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  • ग्वालियर में सड़क निर्माण की गुणवत्ता पर हाईकोर्ट सख्त, चीफ इंजीनियर और सब-इंजीनियर को अवमानना नोटिस

    ग्वालियर में सड़क निर्माण की गुणवत्ता पर हाईकोर्ट सख्त, चीफ इंजीनियर और सब-इंजीनियर को अवमानना नोटिस

    मध्य प्रदेश। के ग्वालियर में सड़क निर्माण की गुणवत्ता और उससे जुड़े सरकारी रिकॉर्ड को लेकर हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। सुनवाई के दौरान सड़क निर्माण की मूल फाइल उपलब्ध नहीं होने और अधिकारियों की ओर से दिए गए जवाबों पर अदालत ने नाराजगी जताई। मामले में चीफ इंजीनियर और सब-इंजीनियर को अवमानना का नोटिस जारी करते हुए दो दिन के भीतर जवाब पेश करने के निर्देश दिए गए हैं। साथ ही, सड़क निर्माण से संबंधित मूल रिकॉर्ड फाइल को सील कर सरकारी वकील की निगरानी में सौंप दिया गया है।

    यह मामला सड़क निर्माण की गुणवत्ता से संबंधित है, जिसमें अदालत के सामने मूल रिकॉर्ड पेश किया जाना था। सुनवाई के दौरान जब संबंधित फाइल उपलब्ध नहीं कराई जा सकी, तो हाईकोर्ट ने अधिकारियों से इसकी स्थिति स्पष्ट करने को कहा। इस पर चीफ इंजीनियर ने बताया कि मूल फाइल कार्यालय में रखी हुई है। अदालत ने उन्हें निर्देश दिया कि वे तत्काल कार्यालय जाकर फाइल लेकर आएं और उसे कोर्ट में प्रस्तुत करें।

    हालांकि, कार्यालय से लौटने के बाद चीफ इंजीनियर ने अदालत को बताया कि सड़क निर्माण की मूल फाइल सब-इंजीनियर के घर पर रखी हुई है। जवाब में आए इस बदलाव से अदालत की नाराजगी बढ़ गई। सरकारी रिकॉर्ड की उपलब्धता और उसे सुरक्षित रखने की व्यवस्था को लेकर सवाल उठे। अदालत ने अधिकारियों के बीच समन्वय और उनकी कार्यप्रणाली पर भी गंभीर टिप्पणी की। सुनवाई के दौरान अदालत ने आशंका जताई कि संबंधित अधिकारी आपस में मिले हुए हैं।

    मूल फाइल को लेकर सामने आई इस स्थिति के बाद हाईकोर्ट ने चीफ इंजीनियर और सब-इंजीनियर को अवमानना का नोटिस जारी किया। दोनों अधिकारियों को दो दिन के भीतर अपना जवाब देने के लिए कहा गया है। अब उन्हें अदालत के सामने यह स्पष्ट करना होगा कि सड़क निर्माण से जुड़ा महत्वपूर्ण सरकारी रिकॉर्ड निर्धारित स्थान पर उपलब्ध क्यों नहीं था और उसे पेश करने में परेशानी क्यों हुई। हालांकि, अधिकारियों के जवाब और मामले में आगे होने वाली सुनवाई के बाद ही स्थिति और स्पष्ट होगी।

    अदालत ने मामले से संबंधित मूल रिकॉर्ड फाइल को सील कराने का निर्देश भी दिया है। इसके बाद फाइल सरकारी वकील की निगरानी में रखी गई है। इस कदम का उद्देश्य रिकॉर्ड को सुरक्षित रखना और मामले की सुनवाई के दौरान उससे संबंधित दस्तावेजों की उपलब्धता सुनिश्चित करना है। सड़क निर्माण के रिकॉर्ड को लेकर पैदा हुई स्थिति ने सरकारी विभागों में दस्तावेजों के रखरखाव और जवाबदेही के मुद्दे को भी महत्वपूर्ण बना दिया है।

    मामले में सड़क की गुणवत्ता की जांच करने वाली एजेंसी की भूमिका भी सवालों के घेरे में आई है। सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष पेश रिपोर्ट में बताया गया कि भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण यानी एनएचएआई की सड़कों की जांच की प्रक्रिया करीब डेढ़ साल से जारी है। जांच में लग रहे लंबे समय और रिपोर्ट से संबंधित तथ्यों पर हाईकोर्ट ने नाराजगी व्यक्त की। अदालत ने जांच की प्रक्रिया और रिपोर्ट में सामने आए बिंदुओं पर सवाल उठाए हैं।

    इस मामले में अब दो प्रमुख पहलुओं पर ध्यान रहेगा। पहला, सड़क निर्माण की मूल फाइल उपलब्ध नहीं होने के संबंध में दोनों अधिकारियों की ओर से दिया जाने वाला जवाब और दूसरा, सड़क की गुणवत्ता की जांच तथा उससे संबंधित रिपोर्ट की स्थिति। हाईकोर्ट के निर्देशों के बाद संबंधित अधिकारियों को तय समय सीमा में अपना पक्ष रखना होगा। सड़क निर्माण की गुणवत्ता, सरकारी रिकॉर्ड का रखरखाव और जांच प्रक्रिया की जवाबदेही इस मामले की सुनवाई के अहम बिंदु बने हुए हैं।

  • CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक अवमानना की मांग, वकील ने अटॉर्नी जनरल को पत्र लिखकर कार्रवाई की अनुमति मांगी

    CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक अवमानना की मांग, वकील ने अटॉर्नी जनरल को पत्र लिखकर कार्रवाई की अनुमति मांगी

    नई दिल्ली ।मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट के वकील ब्रजेश सिंह ने अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमनी को पत्र लिखा है। पत्र में उन्होंने इस कार्रवाई के लिए आवश्यक अनुमति देने का अनुरोध किया है। यह मांग ऐसे समय सामने आई है, जब चुनाव आयोग के भीतर फैसलों को लेकर दो चुनाव आयुक्तों की कथित असहमतियों पर चर्चा तेज है।

    ब्रजेश सिंह ने अपने पत्र में चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता से जुड़े सवाल उठाए हैं। उन्होंने मीडिया में सामने आई जानकारी का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि मुख्य चुनाव आयुक्त के नेतृत्व में बहु-सदस्यीय चुनाव आयोग का संचालन इस तरह हुआ, मानो महत्वपूर्ण फैसले एक ही व्यक्ति द्वारा लिए जा रहे हों। पत्र में इसे सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों में बताई गई चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली से अलग बताया गया है।

    आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के लिए अटॉर्नी जनरल या सॉलिसिटर जनरल की लिखित सहमति आवश्यक होती है। मौजूदा स्थिति में ब्रजेश सिंह का पत्र इसी अनुमति के लिए भेजा गया है। यानी अभी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कोई आपराधिक अवमानना मामला शुरू नहीं हुआ है और पत्र के आधार पर आगे की प्रक्रिया अटॉर्नी जनरल की अनुमति पर निर्भर करेगी।

    इस मांग की पृष्ठभूमि में चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों से जुड़ी जानकारी भी है। चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की ओर से पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज किए जाने का दावा सामने आया है। इन आपत्तियों में मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने और बहाल करने, फॉर्म 6 में बदलाव तथा मतदाता सूची से जुड़े दूसरे विषयों पर सवाल उठाए जाने की बात कही गई है।

    विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर भी दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों की चर्चा हुई है। सामने आई जानकारी के मुताबिक, कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं को लेकर उन्होंने सवाल उठाए तथा यह दावा किया कि कुछ निर्णय उनकी जानकारी या मंजूरी के बिना लिए गए। मतदाता सूची के डिजिटल डाटा और उसके प्रबंधन से जुड़े विषय भी इन आपत्तियों में शामिल बताए गए हैं।

    इन घटनाक्रमों के बाद विपक्षी दलों की ओर से भी मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ सवाल उठाए गए हैं। कुछ विपक्षी दलों ने उनके इस्तीफे की मांग की है और एसआईआर की प्रक्रिया पर भी आपत्ति जताई है। पहले दिए गए महाभियोग नोटिस को लेकर भी राजनीतिक दबाव बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। इस नोटिस में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ पक्षपातपूर्ण और भेदभावपूर्ण आचरण सहित कई आरोप लगाए गए थे।

    हालांकि, चुनाव आयोग ने आंतरिक मतभेद या फैसलों में असहमति के दावों को अलग तरीके से प्रस्तुत किया है। आयोग का कहना है कि उसके सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए जा रहे हैं और एसआईआर से जुड़े निर्णयों को भी सभी तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी प्राप्त है। आयोग ने यह भी कहा है कि वैचारिक मतभेद को टकराव नहीं माना जाना चाहिए।

    आयोग के अनुसार, व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए सुझाव देना केवल चुनाव आयुक्तों तक सीमित नहीं है, बल्कि आयोग का प्रत्येक अधिकारी अपने सुझाव देने के लिए अधिकृत है। इस तरह एक ओर कथित लिखित आपत्तियों और दूसरी ओर आयोग की सर्वसम्मति वाली सफाई के बीच विवाद बना हुआ है।

    अब ब्रजेश सिंह द्वारा अटॉर्नी जनरल को भेजे गए पत्र के बाद मामले का कानूनी पहलू भी चर्चा में आ गया है। पत्र में सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों और चुनाव आयोग की बहु-सदस्यीय व्यवस्था का हवाला देते हुए आपराधिक अवमानना की कार्यवाही की अनुमति मांगी गई है। आगे की स्थिति अटॉर्नी जनरल की ओर से लिए जाने वाले निर्णय पर निर्भर करेगी।

  • जजों पर बेबुनियाद आरोपों के गंभीर परिणाम, सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी; गुलशन पाहुजा को राहत के लिए हाई कोर्ट जाने की सलाह

    जजों पर बेबुनियाद आरोपों के गंभीर परिणाम, सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी; गुलशन पाहुजा को राहत के लिए हाई कोर्ट जाने की सलाह

    नई दिल्ली । यूट्यूबर गुलशन पाहुजा की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने न्यायपालिका के खिलाफ बिना ठोस आधार लगाए जाने वाले आरोपों पर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी न्यायिक अधिकारी पर भ्रष्टाचार जैसे गंभीर आरोप बिना पर्याप्त साक्ष्य के लगाना उचित नहीं है। साथ ही सर्वोच्च अदालत ने इस स्तर पर किसी भी प्रकार की तत्काल राहत देने से इनकार करते हुए याचिकाकर्ता को राहत के लिए पहले दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की सलाह दी।

    मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि न्यायिक अधिकारियों के विरुद्ध लगाए जाने वाले आरोपों का व्यापक सामाजिक प्रभाव पड़ता है। अदालत ने टिप्पणी की कि जब किसी जज या न्यायिक अधिकारी पर बिना प्रमाण के भ्रष्टाचार के आरोप लगाए जाते हैं तो इससे न केवल उनकी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा प्रभावित होती है, बल्कि पूरे न्यायिक तंत्र की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े हो सकते हैं। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में जिम्मेदारी और तथ्यों का विशेष महत्व होता है।

    सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वह फिलहाल मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं कर रहा है। अदालत का कहना था कि याचिकाकर्ता पहले ही आपराधिक अवमानना के मामले में दोषी ठहराए जा चुके हैं और न्यायिक प्रक्रिया के तहत आत्मसमर्पण भी कर चुके हैं। ऐसे में वर्तमान परिस्थिति में तत्काल राहत प्रदान करना उचित नहीं माना जा सकता।

    पीठ ने सुनवाई के दौरान यह भी उल्लेख किया कि पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने उनकी सजा के निलंबन से जुड़ी अर्जी पर विचार किया था। हालांकि बाद में आत्मसमर्पण की समय-सीमा बढ़ाने का अनुरोध स्वीकार नहीं किया गया, जिसके बाद याचिकाकर्ता ने न्यायिक आदेश का पालन करते हुए आत्मसमर्पण कर दिया। सर्वोच्च अदालत ने कहा कि यदि सजा के निलंबन या अन्य अंतरिम राहत की आवश्यकता है तो इसके लिए संबंधित हाई कोर्ट के समक्ष आवेदन करना उचित कानूनी प्रक्रिया होगी।

    अदालत ने यह भी बताया कि याचिकाकर्ता द्वारा आपराधिक अवमानना की दोषसिद्धि को चुनौती देने वाली अपील अभी नियमित सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं हो सकी है। इसके पीछे याचिका में मौजूद कुछ तकनीकी कमियों का समय पर निराकरण नहीं होना बताया गया। अदालत ने संकेत दिया कि निर्धारित प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही अपील पर आगे विचार किया जा सकेगा।

    मामला उन वीडियो से जुड़ा है जिन्हें यूट्यूबर गुलशन पाहुजा ने अपने डिजिटल मंच पर प्रकाशित किया था। आरोप था कि इन वीडियो में न्यायपालिका और कुछ न्यायिक अधिकारियों के संबंध में आपत्तिजनक टिप्पणियां की गई थीं। इस मामले में कुछ न्यायिक अधिकारियों ने अदालत का रुख करते हुए आपराधिक अवमानना की कार्रवाई की मांग की थी। सुनवाई के बाद दिल्ली हाई कोर्ट ने उन्हें दोषी ठहराते हुए छह महीने के कारावास की सजा सुनाई थी।

    सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि संबंधित वीडियो में शामिल दो अधिवक्ताओं ने अदालत के समक्ष बिना शर्त माफी मांग ली थी। उन्होंने कहा था कि वीडियो के प्रकाशन और उसके साथ लगाए गए शीर्षकों की जानकारी उन्हें नहीं थी। अदालत ने उनकी माफी स्वीकार करते हुए उनके विरुद्ध कार्रवाई समाप्त कर दी थी, जबकि मुख्य मामले में यूट्यूबर के खिलाफ कार्रवाई जारी रही।

    यह मामला एक बार फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, न्यायपालिका की गरिमा और सोशल मीडिया पर सार्वजनिक बयानों की जिम्मेदारी जैसे महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्नों को सामने लेकर आया है। विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल मंचों पर किए जाने वाले दावों और आरोपों के लिए तथ्यात्मक आधार और कानूनी जिम्मेदारी दोनों का पालन आवश्यक है, ताकि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और न्यायिक संस्थाओं की गरिमा के बीच संतुलन बना रहे।

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