए पूरी गंभीरता से लेना चाहिए।

    प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि भारत की लोकतांत्रिक परंपरा अत्यंत प्राचीन और समृद्ध रही है, और समय समय पर इसमें नए आयाम जुड़ते रहे हैं। उन्होंने कहा कि महिला आरक्षण जैसा निर्णय देश की शासन व्यवस्था को और अधिक संवेदनशील और समावेशी बनाने में मदद करेगा। उनके अनुसार जब निर्णय लेने की प्रक्रिया में समाज के सभी वर्गों की भागीदारी होती है, तो नीतियां अधिक संतुलित और प्रभावी बनती हैं।

    उन्होंने विकसित भारत के लक्ष्य का उल्लेख करते हुए कहा कि देश तेजी से आगे बढ़ रहा है और इस यात्रा में महिलाओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री ने कहा कि विकास केवल आर्थिक प्रगति या बुनियादी ढांचे तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सामाजिक भागीदारी और समान अवसर भी शामिल हैं।

    अपने संबोधन में उन्होंने यह भी कहा कि पिछले वर्षों में महिला आरक्षण को लेकर कई बार चर्चा हुई है और अलग अलग समय पर इसके विरोध के स्वर भी सामने आए हैं। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में जनता अपने मत और निर्णय के माध्यम से जवाब देती है और समय के साथ समाज की सोच भी बदलती है। उनके अनुसार महिलाओं की भागीदारी को लेकर देश में लगातार सकारात्मक बदलाव देखने को मिला है।

    प्रधानमंत्री ने कहा कि यह विधेयक केवल एक कानून नहीं बल्कि एक ऐसी शुरुआत है जो देश की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था में बड़ा परिवर्तन ला सकती है। उन्होंने कहा कि इससे आने वाले समय में महिलाओं की भूमिका और अधिक मजबूत होगी और शासन व्यवस्था में नई ऊर्जा का संचार होगा।